9/29/2020

सत्ता का सिद्धांत, मैक्स वेबर

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मैक्स वेबर का सत्ता का सिद्धांत 

समाजशास्त्रीय चिन्तन के क्षेत्र मे वेबर द्वारा प्रतिपादित सत्ता की अवधारणा का महत्वपूर्ण स्थान है। वेबर की अवधारणा मौलिक है। मैक्स वेबर के अनुसार," समाज मे सत्ता विशेष रूप से आर्थिक आधारों पर आधारित होती है, यद्यपि आर्थिक कारक सत्ता के निर्धारण मे एकमात्र कारक नही कहा जा सकता है।" सत्ता उन्ही के हाथों मे रहती है जिनके पास सम्पत्ति एवं उत्पादन के साधन होते है। इसलिए ही पूंजीपति वर्ग उत्पादन के साधनों एवं मजदूरों की सेवाओं पर आधिकार पाने का प्रयत्न करते है और मजदूर भी अपने श्रम के बदले अधिकाधिक अधिकार पाने का प्रयत्न करते है। सत्ता के द्वारा ही पूंजीपति मजदूर की स्वतंत्रता को खरीदता है और उसे श्रमिक पर एक विशेष प्रकार का अधिकार प्राप्त होता है। संक्षेप मे, आर्थिक जीवन मे एक स्थिर एवं संस्थागत अर्थव्यवस्था समाज मे कतिपय विशिष्ट वर्ग को सत्ता एवं अधिकार प्रदान करती है। इस सत्ता के आधार पर ही यह वर्ग अन्य वर्गों पर प्रभुत्व रखता है और उनसे उच्च परिस्थिति धारण करता है।

सत्ता का अर्थ 

सत्ता का अर्थ जानने से पूर्व " शक्ति " को समझ लेना आवश्यक है क्योंकि इन दोनों मे घनिष्ठ सम्बन्ध है। वेबर के अनुसार " शक्ति उन लोगों मे निहित होती है जो दूसरों के व्यवहार को उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रभावित कर सकते है। इस प्रकार शक्ति का तात्पर्य है, एक व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा को दूसरे पर थोपना और जैसा वह चाहता है वैसा ही दूसरों से व्यवहार करवा लेना। जब इस शक्ति को वैधानिक स्वीकृति मिल जाती है तो उसे सत्ता कहते है।

बीरस्टीड का भी मत है कि सत्ता शक्ति से भिन्न होती है। सत्ता का सम्बन्ध पद या प्रस्थिति से होता है जबकि शक्ति का व्यक्ति से। सत्ता सदैव संस्थाकृत होती है अतः विशिष्ट रूप से मूल्यवान समझी जाती है। सत्ता वैधानिक शक्ति है, जिसका पालन व्यक्ति स्वेच्छा से करता है।

इस प्रकार जब कोई व्यक्ति किसी पद पर आसीन होता है और उस पद से सम्बंधित वैधानिक शक्ति का प्रयोग करता है तब उसे " सत्ता का उपभोग " करना कहते है। यह शक्ति संस्थागत होती है न कि वैयक्तिक।

सत्ता की विशेषताएं (satta ki visheshta)

मैक्स वेबर ने सत्ता का विश्लेषण करते हुये उसकी प्रमुख विशेषताएं भी बतलाये है। ये विशेषताएं इस प्रकार से है--

1. शक्ति का एक रूप  

 सत्ता शक्ति का ही एक रूप है। शक्ति को जब सामाजिक, वैधानिक तथा सांस्कृतिक मान्यता मिलती है तो वह सत्ता के रूप मे प्रकट होती है।

2. संस्थागत 

सत्ता हमेशा संस्थागत होती है। सत्ता के सभी प्रकार नियम, कार्य-प्रणालियां, रीति-रिवाज, प्रथायें, परम्परायें, मान्यतायें आदि से मुक्त होते है। इसलिये सत्ता कभी भी वैयक्तिक नही होती।

3. प्रस्थिति से सम्बंधित 

सत्ता का सम्बन्ध कभी भी विशिष्ट व्यक्ति से नही होता है। वह तो प्रस्थिति से सम्बंधित होती है। जो व्यक्ति उस प्रस्थिति पर आरूढ़ होता है वह सत्ता का प्रयोग करता है।

4. विशेष अधिकार शक्ति 

सत्ता पर आसीन व्यक्ति को उस पर से सम्बंधित विशेष अधिकार एवं शक्तियाँ प्राप्त होती है। इन शक्तियों एवं अधिकारों का प्रयोग वह संस्थागत तरीके से ही कर सकता है।

5. निश्चित क्षेत्र 

प्रत्येक सत्ता का एक निश्चित क्षेत्र होता है। एक व्यक्ति अपनी सत्ता का प्रयोग इसी सीमा मे करता है। जैसे-- एक व्यक्ति पिता है। पिता के रूप मे उसकी सत्ता केवल स्वयं के बच्चों तक सीमित है। इस सीमा से बाहर वह अपनी इस शक्ति का प्रयोग नही कर सकता।

6. सत्ता का अस्तित्व 

सत्ता का अस्तित्व समाज के प्रत्येक क्षेत्र मे पाया जाता है। पारिवारिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों मे हमें सत्ता के दर्शन होते है।

7. सत्ता मे शक्ति को नैतिकता, सांस्कृतिक मूल्य, धर्म, न्याय, प्रचलित कानून आदि के द्वारा उचित ठहराया जाता है। इसलिए व्यक्ति स्वेच्छा से सत्ता का पालन करता क्योंकि समाज की मांग भी यही होती है।

सत्ता के प्रकार (satta ke prakar)

वेबर के सत्ता के तीन प्रकारों का उल्लेख किया है जो इस प्रकार है--

1. वैधानिक सत्ता (legal authority) 

वेबर ने लिखा है कि राज्य द्वारा बनायें गये कानूनों के अनुसार कुछ पद ऐसे होते है जिनके साथ एक विशिष्ट प्रकार की सत्ता जुड़ी होती है अतः जो भी व्यक्ति उस पद को धारण करता है वह उस पद से जुड़ी सत्ता का उपयोग करता है, उसकी इसी सत्ता को हम वैधानिक सत्ता कहते है। बेवर के अनुसार नौकरशाही व्यवस्था वैधानिक सत्ता का सबसे प्रमुख उदाहरण है। जैसे जिलाधीश जो कि जिले का प्रमुख होता है यदि कोई व्यक्ति पद पर पदस्थ होता है तो वह इस पद से सम्बंधित समस्त शक्तियों व अधिकारों का प्रयोग करता है एवं उसके अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों को उसके आदेशों का पालन अनिवार्यतः करना पड़ता है।

वैधानिक सत्ता का स्त्रोत व्यक्ति की निजी प्रतिष्ठा मे निहित नही होता बल्कि उन नियमों मे निहित होता है जिनके तहत वह एक विशिष्ट पद पर आसीन होता है। स्पष्ट है कि वैधानिक सत्ता का स्त्रोत स्वयं राज्य के कानून होते है। वैधानिक सत्ता का अधिकार क्षेत्र सीमित व निश्चित होता है उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर वह अपनी सत्ता का प्रयोग नही कर सकता जैसे किसी विश्वविद्यालय की व्यवस्था को सुरारू रूप से संचालित करने के लिये कुलपति, कुलसचिव, डीन एवं विभागाध्यक्ष सभी को एक दूसरे से अलग अलग अधिकार या सत्ता प्रदान की गयी है। इसमे से कोई भी अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कोई कार्य करने के लिए स्वतंत्र नही होता। इसके साथ ही कोई व्यक्ति यदि किसी अधिकारी के पद पर कार्यरत् है तो कार्यालय मे उसके जो अधिकार है वह अधिकार घर पर नही है घर पर वह पति या पिता की सत्ता का उपयोग करेगा न कि अधिकारी की।

2. परम्परागत सत्ता 

इस प्रकार की सत्ता व्यक्ति को वैधानिक नियमों के अनुसार नही वरन् परम्परा द्वारा स्वीकृत पर पर आसीन होने के कारण प्राप्त होती है। प्रत्येक समाज मे परम्परागत आधार पर अनेक पद लम्बे समय से चले आ रहे होते है। इन पदों का अस्तित्व विश्वासों पर एवं सामाजिक मूल्यों पर टिका हुआ होता है। जब कोई व्यक्ति इन पदों पर आसीन होता है तब उसे जो सत्ता प्राप्त होती है उसे "परम्परागत सत्ता" कहते है।

परम्परागत सत्ता परम्पराओं पर आधारित होती है। वेबर के अनुसार परम्परावादी सत्ता का स्पष्टीकरण निम्नलिखित शब्दों मे किया गया है-- ऐसी सत्ता वैज्ञानिक आधार पर प्राप्त नही होती। यह उन विश्वासों, आदर्शों, परम्पराओं के अनुसार प्राप्त होती है जो बहुत समय से समाज मे चली आ रही है। समाज मे प्रचलित परम्पराओं के अनुसार प्राप्त होती है जो बहुत समय से समाज मे चली आ रही है। समाज मे प्रचलित परम्पराओं पर आधारित सत्ता को वेबर ने परम्परागत सत्ता कहा है।

इस प्रकार की सत्ता का उदाहरण," पितृसत्तात्मक परिवार मे घर का मुखिया का सभी सदस्यों पर अधिकार होता है। सभी सदस्य उसकी आज्ञा का पालन केवल इस कारण करते है क्योंकि ऐसा पीढ़ी दर पीढ़ी से होता चला आ रहा है। इस प्रकार उसकी आज्ञा मानना उसके परिवार की एक परम्परा है। अतः वे उस सत्ता के समक्ष अपने को झुकाने मे ही अपनी भलाई समझते है। इस सत्ता का आधार अतार्किक है।

3. करिश्माई अथवा चमत्कारी सत्ता 

इस प्रकार की सत्ता का आधार न तो वैधानिक होता है और न ही परम्परागत। इस प्रकार की सत्ता का आधार होता है करिश्मा या चमत्कार। करिश्मा का अर्थ है सामान्य से भिन्न कुछ विशिष्ट अथवा असाधारण गुणों का होना। इन्हीं गुणों के कारण व्यक्ति कोई चमत्कार अथवा करिश्मा दिखाता है। जिस व्यक्ति मे इस प्रकार के गुण होते है वह इस प्रकार की सत्ता का अधिकारी होता है।

मैक्स वेबर द्वारा प्रयुक्त किया गया " Charima " शब्द किसी चमत्कारी शक्ति का प्रतीक है। यह चमत्कारिक शक्ति व्यक्तियों के लिए वास्तविक भी हो सकती है और अनुमानित भी। वेबर का चमत्कारिक शक्ति (सत्ता) से आश्य, व्यक्ति से ऊपर किसी शासन या सत्ता से है, जिनके समक्ष शासित वर्ग के लोग इस कारण झुक जाते है, क्योंकि उनका उस शासन एवं सत्ता के प्रति विशेष व्यक्ति की चमत्कारी शक्ति मे विश्वास होता है। चमत्कारिक सत्ताधारी शक्ति, पीर-पैगम्बर, धार्मिक नेता, अवतार, सैनिक योद्धा आदि होते है।

इन व्यक्तियों मे कुछ ऐसे गुण पाये जाते है जिनको सामान्यतया व्यक्तियों मे नही पाया जाता है। समाज के सदस्यों का यह विश्वास होता है कि इन व्यक्तियों मे कोई अद्भूत देवी शक्ति का निवास है। वेबर ने चमत्कारिक शक्ति का आधार जादू-चमत्कार और नेताशक्ति मे विश्वास बतलाया है।चमत्कारिक सत्ताधारी व्यक्ति या तो कोई चमत्कार को दिखलाकर या फिर युद्ध मे विजय प्राप्त करके अथवा किसी अन्य सफलता को प्राप्त कर, दूसरे व्यक्तियों के अंदर यह विश्वास जमा देता है कि वह वास्तव मे किसी न किसी प्रकार की शक्ति रखता है। यह सत्ता अस्थायी प्रकृति की होती है। इसका प्रभाव व्यक्ति पर तभी तक रहता है जब तक कि सत्ताधारी व्यक्ति अपने चमत्कारों का प्रदर्शन करता रहता है। चमत्कारिक सत्ता का आधार तर्कहीन सिद्धांत तथा चमत्कार होते है। इसकी व्याख्या तार्किक आधार पर नही की जा सकती। 

मैक्स वेबर के सत्ता के सिद्धांत की आलोचना 

1. सत्ता की व्याख्या मे वेबर के कथन ही स्वयं परस्पर विरोधी है। 

वेबर ने जहाँ एक ओर सत्ता की व्याख्या " संस्थागत शक्ति " अथवा कानूनों द्वारा प्राप्त अधिकारों की शक्ति के रूप मे की है, दूसरी ओर उन्होंने करिश्माई सत्ता एवं परम्परागत सत्ता को एक विशेष प्रारूप के रूप मे स्वीकार किया है। वस्तुतः शक्ति के संस्थात्मक रूप के आधार पर केवल वैधानिक सत्ता को उचित ठहराया जा सकता है अन्य को नही।

2. वेबर ने बताया है कि किसी भी समाज मे एक ही समय पर सत्ता के एक से अधिक प्रकार मौजूद हो सकते है, लेकिन वास्तविक मे एक विशेष समय मे किसी समाज मे सत्ता का एक विशेष प्रकार ही अधिक प्रभावपूर्ण होता है।

3. आधुनिक समाजों मे केवल वैधानिक सत्ता ही प्रभावी नही है बल्कि ऐसे समाजों मे भी कुछ नेता अपने आपको करिश्माई सिद्ध कर सत्ता प्राप्ति मे सफल हो जाते है।

उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद भी बेवर का सत्ता का सिद्धांत उनके राजनीतिक समाजशास्त्र का प्रमुख आधार है। वास्तव मे वेबर सत्ता की अवधारणा एवं विभिन्न प्रकारों द्वारा यह स्पष्ट करना चाहते थे कि वैधानिक शक्ति के रूप मे होने वाला परिवर्तन सामाजिक व्यवस्था मे भी परिवर्तन उत्पन्न करता है। वेबर ने सत्ता की विवेचना वैज्ञानिक आधार पर करके मानव व्यवहारों की प्रकृति को भी समझाया है कि किसी प्रकार कोई अधिकार नही मिलने के बावजूद भी लोग एक सत्ताधारी व्यक्ति की श्रेष्ठता को स्वीकार कर लेते है।

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