9/28/2020

आत्महत्या का सिद्धांत, दुर्खीम

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दुर्खीम ने आत्महत्या के सामाजिक सिद्धांत की विशद् विवेचना अपनी पुस्तक "आत्महत्या" (The Suicide) मे की है, जो सन् 1897 मे प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक मे उन्होने आत्महत्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है। आत्महत्या से सम्बंधित विभिन्न आंकड़ों को एकत्रित कर उन्होंने आत्महत्या को एक सामाजिक घटना के रूप मे प्रमाणित करने का प्रयास किया है। 

दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धांत (durkheim aatmahatya ka siddhant)

दुर्खीम की कृति आत्महत्या तीन भागों मे विभक्त है। सर्वप्रथम दुर्खीम ने प्रस्तावना मे आत्महत्या की परिभाषा वैषयिक आधार पर दी है एवं इसकी वैयक्तिक एवं सामाजिक प्रकृति मे भेद किया है। पुस्तक के प्रथम भाग मे दुर्खीम ने अन्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित आत्महत्या के सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या करते हुए उनकी अनुपयुक्तता सिद्ध की है।

पुस्तक के दूसरे भाग मे दुर्खीम ने उन सामाजिक कारकों की व्याख्या की है जो आत्महत्या के लिए उत्तरदायी होते है। इसी संदर्भ मे उन्होने आत्महत्या के तीन प्रकारों-- अहंवादी आत्महत्या, परार्थवादी आत्महत्या एवं आदर्शहीन आत्महत्या की विवेचना प्रस्तुत की है। 

पुस्तक के तीसरे भाग मे दुर्खीम ने समूहवादी सिद्धांत की स्थापना करके आत्महत्या की सामाजिक प्रकृति को स्पष्त किया है। 

आत्महत्या की परिभाषा; दुर्खीम कहते है कि आत्महत्या भी सामान्य बोलचाल की भाषा का एक शब्द है, अतः सामान्यतः व्यक्ति इसका अर्थ जानते है, परंतु दुर्खीम के अनुसार वैज्ञानिक अध्ययन के लिये यह आवश्यक है कि अनुसंधानकर्ता इसका अर्थ भलीभाँति जान लें।

आत्महत्या का अर्थ स्पष्ट करते हुये दुर्खीम लिखते है कि सामान्यतः यह समझा जाता है कि आत्महत्या एक हिंसात्मक कार्य है, जिसमे कुछ शारीरिक शक्ति का प्रयोग करके प्राणान्त किया जाता है, पर यह भी हो सकता है कि एक विशुद्ध नकारात्मक मनोवृत्ति या केवल कार्य निवृत्त (Abstention) से भी वह परिणाम हो सकते है। उदाहरण के लिये खाना खाने से इन्कार करना या खाना नही खाना भी उतना ही आत्मघाती हो सकता है; जितना कि एक चाकू या पिस्तौल से स्वयं का आत्म विनाश करना। 

आत्महत्या को परिभाषित करते हुये दुर्खीम लिखते है; आत्महत्या शब्द मृत्यु की उन समस्त घटनाओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो स्वयं मरने वाले की सकारात्मक या नकारात्मक क्रिया का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम होती है, जिसके भावी परिणाम (मृत्यु) को वह जानता है।  

इस प्रकार दुर्खीम कहते है कि आत्महत्या मे व्यक्ति यह निश्चित कर लेता है कि उसे अपना जीवन त्यागना है। अतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण से आत्महत्या उसे कहेंगे, जिसमे व्यक्ति के द्वारा जीवन के त्याग करने की इच्छा निहित हो। इस प्रकार आत्महत्या अपनी इच्छा या जानबूझकर आत्म हनन करने वाली क्रिया का नाम है।

दुर्खीम ने आत्महत्या से सम्बंधित अपने पूर्ववर्ती सभी सिद्धांतों को अस्वीकार करते हुए कहा है कि," इन सिद्धांतों मे मानसिक कारण, निर्धनता,  रिराशा, प्रेम मे असफलता आदि जो कारण आत्महत्या के लिये बताये गये है वे सब वैयक्तिक कारण है। इनके आधार पर आत्महत्या की वास्तविक व्याख्या संभव नही है समाज या समूह व्यक्ति पर अस्वस्थ दबाव डालता है जिसके कारण व्यक्ति के मन मे आत्महत्या के अनुकूल भावनाऐं उत्पन्न होती है।

दुर्खीम के अनुसार समाज या समूह व्यक्ति पर जो दबाव डालता है वह दो प्रकार का होता है--

1. स्वस्थ दबाव  

एक सामाजिक प्राणी के रूप मे व्यक्ति की अनेक मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक आवश्यकताऐ होती है जिन्हें वह दूसरों की सहायता से ही पूर्ण कर सकता है। इस प्रकार ये आवश्यकताएं समाज के सभी सदस्यों को एक-दूसरे से बांधती है। यह बन्धन या दबाव प्रत्येक व्यक्ति पर रहता है। इसके फलस्वरूप सभी व्यक्तियों को सभी आवश्यकताओं की पूर्ति सुगमता से होती रहती है और व्यक्ति को जीने मे आनन्द आता है। यह समाज का व्यक्ति पर स्वस्थ दबाव है। 

2. अस्वस्थ दबाव

स्वस्थ दबाव के विपरीत समाज या समूह व्यक्ति के समक्ष ऐसी परिस्थितियां पैदा करता है जो व्यक्ति को सामूहिक जीवन  से उखाड़ देती है और व्यक्ति यह सोचने लगता है कि संपूर्ण विश्व मे उसका अपना कोई नही है या समाज व्यक्ति के व्यक्तित्व को इस सीमा तक निगल जाता है कि उसकी अपनी अलग पहचान ही न हो, तब व्यक्ति वही करता है जैसा समाज चाहता है। यह व्यक्ति पर समाज का अस्वस्थ दबाव है। अस्वस्थ दबाव के फलस्वरूप ही व्यक्ति आत्महत्या करता है। 

एक व्यक्ति जिसका अपना परिवार है। परिवार मे उसकी पत्नी, बच्चे, माता-पिता है, जो उसे चाहते है। दिनभर कार्य करने के पश्चात, वह घर की ओर दौड़ता है क्योंकि उसकी पत्नी उसकी राह देखती है, बच्चे उसे प्रेम करते है, माता-पिता उसे स्नेह प्रदान करते है। यह स्थिति उसके जीवन को आनंददायक बना देती है। ऐसी स्थिति मे कोई भी व्यक्ति आत्महत्या नही करेगा। इसके विपरीत यदि अपने परिवार वालों से प्रेम, स्नेह, त्याग आदि प्राप्त ना हो तो वह दुखी हो जाता है। पूरे संसार मे वह स्वयं को अकेला समझता है। वह अकेलापन, निराशा, असुखी और अतृप्त भावनाओं से पीड़ित हो जाता है और आत्महत्या कर लेता है। 

आत्महत्या सम्बन्धी अपने विचारों को पुष्ट करने के लिये दुर्खीम ने फ्रांस, इटली, ब्रिटेन आदि देशों की यात्रा कर इस सम्बन्ध मे काफी मात्रा मे आंकड़े एकत्रित किये। इन आंकड़ों द्वारा उन्होंने निम्नलिखित निष्कर्ष प्रस्तुत किये है--

1. आत्महत्या की दर हर वर्ष लगभग समान होती है।

2. सार्दियों की तुलना मे गर्मियों मे आत्महत्यायें अधिक होती है।

3.स्त्रियों की अपेक्षा पुरूष अधिक आत्महत्या करते है।

4. कम आयु वालो की अपेक्षा अधिक आयु के व्यक्तियों मे आत्महत्याओं की दर अधिक पाई जाती है।

5. गाँवों की तुलना मे शहरों मे अधिक आत्महत्याऐं होती है।

6. सामान्य लोगों की तुलना मे सैनिक अधिक आत्महत्या करते है।

7. कैथोलिक धर्म मानने वालों की अपेक्षा प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायी अधिक आत्महत्या करते है।

8. विवाहितों की तुलना मे अविवाहित, विवाह-विच्छेदित, विधुर तथा विधवाऐं अधिक आत्महत्या करते है।

9. विवाहितों मे भी बच्चे वाले व्यक्तियों की अपेक्षा वे व्यक्ति अधिक आत्महत्या करते है जो नि:संतान होते है।

आत्महत्या के कारण (aatmahatya ke karan)

(अ) मनोव्याधिकीय अवस्थाएँ और आत्महत्या 

मनोव्याधिकीय कारकों मे विभिन्न विद्वानों ने पागलन, स्नायुदोष, अत्यधि मद्यपान के कारण लोग आत्महत्याएँ करते है। परन्तु दुर्खीम ने स्पष्ट किया कि इनमे से किसी भी कारण के आधार पर आत्महत्या की विवेचना नही कि जा सीती। दुर्खीम का कथन है कि इनके साथ मानसिक अलगाव, तथा विशेष सामाजिक दशाएँ मौजूद हो तभी आत्महत्या घटित हो सकती है। 

(ब) मनोजैवकीय कारक और आत्महत्या 

आत्महत्या के गैर-सामाजिक कारकों मे कुछ सामान्य जैवकीय अवस्थाएँ भी महत्वपूर्ण है। जीववादी यह मानते है कि एक विशेष शारीरिक रचना एवं वंशानक्रमण से प्राप्त होने वाली विशेषताएं भी व्यक्ति को आत्मसात की प्रेरणा देती है। दुर्खीम ने विभिन्न तथ्यों के द्वारा यह प्रमाणित किया है कि प्रजाति और पैतृकता के साथ आत्महत्या का कारणात्मक संबंध स्थापित नही किया जा सकता। 

दुर्खीम का कथन है कि कुछ वैज्ञानिकों ने प्रजाति तथा पैतृकता के आधार पर आत्महत्या की विवेचना की है।  परन्तु यह उचित नही है। यदि ऐसा होता तो एक प्रजाति के विभिन्न राष्टों मे आत्महत्या की प्रवृत्ति मे समानताएं दिखाई देती। परन्तु वास्तव मे ऐसा नही है। इनके साथ सामाजिक दशाएँ भी सम्मिलित हो तब आत्महत्या होती है।

(स) भौगोलिक कारक 

भौगोलिकवादी, आत्महत्या और भौगोलिक दशाओं के बीच एक प्रत्यक्ष संबंध मानते है। मोरसेलि, माॅण्टेरक्यु, फेरी आदि भौगोलिकवादियों ने आत्महत्या को  भौगोलिक दशा का परिणाम माना है। दुर्खीम के अनुसार " भौगोलिक पर्यावरण प्रत्यक्ष रूप से न तो सामाजिक जीवन को तीव्रता प्रदान करते है और न ही आत्महत्याओं को बढ़ाने मे इनका कोई प्रभाव होता है। आत्महत्याएँ सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर है। भौगोलिक कारक प्रत्यक्ष रूप से आत्महत्या को प्रेरित नही करते। परन्तु इनके साथ सामाजिक कारण हो जाते है तब आत्महत्याएं होती है। दुर्खीम ने सर्दी की अपेक्षा गर्मियों मे अधिक आत्महत्याऐं होती है ऐसा निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। 

आत्महत्या के प्रकार (aatmahatya ke prakar)

दुर्खीम आत्महत्या को एक सामाजिक घटना मानते है एवं सामाजिक घटना के रूप मे आत्महत्या के सामाजिक कारणों पर बल देते है। दुर्खीम ने आत्महत्या के आँकड़ों का सांख्यकीय विश्लेषण किया है तथा आँकड़ों के आधार पर आत्महत्या को तीन श्रेणियों मे वर्गीकृत किया है। आत्महत्या के तीन प्रकार इस प्रकार से है--

1. अहंवादी आत्महत्या (Egoistic Suicide

दुर्खीम कहते है कि अहंवादी आत्महत्या सामान्यतः तब होती है, जब व्यक्ति और समूह का संबंध अत्यधिक ढीला, अव्यवस्थित और अपर्याप्त होता है। जब व्यक्ति अपने आपको समाज एवं सामूहिकता से पृथक या कटा हुआ पाता है तो वह धीरे-धीरे एकाकी हो जाता है। उसकी सामूहिक सहभागिता घटने लगती है। समूह के लिए उस व्यक्ति का जीवन कम महत्वपूर्ण हो जाता है। इस रूप मे वह कड़ी (Link) जो कि व्यक्ति को समाज से बांधती है, कमजोर पड़ जाती है। अतः समाज से तिरस्कृत व्यक्ति यह सोचना लगता है कि इस संसार मे कोई उसका अपना नही है, जो उसके साथ सहानुभूति रखता हो। उसे यह अनुभव होता है कि परिवार या समाज मे उसका कोई भी स्थान नही है। उसकी अवहेलना हो रही है वह खुद को बहुत ही एकेला महसूस करता है। यह परिस्थिति व्यक्ति के अहं (Ego) को आघात पहुँचाती है। इस आघात से उद्वेलित होकर व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। वर्तमान समय मे इस प्रकार की आत्महत्यायें अधिक देखने को मिलती है।

2. परार्थवादी आत्महत्या 

परार्थवादी आत्महत्या अहंवादी आत्महत्या का बिल्कुल विपरीत रूप है। इस तरह की आत्महत्या व्यक्ति स्वयं के लिए नही अपितु समाज के लिए करता है। दुर्खीम के मत मे, परार्थवादी आत्महत्याएँ उन समाजों मे पायी जाती है जहाँ सामाजिक एकीकरण की भावना आवश्यकता से अधिक गहन होती है।" सामाजिक एकीकरण की अधिकता के कारण स्वयं व्यक्ति के व्यक्तित्व का कोई मूल्य नही रहता। केवल समाज ही उसके प्रत्येक क्रिया का निर्देशक होता है और व्यक्ति यंत्रवत सामूहिक विचार , सामूहिक रूचि एवं सामूहिक हित का अनुसरण करता है। ऐसी स्थिति मे व्यक्ति जो भी सोचता है या करता है वह सब कुछ समाज या समूह की दृष्टि से करता है। इसलिए समूह अथवा समाज उससे बलिदान की मांग भी करता है तो वह सहर्ष बलिदान कर देता है। ऐसी आत्महत्याओं को दुर्खीम ने परार्थवादी आत्महत्या की संज्ञा दी है। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाषचंद्र बोस और सैकड़ों स्वतंत्रता सैनानी जिन्होंने अपने देश के लिए बलिदान किया है, वे सभी इस श्रेणी के अंतर्गत आते है। 

दुर्खीम ने अनेक उदाहरणों के द्वारा परार्थवादी आत्महत्या की प्रकृति को स्पष्ट किया है। इन उदाहरणों मे आत्महत्या की परम्परात्मक प्रवृत्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि डेनमार्क के सैनिक वृद्धावस्था या रोग के कारण चारपाई पर मरना अपमान समझते थे। अतः वे इस स्थिति से बचने के लिए पहले ही आत्महत्या कर लेते थे। 

स्पेन, हरूली आदि देशों के निवासी भी वृद्धावस्था के प्रारंभ हो पर आत्महत्या कर लेते थे। 

सियोस मे एक निश्चित आयु पूर्ण हो जाने पर लोग विधिवत उत्सव मनाते हुए विषपान करके अपने जीवन का अंत कर लेते थे। 

गाॅल और हवाई द्वीपों मे मुखिया की मृत्यु के पश्चात उसके अनुयायी एवं सेवक भी आत्महत्या कर लेते थे।

भारत मे सती-प्रथा के अंतर्गत पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी अपने पति की चिता के साथ जलकर मर जाती थी। मध्यकाल मे भारतीय स्त्रियां जौहर करती करती थी। भारत मे संन्यासी ब्रह्रालीन होने के लिए समाधि ले लेते थे। 

3. अस्वाभाविक आत्महत्या 

जब व्यक्ति के सामूहिक जीवन मे अचानक तथा अस्वाभाविक परिवर्तन आ जाता है, तब व्यक्ति के सम्मुख नई परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती है। इनसे व्यक्ति को अनुकूलन करना पड़ता है। यदि वह अनुकूलन करने मे असमर्थ हो जाता है तो वह मानसिक अशान्ति तथा तनाव महसूस करता है। इस तनाव से मुक्त होने के लिये वह आत्महत्या कर लेता है। एकाएक दिवालिया होने पर अथवा भारी लाॅटरी खुल जाने पर अतिशय दु:ख या अत्यधिक खुशी मे व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों मे व्यक्ति के जीवन मे एकाएक परिवर्तन हो जाता है जिनके साथ व्यक्ति सहजता से अनुकूलन नही कर पाता और वह आत्महत्या कर लेता है। यह अस्वाभाविक आत्महत्या है।

आत्महत्या की रोकथाम के उपाय 

दुर्खीम ने आत्महत्या को एक व्याधिकीय घटना मानकर उसके निराकरण के उपाय भी बतलाये है, जो इस प्रकार से है--

1. दुर्खीम के अनुसार आत्महत्या जैसी समस्या के निराकरण के लिए नैतिक दण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिए। जैसे आत्महत्यारे को अंतिम संस्कार के सम्मान से वंचित करके एवं नागरिक, राजनैतिक और परिवारिक अधिकार छीनकर आत्महत्याओं को कम किया जा सकता है।

2. इस समस्या के निराकरण के लिए आवश्यक है कि सामाजिक समूहों कि पुनर्स्थापना कि जाये ताकि वे व्यक्ति पर पहले जैसा नियंत्रण कर सकें और व्यक्ति उनसे आपको बँधा हुआ महसूस कर सके।  दुर्खीम के विचार से आधुनिक समाज मे व्यावसायिक समूह ही इस कार्य को कर सकते है, परन्तु व्यावसायिक समूह का नियंत्रण और उसके साथ व्यक्ति का तादात्म्य तभी संभव है जबकि उसे संगठित किया जाये, ताकि ये समूह अपने सदस्यों को व्याधिकीय परिस्थितियों का शिकार होने से बचाएँगे। ये व्यावसायिक समूह एक विशिष्ट नैतिक अनुशासन की स्थापना भी करेंगे। इसके अलावा अन्य कोई संस्था यह कार्य नही कर सकती।

3. दुर्खीम के अनुसार स्त्री-पुरूष की मनोवैज्ञानिक असमानता को कम करके वैवाहिक क्षेत्र मे आदर्शहीन आत्महत्या को रोका जा सकता है।

4. दुर्खीम ने व्यावहारिक समाजशास्त्र की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए कहा है कि समस्या की प्रकृति और स्त्रोत का तथा उसके समाधान के लक्षणों और प्रयोग का ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात पूर्ण शक्ति के साथ कार्य मे जुट जाना ही श्रेयस्कर है। आत्महत्याओं की वृद्धि जिन व्याधिकीय परिस्थितियों के कारण हुई है उनका उपचार किया जाना।

दुर्खीम के आत्महत्या सिद्धांत का मूल्यांकन 

दुर्खीम के आत्महत्या संबन्धी विचार उनकी सैद्धांतिक एवं पद्धतिशास्त्रीय मान्यताओं की अनुपम कृति है। दुर्खीम ने वैयक्तिक तथ्य को सामाजिक तथ्य प्रमाणित करने के लिए अथक प्रयास किए। परन्तु केवल आंकड़ों के आधार पर इस जटिल तथ्य की व्याख्या करना उतना सरल नही है जैसा दुर्खीम ने किया है। जिलबोर्ग ने लिखा है-- " आत्महत्या के सांख्यिकी आंकड़ों को जिस प्रकार संकलित किया जाता है वह बहुत कम विश्वसनीय है। 

दुर्खीम ने मानव की जैविकीय और वैयक्तिक प्रेरणाओं की इतनी अधिक उपेक्षा की है कि उनकी विवेचना संदेहास्पद हो गई है।

परन्तु इसके बावजूद दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धांत अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जैसा कि वर्मा ने लिखा है-- दुर्खीम का यह ग्रंथ न केवल आत्महत्या की विवेचना करता है अपितु समाजशास्त्र की अनेक समस्याओं पर भी प्रकाश डालता है।

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