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11/07/2019

वर्ग संघर्ष का सिद्धांत, कार्ल मार्क्स

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कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त

varg sangharsh ka siddhant;कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिध्दान्त को समाजशास्त्र मे सबसे अधिक महत्व दिया जाता हैं। मार्क्स ने समाज मे पाये जाने वाले वर्ग-भेद को अपनी विवेचना का प्रमुख आधार माना हैं। मार्क्स ने लिखा है कि आदिम साम्यवादी युग में किसी प्रकार के वर्ग नही थे। सभी व्यक्ति समान आकांक्षाओं और आवश्यकताओं से प्रेरित थे। इन आकांक्षाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यक्ति समान कार्यों का सम्पादन करते थे। इसके बाद दासत्व, सामन्त और पूँजीवादी युगों मे निरन्तर वर्ग बने रहे और इन वर्गों मे स्वार्थ भेद के कारण निरन्तर संघर्ष होते रहें।
कार्ल मार्क्स
मार्क्स ने लिखा है कि सम्पूर्ण समाज अधिकाधिक दो महान समूहों मे विभाजित हो रहा है, एक-दूसरे का प्रत्यविरोधी करते हुए, बुर्जूआ और सर्वहार दो महान वर्गो में हैं।
वर्ग शब्द से मार्क्स का अभिप्राय 
वर्ग शब्द से मार्क्स का अभिप्राय आर्थिक वर्ग से था। उन्होंने लिखा है कि ," समाज मे उत्पादन क्रिया में लगे हुए व्यक्तियों का समूह जो एक से कार्य संपन्न करते हैं, जिनका दूसरे व्यक्तियों के साथ एक-सा संबंध होता है तथा जिनके आम हित समान होते है, एक वर्ग कहलाता है।" मार्क्स का निष्कर्ष है कि विभिन्न ऐतिहासिक युगों मे समाज के अंदर दो ऐसे वर्गों का अस्तित्व रहा है जिनमे से एक उत्पादन के साधनों का मालिक तथा दूसरा उत्पादन प्रक्रिया मे अपने श्रम के द्वारा उत्पादन कार्य करता था। समाज मे किसी वर्ग की स्थिति इस बात पर निर्भर होती है कि उत्पादन के साधनों के साथ क्या संबंध होता है।
संघर्ष शब्द से अभिप्राय 
संघर्ष का अर्थ सिर्फ हथियारों से लड़ी जाने वाली लड़ाई ही नही है, इसका व्यापक अर्थ असंतोष, रोष एवं आंशिक असहयोग भी है। जब यह कहा जाता है कि वर्गों में अनादिकाल से सदैव संघर्ष होता रहा है तो उसका तात्पर्य यह नही है कि हमेशा युद्ध ज्वालायें भड़कती रहती है। ये सिर्फ थोड़े ही समय के लिए भड़कती है। सामान्य रूप से असंतोष तथा रोष की भावना धीरे-धीरे शांतिपूर्ण रीति से सुलगती रहती है, सिर्फ कुछ ही अवसरों पर यह भीषण ज्वाला या विस्फोटक का रूप धारण करती है। 
वर्ग संघर्ष की व्याख्या 
मार्क्स तथा ऐंजिल्स ने कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र मे लिखा है," आज तक प्रत्येक समाज शोषक तथा शोषित वर्गों के विरोध पर आधारित रहा है।" मार्क्स ने लिका है कि प्रारंभ मे वर्ग भेद उतना नही था जितना आज मालिक एवं मजदूर में है, लेकिन प्रारंभ मे वर्ग अवश्य थे तथा उनमें संघर्ष भी अवश्य होता रहता था। धीरे-धीरे मानव बुद्धि का विकास हुआ एवं आविष्कार होने लगे। परिणामतः उत्पादन शक्तियों का विकास, कल-कारखानों का विस्तार एवं यातायात के विकसित साधनों मे वृद्धि हुई। इधर एशिया के द्वारा खुल गये तथा बाजार का विस्तार हुआ, परिणामस्वरूप पूँजीवाद ने जन्म लिया।
पूंजीवाद के विस्तार के साथ उसकी सामंतशाही से टक्कर हुई, जिसमें पूँजीवाद की विजय हुई। इधर पूँजीवाद के कारण उत्पादन की शक्तियों मे विस्तार तथा विकास होने लगा है। पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ उत्पादन के साधन कम से कम लोगों के हाथों में केन्द्रित होने लगे तथा दूसरी तरफ सर्वहार वर्ग की संख्या से निरंतर वृद्धि होने लगी।
मार्क्स का विचार है कि पूंजीवाद के विकास के साथ-साथ समस्त शोषित वर्ग एक सूत्र में संगठित होकर पूंजीवाद से संघर्ष करेगा। ज्यों-ज्यों उद्योगों तथा कल-कारखानों का विकास होगा त्यों-त्यों मजदूर संघ एवं हड़तालों आदि की कार्यवाहियाँ सामने आयेंगी, अपने हितों की सुरक्षा के लिए सर्वहार वर्ग पूंजीवाद से भावी संघर्ष हेतु सदा ही तैयारी करता रहेगा। बुर्जुआ वर्ग तथा सर्वहार वर्ग का एक दूसरे के साथ संघर्ष है जो अपनी चरम सीमा पर पहुँचकर क्रांति का रूप लेगा। एक तरफ पूंजीवादी अधिकाधिक शोषण करते जाते है एवं दूसरी ओर सर्वहार इस शोषण से असंतोष प्रकट कर उससे छुटकारा पाने के प्रयत्न में संलग्न रहता है। शोषण करने तथा उससे मुक्त होने की यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक कि समाज मे उक्त प्रकार की वर्ग व्यवस्था बनी रहेगी तथा इसी आधार पर वर्गहीन समाज की स्थापना होने तक वर्गों का संघर्ष भी बराबर चलता रहेंगा। 
इस तरह मार्क्स ने बतलाया कि संसार में अभी तक वर्गहीन समाज की स्थापना नही होने पायी है। वर्गों का अस्तित्व बने रहने के कारण ही अभी तक संसार अपने को संघर्षों से स्वतंत्र नहीं कर सका है। जब तक वर्ग-व्यवस्था रहेगी तब तक समाज मे संघर्ष होता रहेगा। इतिहास के पृष्ठ इसलिए वर्गों के आपसी संघर्ष का उल्लेख करते है। 
मार्क्स ने यह भी बताया है कि आज संघर्ष अपनी चरम सीमा तक पहुँचने की तरफ अग्रसर हो गया है जिसमें शोषित (सर्वहार) वर्ग की वृद्धि होती जा रही है। इस वर्ग का असंतोष इसके मजबूत तथा अंतर्राष्ट्रीय संगठनों मे अभिव्यक्त हो रहा है। इसी संगठन की मजबूती के साथ-साथ उसका पूँजीपति वर्ग से संघर्ष भी बढ़ गया है। अतः यह संघर्ष अपनी चरम सीमा पर क्रांति का रूप लेगा जिसमें समस्त पूँजीपति वर्ग की समाप्ति हो जायेगी तथा समस्त उत्पादन के साधनों पर सर्वहार वर्ग का आधिपत्य हो जायेगा एवं तब शोषण से समस्त संसार अपने को मुक्त पायेगा। मार्क्स का विश्वास है कि इस प्रक्रिया के द्वारा मानव इतिहास मे वर्गहीन समाज की स्थापना होगी जिसमें समाज वर्ग-संघर्षों में मुक्त होगा। उसमें उत्पीड़न तथा शोषण पूर्ण रूप से समाप्त हो जायेगा। यही कार्ल मार्क्स का वर्ग संघर्ष का सिद्धात है।

वर्ग संघर्ष का जन्म 

कार्ल मार्क्स का कहना था कि समाज में दो वर्ग हमेशा से ही रहे हैं और दोनों मे से एक वर्ग शोषक और दूसरा शोषित वर्ग रहा हैं। दासत्व युग मे एक वर्ग दास बनकर और दूसरा वर्ग स्वामी बनकर इस प्रकार सान्तवादी युग मे सामन्त वर्ग और दूसरा कृषकों का वर्ग। आधुनिक युग पूंजीवादी और श्रमिक वर्ग हैं। पूंजीवादी श्रमिकों का शोषण करते हैं। कार्ल मार्क्स कहता कहता है की प्रत्येक युग मे एक वर्ग शक्तिशाली और दूसरा वर्ग शोषित व निर्बल रहा है। पूंजीवादी मजदूरों के श्रम को कम मूल्य मे खरीद लेते है और उनके श्रम से कम मूल्य पर अधिक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इस प्रकार शोषित वर्ग के अत्याचारों से परेशान होकर शोषित वर्ग मे असन्तोष फैल जाता है और वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। 
 कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि पूँजीपति और सर्वहार वर्ग के बीच संघर्ष होगा तो इस संघर्ष मे सर्वहार वर्ग की विजय सुनिश्चित होगी। जब पूँजीपति श्रमिकों के शोषण मे व्यस्त हो जाते है तो श्रमिक वर्ग को विवश होकर क्रांति और संघर्ष का सहारा लेना पड़ता हैं। उसने यह भी लिखा है कि अगर पूँजीपतियों के हाथ से सत्ता को छीनना है तो इसके लिए श्रमिक वर्ग को सशस्त्र खूनी क्रांति करना अनिवार्य होगा। 

वर्ग संघर्ष के कारण 

जब पूँजीपति अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाता है तो इसमे आन्तरिक असंगतियां उत्पन्न हो जाती है। आन्तरिक असंगतियों के परिणामस्वरूप पूंजीवादी मजदूरों की उपेक्षा करके अधिक से अधिक धन कमाने में लिप्त हो जाते है। वर्ग संघर्ष का मुख्य कारण मार्क्स ने पूँजीपतियों द्वारा श्रमिकों का शोषण किया जाना माना है। पूँजीपति श्रमिकों से कड़ी मेहनत कर बाते है और उन्हे उसका उचित मूल्य नही देते। पूंजीवादी श्रमिकों के श्रम को कम मूल्य मे खरीद कर वस्तु का अधिक उत्पादन कर उन्हे अधिक दाम मे बेचते है और उसका मुनाफा अपनी जेब मे ही रखते है और श्रमिकों को केवल वे मजदूरी मात्र ही देते है। यही वर्ग संघर्ष का कारण है।
मार्क्स के मतानुसार राज्य, व्यक्ति की प्रगति मे सबसे बड़ी बाधा है। किसी भी समाज मे जब तक राज्य और वर्गों का अस्तित्व रहेगा वह समाज कभी भी प्रगति नही कर सकेगा वहां रहने वाली जनता को कभी भी न्याय और संरक्षण नही नहीं मिलेगा। जब किसी भी समाज में एक वर्ग का जन्म होता है तो उसी समाज मे उस वर्ग का प्रतिद्वंदी दूसरा वर्ग भी जन्म लेता हैं।
वर्ग संघर्ष का भविष्य 
मार्क्स के वर्ग सिद्धांत का उद्देश्य पूँजीपतियों को समाप्त करके सर्वहार वर्ग की सत्ता को स्थापित करना है। मार्क्स का कथन है कि सर्वहार वर्ग एक राजनीतिक दल के रूप मे संगठित होकर पूंजीवादी व्यवस्था का अंत करेगा। सर्वहार वर्ग एक क्रांति करेगा जिसमें हिंसा का सहारा लिया जायेगा तथा समस्त शासन व्यवस्था को बदलकर सर्वहार समाज के नियंत्रण मे एक अधिनायकवादी शासन स्थापित करके वर्गहीन समाज की स्थापना की जायेगी। मार्क्स ने कम्युनिस्ट घोषणा मे लिखा है कि," वे खुले रूप मे घोषणा करते है कि उनके लक्ष्य की प्राप्ति सिर्फ वर्तमान समस्त सामाजिक दशाओं के बलपूर्वक विनाश के द्वारा ही हो सकती है। सर्वहार अपनी दासता की जंजीरों के अतिरिक्त कुछ नही खोयेंगे, उनके जीतने हेतु संसार पड़ा है।

कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष सिद्धांत की आलोचना

कार्ल मार्क्स ने जिस वर्ग संघर्ष के सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, उसकी आलोचना निम्न तरह से की जाती है-- 
1. शोषण पर बल 
वर्ग संघर्ष का सिद्धात मनुष्य की मनुष्य द्वारा शोषण करने की विधि की तरफ संकेत करता है।
2. घृणा का जन्म
वर्ग संघर्ष का सिद्धात लोगों में घृणा के बीजों के रोपण का कार्य करता है।
3. हिंसा को बढ़ावा 
वर्ग संघर्ष सिद्धांत हिंसात्मक क्रांति को जन्म देता है।
4. विरोध का सिद्धात 
वर्ग संघर्ष का सिद्धात सहयोग के स्थान पर एक विरोध का सिद्धात है क्योंकि यह सिद्धांत श्रमिकों की पूंजीपतियों के प्रति विरोध भावना पैदा करता है ताकि श्रमिक वर्ग पूंजीपति वर्ग के विरूद्ध क्रांति कर सके। 
5. संगठन की प्रेरणा
वर्ग संघर्ष का सिद्धात श्रमिक वर्ग को पूंजीपति वर्ग के विरूद्ध संगठन बनाने हेतु प्रेरित करता है। 
6. ऐतिहासिकता का अभाव 
वर्ग संघर्ष का सिद्धात ऐतिहासिक दृष्टि से भी ठीक नही है। इस सिद्धांत मे धनिक वर्ग तथा निर्धन वर्ग भी निरंतरता पर बल दिया गया है लेकिन इतिहास में कभी भी ऐसा उदाहरण देखने को नही मिलता है जहाँ धनिकों एवं निर्धनों के बीच संबंधों में निकटता के ही दर्शन होते है। 
7. वर्ग विहीन समाज की काल्पनिकता 
वर्ग संघर्ष के बाद वर्ग विहीन समाज की स्थापना होगी। मार्क्स का यह कथन सर्वथा काल्पनिक है क्योंकि पूंजीपति वर्ग के विनाश के बाद श्रमिकों में संगठन रहेगा ही यह बात अनिवार्य नही है। 
8. पूंजीवाद का विनाश असंभव 
मार्क्स का यह मत भी सत्य नही है कि पूंजीवाद विकास की चरम सीमा पर पहुँच कर स्वतः नष्ट हो जायेगा। वर्तमान मे पूंजीवाद का अस्तित्व चारों  ओर देखने को मिलता है।
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