3/09/2022

सामाजिक समूह के प्रकार/वर्गीकरण

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सामाजिक समूह के प्रकार अथवा वर्गीकरण 

samajik samuh ke prakar;समाजशास्त्रियों ने भिन्न-भिन्न आधारों पर सामाजिक समूह के अनेक प्रकारों का उल्लेख किया हैं। उदाहरण के लिए, समूह द्वारा किए जाने वाले कार्यों के आधार पर इन्हें सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सेवा-समूह आदि में वर्गीकृत किया जा सकता हैं। 

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जर्मन समाजशास्त्री सिमैल और वाॅनविज ने सदस्यों की संख्या को आधार मानकर समूहों का वर्गीकरण किया हैं। इसी प्रकार, मिलर ने सामाजिक समूहों को उदग्र और समतल जैसे दो भागों में विभाजित किया हैं। चार्ल्स एलवुड ने सभी मानव समूहों को ऐच्छिक और अनिवार्य दो प्रमुख भागों में विभाजित किया हैं, जबकि पार्क और बर्गेस ने समूहों को पास्परिक संबंधों, भाषा, प्रजाति, क्षेत्र, सामाजिक दूरी और सामाजिक अनुकूलन की मात्रा के आधार पर छः भागों में विभाजित किया हैं। 

तात्पर्य यह है कि विभिन्न आधारों पर सामाजिक समूहों के इतने प्रकार हो सकते हैं कि उनकी कोई निश्चित संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती। इस दृष्टिकोण से प्रस्तुत विवेचन में हम कुछ प्रमुख समाजशास्त्रियों द्वारा प्रस्तुत सामाजिक समूह के प्रमुख प्रकारों का संक्षिप्त में विवेचन करेंगे।

मैकाइवर एवं पेज के अनुसार सामाजिक समूहों का वर्गीकरण 

मैकाइवर एवं पेज ने समस्त सामाजिक समूहों को तीन वर्गों में विभाजित किया है। ये तीन वर्ग निम्नांकित हैं-- 

1. क्षेत्रीय समूह  

ये समूह वे हैं जो एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करते हैं। उदाहरणार्थ-- राष्ट्र, पड़ोस, गाँव, नगर, देश, जनजाति आदि क्षेत्रीय समूह हैं। 

2. हितों के प्रति चेतन समूह जिसका निश्चित संगठन नहीं होता है 

ये समूह अपने हितों के बारे में सचेत तो अवश्य हैं, लेकिन इनमें निश्चित संगठन की कमी होती है। इस प्रकार के समूह के सदस्यों में समान प्रवृत्ति पाई जाती है एक समूह से दूसरे समूह में जाने की इच्छा व पद-प्रतिष्ठा की प्रवृत्ति भी इनमें पाई जाती है। इसका उदाहरण वर्ग, जाति, शरणार्थी समूह, समान तथा असमान रुचि वाली भीड़ है।

3. हितों के प्रति चेतन समूह जिसका निश्चित संगठन होता है 

ये समूह अपने हितों के सम्बन्ध में सचेत होते हैं तथा संगठित भी होते हैं। इन समूहों की सदस्य संख्या सीमित होती है पर इनके उत्तरदायित्व असीमित होते हैं; उदाहरणार्थ-- परिवार, पड़ोस क्लब आदि। इस श्रेणी में कुछ समूह इस प्रकार के भी आते हैं जिनकी सदस्य संख्या तो अत्यधिक होती है परन्तु संगठन में औपचारिकता होती है; उदाहरणार्थ-- राज्य, चर्च, श्रमिक संघ आदि।

समनर के अनुसार सामाजिक समूहों का वर्गीकरण 

समनर ने सामाजिक समूह को दो भागों में बाँटा हैं--

1. अंतः समूह 

समनर ने अपनी पुस्तक 'फोकवेज' में अंतः समूह का विचार प्रस्तुत किया। बाद में ऐसे समूहों को जिनमें अंतः समूह के गुणों का अभाव पाया जाता हैं, बाह्रा कहा जाने लगा। अंतः समूह से मोटे तौर पर आशय अपने लोगों के समूह से होता है। यह वह समूह है जिसके सदस्यों में हम की भावना पायी जाती हैं। दैनिक जीवन के कार्यकलाप अथवा पारस्परिक वार्तालाप में हमें अंतः समूह और इससे संबंधित हम की भावना का दर्शन होता रहता हैं। प्रायः लोग यह कहते हुए पाये जाते हैं कि यह हमारा गाँव हैं। यह हमारा धर्म हैं। यह हमारा राष्ट्र हैं। अपने गांव, अपने धर्म अथवा अपने राष्ट्र की प्रशंसा करते हुए व्यक्ति थकता नहीं हैं। अन्य गाँव, राष्ट्र और धर्म की तुलना में साधारणतः व्यक्ति अपने गाँव, राष्ट्र और धर्म को प्राथमिकता देता हैं। उसे श्रेष्ठ मानता हैं। अंतः समूह के प्रति यह प्रवृत्ति ही बहुत कुछ अर्थों में 'स्वजाति केन्द्रीयता' कही जाती हैं। 

2. बाह्रा समूह 

बाह्रा समूह वह है जिसके प्रति अंतः समूह की तुलना में हमारी कोई खास दिलचस्पी नहीं होती। दूसरे शब्दों मे बाह्रा समूह के प्रति व्यक्ति में प्रायः उदासीनता का भाव रहता हैं जो कभी-कभी विरोध और उग्र विरोध का रूप धारण कर लेता हैं। वास्तव में अन्तः समूह और बाह्रा समूह की धारणा एक दूसरे के साथ सापेक्षित रूप से संबंधित होती है। यह स्वाभाविक हैं कि जहाँ व्यक्ति के कुछ अपने होंगे, जिनके साथ वह लगाव या समीपता महसूस करेगा वहीं कुछ दूसरे भी होंगे जिनके साथ वह कम लगाव, उदासीनता या विरोध का भाव रखेगा और जिनके साथ उसकी सामाजिक दूरी अधिक होगी। उदाहरण के लिए जातीय और विजातीय, हिन्दी भाषी और अहिन्दी भाषी, भारतीय और विदेशी, कांग्रेसी और जनसंघी एक दूसरे के लिए बाह्रा समूह होंगे। इस दृष्टि से एक समूह जो किसी समूह की तुलना में बाह्रा हैं, किसी दूसरे समूह की तुलना में अंतः हो है वहीं गाँव की तुलना में पड़ोस अंतः समूह हैं। इसी प्रकार मान लीजिए कि एक विश्वविद्यालय से संबंधित दस महाविद्यालय हैं। एक विद्यार्थी के लिए अपना महाविद्यालय अंतः समूह हुआ, जबकि दूसरे महाविद्यालय बाह्रा समूह, किन्तु अन्य विश्वविद्यालयों की तुलना में उसके लिए सभी दस महाविद्यालय अंतः समूह हैं।

गिलिन एवं गिलिन के अनुसार सामाजिक समूहों का वर्गीकरण 

गिलिन एवं गिलिन ने समूहों के सभी सम्बन्धित आधारों को सामने रखकर समूहों का निम्न प्रकार से वर्गीकरण प्रस्तुत किया है-- 

1. रक्त सम्बन्धी समूह (जैसे- परिवार जाति आदि), 

2. शारीरिक विशेषताओं पर आधारित समूह (जैसे- समान लिंग, आयु अथवा प्रजाति पर आधारित समूह), 

3. क्षेत्रीय समूह (जैसे- जनजाति, राज्य, राष्ट्र इत्यादि), 

4. अस्थिर समूह (जैसे- भीड़, श्रोता समूह इत्यादि), 

5. स्थायी समूह (जैसे- खानाबदोशी जत्थे, ग्रामीण पड़ोस कस्बे, शहर तथा विशाल नगर इत्यादि) तथा

6.  सांस्कृतिक समूह (जैसे- आर्थिक, धार्मिक , राजनीतिक, मनोरंजनात्मक तथा शैक्षिक समूह)।

सामाजिक समूहों के अन्य वर्गीकरण 

सामाजिक समूहों के अनेक अन्य वर्गीकरण भी किए गए हैं। उदाहरणार्थ, एलवुड (Ellwood) ने समूहों को ऐच्छिक व अनैच्छिक समूह, संस्थागत व असंस्थागत समूह तथा अस्थायी व स्थायी समूहों में विभाजित किया है। 

गिडिंग्स ने समूहों को जननिक समूह एवं इकट्ठे समूह का उल्लेख किया है। जननिक समूह परिवार है जिसमें मनुष्य का जन्म होता है। इकट्टठा समूह ऐसा ऐच्छिक समूह है जिसमें मनुष्य स्वेच्छा से सम्मिलित होता है। 

वार्ड (Ward) ने दो प्रकार के समूह बताए हैं-- ऐच्छिक समूह तथा अनिवार्य समूह। 

सोरोकिन ने एकल प्रबन्धन समूह/ एकल कार्यात्मक समूह तथा बहु-बन्धन समूह, बहु कार्यात्मक समूह का उल्लेख किया है। 

नूनेज ने चार प्रकार के समूह बताए हैं-- संरचित समूह, संरचित अर्द्ध-समूह, आकस्मिक अर्द्ध समूह तथा कृत्रिम समूह। 

मर्टन ने समूहों को सदस्यता समूह तथा गैर सदस्यता समूहों में विभाजित किया है। उन्होंने सन्दर्भ समूह की अवधारणा भी विकसित की है। सन्दर्भ समूह से अभिप्राय उस समूह से है जिसको व्यक्ति अपना आदर्श स्वीकार करते हैं जिसके सदस्यों के अनुरूप बनना चाहते हैं तथा जिसकी जीवन-शैली का अनुकरण करते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि हम सन्दर्भ समूहों के सदस्य नहीं होते हैं हम सन्दर्भ समूहों से अपने आप को अभिनिर्धारित अवश्य करते हैं। 

लियोपोल्ड ने समूहों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया हैं-- भीड़, समूह तथा अमूर्त संग्रह।

पार्क एवं बर्गेस ने समूहों को प्रादेशिक एवं गैर-प्रादेशिक समूहों में विभाजित किया है। 

जॉर्ज हासन ने समूहों को असामाजिक, आभासी सामाजिक, समाज-विरोधी तथा समाज पक्षी समूहों में विभाजित किया है।

बीरस्टीड ने समूहों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है सांख्यिकीय समूह, समाजीय समूह, सामाजिक समूह तथा सहचारी समूह। उन्होंने अनेक अन्य समूहों का भी उल्लेख किया है जिनमें वृहत् समूह एवं लघु समूह, बहुसंख्यक समूह एवं अल्पसंख्यक समूह, दीर्घकालीन समूह एवं अल्पकालीन समूह, खुला समूह एवं बन्द समूह, स्वतन्त्र समूह एवं आश्रित समूह संगठित समूह एवं असंगठित समूह इत्यादि प्रमुख हैं।

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