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4/02/2021

अकबर की धार्मिक नीति एवं दीन ए इलाही की विशेषताएं

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akbar ki dharmik niti;मुगल साम्राज्‍य के संस्‍थापक बाबर ने किसी व्‍यवस्थित या योजनाबद्ध धार्मिक नीति की शुरूआत नहीं की थी। व्‍यक्तिगत रूप से बाबर एक धार्मिक व्‍यक्ति था। ईश्‍वर में उसका अटूट विश्‍वास था। खानवा और चन्‍देरी के युद्धों में उसने धर्म का राजनीतिक उपयोग अवश्‍यक किया। हुमायूं में भी आमतौर पर कोई धार्मिक कट्टरता दिखाई नही देती न ही वह धार्मिक दृष्टि से असहिष्‍णु था। शेरशाह भी धार्मिक दृष्टि से एक सहिष्‍णु शासक था। गैर मुस्लिमों के प्रति उसका व्‍यवहार अच्‍छा था। 

अकबर की धार्मिक नीति

16वीं शताब्‍दी विश्‍व इतिहास में धार्मिक पुनःउत्‍थान की शताब्‍दी थी। यूरोप की तरह की भारत में पुनर्जागरण की धारा बहने लगी। अकबर इस धारा का इस शताब्‍दी में प्रमुख व्‍यक्ति बना। अकबर की उदार चेतना के अनेक अन्‍तर्निहित परिस्थितियां थी। जो इस प्रकार है--

हिन्‍दू राजकुमारियों से विवाह 

1562 ई. में अजमेर से लौटते हुए अकबर का विवाह आमेर के राजा भारमल की पूत्री से हुआ। इसके पहले भी सल्‍तनत काल में कुछ मुस्लिम सुल्‍तानों या सामन्‍तों ने हिन्‍दू कन्‍याओं से विवाह किये थे। तब‍ ऐसा करने पर उन्‍हें मजबूर किया गया था। किन्‍तु अकबर का यह वैवाहिक सम्‍बन्‍ध दोनों पक्षों की राजी-खुशी से संपन्न हुआ था। इस विवाह से राजपूतों और आम हिन्‍दूओं के प्रति सहिष्‍णुता और मेत्री की नई नीति का आरम्‍भ हुआ। 1570-71 में जैसलमेर और बीकानेर के राज परिवारो की कन्‍याओं का विवाह भी अकबर के साथ हुआ। आगे चलकर जहांगीर का विवाह भी भारमल की पोती के साथ हुआ। मुगल हरम में विवाह करने वाली इन हिन्‍दू राजकुमारियो को अपने धर्म का पालन तथा पुजा-पाठ की पूरी आजादी थी। अकबर के धार्मिक दृष्टिकोण पर इन वैवाहिक सम्‍बन्‍धों का प्रभाव पड़ना भी स्‍वाभाविक था।

परिवार वंश 

अकबर का परिवार एक धार्मिक परिवार था। बाबर और हुमायूं दोनों की इस्‍लाम में अटूट आस्‍था थी, परन्‍तु धर्म के बाह्म रूप को उन्‍होने अधिक महत्‍व नहीं दिया और राजनीतिक आवश्‍यकताओं के लियें उन्‍होने अपना धर्म बदल लिया था और सून्‍नी से शिया हो गये थे। अकबर की माता फारस के शिया पन्‍थ की थी। अकबर का जन्‍म एक हिन्‍दू परिवार में हुआ था जहां उसे एक महीने तक रहना पड़ा था। अकबर का अत्‍यन्‍त स्‍वामी भक्‍त सरदार बैरम खां उसका सरंक्षक था और अकबर का सुयोग्‍य शिक्षक अब्‍दूल लतीफ अपने धार्मिक विश्‍वासों की उदारता के लिये प्रसिद्ध था और जिन्‍होने अकबर को ‘सुलहकुल‘ का पाठ पढ़ाया। इस प्रकार वंशानुगत संस्‍कारों ने अकबर को उदार बनाने में बहुत योग दिया। 

जजिया और यात्रा कर की समाप्ति 

अपने शासन के प्रारम्भिक वर्षो में, अकबर ने अपनी सामाजिक, धार्मिक सहिष्‍णुता का परिचय देते हुए 1562 में दास प्रथा का अन्‍त कर दिया और 1563 में हिन्‍दूओं पर से तीर्थ यात्रा कर समाप्‍त कर दिया। 1564 में हिन्‍दूओं को द्वितीय श्रेणी का नागरिक सिद्ध करने वाले ‘जजिया कर‘ को अकबर ने हटा दिया। दिल्‍ली और आगरा के बादशाहों में अकबर पहला व्‍यक्ति था जिसने 350 वर्षो से चले आ रहे घृणित ‘जजिया कर‘ को बन्‍द किया था। 

अकबर के अमीर और सरदार 

शेख मुबारक, अबुल फजल, फैजी, सूफी सरदार थे जिनका उसके जीवन पर प्रभाव पड़ा। राजपूत सरदार, अब्‍दूल रहीम खान-खाना जैस विद्वानों ने भी उसकी उदार चेतना को प्रोत्‍साहित किया। मानसिंह, भगवानदास, टोडरमल, बीरबल ने अकबर की उदार नीति का समर्थन किया। 

मजहर जारी करना

इबादत खाना में इस्‍लाम के सिद्धांतों पर होने वाले विवादों में अकबर ने अक्‍सर पाया कि मुस्लिम धर्माचार्य एक दूसरे पर क्रुद्ध हो जाते है। कभी-कभी बड़ी संकीर्णता का परिचय देते है। ऐसे में उसने धार्मिक विवादों में अंतिम निर्णय देने का अधिकार स्‍वयं के पास रखने का निश्‍चत किया। इससे मतभेदों को कम किया जा सकता था। इस कार्य में शेख मुबारक तथा उसके दोनों पुत्रों अबुल फजल और फैजी ने बहुत सहयोग दिया। जून 1579 को अकबर ने फतहपूर सीकरी की मस्जिद में स्‍वंय ‘खुतबा‘ को पढ़ा। खुतबा के अंतिम शब्‍द थे- ‘अल्‍ला-हु-अकबर‘अर्थात् अल्‍लाह ही सबसे बड़ा और महान है। ‘इसके कुछ दिन बाद एक ‘मजहर‘ जारी किया गया जिसके अनुसार भारत में इस्‍लाम सम्‍बन्‍धी धार्मिक विवादों में निर्णय देने का अधिकार अकबर को दिया गया। इस प्रपत्र को शेख मुबारक ने तैयार किया था। इस पर अब्‍दूल नबी मखदूम उल मुल्‍क जैसे कई इस्‍लामी विद्वानों के हस्‍ताक्षर थे ।

दीन-ए-इलाही 

15वीं शताब्‍दी के आठ दशक से लेकर 16वीं शताब्‍दी के प्रथम शताब्‍दी तक के काल को दीन-ए-इलाही कहां जाता है। अकबर ने 1582 ई. में एक नवीन धर्म की स्‍थापना की जिसे दीन-ए-इलाही कहा गया। दीन का अर्थ होता है ‘धर्म और इलाही का अर्थ ‘ईश्‍वर‘ हेाता है। अतः ‘दीन-ए-इलाही‘ का अर्थ ईश्‍वर का धर्म हुआ है इसमें प्रत्‍येक धर्म की इच्‍छा बातों को लिया गया था। 

दीन-ए-इलाही के सिद्धान्‍त या विशेषताएं इस प्रकार थे--

1. ईश्‍वर एक है और अकबर उसका पैगम्‍बर व नेता है। 

2. सभी सदस्‍यों को अकबर को साष्‍टांग प्रणम करना आवश्‍यक था। 

3. प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने जन्‍म दिवस पर भोज का आयोजन करता था। 

4. इस धर्म के अनुयायियों को मृत्‍यु के बाद दिये जाने वाले श्राद्ध को भी स्‍वयं अपने जीवित रहते हुए करना पड़ता था। 

5. इसके अनुयायियों के लिए मांस खाना निषेध था। 

6. इस धर्म के अनुयायी सूर्य व अग्नि की उपासना करते थे। 

7. इस धर्म को रविवार के दिन ही स्‍वीकार किया जाता था। 

8. अनुयायियों को उनकी इच्‍छानुसार जलाया या दफन किया जा सकता था। 

9. दान व उदारता का पालन करना अनिवार्य था। 

10. इसके सदस्‍य परस्‍पर मिलने पर ‘अल्‍लाह-हो-अकबर‘ व उसका जवाब ‘जल्‍ले-जल्‍लाल हूं‘ होता था का प्रयोग करते थे। यद्यपि दीन-ए-इलाही को ज्‍यादा समर्थन प्राप्‍त नहीं हुआ और यह असफल हो गया, किन्‍तु फिर भी सम्राट अकबर का यह एक नवीन प्रशंसनीय प्रयोग था। 

इस प्रकार अकबर की धार्मिक नीति उदार, सहिष्‍णु तथा प्रजावत्‍स‍ल थी। जिससे अकबर को अपनी सम्‍पूर्ण प्रजा का समर्थन प्राप्‍त हुआ और इतिहास में अकबर प्रसिद्ध हो गया।

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