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12/14/2020

स्वराज दल की स्थापना, उद्देश्य, कार्यक्रम, मूल्यांकन

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स्वराज दल (पार्टी) की स्थापना 

swaraj dal ki sthapna;गांधी जी के असहयोग आंदोलन की बातो को पुराने उदारवादी नेताओ ने आसानी से नही माना था। कुछ तो कांग्रेस से टूटकर अलग जा खड़े हुए, कुछ ने जन आंदोलन के दबाव से इसे मान्यता दे दी, परन्तु चौरा-चौरी कांड के बाद जब जन-आंदोलन ही बिखरने लगा तो नए मुल्ला पुराने रंग-ढंग मे लौट आए। 1922 ई. मे पुनः ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिससे मालूम पड़ने लगा कि कांग्रेस 1907 ई. की भांति दो दलो मे विभाजित हो जाएगी। उसी वर्ष कलकत्ता अधिवेशन मे कौंसिल प्रदेश के प्रश्न पर दोनो गुटो मे वाक-संघर्ष हुआ, किन्तु हिन्दू मुस्लिम दंगो के कारण यह संघर्ष टल गया। कांग्रेस से त्याग पत्र देकर जनवरी, 1923 ई. को देशबंधु चितरंजनदास तथा मोतीलाल नेहरू ने स्वराज्य दल की स्थापना की। 

चितरंजनदास ने कहा कि," हम ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की नष्ट कर देना चाहते है, जिमने कोई अच्छाई नही है और ऐसी व्यवस्था स्थापित करना चाहते है जो सफलतापूर्वक और जनहित मे चल सके। 

स्वराज्य दल (पार्टी) के उद्देश्य {swaraj dal ke uddeshya)

स्वराज दल के उद्देश्य इस प्रकार है--

1. भारत के लिए स्वराज्य की प्राप्ति करना। 

2. उस परिपाटी का अंत करना, जो अंग्रेजी सत्ता के अधीन भारत मे विद्यमान थी। 

3. कौंसिल मे प्रवेश कर असहयोग के कार्यक्रम को अपनाना और असहयोग को सफल बनाना।

4. सरकार की नीति का घोर विरोध कर उसके कार्यों मे अड़ंगा लगाना, जिससे उसके कार्य सुचारू रूप से नही चल सकें तथा सरकार अपनी नीति परिवर्तन करने मे विवश हो जाए। 

स्वराज दल का कार्यक्रम 

स्वराज्य दल ने अपने उद्देश्यो की प्राप्ति हेतु निन्म कार्यक्रम को निश्चित किया--

1. सरकारी बजट को रद्द करना।

2. उन प्रस्तावों का विरोध करना, जो नौकरशाही को शक्तिशाली बनाने का प्रयास करे।

3. उन प्रस्तावों, योजनाओं तथा विधेयकों को कौंसिलों मे प्रस्तुत करना, जिनके द्वारा राष्ट्र की शक्ति मे वृद्धि हो तथा नौकरशाही की शक्तियों का अंत किया जाना सम्भव हो।

4. कौंसिल के बाहर रचनात्मक कार्यों को सहयोग देना।

5. ज्यों ही उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सत्याग्रह करना अनिवार्य है और उसके बिना नौकरशाही ठीक रास्ते पर नही आएगी तो वे शीघ्र ही कौंसिल मे अपने स्थान को त्याग देने तथा देश को सत्याग्रह के लिए तैयार करने की अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करेंगे। 

6. कार्यक्रम को अधिक प्रभावशाली बनाने के उद्देश्य से उन सभी स्थानो पर अधिकार करने का प्रयत्न किया जाए, जिन पर कौंसिल के सदस्य होने के नाते अधिकार करने मे सफल हो सकते थे।

स्वराज दल की सफलता 

स्वराज्य दल की उपलब्धियां;माण्ट फोर्ड सुधारों को नष्ट करने के उद्देश्य से स्वराज्यवादियों ने मोतिलाल नेहरू व चितरंजनदास के नेतृत्व मे, 1923 के निर्वाचन मे भाग लिया व मध्यप्रदेश एवं बंगाल मे सफलता मिली। अन्य प्रान्तों मे इस दल का सबसे बड़े दल के रूप मे जन्म हुआ। 1925 मे चितरंजनदास की अचानक मृत्यु हो जाने से बंगाल मे स्वराज्यवादियों को गहरा धक्का लगा फिर भी कौंसिल के आगामी चुनाव मे उन्हे बहुमत मिला, बाध्य होकर गवर्नर ने कौंसिल भंग कर दी।

स्वराज दल की नीति मे परिवर्तन 

प्रारंभ मे स्वराज दल ने सरकार के प्रति असहयोग की नीति अपनायी और उसके कार्यों मे अड़ंगे डाले, लेकिन इसे उस नीति मे विशेष सफलता प्राप्त नही हुई। 1925 ई. मे देशबंधु चित्तरंजनदास की मृत्यु हो गयी और पाण्डित मोतीलाल नेहरू का सबसे बड़ा सहयोगी खो गया, जिससे स्वराज्य दल कमजोर पड़ गया। दल का सम्पूर्ण भार अब पाण्डित मोतीलाल नेहरू के कंधो पर आ गया। कानपूर मे कांग्रेस का अधिवेशन किया गया और उसमे यह निश्चित हुआ कि यदि सरकार राष्ट्रीय मांगो को शीघ्र स्वीकार नही करती है तो स्वराज दल के लोगो को कौंसिल का बहिष्कार करना चाहिए, जिससे सरकार के व्यवस्थापन मे अंड़गा डले। कुछ स्वराज्यवादियों, जिनमे मध्यप्रान्त और महाराष्ट्र के लोग थे, को यह नीति नही रूची वे माण्टफोर्ड सुधारो को अपर्याप्त कहते थे, किन्तु उसे कार्य रूप देने के पक्ष मे भी थे। इस प्रकार हम देखते है कि कुछ स्वराज्यवादियों की नीति मे परिवर्तन आने लगा और असहयोग के स्थान पर उन्होंने उत्तरदायित्व पूर्ण सहयोग की नीति अपनायी। वैसे तो चितरंजनदास ने भी अपने जीवन काल मे ही यह अनुभव कर लिया था कि असहयोग नीति लाभप्रद सिद्ध नही हो रहीं है, इसलिए 1924 ई. को फरीदपूर मे जब सम्मेलन हुआ था उसमे उन्होंने सरकार से समझौता करने के लिए प्रस्ताव किया था, जिसमे कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिये थे--

1.सरकार जनता के प्रतिनिधियों को कुछ उत्तरदायित्व सौंपे।

2. सरकार निकट भविष्य मे स्वराज स्थापना करे।

3. सरकार ह्रदय परिवर्तन और शांतिपूर्ण समझौते का वातावरण उत्पन्न करे।

4. सरकार सभी राजनीति बन्दियों को मुक्त कर क्षमा प्रदान करे।

देशबंधु की मृत्यु के बाद स्वराज्यवादियों ने खुलकर इस नीति का समर्थन करना प्रारंभ कर दिया। कुछ स्वराज्यवादी अभी भी अड़ंगा नीति पसंद करते थे। अतः स्वराज दल मे मतभेद हो गये। ब्रिटिश सरकार सदैव मौके की तलाश मे रहती थी। उसने पुनः इस सुनहरे अवसर को हाथ से नही जाने दिया और जो स्वराज्यवादी सहयोग करने के पक्षधर थे उन्हे प्रसन्न करने के लिए विभिन्न समितियों मे स्थान देना प्रारंभ कर दिया। 1924 मे कुछ स्वराज्यवादियों को स्पात सुरक्षा समिति मे स्थान दिया। 1925 ई. स्वयं मोतीलाल नेहरू ने स्कीन समिति की सदस्यता स्वीकार की। पदों का लोभ स्वराज्यवादियों से रोका नही गया। वी.जे.पाटिल केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के अध्यक्ष चुने गये। मध्यप्रदेश विधानमण्डल के अध्यक्ष एस.बी.टाम्बे गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य नियुक्त हुए। इस फूट और स्वराज्यवादियों के पदों के लोभ के परिणामस्वरूप यह दल कमजोर होता चला गया तथा उसका आकर्षण भी समाप्त हो गया। 1924 मे महात्मा गांधी जब अपनी बीमारी और स्वराज्यवादियों की मांग के कारण कैदमुक्त हुए तो उन्होंने 1926 ई. मे साबरमती समझौता द्वारा स्वराज्यवादियों मे एकता स्थापित करने का प्रयास किया किन्तु उन्हे असफलता हाथ लगी। जयकर, केलकर और मुंजे आदि स्वराज पार्टी के सदस्यों ने पार्टी से विद्रोह कर ही दिया था। पंडित मदनमोहन मालवीय और लाला लाजपत राय ने स्वराज्य पार्टी के हाथों मे हिंदुओं के हित सुरक्षित नही है कहकर पार्टी छोड़ दी और अंत मे 1926 मे स्वराज दल दो भागों मे विभक्त होकर ही रहा।

स्वराज दल के पतन या असफलता के कारण 

1926 ई. तक स्वराज्य दल की शक्ति समाप्त हो गई। उसके पतन के अनेक कारण थे, जिसमे से प्रमुख इस प्रकार है--

1. नीति मे परिवर्तन 

स्वराज्य दल ने सरकार के साथ सहयोग की नीति को अपनाना आरंभ किया, फलतः उसका राष्ट्रवादी रूप धीमा पड़ गया व उसका आकर्षण धीरे-धीरे खत्म होता गया।

2. देशबंधु चितरंजनदास की मृत्यु 

1925 ई. मे चितरंजनदास की मृत्यु के बाद स्वराज दल लड़खड़ाने लगा।

3. 1926 के निर्वाचन 

1926 ई. चुनाव मे स्वराज दल विशेष सफल न हो सका, जिससे दल का महत्व घट गया।

4. हिन्दू मुस्लिम दंगे 

हिन्दू मुस्लिम दंगों ने दल की एकता को नष्ट कर दिया।

5. कांग्रेस मे एक अन्य दल की स्थापना 

स्वराज्य दल के अतिरिक्त कुछ नेताओं ने कांग्रेस के अंदर ही एक अन्य स्वतंत्र दल की स्थापना की। इस दल ने हिन्दुत्व का नारा लगाया, जिसके नीचे उत्तर-भारत के हिन्दू संगठित होने लगे।

स्वराज्य पार्टी का मूल्यांकन 

हालांकि स्वराज्य दल अपने सदस्यों के मतभेद से अपने उद्देश्यो की प्राप्ति मे सफल नही हो सका पर राष्ट्रीय आंदोलन मे उसका महत्वपूर्ण स्थान है।  विट्ठल भाई पटेल केन्द्रीय असेम्बली की अध्यक्षता, मोतीलाल नेहरू द्वारा दल का नेतृत्व और चितरंजनदास द्वारा कौंसिल मे स्वराज पार्टी का संचालन जिस कुशलता से हुआ उससे यह सिद्ध हो गया कि भारत स्वराज्य प्राप्ति के सर्वथा योग्य है।

अपनी समस्त त्रुटियों और कमियों के बाद भी स्वराज्य पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास के निराशापूर्ण क्षणों मे स्वराज की ज्योति जलाए रखी। उसने असहयोग और सविनय अवज्ञा के मध्य एक सेतुबन्ध का काम किया। उसने इस आर्दश को कभी भी मिटने नही दिया कि भारत का उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति है।

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