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12/04/2020

लार्ड कर्जन का बंगाल विभाजन

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bangal vibhajan;लार्ड कर्जन का कार्यकाल भारत मे प्रतिक्रियावादी साम्राज्यवादी चालों के लिए जाना जाता है। कर्जन का दिमाग हर उस मुद्दे की ओर आकर्षित होता था जिससे भारतीय राष्ट्रीयता तथा भारत की अखंडता पर आघात किया जा सके। लार्ड कर्जन ने बंगाल की अखंडता पर प्रहार कर सन् 1905 मे अपने कारनामों मे एक अत्यंत मूर्खतापूर्ण कारनामा "बंग-भंग" (बंगाल विभाजन) जोड़ दिया था। 

लार्ड कर्जन का बंगाल विभाजन (सन् 1905) 

कर्जन की दृष्टि मे बंगाल का विभाजन महज एक प्रशासकीय सुधार था, परन्तु इसके द्वारा वह अब तक आये समस्त प्रशासकों मे सबसे अधिक घृणास्पद बन गया। मिस्टर प्रिंगले कैनेडी ने कहा " अंग्रेजों ने भारत को अकबर के तरिकों का अनुसरण करके जीता था, अब उन्हे उसे औरंगजेब की नकल करके खो नही देना चाहिए।" 

बंगाल एक बहुत बड़ा प्रांत था उस समय बंगाल प्रांत मे बंगाल, बिहार और उड़ीसा का प्रदेश था। इसका क्षेत्रफल 1,89,000 वर्गमील तथा आबादी 7,80,00,000 थी। जनसंख्या 8 करोड़ थी। बिहार और उड़ीसा की जनसंख्या 2 करोड़ 10 लाख थी। प्रशासन की सुविधा के लिए इस प्रांत के विभाजन की मांग समय-समय पर उठती रही थी। सर ऐण्ड्यू फ्रेजर जो तत्कालीन गवर्नर रह चुका था इसमे प्रमुख भूमिका निभाई। उसके अनुसार पूर्वी बंगाल मे मैमनसिंह और बाकरगंज के डिवीजन अव्यवस्था तथा अपराधों के लिए कुख्यात थे और बंगाल के विस्तृत प्रदेश का उप गवर्नर अपनी अपर्याप्त पुलिस व्यवस्था तथा कार्यक्षेत्र के फैलाव के कारण इससे निपटने मे असमर्थ रहा था। इसके अतिरिक्त इससे पहले भी इस प्रकार के प्रदेश विभाजन हो चुके थे। 1901 ई. मे पंजाब से अलग कर, पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत एक चीफ कमिश्नर की अधीनता मे बनाया जा चुका था तथा शेष उत्तरप्रदेश को यूनाइटेड प्राविन्सेज ऑफ आगरा एण्ड अवध या यू.पी. की संज्ञा दे दी गयी थी। इस प्रकार 1873 मे आसाम को एक स्वतंत्र प्रांत बनाया जा चुका था। बंगाल के व्यापक दौरे करके कर्जन ने अंतिम रूप से बंगाल विभाजन की घोषणा सन् 1905 मे कर दी।

नयी व्यवस्था के अनुसार पूर्वी बंगाल और आसाम का नया प्रांत बनाया गया जिसमे राजशाही, चटगाँव और ढाका के तीन डिवीजन सम्मिलित थे। इसका क्षेत्रफल 1,06,540 वर्ग मील और जनसंख्या तीन करोड़ दस लाख थी जिसमे से 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान और 1 करोड़ 20 लाख हिन्दू थे। इस प्रांत का मुख्यालय ढाका मे था और यह एक लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन था। शेष पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा का एक प्रांत बना जिसका क्षेत्रफल 1,41,580 वर्गमील था और जिसकी जनसंख्या 5 करोड़ 40 लाख थी। इसमे 4 करोड़ 20 लाख हिन्दू थे और केवल 90 लाख मुसलमान थे। प्रशासनिक दृष्टि से इस व्यवस्था मे कोई दोष प्रतीत नही होता था।

परन्तु कर्जन का उद्देश्य इतना निर्दोष नही था। इस बंगाल विभाजन के भीतर साम्राज्यवादी हित छुपे हुए थे। अब तक बंगाल पूरे देश मे नवीन राष्ट्रीय जागरण तथा विकास का केन्द्र बन चुका था। ऐसी स्थिति में बंगाल को खंडित करना तथा हिन्दू मुस्लिम जनसंख्या का धर्म के आधार पर विभाजन करना बड़ी सूक्ष्मता एवं चतुराई से राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय आंदोलन के विकास पर प्रहार था यह बात कर्जन एवं उसके सहयोगी तथा बंगाली जनता अच्छी तरह समझ रही थी।

इस बंगाल विभाजन का कड़ा विरोध हुआ। " यह घोषणा हम पर वज्रपात बनकर गिरी," सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने लिखा ," हमने अपमानिय, कुण्ठित एवं छला गया महसूस किया।" 

संपूर्ण भारत मे रोष व्याप्त हो गया एवं समाचार-पत्रों के माध्यम से इसका घोर विरोध किया गया। इंग्लैंड के समाचार-पत्रों ने भी इस विभाजन की आलोचना की। 

सभी आलोचनाओं तथा आंदोलन की परवाह न करते हुए लार्ड कर्जन ने 16  अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन को मूर्तरूप (लागू कर दिया) दे दिया।  इस विभाजन से उदारवादी नेता भी स्वयं की प्रणाली तथा सिद्धांतों पर अविश्वास करने लगे।

भारत मे बंगाल विभाजन का दिन 16 अक्टूबर 1905 विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के रूप मे मनाया गया। स्थान-स्थान पर भूख हड़ताले तथा वंदे-मातरम् के नारों से ब्रिटिश शासन की इस धूर्ततापूर्ण योजना का विरोध किया गया था। इस विभाजन का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने लाला लाजपतराय तथा गोपालकृष्ण गोखले को इंग्लैंड भेजा, पर उनको वहां कोई सुनने वाला नही था, अतः असफलता लेकर वे भारत लौट आए।

लाला लाजपतराय ने कहा," भारत के देशभक्त अपनी आत्मनिर्भरता तथा बलिदान से ही देश का भला कर सकते है।

बाल गंगाधर तिलक ने नया रास्ता दिखाया," राजनीतिक अधिकारों को लड़कर प्राप्त करना होगा।" बंगाल का विभाजन हो गया। कालांतर मे इतिहासकारों ने इसकी कटू आलोचना की। 16 अक्टूबर 1905 को सारे देश मे शोक दिवस के रूप मे मनाया गया। सरकार ने आंदोलन को कुचलने का प्रयत्न किया, पर आंदोलन अधिक तीव्र होता गया।

जगह-जगह हड़ताल और प्रदर्शन होने लगे। इस प्रकार कर्जन की भूल और मूर्खता ने सारे देश मे राष्ट्रीय आंदोलन की लहर को तेज कर दिया। इस संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि 1911 मे शासन को बंगाल का विभाजन वापस लेना पड़ा, लेकिन इस बात पर ध्यान दिया की कर्ज़न का 1905 का बंगाल विभाजन सन् 1947 मे देश के विभाजन का पूर्वाभास ही सिद्ध हुआ।

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