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12/15/2020

भारत सरकार अधिनियम 1935

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भारत सरकार अधिनियम 1935

bharat sarkar adhiniyam 1935, karan, visheshta, mahatva, mulyankan;सन् 1920 से 1935 तक घटित भारतीय राजनीतिक क्रियाकलापों ने भारत सरकार को भारत मे उत्तरदायी शासन की ओर दूसरा कदम उठाने को विवश कर दिया। 1919 के सुधार अधिनियम से असन्तुष्ट सभी राजनीतिक दलों ने इसे असफल बनाने का पूरा प्रयत्न किया। कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग ने असहयोग आंदोलन चलाया। स्वराज दल ने इसे धारा सभा के अंदर जाकर तोड़ा। साइमन कमीशन का सभी दलों ने प्रभावी बहिष्कार किया। नेहरू प्रतिवेदन मे औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग की गई। गोलमेज सम्मेलन भी असफल रहे। अंत मे ब्रिटिश सरकार की संयुक्त समिति ने 1934 मे श्वेत-पत्र जारी कर अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इस प्रतिवेदन के आधार पर सन् 1935 का अधिनियम पारित हुआ। 

भारत सरकार अधिनियम 1935 के पारित होने की परिस्थितियां (कारण) 

साइमन कमीशन की रिपोर्ट तीन वर्ष बाद प्रकाशित हुई। भारतीयों को इस आयोग पर विश्वास नही था, क्योंकि इस आयोग के सभी सदस्य अंग्रेज थे। भारतीयों की उपेक्षा नही की जा सकती थी। कमीशन की रिपोर्ट निराशाजनक थी। नेहरू रिर्पोट मे कहा गया कि भारत मे संघीय सरकार हो। 1929 मे पूर्ण स्वराज्य की मांग की गई। 1930-32 मे तीन गोलमेज सम्मेलन हुए जिनमे भारत के भावी संविधान पर विचार किया गया। प्रथम और तीसरे सम्मेलन मे भारत ने भाग नही लिया। मांग आजादी की थी लेकिन कुछ भी तय नही हुआ। तीन सिद्धांत तय किये गये--

1. संघ

2. प्रांतीय स्वायत्तता

3. कार्यकारिणी को केन्द्र तथा प्रांत दोनो मे उत्तदायित्व। इन तीनो पर विचार होता रहा। 1935 मे ब्रिटिश सरकार ने अधिनियम को पारित किया जो कि 1947, तक लागू रहा।

 भारत सरकार अधिनियम 1935 की विशेषताएं (bharat sarkar adhiniyam 1935 ki visheshtaye)

सन् 1935 का भारत सरकार अधिनियम सुदीर्घ एवं जटिल था। इसमे 381 सेक्शन और दस परिशिष्ट थे, जिनमे 451 धाराएं एवं सूचियाँ सम्मिलित थी। यह अधिनियम सन् 1935 मे पारित, जुलाई 1936 मे जारी एवं अप्रैल 1937 मे प्रचलित हुआ। इसके द्वारा ब्रिटिश सम्राट की प्र0भुसत्ता स्थापित रही, किन्तु न तो संवैधानिक समस्याओं पर विचार हुआ, न पूर्ण स्वतंत्रता अथवा औपनिवेशिक स्वराज्य का आश्वासन दिया गया। भारतीयों के मौलिक अधिकारों का भी इसमे उल्लेख नही था। इसके बावजूद भारतीय संवैधानिक विकास मे इस अधिनियम का विशेष महत्व है। भारत सरकार अधिनियम 1935 की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. संघ शासन की स्थापना 

1935 के अधिनियम के द्वारा भारत के लिये संघ शासन व्यवस्था की स्थापना करने का प्रयास किया गया। यह ब्रिटिश भारत के विभिन्न प्रांतों और देशी रियासतो को मिलाकर बनाया जाना था। इस प्रकार अधिनियम द्वारा भारत के संवैधानिक ढ़ांचे मे दो क्रांतिकारी परिवर्तन करने का प्रयास किया गया। प्रथम, वर्तमान एकात्मक शासन को संघीय शासन के रूप मे परिवर्तित करने। द्वितीय, पहली बार देशी रियासतो और भारत के विभिन्न प्रांतों को एक सामान्य प्रशासन के अंतर्गत लाने का संकल्प।

2. केन्द्र मे द्वैध शासन प्रणाली 

सन् 1919 के एक्ट के प्रान्तीय द्वैध शासन की तरह ही 1935 के अधिनियम मे भी द्वैध शासन प्रणाली स्थापित की गई। केन्द्रीय प्रशासन को संरक्षित और हस्तान्तरित दो भागों मे बाँटा गया। संरक्षित विषयो पर गवर्नर जनरल और उसकी कार्यकारिणी का पूर्ण अधिकार था तथा वह अपने विवेक से इन विषयो का कार्य करता था। हस्तान्तरित विषय यद्यपि उत्तरदायी मंत्रियों को सौंपा गया था परन्तु विषयो का विभाजन अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक था और इन विषयो को निष्प्रभावी बनाने का यह एक सरल उपाय था।

3. रक्षा कवच 

गवर्नर जनरल अपने निषेधाधिकार, विवेकाधिकार से हस्तांतरित विषयो को समाप्त कर सकता था, स्थागित कर सकता था तथा व्यवस्थापिका की अनुमति के बिना बी कानून बना सकता था। इस प्रकार प्रांतों मे भी गवर्नरों को रक्षा कवच प्रदान किये गये थे।

4. प्रांतीय स्वायत्तता 

इस अधिनियम ने प्रान्तो मे द्वैध शासन प्रणाली को समाप्त कर दिया और स्वायत्तता की स्थापना की। अतः शासन उत्तरदायी मंत्रियों को दिया गया परन्तु उत्तरदायी शासन ब्रिटिश सरकार या गवर्नरों पर बाध्यताकारी अथवा पूर्ण नही था। इसमे गवर्नरो को प्रान्तीय व्यवस्थापिका के निर्णयों को समाप्त करने, स्थगित करने, बदलने के अधिकार दिये गये थे।

5. संघीय न्यायालय 

संघात्मक संविधान के लिये एक उच्च, निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायालय की आवश्यकता होती है। इस न्यायालय का कार्य संघ की इकाइयों (देशी रियासतो और ब्रिटिश प्रांतो) के आपसी और संघ के साथ उठने वाले झगड़ो और विवादों का फैसला करना था। संघ न्यायालय भारत के लिये उच्चतम न्यायालय नही था। कुछ विशेष परिस्थितियों मे प्रिवी कौंसिल को भी अपील की जा सकती थी। 

6. विधानमण्डलों और मताधिकार का विस्तार 

भारत सरकार अधिनियम 1935 मे प्रान्तीय और केन्द्रीय विधानमण्डलो की संख्या मे काफी वृद्धि की गई। केन्द्र मे राज्यसभा के सदस्यों की संख्या 260 और विधानसभा के सदस्यों की संख्या 375 निर्धारित की गई। प्रान्तीय विधानसभा मे सदस्यों की संख्या दूनी कर दी गई। छह प्रांतो मे 11 मे से 6 विधानमंडल दो सदनों वाले बने। इस अधिनियम मे प्रांतों के लिये 10 प्रतिशत जनता को मत देने का अधिकार मिला। देश और राष्ट्र के लिये हानिकारक साम्प्रदायिक चुनाव प्रणाली का अधिक विस्तार कर उसे व्यापक बनाया गया।

7. प्रस्तावना 

1935 के अधिनियम मे प्रस्तावना जोड़कर 1919 की नीति से कोई भिन्न नीति की घोषणा नही की गई। 1919 के अधिनियम की ही प्रस्तावनाओं को 1935 के अधिनियम मे जोड़ा गया। यह नीति इसलिए अपनाई गई जिससे भारतीयो को यह ज्ञात हो सके कि ब्रिटिश सरकार का अंतिम लक्ष्य भारत मे अधिराज्य स्थिति या औपनिवेशिक स्वराज्य स्थापित करना है।

8. ब्रिटिश संसद की प्रभुता 

1935 के अधिनियम के अनुसार किसी भी प्रकार के परिवर्तन का अधिकार केन्द्रीय और प्रांतीय विधानमंडलो को न होकर ब्रिटिश संसद के पास था। केन्द्रीय और प्रांतीय विधानमंडल कुछ विशेष सीमाओं के अंतर्गत अधिनियम मे संशोधन का सिर्फ सुझाव प्रस्तुत कर सकते थे। सर्वोच्च सत्ता सिर्फ ब्रिटिश संसद के हाथ मे ही थी।

9. तीन सूचियाँ 

1935 के अधिनियम मे तीन सूचियों की व्यवस्था की गई। केन्द्रीय, प्रान्तीय तथा समवर्ती। वे विषय जो सर्वसाधारण के हित के थे, केन्द्रीय या संघीय सूची मे रखे गये। जैसे-- सेना, विदेशी मामले, मुद्रा, डाक, तार आदि। प्रांतीय सूची मे शांति, न्याय, पुलिस, जेल विषय थे, जो मूलतः तो प्रांतीय थे परन्तु देशव्यी एकरूप आचरण की उनमे आवश्यकता पड़ सकती थी। इन विषयो मे दण्ड नियम, दीवानी, विधि, विवाह एवं विवाह विच्छेद (तलाक), उत्तराधिकार नियम आदि सम्मिलित किये गये। "अवशिष्ट शक्तियों" को गवर्नर जनरल अपने "स्लविवेक" द्वारा किसी को भी प्रदान कर सकता था।

10. साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति को कायम रखना 

अंग्रेजो ने भारतियों मे फूट डालकर राज्य करने की नीति को कायम रखते हुए साम्प्रदायिक निर्वाचन पद्धति को तो कायम रखा ही, साथ ही इसका और अधिक विस्तार भी कर दिया। हरिजनों के लिए भी सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति अपनाई गई तथा मुसलमानों को केन्द्रीय विधानमण्डल मे 33-1/2 प्रतिशत स्थान दिये गये। बाकी सभी सम्प्रदायों के लिये 1919 के अधिनियम के अनुसार साम्प्रदायिक चुनाव पद्धति मे प्रतिनिधित्व दे दिया गया। मजदूरों और स्त्रियों को अलग प्रतिनिधित्व दिया गया।

11. भारतीय परिषद् का समाप्त होना 

1935 के अधिनियम मे भारतीय परिषद् समाप्त कर दी गई और उसके स्थान पर भारत सचिव के लिये कुछ परामर्शदाताओं की नियुक्ति की गई। इन परामर्शदाताओं की अधिकतम संख्या 6 और न्यूनतम 3 निर्धारित की गई। हस्तांतरित विषयो पर से भारतीय सचिव का नियंत्रण समाप्त कर उन्हे मंत्रियों को सौंप दिया। गवर्नर और गवर्नर जनरल की शक्तियों के अंतर्गत विषयों पर भारत सचिव का नियंत्रण यथावत रहा।

भारत सरकार अधिनियम 1935 की आलोचना 

1935 का अधिनियम भारतीयों को संन्तष्ट न कर सका। सभी वर्गो के लोगो ने इसकी आलोचना की। एक आलोचक ने कहा," 1935 का भारत सरकार का अधिनियम भारतीयों की शासन करने की शक्ति का उसी प्रकार परीक्षण करता है, जिस प्रकार एक हाथ-पाँव बँधे हुये व्यक्ति को नदी मे फैंककर उसकी तैरने की योग्यता का परीक्षण किया जाता है।" 1935 के अधिनियम की आलोचना के निम्न बिन्दु है जो इस प्रकार से है--

1. 1935 का अधिनियम अविश्वास पर आधारित था

ब्रिटेन के मजदूर दल के नेता मिस्टर एटली ने इस अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा," यह अधिनियम अविश्वास पर आधारित है।" 1935 के भारत सरकार अधिनियम मे केन्द्र के लिए आंशिक उत्तरदायित्व की व्यवस्था की गई थी तथा प्रांतों मे पूर्ण उत्तदायी शासन तब ही संभव हो सकता था, जबकि वास्तविक शक्ति मंत्रियों के पास हो और ये मंत्री अपने कार्यों के लिये विधानमण्डल के प्रति उत्तरदायी हो। 1935 के एक्ट द्वारा मंत्रियों की वास्तविक शक्ति का हस्तांतरण नही किया गया। यह अधिनियम एक प्रतियोगी कानून था। 

2. भारत मंत्री का शासन पर पूर्ववत् नियंत्रण 

यद्यपि 1935 के अधिनियम से भारत मंत्री की निरीक्षण निर्देशन व नियंत्रण की शक्ति छीनकर सम्राट मे निहित कर दिया गया परन्तु यह परिवर्तन भी करने भर को ही रहा। अब भी भारत पर उसका पूर्ववत् नियंत्रण रहा। गवर्नर जनरल पर अब भी उसका पूरा नियंत्रण था। समस्त इण्डियन सिविल सर्विस की भरती व नियंत्रण भारत मंत्री के हाथों मे ही था। वह सम्राट के लिये संरक्षित, भारतीय विधान-मण्डलों के विधेयकों पर स्वीकृति देने या न देने को सम्राट की शक्तियों का भी प्रयोग करता था। 

3. केन्द्र मे द्वैध शासन प्रणाली अनुचित थी

प्रांतों मे द्वैध शासन 1919 मे ही प्रारंभ कर दिया गया था जो कि पूर्णरूपेण असफल रहा, परन्तु फिर भी केन्द्र मे, 1935 मे द्वैध शासन की व्यवस्था की गई।

4. नौकरशाही शासन की स्थापना द्वारा भारतीयों की उपेक्षा 

भारत के शासन पर अब भी ब्रिटिश सरकार का ही नियंत्रण रहा। भारतीय संविधान मे संशोधन करने की शक्ति ब्रिटिश संसद के हाथों मे ही रही। समस्त उच्च अधिकारी अंग्रेज ही होते थे, जिनकी नियुक्ति भारत का मंत्री करता था और जो उसी के प्रति उत्तरदायी भी होते थे। इस प्रकार नौकरशाही शासन स्थापित किया गया और भारतीयों की शासन मे उपेक्षा की गई।

5. साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व देश के हित के विरुद्ध 

ब्रिटिश अधिकारियों ने अपनी फूट डालो और शासन करो की नीति को विस्तृत किया। सांप्रदायिक निर्वाचन पद्धति को अत्यधिक व्यापक कर दिया जिसके कारण भारत मे एकता समाप्त हो गई। समस्त भारत विभिन्न सांप्रदायिक वर्गो मे विभाजित कर दिया गया।

6. लोक सदन का अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रजातंत्र विरोधी विचारधार का प्रतीक 

प्रत्येक देश मे निचले सदन का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप मे होता था, परन्तु 1935 के अधिनियम मे भारतीय विधान-मंडल के निचले सदन के लिये अप्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था की गई। साथ ही मत देने का अधिकार भी बहुत सीमित था।

सन् 1935 के अधिनियम का मूल्यांकन 

1935 का अधिनियम दो बातों से 1919 के अधिनियम से अच्छा था। प्रथम, तो इसमे प्रांतो के द्वैध शासन के स्थान पर पूर्ण उत्तदायी शासन की व्यवस्था की गई। दूसरे, केन्द्र मे आंशिक उत्तरदायित्व की स्थापना का प्रस्ताव किया गया। इसके अतिरिक्त विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या मे भी वृद्धि की गई तथा मताधिकार का भी विस्तार किया गया।

परन्तु यह अधिनियम भी भारतीयों को संन्तष्ट न कर सका। इससे गवर्नर जनरल व गवर्नरों को इतने विशेष उत्तरदायित्व तथा स्वविवेकी शक्तियाँ सौंपी गई कि मंत्रियों के पास शासन करने को कुछ बचा ही नही। इसलिए प्रत्येक राजनैतिक दल ने इस अधिनियम की आलोचना की।

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