10/13/2020

मौर्यकालीन कला या स्थापत्य कला

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मौर्यकालीन कला या स्थापत्य कला (morya kalin sthapatya kala)

भारतीय कला के इतिहास का प्रादुर्भाव सिन्धु  सभ्यता से होता है, लेकिन सिंधु सभ्यता के बाद कलात्मक कृतियाँ मौर्य काल की ही मिलती है। सिंधु सभ्यता और मौर्य काल के बीच का समय भारतीय कला का अन्धकार युग माना जाता है। इस अन्धकार के पश्चात मौर्य काल भारतीय कला के स्वर्णिम काल के रूप मे उदय हुआ। मौर्य राजाओं ने कला के क्षेत्र मे अभूतपूर्व योगदान दिया और अपने संरक्षण मे कला का आश्रय दिया। मौर्य काल का वैभव, आत्मविश्वास और शक्तिशाली राजसत्ता का प्रतिबिम्ब मौर्य कला मे दिखाई देता है, यही कारण है कि अनेक विद्वान भारतीय कला का इतिहास मौर्य काल से ही मानते है। मौर्यकालीन स्थापत्य कला के अवशेषों को निम्म भागों मे विभाजित किया जा सकता है, जो इस प्रकार है--

1. स्तम्भ 

मौर्य कला के सर्वोत्तम नमूने अशोक के स्तम्भ है जो उसने अपने धर्म प्रचार के लिए निर्मित कराये थे। ये स्तम्भ देश के विभिन्न भागों मे स्थित है जिनकी संख्या लगभग 20 है। ये स्तम्भ चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित है। हर स्तम्भ की ऊंचाई 40 से 50 फुट तक है। उत्तरप्रदेश मे सारनाथ, प्रयाग, कौशाम्बी तथा नेपाल की तराई मे लुम्बिनी व निग्लिवा मे अशोक के स्तम्भ मिलते है। इन स्थानों के अलावा भी साँची, लौरिया-नन्दनगढ़ आदि स्थानों मे भी अशोक के स्तम्भ है। प्रत्येक स्तम्भ प्रमुख रूप से तीन भागों मे विभाजित है--

(क) मुख्य स्तम्भ 

इस पर सिंह तथा हाथी की मूर्ति निर्मित है। इस पर पीठ से पीठे लगये चार सिंह और बीच मे एक चक्र है जो धर्म चक्र का प्रतीक है। उसके नीचे कमल का उल्टा फूल बनाया गया है। मौर्य शिल्पियों के रूप विधान का सारनाथ के स्तम्भ पर पशुओं की आकृतियों से अच्छा दूसरा नमून नही है।

(ख) घण्टाकृत 

स्तम्भों के ऊपरी भाग मे स्थित घण्टाकृत अखमीनी स्तम्भों की भाँति घण्टों के समान दिखता है। यह ऊपर की तरफ गोलाई मे धीरे-धीरे कम होता जाता है। भारतीय विद्वान इस उल्टा कमल मानते है।

(ग) स्तम्भ का तना

स्तम्भ का कुछ भाग भूमि मे गड़ा हुआ है जिस पर मोर बना हुआ है। यह भाग भी अन्य भागों की भाँति ब्रज्य्रलेप से सुन्दर एवं चमकीला बनाया गया है। 

2. गुफाएँ  

मौर्य काल मे वस्तुकला के अंतर्गत एक नवीन शैली का जन्म हुआ। इसका जन्मदाता या निर्माता मौर्य सम्राट अशोक था। सम्राट अशोक द्वारा अनेक गुफायें निर्मित गयी। इन्हें कठोर चट्टानों को कटबार शीशे की तरह चमकीला बनाया गया था। इनका उपयोग भिक्षुओं के निवाश स्थान के साथ-साथ सभा भवन एवं उपासना गृह के रूप मे होता था। इस क्षेत्र मे अशोक के पौत्र दशरथ ने भी अशोक का अनुसरण किया उसने नागार्जुन पहाड़ियों मे तीन गुफाओं का निर्माण करवाया था। 

 यह गुफायें गया के समीप बारबर और नागार्जुन की पहड़ियों मे स्थित है। इसमे सबसे प्रचानी गुफा " सुदामा गुफा " है।

3. राजप्रासाद एवं विशाल भवन 

चन्द्रगुप्त मौर्य ने पाटलिपुत्र मे बहुत विशाल एवं भव्य राजप्रासाद का निर्माण कराया था। उसके राजमहलों के स्तम्भों पर चित्रकला तथा मूर्तिकला का सुन्दर प्रदर्शन किया गया था। इसके सभा भवन मे कई पाषाण खम्भे तथा फर्श व छत काष्ठ के थे। सभा भवन की लम्बाई 140 फुट व चौड़ाई 20 फुट थी। राजप्रासाद के भवन बलुआ पत्थर से निर्मित थे व उन पर चमकदार पालिश की गयी थी। चीनी यात्री फाह्रायान के अनुसार " यह प्रासाद मानवकृत नही है वरन् देवों द्वारा निर्मित है। प्रासाद के स्तम्भ पत्थरों से बने है और उन पर अद्वितीय चित्र उभरे है।" 

4. स्तूप 

स्तूप उल्टे कटोरे के आकार का पत्थर अथवा ईंटों से निर्मित एक ठोस गुम्बद होता था, जिसमे मृतकों के अवशेषों को रखा जाता था। महात्मा बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ही मुख्यतया स्तूपों का निर्माण किया गया था। स्तूपों का उपयोग महत्वपूर्ण घटना की स्मृति को बनाये रखने हेतु भी होता था। स्तूपों का आन्तरिक भाग कच्ची ईंटों का व बाहरी भाग पक्की ईंटों का होता था। स्तूप के ऊपर काष्ठ अथवा पत्थर का छत्र होता था। स्तूपों के चारों ओर परिक्रमा लगाने के लिए चबूतरा होता था व उसे लकड़ी की वेष्टणी से घेर दिया जाता था। सम्राट अशोक ने 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था,  परन्तु वर्तमान मे प्रायः इन मे से अधिकांश नष्ट हो गये है, किन्तु चीनी यात्रियों ने इनको देखा था। वर्तमान मे सबसे अधिक प्रचलित स्तुप साँची का है।

5. मूर्ति कला 

मौर्य काल मे मूर्ति कला अपने उन्नत शिखर पर थी।  विभिन्न स्थानों पर हुये उत्खननों से मौर्य कालीन अनेक मूर्तियां प्राप्त हुई है। मथुरा के पास परखम मे मौर्ययुगीन मूर्तियाँ मिली है। पत्थरों को काटकर सुडौल एवं सजीवता से पूर्ण पशुओं की मूर्तियां निर्मित की गयी। स्मिथ ने इस विषय मे लिखा है," मौर्य युग मे पत्थर तराशने की कला पूर्णता को प्राप्त हो चुकी थी और उसके द्वारा ऐसी आकृतियाँ सम्पन्न हुई थी, जैसी सम्भवतः इस बीसवीं शताब्दी मे भी बनना कठिन है।" 

मौर्य कालीन मूर्तियों की मुख्य विशेषता भाव प्रकाशन की प्रवीणता से परिपूर्ण अभिव्यंजना है। मथूरा के अलावा मौर्यकालीन मूर्तियां पटना, अहिच्छत्र, कौशाम्बी, गाजीपूर आदि स्थानों पर भी पायी जाती है। पटना मे नृत्य की मुद्रा मे एक स्त्री की मूर्ति मिली है, जिसकी ऊंचाई 11 इंच है। इसके सिर पर पगड़ी के समान वस्त्र, टाँगों मे लहँगा तथा छाती पर कपड़े की एक पट्टी बनायी गयी है।

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