8/27/2020

लेखांकन अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य

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लेखांकन या लेखाकर्म का अर्थ (lekhankan kise kahte hai)

lekhankan meaning in hindi;लेखाकर्म एक विश्लेषणात्मक कार्य है। यदि पुस्तपालन व्यापारिक गतिविधियों को विस्तारपूर्वक दैनिक आधार पर लिखता है, तो लेखाकर्म वार्षिक आधार (या अन्य साययिक आधार पर) उन गतिविधियों को संक्षिप्त, सारगर्भित व परिणाम मूलक बनाने की विधि है। इसके अन्तर्गत अंतिम खाते बनाना कोष-बहाव तथा रोकड़-बहाव विवरण तैयार करना, अंतिम खातों का विश्लेषण, निर्वाचन, प्रस्तुतीकरण व प्रकाशन का कार्य आता। विभिन्न पक्षों को सूचनाएं उपलब्ध करवाना भी इसी के अंतर्गत आता है।

लेखाकर्म या लेखांकन की परिभाषा (lekhankan ki paribhasha)

मैल्हासमैने तथा स्लैविन " लेखांकन स्वामित्व मे अथवा सम्पत्ति के अधिकार मे बढ़ने और घटने की भाषा मे, परिवर्तनों को लिपिबद्ध करने तथा वित्तीय व्यवहारों का विश्लेषण एवं व्याख्याएं करने की प्रक्रिया है।
हेरोल्ड बीरमेन तथा ऐलन आर. ड्रेबिन " लेखांकन को वित्तीय सूचना के पहचानने, मापने, लिपबध्द करने तथा सम्प्रेषित करने के रूप मे परिभाषित किया जा सकता है।

लेखांकन के उद्देश्य (lekhankan uddeshya)

(अ) मुख्य उद्देश्य
जिन प्रमुख उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पुस्तपालन तथा लेखाकर्म किया जाता है वे मुख्य उद्देश्य कहे जाते है--
 1. व्यवसाय मे लाभ हो रहा है या हानि। यदि लाभ हुआ है तो कितना और यदि हानि हुई है तो कितनी?
2. एक निश्चित समय पर व्यापार की कितनी सम्पत्तियां एवं दायित्व और इनकी वित्तीय स्थिति क्या है?
3. यह ज्ञात करना कि व्यापार उन्नति पर है या अवनति पर?
4. प्रत्येक व्यापारी यह जानना चाहता है कि एक निश्चित समय पर उसे किसी अमुक व्यक्ति को कितनी धनराशि देनी तथा किसी अमुक व्यक्ति से कितनी धनराशि लेनी है?
5. कानूनी आदेशों का पालन करने के लिए भी पुस्तपालन एवं लेखाकर्म किया जाता है। जैसे प्रत्येक ऐसी कम्पनी के लिए जिसकी स्थापना कम्पनीज अधिनियम, 1956 इसके पूर्व के कम्पनीज अधिनियमों के अन्तर्गत है, पुस्तपालन एवं लेखाकर्म रखना आवश्यक ही नही वरन् अनिवार्य है। एकाकी व्यापार एवं साझेदारी संस्था द्वारा लेखाकर्म रखना किसी भी अधिनियम द्वारा " अनिवार्य " नही है, परन्तु हिसाब-किताब रखने के लाभ इतने अधिक है कि ये संस्थाएं भी पुस्तपालन एवं लेखाकर्म को अपनाती है।
(ब) अन्य उद्देश्य
पुस्तपालन एवं लेखाकर्म के द्वारा उपर्युक्त मुख्य उद्देश्यों की पूर्ति तो की ही जाती है, किन्तु उनके द्वारा कुछ अन्य सूचनाएं भी अपने आप प्राप्त हो जाती है। इन अतिरिक्त सूचनाओं को प्राप्त करना "सहायक" उद्देश्यों मे गिना जाता है। ये सूचनाएं व उद्देश्य निम्न है--
1. यह ज्ञात प्राप्त किया जा सकता है कि कितना माल है, कितना माल बिक चुका है तथा कितना माल क्रय किया जा चुका है?
2. व्यवसाय मे रोकड़ की क्या स्थिति है?
3. कर्मचारियों की त्रुटियों व कपटों को जाना जा सकता है। ऐसा होने से इन पर अच्छा नियंत्रण रखा जा सकता है।
4. व्यापार मे प्रयुक्त पूंजी का विस्तृत ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
5. बहुत से व्यापारी कर निर्धारण के उद्देश्य से आवश्यक जानकारी प्राप्त करने के लिए लेखे करते है।
6. यह ज्ञात किया जा सकता है कि एक निश्चित समय पर व्यवसाय की क्या आवश्यकताएं हैं?
संदर्भ; मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, लेखक डाॅ सुरेश चन्द्र जैन।
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