8/27/2020

कार्यशील पूंजी घटक या तत्व, महत्व, आवश्यकता

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कार्यशील पूंजी की अवधारणा (karyasheel punji kya hai)

यह पूंजी व्यवसाय के दैनिक कार्यकलापों को पूरा करने हेतु जरूरी होती है। दूसरे शब्दों मे यह कहा जा सकता है कि स्थायी सम्पत्तियाँ क्रय कर लेने के बाद व्यवसाय की दैनिक आवश्यकता को पूरा करने के लिए कार्यशील पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। यह पूंजी अल्प अवधि के स्वभाव की होती है।
जिस प्रकार वित्तीय प्रबंध मे पूँजी शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों मे किया जाता है, उसी प्रकार व्यावसायिक जगत मे कार्यशील पूंजी का अर्थ भी विवादास्पद है। कार्यशील पूंजी की परिभाषा के सम्बन्ध मे विद्वानों मे काफी मतभेद है। एक विचारधारा के अनुसार, " दीर्घकालिन तथा अल्पकालीन दोनों तरह की देनदारियों द्वारा प्रतिनिधित समस्त चल सम्पत्ति के योग को कार्यशील पूंजी माना जाता है।"
हाॅगलैण्ड के अनुसार " कार्यशील पूंजी का अर्थ व्यापारिक लेखा पुस्तकों मे दायित्व तथा चालू सम्पत्ति के अन्तर से माना जाता है।" इसी तरह के विचार लिंकन, स्टेवैन्स, सेलियर्स आदि विद्वानों ने व्यक्त किये है।

कार्यशील पूंजी की मात्रा के निर्धारक घटक या तत्व (karyasheel punji ke ghatat)

1. व्यवसाय की प्रकृति
नियमित एवं निश्चित माँग वाले व्यवसायी की अपेक्षाकृत कृम कार्यशील पूंजी से काम चल जाता है। नियमित एवं निश्चित माँग होने से नगद प्रवाह सदैव बना रहता है तथा स्कन्ध मे अधिक विनियोग नही करना पड़ता है।
2. उत्पादन प्रक्रिया मे लगने वाला समय
जिन उधोगों मे कच्चे माल को निर्मित माल मे बदलने मे काफी समय लगता है, उनमें अर्द्ध निर्मित माल मे काफी समय तक पूंजी फंसी रहती है तथा इसी कारण ऐसे उधोगों मे अधिक कार्यशील पूंजी की जरूरत होती है। इसके विपरीत यदि उत्पादन प्रक्रिया मे लगने वाला समय कम हो तो निर्मित वस्तु से रोकड़ प्राप्ति शीघ्र होती है तथा ऐसी स्थिति मे कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है।
3. माल की आवृत्ति
किसी भी संस्था मे माल तीन प्रकार का हो सकता है- कच्चा माल, अर्द्ध निर्मित माल एवं निर्मित माल। तीनों ही प्रकार का माल चालू सम्पत्तियों मे सम्मिलित होता है, अतः कार्यशील पूंजी को प्रभावित करता है।
4. क्रय-विक्रय की शर्तें
उधार या नकद क्रय विक्रय सम्बन्धी व
शर्तें भी कार्यशील पूंजी की मात्रा को प्रभावित करती है। यदि कोई व्यावसायी वस्तुओं का क्रय उधार करे एवं उसका विक्रय नकद करे तो ऐसी स्थिति मे बहुत कम कार्यशील पूंजी की जरूरत होगी। इसके विपरीत यदि कोई व्यापारी नकद माल क्रय करे एवं उधार माल का विक्रय करे तो उसे ज्यादा कार्यशील पूंजी की जरूरत होगी। इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि नकद क्रय अथवा उधार क्रय विक्रय की शर्तें कार्यशील पूंजी की मात्रा को प्रभावित करती है।
5. व्यवसाय का आकार
व्यवसाय के आकार का भी कार्यशील पूंजी की मात्रा पर प्रभाव पड़ता है। व्यवसाय का आकार जितना बड़ा होगा उतनी ही अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी, क्योंकि बड़े व्यवसायों मे स्थायी पूँजी अधिक होती है जिसके लाभदायक उपयोग के लिए अधिक कार्यशील पूँजी होना आवश्यक है।
6. लाभांश नीतियाँ
लाभाशं नीति व कार्यशील पूंजी का घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि लाभांश नकद मे वितरित किया जाता है तो अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है लेकिन लाभांश अधिलाभांश अंशो (bonus shares) मे वितरित किया जाता है तो कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी।
7. बैंकिंग सम्बन्ध
जिन कम्पनियों ने बैंकों मे अपनी व्यावसायिक साख जमा ली होती है, उन्हें आवश्यकता के समय तुरंत कार्यशील पूंजी प्राप्त हो जाने का विश्वास रहता है। ऐसी स्थिति मे वे कम कार्यशील पूंजी से अपना काम चला लेती है। ऐसी स्थिति मे उन्हें ज्यादा कार्यशील पूंजी की आवश्यकता नही होती।
8. खरीद की शर्तें एवं रीतियां
विभिन्न प्रकार का कच्चा माल एवं अन्य समान किन शर्तों पर खरीदा जाता है तथा कितनी मात्रा मे खरीदा जाता है, इसका भी कार्यशील पूंजी पर प्रभाव पड़ता है।

8. विक्रय की शर्तें
यदि माल उधार बेचा जाता है तो अधिक कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी लेकिन यदि माल नकद बेचा जाता है तो कम कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होगी।
9. अन्य कारण
किसी राज्य के अर्थिक एवं औधोगिक विकास के स्तर यहां तक कि परिवहन एवं संचार का भी वहां की कम्पनियों की कार्यशील पूंजी पर प्रभाव पड़ता है।

कार्यशील पूंजी का महत्व (karyasheel punji ka mahatva)

व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के कार्यकलापों मे कार्यशील पूंजी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उचित मात्रा मे स्थायी सम्पत्तियों का प्रबंध कर लेने मात्र से ही व्यवसाय का संचालन नही किया जा सकता है बल्कि इन सम्पत्तियों का पूर्ण उपयोग करके ही व्यवसाय मे लाभ कमाया जा सकता है। स्थायी सम्पत्तियों का पूर्ण उपयोग कार्यशील पूंजी के उचित प्रबंध पर निर्भर करता है। व्यवसाय की सामान्य कार्यवाही का व्यवस्थित ढंग से संचालन करने के लिए कच्चा माल खरीदने, उसे निर्मित माल मे बदलने, माल की बिक्री व्यवस्था करने तथा ग्राहकों को उधार माल बेचने आदि की आवश्यकता होती है। इन सब के लिए कार्यशील पूंजी की आवश्यकता पड़ती है। व्यवसाय मे कार्यशील पूंजी का महत्व मनुष्य शरीर मे रक्त प्रवाह की भाँति है। जिस प्रकार मनुष्य का स्वास्थ्य रक्त प्रवाह अधिक होने व कम होने से बिगड़ जाता है ठीक उसी उसी प्रकार कार्यशील पूंजी की व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने से व्यवसाय की स्थिति बिगड़ जाती है तथा यह प्रगति की बजाय पतन की ओर जाने लगता है।
कार्यशील पूंजी प्रमुखतः व्यवसाय की निम्न आवश्यकताओं की पूर्ति करती है--
1. कच्चा माल खरीदने के लिए आवश्यक वित्त-पोषण की व्यवस्था करना।
2. कच्चे माल को निर्मित माल मे परिवर्तित करने के लिए आवश्यक मजदूरी व उपरिव्ययों का भुगतान करना।
3. उचित विक्रय व्यवस्था कर संस्था को आत्मनिर्भर बनाना।
कार्यशील पूंजी का प्रयोग विभिन्न प्रत्यक्ष व्ययों के तत्काल भुगतान के लिए किया जाता है। साधारणतया इन व्ययों का भुगतान माल क्रिय विक्रय से पूर्व ही किया जाता है। आधुनिक व्यवसाय मे जहाँ प्रतिस्पर्धा अधिक होती है, विक्रय की उचित मात्रा बनाये रखने के लिए उधार बेचना आवश्यक होता है। बेचा गये माल की वसूली कुछ समय पश्चात होती है। लेकिन इस समय के दौरान व इस समय से पूर्व विभिन्न प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष व्ययों जैसे सामग्री, बिजली, पानी, मजदूरों, किराय आदि निरंतर व्यय होते रहते है। आय तथा व्यय के समयों मे होने वाले अंतर के कारण संस्था को कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है।
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