12/07/2021

शिक्षा का सिद्धांत, प्लेटो

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प्लेटो का शिक्षा सिद्धांत 

plato ka shiksha ka siddhant;प्लेटो यूनान का एक महान राजनीतिक विचारक था। उसकी महान रचना का नाम Republic हैं। अपने इस प्रसिद्ध ग्रंथ में प्लेटो ने लिखा हैं-," सभी आधुनिक राज्यों का विधान और शासन असंतोषजनक हैं। प्रत्येक राज्य की यही दशा हैं। अतः बाध्य होकर मुझे इस निष्कर्ष को स्वीकार करना पड़ा कि इस समस्या का समाधान तभी हो सकता है जब सही शिक्षा को ही राज्यों और व्यक्तियों के आचारण का आधार माना जाए।" 

यदि रिपब्लिक का मूल उद्देश्य 'न्याय' के सिद्धान्तों की खोज है तो शिक्षा उसकी प्राप्ति का मुख्य स्त्रोत एवं माध्यम हैं। 

प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य की योजना में शिक्षा की आवश्यकता, शिक्षा के महत्व तथा नई शिक्षा के कार्यक्रम का विशद् वर्णन किया हैं। प्लेटो के इन विचारों से रूसों बहुत प्रभावित हुआ और उसने कहा," रिपब्लिक, शिक्षाशास्त्र पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ हैं।" 

शिक्षा का तात्पर्य 

प्लेटो के अनुसार शिक्षा सामाजिक बुराईयों को नष्ट करने का प्रत्यन हैं तथा त्रुटिपूर्ण जीवन को सुधारने की एक योजना हैं। प्लेटो का कहना है कि," शिक्षा बौद्धिक बुराई के लिए बौद्धिक उपचार हैं। प्लेटो की शिक्षा के दो रूप हैं-- दार्शनिक पक्ष तथा सामाजिक पक्ष। दार्शनिकता के विषय में प्लेटो ने कहा है कि," शिक्षा निरपेक्ष सत्य के दर्शन का एक साधन है और यह सत्य आत्मा का दर्शन हैं तथा सामाजिक पक्ष के संबंध में प्लेटो ने कहा हैं कि," शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया हैं, जो व्यक्तियों को समाज के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराती हैं। 

शिक्षा का महत्व

प्लेटो ने शिक्षा को बहुत महत्व दिया हैं। प्लेटो के अनुसार शिक्षा का तात्पर्य आत्मा को ऐसी परिस्थिति में ले जाना है जो उसके विकास की प्रत्येक अवस्था में सबसे उपयुक्त हो। शिक्षा निरपेक्ष दर्शन का साधन है और यह सत्य आत्मा का दर्शन हैं। जिस प्रकार शरीर भोजन के बिना नहीं रह सकता। उसी तरह आत्मा अपनी क्रियाओं के लिये शिक्षा-रूपी आध्यात्मिक भोजन पर निर्भर हैं।

प्लेटो राज्य को श्रेष्ठ शिक्षा का साधन मानता हैं। उसके अनुसार सही शिक्षा से जीवन के मार्ग की अनेक कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। व्यक्ति को विवेकशील और अपने कार्य के प्रति निष्ठावान बनाने का यह रचनात्मक (Positive) उपाय हैं। 

सैबाइन के अनुसार," प्लेटो के दृष्टिकोण से शिक्षा की उत्तम व्यवस्था से लगभग प्रत्येक सुधार संभव हैं। यदि शिक्षा की अवहेलना की जाती हैं, तो राज्य चाहे कुछ भी करे उसका कोई महत्व नहीं हैं। 

शिक्षा के उद्देश्य 

प्लेटो के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य न्याय को साकार करना हैं। प्लेटो के मुताबिक शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-- 

1. राजनीतिक 

इसका प्रथम उद्देश्य अभिभावक वर्ग को प्रशासन तथा संरक्षण के कार्यों में विशेषज्ञ बनाना हैं। 

2. सामाजिक 

इसका दूसरा उद्देश्य संरक्षक वर्ग में साहस की भावना भरना हैं।

3. शारीरिक व आत्मिक 

शिक्षा का उद्देश्य शरीर व आत्मा के समुचित विकास के लिये प्रशिक्षण देना हैं। 

4. अनुभूतिक व क्रियात्मक 

प्लेटो का मत हैं कि व्यक्ति को जानना और इसकी अनुभूति करना आवश्यक हैं कि वह समाज की एक इकाई है और अपने सामाजिक व्यक्तित्व के कारण समाज के प्रति उसके विशिष्ट कर्त्तव्य हैं, यह बताना शिक्षा का उद्देश्य हैं। 

5. व्यक्तिगत 

प्लेटो के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तित्व का सर्वांगींण विकास भी हैं।

प्लेटो की शिक्षा योजना की रूपरेखा 

अपने आदर्श राज्य के लिए प्लेटो ने जिस शिक्षा योजना को अपनाया हैं, उसकी प्रमुख विशेषता राज्य-नियंत्रण हैं। शिक्षा के राजकीय नियंत्रण के साथ-साथ उसने यह भी व्यवस्था की है कि संरक्षक वर्ग के स्त्री तथा पुरुष इस शिक्षा योजना से समान लाभ उठा सकें। 

अपनी शिक्षा योजना को प्लेटो ने दो स्तरों-- प्रारंभिक शिक्षा तथा उच्च शिक्षा में विभक्त किया हैं। शिक्षा का इन दो स्तरों में वर्गीकरण विद्यार्थियों की उम्र तथा उनके वर्गों को ध्यान में रखकर किया गया हैं-- 

1. प्रारंभिक शिक्षा 

प्लेटो ने प्रारंभिक शिक्षा सभी बच्चों के लिए अनिवार्य रखी थी। यह शिक्षा 6 से 20 वर्ष चलती हैं। प्लेटो की प्रारंभिक शिक्षा का उद्देश्य मनुष्यों की भावनाओं और संवेगों को सन्तुलित कर राज्य में रहने वाले लोगों के चरित्र का निर्माण करना हैं। इसके पाठ्यक्रम में प्लेटो ने व्यायाम, साहित्य और संगीत की शिक्षा को शामिल किया हैं। 

प्लेटो ने व्यायाम शब्द का प्रयोग सीमित अर्थ में नही किया है। वह व्यायाम मे शारीरिक कसरत, आहार नियम, औषिधि आदि के नियमों के ज्ञान को सम्मिलित करता है। इससे विद्यार्थी को अपने शरीर के रोगों और औषधि का भी ज्ञान हो जाएगा। शरीर सौष्ठव के साथ शरीर की बनावट व्यायाम मे सम्मिलित हैं। उसका विचार था कि स्वस्थ शरीर वाले व्यक्तियों का समाज भी स्वस्थ होगा। ऐसे समाज में डॉक्टरों की जरूरत नहीं पड़ेगी। प्लेटो मानता है कि व्यायाय का नैतिक महत्व भी हैं। व्यायाम के माध्यम से व्यक्ति में साहस, धैर्य, कष्टसहन, सहनशीलता और नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं। 

प्लेटो कहता हैं कि जिम्नास्टिक शरीर के लिए और संगीत आत्मा के लिए आवश्यक हैं। वह संगीत को व्यापक रूप में स्वीकार करता है। उसके लिए संगीत में साहित्य, लोक-नृत्य, ललित कलाएँ आदि सम्मिलित हैं। प्लेटो मानता है कि संगीत के द्वारा भावना और विवेक का विकास होता हैं। प्लेटो ने संगीत के शिक्षण पर सतर्कता बरतने की सलाह दी हैं। इसका कारण यह है कि वह मानता है कि कला का संबंध ह्रदय से होता हैं, कलाओं में प्रभावित करने की भी शक्ति होती हैं, अतः कला की प्रत्येक कमजोरी व्यक्ति के ह्रदय पर गलत प्रभाव डालती हैं। कवियों या कलाकारों को कला कई बार गलत मार्ग पर ले जाती है इसलिए प्लेटो बहुत सजगता से बतलाता हैं कि संगीत में किन विद्यों का प्रयोग बांछनीय है और किनका प्रयोग अवांछनीय हैं। साहित्य में किन विचारों को होना चाहिए तथा किनको नहीं होना चाहिए। प्लेटो नाटकों का विरोधी हैं। कविता की भी सीमाएँ निश्चित की गई हैं। कविता वर्णनात्मक एवं महाकाव्य रूप में होनी चाहिए।

18 से 20 वर्ष तक प्लेटो अनिवार्य सैनिक शिक्षा की व्यवस्था देता हैं, क्योंकि इससे क्योंकि इससे किशोरों में आत्म-विश्वास और अनुशासन पैदा होता हैं। इस शिक्षा के समाप्‍त होने पर जो व्यक्ति सबसे अधिक योग्यता का परिचय देगा उन्हें उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए चुन लिया जायेगा और शेष को सैनिक वर्ग में सम्मिलित करके उनके अनुरूप काम-काम में लगा दिया जायेगा। 

प्लेटो ने स्त्री शिक्षा का समर्थन और सहशिक्षा का विरोध करता हैं। बालकों और बालिकाओं के पाठ्यक्रमों में प्लेटो कोई अंतर नहीं करता। पृथक विद्यालयों के होने के बाद भी पाठ्यक्रम एक ही रहेगा।

2. उच्च शिक्षा 

प्लेटो की उच्च शिक्षा सभी के लिए नहीं हैं। प्लेटो की उच्च शिक्षा में दो स्तर हैं-- 20 से 30 वर्ष तक शिक्षण और 30 से 35 वर्ष तक का शिक्षण। सैन्य शिक्षा में सफल होने वाले जिन विद्यार्थियों में विवेक के प्रति झुकाव होगा वह शासक वर्ग के लिए 'उच्च शिक्षा' के लिए भेजा जाएगा। प्लेटो द्वारा प्रस्तुत उच्च शिक्षा राज्य का शासक या संरक्षक बनने वालों के लिए हैं। वस्तुतः संरक्षक वर्ग में से केवल उन्हीं लोगों के लिए यह शिक्षा थी जो दार्शनिक शासक के स्थान को ग्रहण करने के योग्य हों। 

प्रारंभिक शिक्षा युवाओं के लिए हैं। वह सैनिक निर्माण करने की शिक्षा हैं। सैन्य शिक्षा कलात्मक है अर्थात् कला के माध्यम से दी जाती है पर उच्च शिक्षा वैज्ञानिक है अर्थात् उसका माध्यम विज्ञान का अध्यापन हैं। गणित, खगोल, विज्ञान, दर्शनशास्त्र, तर्कशास्त्र, राजनीति आदि का अध्ययन कराना इसका ध्येय हैं। इन विषयों को 20 से 30 वर्ष अर्थात 10 वर्षों तक पढ़ाया जाएगा और शेष वर्षों अर्थात् 30 से 35 वर्ष तक केवल दर्शनशास्त्र का अध्यापन किया जायेगा। प्लेटो की मान्यता थी कि इन विषयों के अध्ययन से विवेक जागृत और विकसित होता हैं। प्लेटो से पहले प्रोटोगोरस और सोफिस्ट इन विषयों की शिक्षा दिया करते थे। 

प्लेटो ने शिक्षा-योजना बहुत विचार करने के बाद निर्मित की। गणित की शिक्षा इन्द्रिय ज्ञान से ऊपर उठकर सर्वोच्च विचार का ज्ञान प्राप्त कराती हैं। यह शिक्षा 30 वर्ष तक के लिए हैं। 30 और 35 वर्ष के बीच दर्शन के अध्ययन द्वारा 'शुभ के विचार' (The idea of good) का ज्ञान प्राप्त होगा। 

30 से 35 वर्ष तक के अध्ययन के बाद परीक्षा होती हैं। इसमें जो सफल होगा वह 'दार्शनिक राजा' होगा। उसे 'पूर्ण संरक्षक' भी कहा जा सकता हैं। प्लेटो कहता हैं कि दार्शनिक राजा के हाथों राज्य सुरक्षित रहेगा वही राज्य का शासक होगा। 

प्लेटो की शिक्षा-योजना यहीं समाप्त नहीं होती। दार्शनिक शासक 35 से 50 वर्ष तक की उम्र में राज्य की सेवा करेंगे। राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होते हुए भी वह समाज का सेवक हैं। 50 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद वे आने वाले अन्य शासकों के लिए स्थान छोड़ेंगे पर उन्हें राज्य की विभिन्न गतिविधियों से सक्रिय रूप से जोड़े रखा जाएगा। साथ ही वे शुभ के विचार का चिन्तन भी करते रहेंगे। आवश्यक होने पर राज्य की सेवा भी करेंगे। 

इस रूप में प्लेटो की शिक्षा-योजना जीवन पर्यन्त की योजना हैं। प्रारंभिक शिक्षा सैनिक वर्ग का निर्माण करती हैं, जो समाज की सेवा करेगा। उच्च शिक्षा शासक वर्ग का निर्माण करती हैं जो समाज की व्यवस्थाओं का संचालन करेगा। 

प्लेटो के शिक्षा सिद्धांत की विशेषताएं 

प्लेटो के शिक्षा सिद्धांत की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-- 

1. दर्शन-प्रमुख आधार के रूप में 

प्लेटो की शिक्षा दर्शनशास्त्र पर आधारित हैं, क्योंकि प्लेटो के अनुसार," समस्त ज्ञान तथा क्रियाकलापों की आत्मा ही स्त्रोत हैं। अतः आत्मा को ही समस्त ज्ञान का कोप कह सकते हैं।" प्लेटो ने राज्य को नैतिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान की संस्था माना हैं। उसका कहना है कि राज्य के हितों हेतु व्यक्ति को बलिदान देना चाहिए। 

2. न्याय की प्रमुखता 

प्लेटो की शिक्षा न्याय पर आधारित थी तथा न्याय के आर्दश की सफलता के लिए एक नवीन प्रकार के मानसिक तथा भौतिक वातावरण की आवश्यकता थी। 

3. पाठ्यक्रम का आधार निश्चित आयु व वर्ग 

प्लेटो ने शिक्षा का पाठ्यक्रम आयु एवं बुद्धि के आधार पर निर्धारित किया हैं। 

4. पाठ्यक्रम में नैतिक मानदण्डों को उचित स्थान 

प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना के अंतर्गत धर्म और नैतिकता को उचित स्थान प्रदान किया हैं। वह नैतिकता की दृष्टि से कुरूचिपूर्ण साहित्य और कलाकृतियों को सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं। 

5. शिक्षा एक दीर्घकालीन अनवरत प्रक्रिया 

प्लेटो ने शिक्षा को जीवन का अल्पकालीन कार्य न मानकर उसे आजीवन चलने वाली प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया हैं। 

6. मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को अधिकाधिक महत्व

प्लेटो की शिक्षा की एक अन्य विशेषता यह भी है कि प्लेटो ने मानव मन को अपनी शिक्षा का प्रमुख आधार बनाया था तथा अपनी शिक्षा में मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को महत्व देकर उनके अनुकूल ही व्यक्तियों को शिक्षा देने का प्रयास किया। 

7. कर्तव्यपरायणता पर बल 

अपने शिक्षा सिद्धांत में प्लेटो ने इस बात पर बल दिया है कि समाज के विभिन्न वर्गों में कर्तव्यों के प्रति सजगता उत्पन्न करना ही शिक्षा का लक्ष्य हैं। इस प्रकार कह सकते हैं कि प्लेटो की शिक्षा कर्तव्यपरायणता की शिक्षा पर निर्भर हैं। 

8. बौद्धिक विकास पर अधिक बल 

प्लेटो द्वारा प्रतिपादित शिक्षा सिद्धांत का एक मात्र उद्देश्य व्यक्ति का बौद्धिक विकास करना था। 

9. राज्य प्रशिक्षण संस्था के रूप में 

प्लेटो शिक्षा कार्य के लिए राज्य को ही सर्वोच्च संस्था मानता था, क्योंकि राज्य का उद्देश्य व्यक्ति को अपने अनुरूप शिक्षित करना हैं।

प्लेटो के शिक्षा योजना की आलोचना 

उपरोक्त विशेषताओं के बाद भी प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था में अनेक अवगुण विद्यमान थे, जिनके आधार पर प्लेटो की शिक्षा की कड़ी आलोचना की गयी थी, जो निम्नलिखित हैं-- 

1. उत्पादकों के लिए शिक्षा नहीं 

प्लेटो की शिक्षा योजना में सबसे बड़ा दोष तो यह है कि वह उत्पादकों अथवा श्रमिकों के लिए शिक्षा की व्यवस्था नहीं करता। क्या उन्हें अच्छा नागरिक बनने तथा अपना कार्य अच्छी तरह सीखने की शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए थीं? 

सैबाइन के शब्दों में," यह योजना व्यावसायिक शिक्षा को शिक्षा नहीं मानती।" 

2. पाठ्यक्रम की अवधि बहुत अधिक 

प्लेटो की उच्च शिक्षा की अवधी बहुत लम्बी हैं। 35 वर्ष की आयु तक सैद्धान्तिक शिक्षा चलती रहती हैं। उसके बाद भी 15 वर्ष तक व्यावहारिक शिक्षा चलती हैं। 50 वर्ष तक तो शिक्षा प्राप्त करते-करते व्यक्ति बूढ़ा हो जाएगा। 

3. साहित्य एवं कला की उपेक्षा 

प्लेटो साहित्य एवं कला को भी संगीत की परिधि में लेता है और वह उन पर शासन का पूर्ण नियन्त्रण चाहता हैं। वह कवियों और कविताओं को झूठा मानता हैं। 

कैटलिन के शब्दों में," प्लेटो कवियों को झूठा कहकर दरवाजे के बाहर कर देता हैं।" यह उचित नहीं। 

4. गणित आदि पर अधिक बल 

प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में गणित आदि विषयों पर बहुत बल दिया हैं। शिक्षा के क्षेत्र में गणित का निश्चित रूप से महत्व हैं, परन्तु प्रत्येक शासक को गणित का पण्डित होना चाहिए यह बात सर्वथा अतार्किक हैं। 

5. स्त्रियों और पुरूषों के स्वभाव में अंतर 

प्लेटो यह तो ठीक कहता है कि स्त्रियों को भी शिक्षा दी जानी चाहिए, परन्तु वह स्त्रियों व पुरूषों के मूल शारीरिक और मानसिक अंतर की उपेक्षा करता हैं। कुछ कार्य ऐसे हैं जो स्त्रियाँ नहीं कर सकतीं, और कुछ ऐसे कार्य हैं जिन्हें वे ही अच्छी तरह से कर सकती हैं। प्लेटो इस अंतर की उपेक्षा करता हैं इसलिए उसकी शिक्षा दोषपूर्ण हैं। 

6. नियन्त्रित शिक्षा 

प्लेटो की शिक्षा राज्य द्वारा नियंत्रित शिक्षा हैं। सभी व्यक्तियों के लिए नियन्त्रित और निर्देशित शिक्षा- ऐसी शिक्षा में स्वतंत्र चिंतन संभव नहीं हैं और दर्शन की दुनिया में सत्य तक पहुंचने के लिए आवश्यक हैं, शिक्षा स्वतंत्र हो, एक रस न हो।

प्लेटो की शिक्षा योजना का मूल्यांकन 

उपरोक्त आलोचनाओं के बाद भी हम देखते है कि प्लेटो के शिक्षा सिद्धांत के महत्व का पलड़ा भारी हैं। प्लेटो का आदर्श राज्य मुख्य रूप से एक विश्व विद्यालय हैं। एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ का कथन है कि आधुनिक आलोचक को इस बात पर अवश्य आपत्ति होनी चाहिए कि प्लेटो ने शिक्षा के इस महत्व को एक और तो बड़े विस्तार से उल्लिखित किया हैं और दूसरी ओर वह अन्य सामाजिक अध्ययन के विषयों की ओर विशेष रूप से उदासीन हैं, तथापि यह तो मानना ही पड़ेगा कि उसने राज्य को ही सर्वोच्च शिक्षा संस्था माना हैं। इसके महत्व को स्वीकारते हुए किसी विद्वान ने कहा भी हैं कि," प्लेटो की रिपब्लिक व्यापक रूप से एक विश्वविद्यालय, एक चर्च और एक परिवार हैं।" 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि 'प्लेटो की शिक्षा पद्धित निन्दनीय कम तथा प्रशंसनीय अधिक हैं।' प्लेटो की दार्शनिक शासक की शिक्षा पद्धित वर्तमान युग के अनुकूल नही हैं।' 

'सेबाइन' ने लिखा है कि दार्शनिकों का शासन सरलता से सन्तों के शासन में बदल जायेगा। सम्भवतः प्लेटो के आदर्श राज्य की समता सबसे उत्तम रूप में मठों की व्यवस्था से की जा सकती हैं।' अनेक आलोचक राजनीतिज्ञो ने प्लेटो की शिक्षा प्रणाली का एक अन्य विधि से भी मूल्यांकन किया हैं। कुछ राजनीतिज्ञों का विचार है कि प्लेटो कि शिक्षा प्रणाली कुलीन तंत्र की पोषक हैं, परन्तु 'इबस्टीन' के शब्दों में प्लेटो की शिक्षा प्रणाली का उचित मूल्यांकन किया गया हैं, वे लिखते हैं कि यद्यपि लोकतंत्र की धारणा हमेशा ही प्लेटो द्वारा प्रतिपादित कुलीन वर्गीय राजनीतिक शासकों की प्रशिक्षण योजना का विरोध करती रहेगी फिर भी वह सार्वजनिक सेवा के कर्मचारियों के समुचित प्रशिक्षण की सम्भावना तथा वांछनीयता के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखेगी।' प्रो. जोवेट भी प्लेटो के शिक्षा सिद्धांत के प्रमुख आलोचक रहे। 

अंत में कह सकते हैं कि प्लेटो की शिक्षा योजना आधुनिक शिक्षा-शास्त्रियों का पाठ्यक्रम निर्धारित करने के लिए मार्गदर्शन करती हैं, तथा निकट भविष्य में भी करती रहेगी।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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