12/12/2021

राज्य संबंधी सिद्धांत, अरस्तु

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प्रश्न; अरस्तु की राज्य संबंधी अवधारणा का वर्णन कीजिए। 

अथवा" अरस्तु के राज्य संबंधी विचारों का वर्णन कीजिए। 

अथवा" अरस्तु के आदर्श राज्य के सिद्धांत का वर्णन कीजिए। 

अथवा" अरस्तु का आदर्श राज्य ही प्लेटो का उपादर्श राज्य हैं।" समीक्षा कीजिए। 

अथवा" अरस्तु के राज्य की उत्पत्ति, प्रकृति एवं उद्देश्य के बारे में विचार स्पष्ट कीजिए। 

अथवा" अरस्तु के राज्य संबंधी विचारों का आलोचनात्मक वर्णन कीजिए। 

अथवा" अरस्तु की राज्य संबंधी अवधारणा का परीक्षण कीजिए।

अरस्तू का राज्य संबंधी सिद्धांत 

arastu ka rajya sambandhi siddhant;अरस्तू अपने गुरु प्लेटो की तरह ही सोफिस्ट वर्ग के इस विचार का खण्डन करता है कि राज्य की उत्पत्ति समझौते से हुई है और उसका अपने नागरिकों की शक्ति पर कोई वास्तविक अधिकार नहीं है। अरस्तू के अनुसार व्यक्ति अपनी प्रकृति से ही एक राजनीतिक प्राणी है और राज्य व्यक्ति की इस प्रवृत्ति का ही परिणाम है। उसका मत था कि राज्य का जन्म विकास के कारण हुआ है, वह एक स्वाभाविक संस्था है, उसके उद्देश्य और कार्य नैतिक हैं, वह सब संस्थाओं में श्रेष्ठ और उच्च है। 

अरस्तू के अनुसार राज्य की उत्पत्ति जीवन की आवश्यकताओं से होती है, परन्तु उसका अस्तित्व सद्जीवन की सिद्धि के लिए बना रहता है। अतः यदि समाज के आरम्भिक रूप प्राकृतिक हैं, तो राज्य की भी वही स्थिति है, क्योंकि वह उनका चरम लक्ष्य है और किसी वस्तु की प्रकृति उसका चरम लक्ष्य होती है। अरस्तू के शब्दों में, इसलिए यह जाहिर है कि राज्य प्रकृति की रचना है और मनुष्य प्रकृति से राजनीतिक प्राणी है, और जो मनुष्य प्रकृति से या मात्र संयोगवश किसी भी राज्य से सम्बद्ध न हो, वह या तो नराधम होगा या अतिमानव उसकी स्थिति तो उस समुदायहीन, नियमहीन, गृहहीन व्यक्ति जैसी होगी, जिसकी होमर ने निन्दा की है। व्यक्ति के लिए राज्य की उत्पत्ति प्राकृतिक है, अपने इस विचार की पुष्टि के लिए अरस्तू ने दो तर्क प्रस्तुत किये हँसर्वप्रथम वह मानता है कि प्रत्येक राज्य प्रकृतिजन्य है क्योंकि राज्य उन समस्त समुदायों का पूर्णरूप है, जो प्रकृ तिजन्य हैं। राज्य में भी वही गुण विद्यमान है जो इसका विकास करने वाले पूर्ववर्ती समुदायों में पाया जाता है। राज्य की प्रारम्भिक एवं मूलभूत इकाई अरस्तू व्यक्ति को मानता है जो अकेले में अपूर्ण है। अपनी दैनिक आवश्यकताओं को जुटाने एवं अपने जीवन को सुन्दर व सुखमय बनाने के लिए व्यक्ति को अनेक समुदायों की आवश्यकता होती है। परिवार, ग्राम राज्य आदि व्यक्ति के कुछ ऐसे ही मूलभूत समुदाय हैं। जिस अर्थ में परिवार या ग्राम व्यक्ति के लिए नितान्त आवश्यक होने के कारण स्वाभाविक समुदाय हैं, उसी अर्थ में राज्य भी व्यक्ति का एक नितान्त आवश्यक समुदाय है। इस समुदाय की उपस्थिति से ही व्यक्ति आत्मनिर्भरता एवं पूर्णत्व की स्थिति को प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं। अरस्तू का मत है," केवल जीवन मात्र की आवश्यकता के लिए राज्य उत्पन्न होता है और अच्छे जीवन की उपलब्धि के लिए कायम रहता है।" अरस्तू के विचार में राज्य इस कारण प्राकृतिक है कि यह वह उद्देश्य अथवा सम्पूर्णत्व है जिसकी ओर अन्य दूसरे समुदाय बढ़ते हैं। परिवार तथा ग्राम आदि व्यक्ति के जो अन्य प्राकृतिक समुदाय हैं, वे अपनी पूर्ण प्रकृति का विकास तभी कर सकते हैं , जबकि राज्य के रूप में वे अपनी प्रकृति की परिसमाप्ति को प्राप्त कर चुके हों व्यक्ति के सम्पूर्ण प्राकृतिक समुदायों का विकसित स्वरूप राज्य है। यदि परिवार आत्मनिर्भरता संबंधी व्यक्ति की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण कर पाते हैं तो ग्राम व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाते और इसी प्रकार यदि परिवार एवं ग्राम ही व्यक्ति को आत्मनिर्भरता प्रदान कर पाते तो राज्य उसके लिए महत्वहीन हो जाते, किन्तु राज्य के अतिरिक्त अन्य समुदायों में इतनी क्षमता नहीं है कि वे व्यक्ति को आत्मनिर्भर बना सकें, अतः राज्य व्यक्ति के लिए एक प्राकृतिक एवं मूलभूत समुदाय है। 

दूसरा, राज्य को प्राकृतिक कहने का एक अन्य कारण भी है। अरस्तू के अनुसार राज्य का उद्देश्य एवं लक्ष्य आत्मनिर्भरता की प्राप्ति है। इसे व्यक्ति के जीवन का महानतम लक्ष्य कहा जा सकता है। सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य की उपलब्धि का साधन राज्य है। अतः सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति का साधन होने के कारण भी राज्य व्यक्ति के लिए प्राकृतिक संस्था है। अरस्तू के अनुसार राज्य मनुष्य की सामाजिकता का परिणाम है सामाजिक जीवन अन्य जीवधारियों में भी पाया जाता है, परन्तु व्यक्ति विचारशील प्राणी है, इसलिए उसकी सामाजिकता अन्य श्रेणी के जीवधारियों से भिन्न है। यह सामाजिक मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों तथा कुछ विशेष उद्देश्यों पर आधारित है और इसने अनेक स्थितियों से गुजरकर अपना पूर्ण विकास प्राप्त किया है। सर्वप्रथम विवाह पद्धति के आधार पर अरस्तू ने सबसे पहले सामाजिक संस्था परिवार की स्थापना की जिसमें पति-पत्नी, सन्तान और दास एक साथ रहते हैं। परिवार में हमें राज्य के बीज दिखाई देते हैं क्योंकि परिवार का स्वामी शासक के रूप में कार्य करता है। परिवार स्वाभाविक समुदाय है क्योंकि यह सन्तानोत्पत्ति और सुरक्षा की आवश्यकताओं को पूरा करता है। परन्तु व्यक्ति केवल सुरक्षा ही नहीं चाहता उसकी अन्य भी अनेक भौतिक तथा आध्यात्मिक आवश्यकताएँ हैं। इसलिए कुछ परिवार मिलकर ग्राम का निर्माण करते हैं। ग्राम के द्वारा व्यक्तियों के पारस्परिक झगड़े निपटाने और उनके सामूहिक जीवन व्यतीत करने का प्रबन्ध किया जाता है, लेकिन ग्राम भी व्यक्तियों की सभी भौतिक, बौद्धिक और नैतिक आवश्यकताएँ पूरी नहीं कर पाते, अतः ग्रामों के सम्मिलन से नगर राज्य का जन्म होता है। नगर राज्य सुरक्षा और न्याय प्रदान करने की आवश्यकता ग्राम की तुलना में अधिक अच्छे प्रकार से पूरी कर सकता है और यह व्यक्ति की बौद्धिक एवं नैतिक शक्तियों को भी अधिक अच्छे प्रकार से विकसित कर सकता है। अतः नगर राज्य व्यक्तियों का अन्तिम और पूर्ण एवं श्रेष्ठतम समुदाय है। इस प्रकार अरस्तू के अनुसार परिवार से ग्राम से राज्य अस्तित्व में आये।

अरस्तू के शब्दों में," जब बहुत से ग्राम एक दूसरे से पूर्ण रूप से इस प्रकार मिल जाते हैं कि वे केवल एक ही समाज का निर्माण करते हैं, तब वह समाज राज्य बन जाता है।" दूसरे शब्दों में राज्य कुलों (परिवार) और ग्रामों का एक ऐसा समुदाय है जिसका उद्देश्य पूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्ति है।

राज्य का जन्म और विकास 

अरस्तु ने 'पाॅलटिक्स' में राज्य के विकास का व्यवस्थित रूप प्रतिपादित किया हैं। उसने उस समय समाज में प्रचिलित सोफिस्टो की धारणा 'राज्य किसी समझौते का परिणाम हैं' का खण्डन किया। उसने कहा कि राज्य का जन्म एक निरन्तर विकास के परिणामस्वरूप हुआ हैं। 

अरस्तु 'राज्य और समाज' में कोई भेद नहीं करता। प्राचीन यूनान में दोनों के लिए 'पोलिस' (Polis) शब्द का प्रयोग किया गया हैं। अरस्तु मानता हैं 'पोलिस' का विकास एक स्वाभाविक क्रम से हुआ हैं, यह विकास की एक श्रंखला हैं। 

राज्य के विकास की श्रृंखला की पहली कड़ी हैं-- परिवार। अरस्तु के शब्दों में," सबसे पहले तो मनुष्यों का संयोग होना जरूरी हैं, जो एक-दूसरे के बिना रह नहीं रह सकते। उदाहरणार्थ-- पुरूष और स्त्री का संयोग मनुष्य जाति की उत्पत्ति के लिए होना ही चाहिए और इसी प्रकार स्वाभाविक शासक और स्वाभाविक शासित तत्वों का संयोग घटित होना चाहिए, जिसमें दोनों की रक्षा हो सके।..... और इन दोनों से अनिवार्य प्रकृत संबंधों से उत्पन्न होने वाला पहला परिणाम हैं-- गृहस्थी अथवा घर।" 

इस प्रकार परिवार राज्य की पहली इकाई हैं। यह राज्य के विकास की मंजिल का प्रथम पड़ाव हैं। परिवार मनुष्य की शारिरिक और मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली पहली आवश्यक संस्था हैं। 

परन्तु परिवार का क्षेत्र बहुत छोटा हैं। मनुष्य की आवशयकताएँ केवल परिवार से ही पूरी नहीं हो सकतीं। व्यक्ति को भोजन, कपड़े और मकान भी चाहिए। यह सब एक परिवार के सदस्य मिलकर नहीं उत्पन्न कर सकते। उसे सभी व्यक्तियों की सहायक लेनी ही पड़ती हैं, क्योंकि परिवार आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। इन आवश्यकताओं की पूर्ति संपूर्ण ग्राम से ही हो सकती हैं। अतः परिवार से पग-पग बढ़ता हुआ मनुष्य ग्राम पर आ जाता हैं। 

ग्राम के बाद भी विकास का यह क्रम चलता रहा। मनुष्य ने पाया कि ग्राम की इकाई भी उसकी सभी जरूरतों की पूर्ति नहीं कर सकती, क्योंकि सुखी और श्रेष्ठ जीवन के लिए व्यक्ति की आकांक्षाओं का दायरा भी बढ़ता ही रहा। अतः ग्रामों से बाहर निकल कर मनुष्य ने धीरे-धीरे एक पूर्ण संस्था को विकसित किया, यह संस्था थी राज्य। 

इस प्रकार मानव इतिहास के आरंभ में मनुष्य से परिवार, परिवार से ग्राम और ग्राम से धीरे-धीरे राज्य का विकास हुआ। 

अरस्तु के अनुसार," बहुत से गाँवों के मिलने से अन्ततोगत्वा जो पूर्णता को पहुँचा हुआ समाज बनता हैं, बस वही राज्य हैं जो अब सभी वस्तुओं के विषय में आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा को पहुँचा हुआ कहा जा सकता हैं।" 

राज्य की प्रकृति 

अरस्तु राज्य को एक स्वाभाविक संस्था मानता हैं। राज्य मनुष्य पर लादी गई कोई संस्था नही हैं। यह संस्था मनुष्य की भौतिक और नैतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकसित हुई हैं, यह एक स्वाभाविक संस्था हैं। राज्य किसी पिंजरे के समान नहीं हैं, जहाँ मनुष्य बंदी हो। राज्य एक घोंसले के समान हैं, जिसे मनुष्य ने स्वयं तिनका-तिनका जोड़कर बनाया हैं। 

अरस्तु के शब्दो में," मानवीय आवश्यकताओं पर आधारित मानव समुदाय के बढ़ते हुए घेरे की पराकाष्ठा राज्य हैं।.....वह उनके मार्ग में बाधक नहीं, बल्कि सहायक हैं। वह एक घोंसले के समान हैं, पिंजरे के समान नहीं हैं।" 

अरस्तु के अनुसार," मनुष्य स्वभाव से ही एक सामाजिक प्राणी हैं। सभी लोगों के साथ मिलकर रहना, हँसना-खेलना उसका स्वभाव हैं। मनुष्य के इस स्वभाव का विस्तृत रूप राज्य हैं।"

अरस्तु के अनुसार,".....जो राज्य के बाहर रहते है या तो पशु है या देवता, क्योंकि सामान्य मानव स्तर से हटकर पशु या ईश्वर ही जीवित रहता हैं।" इसलिए भी राज्य स्वाभाविक हैं।

राज्य इसलिए भी स्वाभाविक हैं, क्योंकि राज्य जिन संस्थाओं से मिलकर बना हैं, वे सभी संस्थाएँ भी स्वाभाविक हैं। राज्य समुदायों का समुदाय हैं। 

सेबाइन के अनुसार," जिस प्रकार बंजुफल (Qcorn) के लिए बंजु (Oak) वृक्ष में विकसित होना स्वाभाविक हैं, उसी प्रकार मानव प्रकृति की उच्चतम शक्तियों का विकास राज्य में होना स्वाभाविक हैं।" और वे सभी स्वाभाविक हैं। इसलिए राज्य भी स्वाभाविक हैं। 

अरस्तु की इसी बात को शताब्दियों के बाद ग्रीन ने एक अन्य रूप में प्रतिपादित किया और कहा-," शक्ति नहीं, इच्छा ही राज्य का आधार हैं।"

राज्य का महत्व 

अरस्तु मानता हैं कि राज्य मनुष्य से पहले हैं इसकी व्याख्या करते हुए डाॅ.वी.पी. वर्मा लिखते हैं," मानवशास्त्र और इतिहास की दृष्टि से विचार करें तब ऐसा मालूम पड़ेगा कि परिवारों और ग्रामों की उत्पत्ति नगर राज्य से पहले हुई। निश्चित ही ऐतिहासिक दृष्टि से नगर राज्य बाद में और ग्राम पहले हुए किन्तु यदि तार्कित कारणवाद का आश्रय लेकर उनके सापेक्ष महत्व की मीमांसा करें तब मालूम पड़ेगा कि नगर राज्य पहले हैं।" 

समय की दृष्टि से राज्य चाहे व्यक्ति के बाद आता हो, परन्तु विचार और महत्व की दृष्टि से राज्य पहले आता हैं। व्यक्ति राज्य में ही पूर्णता प्राप्त करता हैं और इस पूर्णता का विचार अप्रत्यक्ष रूप से ही सही मनुष्य के मन में ग्राम और परिवार से पहले हैं और क्योंकि राज्य में व्यक्ति पूर्णता प्राप्त करता हैं, इसलिए भी राज्य व्यक्ति से पहले हैं। 

राज्य का स्वरूप जैविक 

अरस्तु ने राज्य के स्वरूप की जैविक धारणा को माना हैं और उसके अनुसार राज्य विभिन्न प्रकार के अंगों से मिलकर बना हुआ एक संपूर्ण चेतन (Oraganic Whole) हैं, व्यक्ति और समुदाय इसके अंग हैं। जिस तरह शरीर के सभी अंगों का महत्व हैं, वह सभी राज्य की जीवन देने वाली शक्ति के कारण हैं। राज्य के अभाव में वे सभी जड़ हो जायेंगे और इनका विनाश हो जायेगा। व्यक्ति राज्य के सदस्य के रूप में अर्थात् राज्य में रहकर ही अपना विकास कर सकता हैं। इवन्सटीन के अनुसार," अरस्तु ने अपने इस विचार के आधार पर राज्य की जैविक धारणा की नींव रखी हैं।"

राज्य के उद्देश्य 

अरस्तू के अनुसार," राज्य का अस्तित्व सदजीवन के लिए है, मात्र जीवन के लिए नहीं यदि इसका उद्देश्य मात्र जीवन को बनाये रखना होता तो गुलाम और जंगली जानवर भी राज्य बना लेते, परन्तु वे राज्य नहीं बना सकते क्योंकि न तो जीवन के आनंद में उसका कोई हिस्सा होता है न वे अपनी पसन्द का जीवन जी सकते हैं... राज्य का अस्तित्व मैत्री के लिए या अन्याय से सुरक्षा के लिए भी नहीं होता, न परस्पर संसर्ग तथा विनिमय के लिए ही होता है क्योंकि तब तो टाइरेनियम और कार्थेजिनियन तथा वे सब लोग जिन्होंने एक दूसरे के साथ वाणिज्य सन्धियाँ कर रखी हैं एक ही राज्य के नागरिक होते ... अतः हमारा निष्कर्ष यह है कि राजनीतिक समाज का अस्तित्व उदात्त कार्यों के लिए है मात्र साहचर्य के लिए नहीं।

उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है कि राज्य के कार्यों और उद्देश्यों के प्रति अरस्तू का दृष्टिकोण रचनात्मक और सकारात्मक हैं। उसका यह दृष्टिकोण लॉक और स्पेन्सर जैसे व्यक्तियों के नकारात्मक और विध्वंसात्मक दृष्टिकोण से पूर्णतया भिन्न है। अरस्तू के अनुसार राज्य एक सकारात्मक अच्छाई हैं, अतः इसका कार्य केवल बुरे कामों अथवा अपराधों को रोकना नहीं वरन् मानव को नैतिकता और सद्गुणों के मार्ग पर आगे बढ़ाना है। इस प्रकार राज्य का उद्देश्य है व्यक्ति के जीवन को श्रेष्ठ बनाना और व्यवहार में उसके द्वारा वे सभी कार्य किये जाने चाहिए जो इस लक्ष्य की पूर्ति में सहायक हों। संक्षेप में, अरस्तू राज्य को निम्न कार्य सौंपता है-- 

1. अपने सदस्यों के लिए पूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन की व्यवस्था करना आत्मनिर्भरता का व्यापक अर्थ है- व्यक्ति न केवल भौतिक उपकरणों की दृष्टि से ही आत्मनिर्भर हों, अपितु नैतिक प्रोत्साहनों एवं प्रेरणाओं की दृष्टि से ही आत्मनिर्भर बनें इस विस्तृत अर्थ में आत्मनिर्भरता की प्राप्ति का एकमात्र साधन राज्य है। 2. उत्तम और आनन्दपूर्ण जीवन का निर्माण उत्तम जीवन की व्याख्या करते हुए बार्कर ने लिखा है कि यह एक ऐसा जीवन है जो उत्तम कार्य और उत्तम आचरणों से ओत-प्रोत है। नैतिक और बौद्धिक सद्गुण ही उत्तम जीवन के मुख्य तत्व हैं और इन दोनों की प्राप्ति के लिए बाह्य साधन अपरिहार्य हो जाते हैं। बाह्य साधनों में आर्थिक व्यवस्था और शारीरिक स्वास्थ को मुख्य माना गया है। अरस्तु आनन्द को सत् से पृथक नहीं करता।अरस्तू के शब्दों में," हमें यह मानना होगा कि हर व्यक्ति में आनन्द की मात्रा उसके द्वारा किये गये उत्तम और बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों तथा उत्तमता और बुद्धिमत्ता के गुणों के अनुसार प्राप्त होती है। सार यह है कि मनुष्य का उद्देश्य एक नैतिक और आनन्दपूर्ण जीवन बिताना है और राज्य ऐसे जीवन को सम्भव बनाने के लिए स्थित है और इस प्रकार स्वयं एक नैतिक संस्था है। एक नैतिक और सद्गुणी जीवन का निर्माण करना इसका उद्देश्य है।" 

3. राज्य का एक प्रमुख कार्य अरस्तू ने नागरिकों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना माना है। शिक्षा को कुछ अर्थों में अरस्तू ने प्लेटो से भी अधिक महत्व दिया है। फॉस्टर के शब्दों में, लॉक (व्यक्तिवादी) के विचार से शिक्षा राज्य का कार्य नहीं; अरस्तू के विचार से यह उसका प्रमुख कार्य है। इसकी संस्थाओं का उद्देश्य मनुश्यों को उत्कृष्ट बनाना है न केवल बौद्धिक स्तर पर बल्कि नैतिक और भौतिक स्तर पर भी न केवल बाल्यकाल बल्कि उनके सम्पूर्ण जीवन के दौरान राज्य नागरिक के लिए पाठशाला होना चाहिए। 

4. शिक्षा संबंधी कार्य के साथ ही अरस्तू ने राज्य का यह कार्य भी माना है कि वह नागरिकों के लिए अवकाश जुटाने का प्रयत्न करे। ए.के. रोगर्स के अनुसार," चूंकि अरस्तू के अनुसार राज्य का उद्देश्य श्रेष्ठ जीवन का निर्माण है और के यह अवकाश से ही सम्भव है। 

संक्षेप में राज्य के कार्य क्षेत्र के बारे में अरस्तू के विचारों से स्पष्ट है कि वह राज्य के अत्यन्त व्यापक कार्यक्षेत्र का समर्थक था। जहां ग्रीन और लॉक जैसे आधुनिक विचारक राज्य के लिए सीमित कार्य क्षेत्र की चर्चा करते हैं वहां अरस्तू ने यह घोषणा की है कि राज्य अच्छे जीवन की स्थापना के लिए यथासम्भव प्रयत्नशील रहे। व्यक्तिवादियों के इस मत से अरस्तू बिल्कुल भी सहमत नहीं हो सकता था कि राज्य का कार्य क्षेत्र अधिक से अधिक सीमित हो। साथ ही उसके विचार उन आदर्शवादियों से भी मेल नहीं खाते जो राज्य के नकारात्मक कार्य क्षेत्र को उचित ठहराते हैं अरस्तू की स्पष्ट धारणा थी कि राज्य का कार्य क्षेत्र सकारात्मक होना चाहिए। राज्य को वे सब कार्य करने चाहिए जो अच्छे जीवन की स्थापना को सम्भव बनाएं। राज्य का व्यापक कार्य क्षेत्र अरस्तू निःसंकोच रूप से इसलिए निर्धारित कर पाया क्योंकि वह यूनानी दार्शनिक था। यूनानियों के लिए उस काल में राज्य अत्यन्त व्यापक समुदाय था। यह उनका राजनीतिक संगठन ही नहीं था अपितु उनका समाज, उनका धार्मिक समुदाय एवं उनका आर्थिक संगठन भी था।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी


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