12/04/2021

कौटिल्य के राजा संबंधी विचार

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कौटिल्य के राजा संबंधी विचारों का वर्णन और विवेचन कीजिए। 

अथवा" कौटिल्य का राजा अधिनायक नहीं हैं। विवेचन कीजिए। 

अथवा" क्या कौटिल्य का राजा निरंकुश हैं? व्याख्या कीजिए। 

कौटिल्य के राजा की दिनचर्या और उसके कार्यों का वर्णन कीजिए। 

अथवा" कौटिल्य के अनुसार, राजा के गुण, कार्यों, और दिनचर्या का विवेचन कीजिए।

उत्तर--

कौटिल्य के राजा संबंधी विचार 

kautilya ke raja sambandhi vichar;कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र मे राजतंत्र का समर्थन किया हैं। यद्यपि कौटिल्य गणतंत्र प्रणाली से भी परिचित थे, तथापि उन्होंने राजतंत्र को ही सर्वोत्तम व्यवस्था माना हैं। कौटिल्य ने अपने सप्तांग सिद्धांत के अंतर्गत राजा को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया हैं। उन्होंने राजा की सत्ता को समुदाय के सभी कार्यों की एकमात्र आधारशिला समझा हैं। उसकी समृद्धि से ही राज्य की समृद्धि संभव हैं। 

कौटिल्य के अनुसार राजा ही राज्य में सर्वशक्तिमान हैं। राजनीति की सफलता या असफलता तथा राज्य का भविष्य राजा की शक्ति और नीति पर निर्भर हैं। 

श्री वी. पी. सिन्हा के शब्दों में," कौटिल्य की शासन प्रणाली में राजा शासन की धुरी है तथा शासन संचालन, उसमें सक्रिय रूप से भाग लेने एवं उसे गति प्रदान करने में राजा का एकमात्र स्थान हैं।" 

अर्थशास्त्र में कौटिल्य ने राजा के संबंध में विस्तार से वर्णन किया हैं। उसने राजा के गुणों, राजा की दिनचर्या, राजा के कार्यों और राजा के महत्व का विशेष वर्णन किया हैं। कौटिल्य ने कहा कि राजा को पराक्रमी, विद्वान तथा चतुर होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भावी राजा को आरंभ से ही सुप्रशिक्षित होना चाहिए। राजा की शिक्षा और राजा के संयम पर कौटिल्य ने बहुत बल दिया है। 

कौटिल्य के अनुसार राजा के आवश्यक गुण 

कौटिल्य ने राजा के अनेक गुणों का होना आवश्यक बताया हैं। कौटिल्य का मत हैं कि राजा एक आदर्श व्यक्ति होना चाहिए। उसमें दुर्गुणों का लेशमात्र भी नही होना चाहिए। उसमें दैवी बुद्धि और शक्ति हो, वह वृद्धजनों की बात को सुनने वाला हो, वह कृतज्ञ हो यानी अहसान फरामोश न हो, वह सत्य भाषण करने वाले हो, उसका लक्ष्य ऊँचा हो, उसमें उत्साह अधिका हो। ये गुण केवल दिखावे के लिए ही नही बल्कि राजा में ये गुण वास्तविकता में होने चाहिए। 

कौटिल्य के अनुसार राजा की शिक्षा 

कौटिल्य इस तथ्य से परिचित थे कि उपर्युक्त सभी गुणों से युक्त व्यक्ति सरलता से नही मिल सकता। कौटिल्य के अनुसार इनमें से कुछ गुण तो स्वाभाविक होते हैं और कुछ अभ्यास से प्राप्त किये जा सकते हैं। 

कौटिल्य ने राजा की शिक्षा और राजा के संयम पर बहुत अधिक बल दिया है। कौटिल्य अपनी शिक्षा योजना द्वारा प्लेटो की तरह स्वर्ग में स्थापित हो सकने वाले आदर्श राज्य के दार्शनिक शासक की कल्पना नही करता अपितु राजा वास्तविकता के धरातल पर खड़ा हैं। यही कारण है कि प्लेटो जहाँ अपनी योजना में असफल रहा, वहीं कौटिल्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को आदर्श शासक बनाया। 

कौटिल्य का मत है कि," उत्तम प्रकार की शिक्षा प्राप्त किया हुआ राजा समस्त प्राणियों के हितों की रक्षा करता हुआ, प्रजा को संरक्षण प्रदान करते हुए, चिलकाल तक निष्कंटक पृथ्वी का उपभोग करता हैं।" 

कौटिल्य के अनुसार," राजा को दण्ड-नीति, राज्य-शासन, सैन्य विद्या, मानवशास्त्र और धर्मशास्त्र तथा इतिहास की शिक्षा दी जानी चाहिए। कौटिल्य के शब्दों में," जिस प्रकार घुन लगी हुई लकड़ी शीघ्र नष्ट हो जाती है उसी प्रकार जिस राजकुल के राजकुमार शिक्षिक नहीं होते, वह राजकुल बिना किसी युद्ध आदि के स्वयं ही नष्ट हो जाता हैं। 

कौटिल्य के अनुसार  राजा की दिनचर्या

कौटिल्य ने राजा की दिनचर्या का विस्तार से उल्लेख किया हैं। इसके पीछे उसका विचार यह हैं कि अपने दायित्वों और कर्त्तव्यों का पालन योग्यता और निपुणता के साथ कर सके। कौटिल्य के लिए राजा पूर्णतः राज्य के लिए समर्पित होना चाहिए, वैभव और विलासिता का जीवन जीने के लिए नहीं। कौटिल्य ने राजा के 24   घण्टों के कार्यक्रमों को 16 घड़ियों में बाँटा हैं। प्रत्येक घड़ी एक घण्टा 30 मिनिट की हैं।

दिनचर्या

प्रथम घड़ी 

प्रजा की रक्षा-व्यवस्था की देख-रेख तथा हिसाब-किताब की जाँच।

द्वितीय घड़ी 

ग्राम व नगरवासियों का प्रशासन। 

तृतीय घड़ी 

स्त्रान, भोजन, स्वाध्याय। 

चतुर्थ घड़ी 

वित्त विभाग का निरीक्षण, नियुक्तियाँ, स्थानांतरण। 

पंचम घड़ी 

मंत्रियों, गुप्तचरों से मंत्रणा। 

षष्ठम घड़ी 

मनोरंजन। 

सप्तम घड़ी 

हाथी, घोड़े, अस्त्र-शस्त्र का निरीक्षण। 

अष्ठम घड़ी 

सेनापति से मंत्रणा।

रात्रिचर्या 

प्रथम घड़ी 

गुप्तचरों की रिपोर्ट पर विचार। 

द्वितीय घड़ी 

स्त्रान, भोजन, स्वाध्याय। 

तृतीय घड़ी 

गायन, वादन। 

चतुर्थ घड़ी 

निद्रा। 

पंचम घड़ी 

निद्रा 

षष्ठम घड़ी 

दिन के कार्यक्रमों पर विचार। 

सप्तम घड़ी 

गुप्तचरों से परामर्श। 

अष्ठम घड़ी

आचार्य, पुरोहित आदि से भेंट। 

कौटिल्य के राजा का जीवन समर्पित और तपस्वी का जीवन हैं।

कौटिल्य के अनुसार राजा के कर्त्तव्य 

राजा के कर्त्तव्य का वर्णन करते हुए कौटिल्य ने लिखा हैं," प्रजा के सुख में राजा का सुख हैं, प्रजा के हित में राजा का हित है। राजा के लिए प्रजा के सुख से भिन्न अपना सुख नहीं हैं, प्रजा के सुख में ही उसका सुख हैं।" उसके अनुसार," राजा और प्रजा में पिता और पुत्र का संबंध होना चाहिए।" जैसे पिता पुत्र का ध्यान रखता हैं, वैसे ही राजा के द्वारा प्रजा का ध्यान रखा जाना चाहिए। इस सामान्य धारणा के प्रतिपादन के साथ-साथ कौटिल्य राजा के कर्त्तव्यों का विशद् विवेचन भी करता हैं। कौटिल्य के अनुसार राजा के मुख्य कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं-- 

1. वर्णाश्रम को बनाये रखना 

कंप्यूटर वर्णाश्रम धर्म को आर्य मर्यादा मानता था। यह व्यवस्था तीन वेदों की देन हैं। ऐसी प्रजा-सदैव प्रसन्न रहती हैं। 

2. दण्ड की व्यवस्था 

वह कहता है कि समाज और सामाजिक व्यवहार दण्ड पर ही निर्भर करते हैं, इसलिए दण्ड की व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं। 

3. आय-व्यय संबंधी 

आय-व्यय का पूरा हिसाब रखना, उसका प्रबंध और उसमें समन्वय बनाये रखना राजा के कर्त्तव्य हैं। 

4. नियुक्तियाँ 

राजा आमात्य, सेनापति और प्रमुख कर्मचारियों की नियुक्ति करता है। यह बहुत महत्वपूर्ण कार्य हैं। नियुक्ति के बाद इन पर नियंत्रण भी बनाये रखना पड़ता हैं।

5. लोकहित और सामाजिक कल्याण संबंधी कार्य 

कौटिल्य का राज्य लोक-कल्याणकारी राज्य भी हैं क्योंकि वह राजा को प्रजा के हित का पूरा ध्यान रखने का कर्त्तव्य बताता हैं। इसके लिये राजा को दानी, दयालु और परोपकारी होना चाहिए। उसे अपने राज्य में रहने वाले वृद्धों, बालकों, अनाथों तथा असहायों के हितों का भी चिन्तन करता रहना जरूरी हैं। वह कृषि की भी उचित व्यवस्था करेगा। वह यातायात का भी प्रबंध करे इसके लिए जलयान मार्गों का निर्माण और रख-रखाव और सुरक्षा उसका प्रधान कर्त्तव्य हैं। कौटिल्य के मतानुसार राजा को धनवानों से कर वसूल कर निर्धनों और असहायों के कल्याण पर खर्च करना चाहिए। उसे राज्य की खानों और उद्योग-धन्धों की भी उचित देखभाल व प्रबन्ध करना चाहिए। उसने वनों का उचित प्रबन्धन तथा वन्य पशु-पक्षियों की देखभाल भी राजा का कर्त्तव्य बताया हैं। 

6. युद्ध करना भी राजा का कर्त्तव्य 

कौटिल्य के अनुसार राजा को राज्य की रक्षा और राज्य को शक्तिशाली बनाने के लिये उसका विस्तार करना आवश्यक हैं। इसलिए राजा का युद्ध करना उसका एक कर्त्तव्य हैं। अतः राजा वीर, साहसी और योद्धा होना चाहिए। 

वास्तव मे कौटिल्य के राज्य का केंद्र-बिन्दु राजा महत्वाकांक्षी एवं पराक्रमी राजा होगा जो युद्ध में विजयों द्वारा न केवल शत्रु से राज्य की रक्षा करने में सक्षम होगा अपितु वह समय-समय पर राज्य का समुचित विस्तार कर एवं राज्य की सीमायें बढ़ाकर राज्य को इतना शक्तिशाली तथा आत्मनिर्भर बना देगा कि अन्य राज्यों में उस राज्य की अवेहेलना करने की हिम्मत न हो।

क्या कौटिल्य का राजा निरंकुश हैं? 

कौटिल्य के राजा का विवेचन करते हुये राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के सामने एक विचारणीय प्रश्न और रह जाता है कि क्या कौटिल्य द्वारा रचित गंथ्र अर्थशास्त्र में वर्णित राजा निरंकुश हैं? 

कौटिल्य के राजा के वर्णन को पढ़ने से ऐसा लगता है कि कौटिल्य का राजा राज्य का केन्द्र-बिन्दु या धुरी होने के कारण निरंकुश हो सकता हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं हैं क्योंकि कौटिल्य अपने राजा पर अनेक प्रतिबन्ध लगाता हैं। 

अलतेकर का मत हैं कि," यह मत स्वीकार होगा कि वर्तमान की तरह राजा पर कोई संवैधानिक प्रतिबन्ध नहीं थे, तथापि उन्होंने कई बन्धन लगाए थे जो सामान्य परिस्थितियों में पर्याप्त प्रभावशाली थे।" 

कौटिल्य के राजा की निरंकुशता पर प्रतिबंध 

1. लोक-कल्याणकारी राज्य की व्यवस्था

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का लक्ष्य लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना था। कौटिल्य ने राजा के समक्ष उच्च आदर्श प्रस्तुत किए। इन कर्तव्यों की व्यवस्था होते हुए राजा के निरंकुश होने की कल्पना नहीं की जा सकती। कौटिल्य के शब्दों में," प्रजा के सुख मे राजा का सुख हैं, प्रजा के हित में उसका हित हैं। राजा के लिए प्रजा से अलग अपना कोई सुख नहीं हैं। प्रजा के सुख में ही उसका सुख हैं।"

2. धार्मिक नियम और रीति-रिवाज 

कौटिल्य के राजा पर दूसरा प्रतिबंध धार्मिक नियमों और रीति-रिवाजों का हैं। वह इनका पालन करने के लिए बाध्य है अन्यथा जनता उसकी हत्या भी कर सकती हैं। वह राजा में निजी नैतिक और धार्मिक भावना की अपेक्षा करता है।

3. सामाजिक समझौते की व्यवस्था 

कौटिल्य के अनुसार मनुष्यों ने राजाज्ञाओं के पालन की प्रतिज्ञा की, उसके बदले मे राजा ने धन-जन की रक्षा का वाचन दिया। इन कर्त्तव्यों का निर्वाह न करने की स्थिति में राजा को बदलने का अधिकार कौटिल्य ने प्रजा को दिया। कौटिल्य ने लिखा हैं," जनता ने कोप के कारण राजा का वध किया।" 

4. मंत्रिपरिषद् का नियंत्रण 

राजा की शक्ति पर तीसरा प्रतिबंध मंत्रिपरिषद का था। उसके अनुसार राज्य रूपी रथ के दो चक्र और मंत्रिपरिषद है, इसलिए मंत्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर हैं मंत्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियंत्रण रख उसे निरंकुश बनने से रोकती थी। 

5. जनमत का भय 

राजा को जनमत का भय हमेशा बना रहता था। राजा का कर्त्तव्य इस प्रकार निर्धारित किए गये थे कि वह जनमत की अवहेलना न कर सकें। उसे अधर्मपूर्ण उपायों द्वारा धन संग्रह नहीं करना चाहिए। राजा अपने न्यायिक अधिकारों का प्रयोग केवल विधि के अनुसार ही कर सकता था। 

6. शिक्षा की व्यवस्था 

कौटिल्य ने राजा की शिक्षा पर बल देकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह निरंकुशता का मार्ग न अपनाकर लोकहित के कार्यों में लगा रहे। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक मानसिक और नैतिक गुण आवश्यक बताये हैं और इस प्रकार सर्वगुणसंपन्न राजा अपने स्वभाव से ही निरंकुश नहीं हो सकता।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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