12/02/2021

मनु के राजनीतिक विचार

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अथवा" मनु के राज्य के संबंधी विचारों का वर्णन कीजिए। 

अथवा" मनु निरंकुश राजसत्ता का समर्थक था! विवेचन कीजिए। 

अथवा" राजनीति विज्ञान को 'मनु' की क्या देन हैं?

उत्तर--

मनु के राजनीतिक विचार 

मनु कौन थे? 

हिन्दू धर्म ग्रंथों में मनु का नाम सम्मान और आदर के साथ मिलता हैं। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार मनु मानव जाति का जनक था। ऋग्वेद में बार-बार मनु को मानव सृष्टि का प्रवर्त्तक और समस्त मानव जाति का पिता कहा गया हैं। पुराणों में मनु का उल्लेख 24 बार हुआ हैं। मनुस्मृति में भी मनु का परिचय दिया गया। मनु मानव जाति के पूर्व पुरूष हैं। जब भगवान विष्णु ने सृष्टि रचने का विचार किया तो सृष्टि रचने की इच्छा के साथ ही नाभि प्रदेश से कमल और उस पर आसीन ब्रह्रा प्रकट हुए। ब्रह्रा ने सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार को प्रकट किया। सृष्टि वृद्धि के लिए ब्रह्राजी ने स्वयं को अर्द्ध नारीश्वर रूप में आधा भाग स्त्री और आधा भाग पुरूष का संयोजित किया। उनसे स्वयं मनु और उनकी सहचरी शतरूपा उत्पन्न हुई। मनु और शतरूपा के मारीच, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलइ, ऋतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु, नारद दस प्रजापति उत्पन्न हुए। इन प्रजापतियों से सात अन्य मनु तेजस्वी महर्षि उन्नत हुए तथा यहीं से आगे सृष्टि वृद्धि का क्रम निरन्तर चलता रहा। मनुस्मृति में कहा गया है कि प्रथम मनु ने उन धर्मों को घोषित किया जिन्हें ईश्वर ने मनुष्यों के लिए मनु को बताया था। मनु अमर और शाश्वत हैं। 

मत्यस्य पुराण के अनुसार प्रत्येक मन्वंतर का एक मनु होता हैं। पुराण चौदह मनु की चर्चा करते हैं। प्रत्येक मन्वंतर अरबों वर्ष का होता हैं तथा प्रत्येक मन्वंतर का स्वामी एक मनु होता हैं। उसी से मन्वंतर का नाम जाना जाता हैं। अब तक छह मनु का शासन काल हो चुका हैं। वर्तमान में सातवें मनु वैवस्पन मनु का शासन काल हैं। भविष्य में अभी सात मनु का शासनकाल और आना हैं। प्रत्येक मन्वतर में चार युग (कृत, त्रेता, द्वापर व कलियुग) होते हैं। इनकी समाप्ति पर धार्मिक कार्य करने वाला तथा धर्म का ज्ञाता पुरूष नए मवंतर के लिए बच जाता हैं। वही पुरूष नए मन्वतर और युग कोप्राचीन धर्म और संस्थाओं का ज्ञान कराता है तथा नये युग और मन्वतर के अनुरूप पुराने धर्म को घोषित करता हैं। इस प्रकार प्रत्येक मन्वतर का एक मनु होता हैं, मेघा तिथि, जो मनुस्मृति के टीकाकार हैं, का कहना हैं कि मनु किसी व्यक्ति का नाम नहीं अपितु पद का नाम हैं।

मनु के राज्य की उत्पति संबंधी विचार 

मनु स्मृति," के सातवें अध्याय में राज्य संबंधी विचार प्रस्तुत किये गये हैं। इसी में राज्य की उत्पति एवं साव्यवी सिद्धान्त प्रस्तुत किये गये हैं। मनु ने राज्य की उत्पति ईश्वर के द्वारा मानी है। इसमें कई जगह सामाजिक अनुबंध सिद्धान्त का भी आभास दिखता है। मनु स्पष्ट करता है कि राज्य के पूर्व मानव की स्थिति , कष्टपूर्ण, असहनीय थी। इस कष्ट के निवारण के लिये ईश्वर इन्द्र, वायु, सूर्य, अग्नि, वरूण, चन्द्रमा, कुबेर, यम आदि ने सारभूत अंश से राजा का निर्माण किया। इन आठ उत्कृष्ट तत्वों से मिलकर राजा ने न केवल मानव दुखों को दूर किया वरनउनके कल्याण को सुनिश्चित किया। इन आठ तत्वों से बना राजा विश्व रक्षक, पोषक, समृद्धिकारक होता है। निश्चित रूप से मनु राज्य की उत्पति के दैवीय सिद्धान्त का पोषक है परन्तु उसके इस सिद्धान्त में सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की झलक भी दिखती है। राजा सर्वोच्च है, वह ही सभी के कल्याण का माध्यम है।" "मनुस्मृति" में राजा का यह दायित्व है कि वह इस भूमि पर सभी दिशाओं में शंति और व्यवस्था कायम रखे। 

मनु का दैवीय उत्पति का सिद्धान्त तथा पाश्चात्य दैवीय उत्पति के सिद्धान्त में अंतर 

प्रायः मनु के दैवीय उत्पति के सिद्धान्त की तुलना पाश्चात्य दैवीय उत्पति के सिद्धान्त से की जाती है। इन दोनों में काफी अंतर दिखता है। पाश्चात्य विद्वानों ने दैवीय उत्पति के सिद्धान्त के द्वारा राजा को निरंकुश सत्ता प्रदान की है। 

मनु राजा को निरंकुश सत्ता का पक्षधर नहीं है। मनु ने राजा को धर्म, नैतिकता के अधीन रखा है। उसने इस बात पर बल दिया है कि राजा सदा प्रजा का पालन करे तथा उसकी रक्षा करे। राजा को देव का अंश बताया गया परन्तु इसमें उसके गुणों पर योग्यता पर बल दिया गया है न कि उसके अधिकार, शक्तियों एवं मनमानी पर है। यहां पर मोरबानी का कथन प्रासंगिक लगता है कि," राजा को समझना चाहिए कि वह धर्म के नियमों के अधीन है। कोई भी राजा धर्म के विरूद्ध व्यवहार नहीं कर सकता है। धर्म राजाओं एवं मनुष्यों पर एक समान ही शासन करता है। इसके अतिरिक्त राजा -राजनीतिक प्रभु जनता के भी अधीन है। वह अपनी शक्तियों के प्रयोग में जनता की आज्ञा पालन की क्षमता से सीमित है। 

सालेटोर के शब्दों में,“ मनु ने निःसंदेह यह कहा है कि जनता राजा को गद्दी से उतार सकती है और उसे मार भी सकती है। यदि एवं अपनी मूर्खता से जनता को सताता है।" 

मनु ने स्पष्ट किया है कि राजा सभी नियमों एवं कानूनों से बंधा है। वह विशिष्ट है परन्तु साधारण मनुष्यों की तरह दण्ड भोगता है। उसका कहना है कि यदि किसी अपराध में दण्ड एक पण है तो राजा के भंग करने पर उसे सौ पण दण्ड दिया जाना चाहिए क्योंकि राजा अधिक विद्वान एवं योग्य है। इसके अतिरिक्त राजा का प्रशिक्षण, दिनचर्या उसे निरंकुशता की ओर नहीं जाने देते हैं। 

इस प्रकार से स्पष्ट हो जाता है कि दैवीय उत्पति सिद्धान्त अपनाये जाने के बावजूद भी मनु का राजा निरंकुश, स्वेच्छाचारी तथा अत्याचारी नहीं है। उसके ऊपर कानून, नैतिकता एवं मर्यादा का नियन्त्रण है।" 

मनु के राजा संबंधी विचार 

मनु ने राजा को अनेक राजाओं के सारभूत अंश से निर्मित बताया है । राजा ईश्वर से उत्पन्न है अतः उसका अपमान नहीं हो सकता है। राजा से द्वेष करने का अर्थ है कि स्वयं को विनाश की ओर ले जाना। “मनु स्मृति" में तो यहां तक लिखा है कि राजा में अनेक देवता प्रवेश करते हैं। अतः वह स्वयं एक देवता बन जाता है। 

मनु स्मृति के अनुसार," ऐसा राजा इन्द्र अथवा विद्युत के समान एश्वर्यकर्त्ता, पवन के समान सबके प्राणाव , प्रिय तथा हृदय की बात जानने वाला, यम के समान पक्षपात रहित न्यायधीश, सूर्य के समान न्याय, धर्म तथा विद्या का प्रकाश, अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने वाला, वरूण के समान दुष्टों को अनेक प्रकार से बांधने वाला, चन्द्र के समान श्रेष्ठ पुरूषों को आनन्द देने वाला तथा कुबेर के समान कोष भरने वाला होना चाहिए।” 

राजा के गुण

मनु ने राजा के गुणों एवं कर्तव्यों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। वह कहता है कि राजा को प्रजा तथा ब्राहृमणों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील रहना चाहिए। राजा को अपने इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना चाहिए। उसे काम, क्रोध आदि से मुक्त रहना चाहिए।"

मनु स्मृति में स्पष्ट किया गया है कि उसे शिकार, जुआ, दिवाशयन , परनिन्दा, परस्त्री प्रेम, मद्यपान, नाच-गाना, चुगलखोरी, ईर्ष्या, परछिद्रान्वेषण, कटुवचन, धन का अपहरण आदि से बचना चाहिए। 

मनु स्मृति में राजा के लिये मुख्य निर्देश निम्न हैं-- 

1. वह शस्त्र धन, धान्य, सेना, जल आदि से परिपूर्ण पर्वतीय दुर्ग में हर प्रकार से सुरक्षित निवास करे ताकि वह शत्रुओं से बच सके। 

2. राजा स्वजातीय और सर्वगुण सम्पन्न स्त्री से विवाह करे। 

3. राजा समय-समय पर यज्ञ का आयोजन करे और ब्राहृमणों को दान करे।

4.प्रजा से कर वसूली ईमानदार एवं योग्य कर्मचारियों के द्वारा किया जाना चाहिए। प्रजा के साथ राजा का संबंध पिता-पुत्र की तरह होना चाहिए। 

5. राजा को युद्ध के लिये तैयार रहना चाहिए। युद्ध में मृत्यु से उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। 

6. विभिन्न राजकीय कार्यों के लिये विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति की जाय। 

7. राजा को विस्तारवादी नीति को अपनाना चाहिए। 

8. अपने सैन्य बल एवं बहादुरी का सदैव प्रदर्शन करना चाहिए। 

9. गोपनीय बातों का गोपनीय बनाकर रखना चाहिए। शत्रुओं की योजनाओं को समझने के मजबूत गुप्तचर व्यवस्था रखनी चाहिए। 

10. अपने मंत्रियों को सदैव विश्वास में रखना चाहिए। 

11. राजा सदैव सर्तक रहे। अविश्वसनीय पर बिल्कुल विश्वास न करे और विश्वसनीय पर पैनी निगाह रखे। 

12. राजा को राज्य की रक्षा तथा शत्रु के विनाश के लिये तत्पर रहना चाहिए। 

13. राजा को अपने कर्मचारियों, अधिकारियों के आचरण की जांच करते रहना चाहिए। गलत पाने पर उनको पदच्युत कर देना चाहिए। 

14. राजा को मृदुभाषी होना चाहिए। मनु ने राजा की दिनचर्या का भी वर्णन किया है। उसने सम्पूर्ण दिन को तीन भागों में बांटकर प्रत्येक के लिये अलग-अलग कार्य निर्धारित किये हैं। राजा को स्नान एवं ध्यान के बाद ही न्याय का कार्य करना चाहिए। राजकार्यों के संबंध में अपने मंत्रियों के साथ तथा विदेश मामलों में अपने गुप्तचरों एवं राजदूतों के साथ परामर्श नियमित रूप से करना चाहिए। 

"मनु स्मृति" में राजा के गतिशील जीवन की चर्चा की गई है। इसमें राजा को सदैव सजग और सावधान रहने की आशा की जाती है।

मनु के शासन संबंधी विचार 

मनु के अनुसार शासन का मुख्य उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति में सहायक होना है। अतः राजा को अपने सहयोगियों के माध्यम से (मंत्रियों) इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। मनु स्मृति में स्पष्ट किया गया है कि राजा को सदैव लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, जो प्राप्त हो गया है उसे सुरक्षित रखने का प्रयास करना चाहिए। राजकोष को भरने का सदैव प्रयास करना चाहिए। समाज के कमजोर एवं सुपात्र लोगों को दान करना चाहिए। राजा को प्रजा के साथ पुत्रवत वर्ताव करना चाहिए तथा राष्ट्रहित में कठोर भी हो जाना चाहिए। राजा को न्यायी, सिद्धान्तप्रिय तथा मातृभूमि से प्रेम करने वाला होना चाहिए। 

राजा को राजकार्य में सहायता देने के लिए मंत्रीयों की व्यवस्था है।" मनु स्मृति ” में “ मंत्री" शब्द का प्रयोग नहीं है परन्तु सचिव शब्द का प्रयोग कई बार मिलता है। मनु स्मृति में कहा गया है कि आदमी से सरल काम भी मुश्किल हो जाता है। अतः शासन के जटिल कार्यों के लिये मंत्री नियुक्त किये जाने चाहिए। वे विद्वान, कर्तव्यपरायण, शास्त्रज्ञाता, कुलीन तथा अनुभवी होने चाहिए। वह शासन कार्य में एकांत में तथा अलग-अलग तथा आवश्यकतानुसार संयुक्त मत्रंणा करनी चाहिए। मंत्रियों को उनकी योग्यतानुसार कार्य सौंपना चाहिए। यहां पर मनु स्पष्ट करता हैसूर, दक्ष और कुलीन सदस्य को वित्त विभाग, शुचि आचरण से युक्त व्यक्ति को रत्न एवं खनिज विभाग, सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता मनोवैज्ञानिक, अन्तःकरण से शुद्ध तथा चतुर कुलीन व्यक्ति को संधि विग्रह विभाग का अधिष्ठाता बनाया जाना चाहिए। मंत्रिपरिषद के अमात्य नामक व्यक्ति का दण्ड विभाग, सेना विभाग तथा राजा को राष्ट्र एवं कोष अपने अधीन रखना चाहिए। इनमें से वह ब्राहृमणों को विशेष महत्व देने पर बल देता है। 

उसका मत है कि," इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है वह ब्राहृमण ही है। ब्राहृमण ब्रहमा का ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र है।" 

मनु की मान्यता है कि मत्रंणा अत्यन्त गोपनीय होनी चाहिए। वह इसके लिए मध्याहन अथवा आधी रात को इसके लिये उपयुक्त मानता है। "मनु स्मृति” से यह भी पता चलता है कि उस समय मंत्रीयों का राजा के प्रति उत्तरदायित्व, मत्रंणा की गोपनीयता मिलकर निर्णय लेने की भावना तथा मंत्रीयों में विभागों के बंटवारे की व्यवस्था विकसित हो गई थी। प्रशासनिक कार्यों के संचालन के लिये वह योग्य , अनुभवी तथा ईमानदार कर्मचारी की नियुक्ति का पक्षधर है। भ्रष्ट अधिकारियों पर पैनी निगाह रखते हुए उनके विरूद्ध कठोर कार्यवाही करने चाहिए। कर्मचारियों एवं महत्वपूर्ण पदाधिकारियों पर नजर रखने के लिये गुप्तचर व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाना चाहिए। राजदूत के संबंध में मनु ने स्पष्ट किया है कि निर्भीक प्रकृति के, सुवक्ता, देश काल पहचानने वाले, हृदय एवं मनोभाव को पहचानने वाले, विविध लिपियों के ज्ञाता तथा विश्वासपात्र को राजदूत बनाया जाना चाहिए। 

मनु के प्रादेशिक प्रशासन संबंधी विचार 

मनु ने प्रशसनिक व्यवस्था संबंधी निर्देश अपनी पुस्तक "मनु स्मृति" में दिये है। मनु का स्पष्ट मत है कि राजा दो , तीन , पांच और सौ गांवों के बीच अपना राज स्थान स्थापित करें तथा यहां शन्ति और व्यवस्था बनाये रखने के लिये योग्य कर्मचारी नियुक्त करे। मनु स्मृति में राज्य को क्षेत्रीय आधार पर पुर तथा राष्ट्र को विभाजित किया गया है। पुर या दुर्ग से आशय राजधानी से है जो चारों ओर से सुरक्षित सुविधाओं से पूर्ण तथा स्वस्थ भू-भाग में बसाई जानी चाहिए। शासन को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिये राष्ट्र को छोटी-बड़ी बस्तियों में विभाजित करना चाहिए। मनुस्मृति मे स्पष्ट रूप से एक ग्राम, दस ग्राम, सौ ग्राम तथा एक हजार ग्रामों की अलग-अलग संगठनों की व्यवथा है। ग्राम शासन की सबसे छोटी इकाई है इसके अधिकारी को ग्रामिक कहा जाता है। 

मनु के अनुसार ग्रामिक का मुख्य कार्य शन्ति और व्यवस्था बनाये रखना है। इसको ही राजस्व एकत्र कर 10 ग्रामों के अधिकारी के पास भेजना है। 10 ग्रामों के अधिकारी को दशग्रामपति कहा जाता है। बीस ग्राम के अधिकारी को विशंती, सौ ग्रामों के अधिकारी को शती, तथा एक हजार ग्रामों के पति को सहस्त्रपति कहा गया है। इन सभी अधिकारियों के कार्यों के निरीक्षण उच्च अधिकारी करता है। प्रत्येक अधिकारी के वेतन का भी उल्लेख मनु स्मृति में मिलता है। ग्रामों के अतिरिक्त नगरों के प्रशासन की भी व्यवस्था की गई है। नगर अधिकारी को स्वार्थ चिन्तक नाम दिया गया है।

विधायिका (परिषद) 

मनु ने कार्यपालिका के साथ ही विधायिका अथवा परिषद का उल्लेख किया है। परिषद का अर्थ विधायिका से लिया जाता है। मनु स्मृति में स्पष्ट किया गया है कि परिषद में तीन से दस तक सदस्य होने चाहिए। इन सदस्यों में से तीन वेदों के जानकार होने चाहिए। वेदों की जानकारी के साथ राष्ट्रीय नीतियों को क्रियान्वित करने की क्षमता भी होनी चाहिए। यहां पर मोरवानी का कथन महत्वपूर्ण है," परिषद ऐसे विद्वान व्यक्तियों से मिलकर बननी चाहिए जिन्होंने वेदों, टीकाओं का अध्ययन किया हो जो अपने तर्कों के संबंध में प्रमाण देने में सक्षम हो।"

मनु स्मृति में कुल, जाति, श्रेणी और जनपद नामक जनता की संघीय संस्था का भी उल्लेख किया। इसमें यह भी बताया गया है कि इन संस्थाओं द्वारा बनाये गये नियमों को वह स्वीकृति प्रदान करे। 

मनु की कानून न्याय एवं दण्ड व्यवस्था 

मनु स्मृति में सदैव राजा के न्यायपूर्ण आचरण पर बल दिया गया है। न्याय ही दण्ड का आधार है। मनु का यह मानना था कि दण्ड के भय के कारण ही लोग स्थिर रहते है। मनु का कहना है कि राजा का यह कर्तव्य है कि वह देश, काल, अपराध की गुणता आदि पर विचार करके ही अपराधियों को दण्ड देना चाहिए। मनु का मानना है कि राजा दण्ड के भय से ही शासन करता है। यदि राजा अपराधियों को दण्ड न दे तो बलवान लोग दुर्बलों को वैसे ही पकाने लगेगें जैसे मछलियों को लोहे की छड़ में छेदकर पकाया जाता है। राजा का यह परम कर्तव्य है कि वह राज्य में न्यायोचित दण्ड की व्यवस्था करें। राजा को सदैव तत्पर रहते हुए कुल, जाति, गण और जनपद में जो भी अपने धर्म से विचलित हो तो राजा उन्हें यथोचित दण्ड की व्यवस्था करता है। 

मनु ने दण्ड के चार प्रकार बताये है-- 

1. घिग्दण्ड 

2. वाग्दण्ड 

3. धनदण्ड 

4. वधदण्ड

मनु ने दण्ड की महत्ता पर बहुत अधिक बल दिया है। उसकी मान्यता है कि दण्ड के अभाव में राज्य एक क्षण भी नहीं चल सकता है। मनु दण्ड को सामाजिक जीवन का आधार मानता है। वह दण्ड के महत्व को निम्न तर्कों के द्वारा सिद्ध करता है-- 

1. दण्ड सभी मनुष्यों का रक्षक होता है । यही कारण है कि सभी उसका पालन करते है। 

2. यह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान होता है। 

3. दण्ड की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था की रक्षा एवं देखभाल करता है। 

4. दण्ड राज्य की संपति की रक्षा तथा वृद्धि के लिये अनिवार्य है। 

दण्ड के संबंध में मनु स्पष्ट करता है कि यह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान तत्व है। 

अतः दण्ड देने वाला व्यक्ति राज्य में सर्वोच्च होता है। प्राचीन भारतीय साहित्य में व्यक्त दण्ड संबंधी विचार को ही सम्प्रभुता का आधार कहा जाता है। 

कानून अथवा विधि संबंधी विचार 

मनु ने कानून निर्माणके लिये परिषद अथवा विधायिका का उल्लेख किया है। परिषद के सन्दर्भ में उसका स्पष्ट मत है कि इसका निर्धारण बौद्धिक क्षमता से होना चाहिए न कि संख्या के आधार पर। उसने स्पष्ट किया है कि इसके दस सदस्यों में तीन वेद के ज्ञाता, एक निर्वक्ता, एक भीमांसाकर, एक निसक्त, एक धर्म शास्त्र का कहने वाला तथा तीन व्यक्ति मुख्य व्यवसायों के होने चाहिए। मनु यह भी स्पष्ट करता है कि यदि ऐसे दस व्यक्ति न मिले तो योग्य वेदों के जानकार तीन व्यक्ति ही काफी है। 

मनु के न्याय संबंधी विचार 

मनु स्मृति में न्याय व्यवस्था का विस्तृत विवेचन किया जाता है। मनु के अनुसार सामान्यतः दो प्रकार के विवाद होते हैं हिंसा के कारण उत्पन्न विवाद तथा धन संबंधी विवाद मनु का मानना है कि राजा को स्वंय विवादों का समाधान करना चाहिए। यदि वह स्वंय न कर पाये तो योग्य ब्राहृमण को नियुक्त किया जाना चाहिए। राजा द्वारा नियुक्त ब्राहृमण भी ऐसे तीन अन्य व्यक्तियों के साथ न्यायालय में न्याय करना चाहिए। मनु अपेक्षा करता है कि सभी विवादों का निर्णय पूर्ण निष्पक्षता से करना चाहिए। यदि सत्य असत्य से पराजित होती है तो उसके सदस्य भी पाप से नष्ट हो जाते है । मनु की स्पष्ट मान्यता थी कि न्यायधीश वेदों का जानकार ब्राहमण व्यक्ति को ही होना चाहिए। शूद्रों को यह महत्वपूर्ण दायित्व नहीं देना चाहिए। न्यायधीशों को शारीरिक भाषा, मुख संकेत तथा मनोविज्ञान समझने की क्षमता रखनी चाहिए। जहां पर निर्णय हो उस स्थान का सभा कहा जाता है। सभा के न्यायधीश को सत्य की रक्षा के लिये दृढ़ प्रतिज्ञ होना चाहिए। सत्यता की जांच करने के लिये लिखित युक्ति तथा साक्षी आदि का परीक्षण करना चाहिए। मनु ने प्रमाणों को भी दो भागों में बांटा हैं--

1. मानुष प्रमाण 

2. दिव्य प्रमाण

मानुष प्रमाणः- मनु ने मानुष प्रमाण को तीन भागों में बांटा है। ये मुख्य रूप से लिखित, युक्ति तथा साक्षी होते है। मनु आगे स्पष्ट करते है कि लिखित प्रमाणों को सर्वाधिक महत्व होता है। इसमें भी यह देखना चाहिए कि बलपूर्वक तो कोई लिखित प्रमाण तैयार नहीं कराया गया है। मनु की स्पष्ट मान्यता थी कि झूठ बोलने वाले, सेवक, शत्रु, सन्यासी, कोढ़ी के ऊपर विश्वास नहीं करना चाहिए। साक्ष्य से पूर्व शपथ का विधान रखना चाहिए। मिथ्या साक्ष्य देने वालों को कठोर दण्ड देना चाहिए। स्त्री के लिये स्त्री साक्षी को स्वीकार करना चाहिए। गवाह के रूप में ब्राहृमण गवाह को विशेष महत्व देना चाहिए| युक्ति प्रमाण के संबंध में मनु कहता है कि यदि किसी व्यक्ति की किसी चीज को कोई 10 वर्ष से अधिक समय से भोग कर रहा है तो वह वस्तु उसी की हो जायेगी। इस संबंध में यह जरूर कहता है कि संबंधित मामला बालक तथा पागल का नहीं होना चाहिए। 

दिव्य प्रमाण:- दिव्य प्रमाण में शपथ लेने, जल में डूबना, जलती अग्नि को ग्रहण करना सम्मिलित किये गये है। यह प्रमाण तभी प्रासंगिक होते है जब मानुष प्रमाण विफल हो जाते है। मनु में न्यायिक पुनरावलोकन के तत्व भी मिलते है। वह यह स्पष्ट करते है कि यदि राजा को लगे कि न्याय गलत हो गया है तो वह विवाद का पुनः अवलोकन कर सकता है। 

मनु के कर व्यवस्था संबंधी विचार 

करारोपण के संबंध में भी मनुस्मृति में व्यापक व्यवस्था की गई है। मनु भी प्रजा के साथ पुत्रवत संबंध रखने का हिमायती था। उसकी मान्यता थी कि प्रजा से थोड़ा-थोड़ा कर ही लेना चाहिए। वह स्पष्ट करता है कि कर न लेने से राजकोष खाली होता है और राज्य कमजोर होता है वही अत्याधिक, दमनकारी कर नीति से प्रजा की जड़ तथा विश्वास घटता है। कर का निर्धारण सदैव न्यायपूर्ण होना चाहिए। वह कहता है कि कर लगाने का उद्देश्य विलासिता नहीं वरनजनकल्याण होना चाहिए। मनु स्मृति में कर की मात्रा का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मनु के अनुसार पशु एवं स्वर्ण का 50 वां भाग, धान्य का छठां भाग, आठवा और बारहवां भाग लेना चाहिए। उसकी मान्यता थी कि अत्याधिक वृद्ध, लंगड़े तथा अंधों से कर नहीं लेना चाहिए। वह स्पष्ट करता है कि कारीगरों, श्रमिकों, बोझा ढोने वालों से एक महीने में एक दिन का काम लेना चाहिए। प्रजा से कर के रूप में ली जाने वाली सामग्री को उसने बलि कहा। व्यापारियों से लिया जाने वाला कर शुल्क कहलाया। किसी व्यक्ति से लिया गया आर्थिक दण्ड अथवा जुर्माना दण्ड कहलाया। उसने इसके अतिरिक्त संतरण कर, पशुकर, आयकर का भी उल्लेख किया है।

मनु का योगदान 

भारतीय राजनीतिक चिंतन में मनु का महत्वपूर्ण योगदान हैं। उन्होंने राजनीतिक चिंतन की व्यवस्थित व्याख्या प्रस्तुत की। मनु का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वे प्रथम विचारक थे जिन्होंने अराजक समाज का अन्त कर उसके स्थान पर राज्य की स्थापना का समर्थन किया तथा उसे आधार प्रदान किया। मनु ने राज्य की उत्पत्ति के दैवीय सिद्धान्त की स्थापना की तथापि राजा को असीमित और अपरिमित अधिकार नहीं दिए। मनु का राजा, धर्म और सदाचार के नियमों के अधीन हैं। वह राज्य में मनमानी नहीं कर सकता। मनु का राजनीतिक चिन्तन उसके समाज-दर्शन का एक भाग हैं। मनु व्यक्ति को केवल राजनीतिक प्रात्र नहीं मानते, वे व्यक्ति को समग्र रूप में देखते हैं। राजनीति उनके चिंतन का एक भाग हैं। उन्होंने मानव-मात्र के कर्त्तव्यों पर जोर दिया तथा प्रत्येक व्यक्ति के स्वधर्म पालन का समर्थन किया। मनु के राजनीतिक आदर्श काल्पनिक नही हैं, अपितु वे यथार्थ और व्यावहारिक हैं। मनु विधि प्रणेता हैं। विश्व में ज्ञात विधिशास्त्रियों में मनु का स्थान सर्वोपरि और सर्वप्रथम हैं। उन्होंने मानव-जीवन के नियमों की व्यवस्थित संहिता प्रस्तुत की। इतनी वैज्ञानिक और शाश्वत व्यवस्था किसी अन्य विचारक ने प्रस्तुत नहीं की है। भारत के प्रत्येक भाग में प्रचलित दण्ड के नियम और न्याय-व्यवस्था मनु की देन हैं। मनु की न्याय-व्यवस्था में हिंसक आचरण से उत्पन्न विवादों और धन संबंधी विवादों का स्पष्ट उल्लेख हैं। मनु ने पुलिस-व्यवस्था, संप्रभुता, बाजारों का गठन और उनका संचालन, गाँव और पुर का संगठन, सेना के कार्य, पराजित राजा के प्रति विजेता राजा का व्यवहार आदि विषयों पर भी विचार किया हैं। मनु ने 'प्रजा रक्षण' के सिद्धांत और अधिक कर न लेने के सिद्धांत का विस्तार से वर्णन किया हैं।  वे पूर्व में ही इस मान्यता की स्थापना कर गए कि राजा को न्यायोचित तरीके से जनता से कर वसूल करना चाहिए। मनु ने केवल राज्य और राजा का ही विचार नहीं किया, अपितु परराष्ट्र संबंध के संदर्भ में भी विस्तार से विचार किया हैं।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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