12/02/2021

मनु के सामाजिक विचार

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मनु के सामाजिक विचार 

manu ke samajik vichar;मनुस्मृति को मानव धर्म शास्त्र कहा जाता हैं, क्योंकि इसमें मानव जीवन से संबंधित लगभग सभी पहलुओं में आचार-विचार के विषय में बतलाया गया हैं। इस तरह इसमें मनुष्य के सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं का वर्णन मिलता हैं। इसके विचार किसी विशेष समूह के लिए न होकर समस्त मानवता पर लागू होते हैं। असल में मनु शब्द ही मानव से निकला हैं, मनु मानव का प्रतिनिधि विचारक हैं। मनुस्मृति का धर्म दैनिक जीवन और सामाजिक जीवन से संबंधित हैं। मनुस्मृति में वर्णादि-धर्म शब्द का प्रयोग किया गया हैं। मनुस्मृति के उपर्युक्त संक्षिप्त परिचय के बाद अब हम मनुस्मृति में वर्णित समाज और सामाजिक जीवन से संबंधित विचारों का क्रमबद्ध रूप में अध्ययन करेंगें-- 

1. सृष्टि व समाज की रचना 

सृष्टि की रचना किस कैसे हुई? मनुस्मृति में इसका विस्तृत उल्लेख मिलता हैं। मनु का मत हैं कि प्रारंभ में सात पुरूषों के संयोग से विराट पुरुष की उत्पत्ति हुई हैं। ये सात पुरुष अहंकार, महतत्व तथा आकाश आदि पांच तत्व हैं। ये बड़े सामर्थ्यवान और शक्तिशाली माने गए हैं। सात पुरूषों की सूक्ष्म मूर्त मात्राओं से नाशवान जगत की उत्पत्ति हुई। यह संपूर्ण जड़ और चेतन जगत सर्वशक्तिमान परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं। 

मनु के अनुसार," उस अनंतपराक्रमी ईश्वर ने संपूर्ण सृष्टि और मुक्ति को इस तरह उत्पन्न करके सृष्टिकाल को प्रलयकाल से नाश करते हुए अपने मे छिपा लिया हैं। इस प्रकार मनुस्मृति के अनुसार ईश्वर तथा जगत् का संबंध कारण तथा कार्य का हैं। 

2. पुरूषार्थ तथा व्यक्तित्व के गुण 

मनु के अनुसार मानव-जीवन या पुरूषार्थ के चार आधार हैं, जो कि मानव जीवन के चार प्रमुख उद्देश्यों को भी व्यक्त करते हैं, वे हैं-- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। 

मनु ने मनुष्य की प्रवृत्तियों और गुणों के आधार पर तीन प्रकार के व्यक्तित्व का उल्लेख किया हैं-- सात्विक, जायसी तथा तामसी। असल में एक व्यक्तित्व में जिस गुण-समूह का प्राधान्य होता हैं उसे उसी गुण-समूह का माना जाता हैं। यथार्थ वस्तु का जानना सत्व का लक्षण तथा उसके विपरीत न जानना या अज्ञानता तम का और रागद्वेष रज के लक्षण हैं। गुणों का आधार मनुष्य की प्रवृत्तियाँ होती हैं। इन्हीं प्रवृत्तियों के द्वारा गुणों का जन्म होता हैं। मानव की मुख्य तीन प्रवृत्तियाँ होती हैं-- 

(अ) सात्विक

(ब) राजसिक 

(स) तामसिक। 

इन प्रवृत्तियों को आधार मानकर गुणों को तीन भागों में बाँटा जा सकता हैं-- 

(अ) सात्विक गुण 

(ब) राजसिक गुण 

(स) तामसिक गुण। 

इन गुणों के आधार पर विशेष प्रकार की क्रियांए होगीं, जैसे-- 

1. अध्ययन, सद्विचार, बिना आसक्ति के स्वधर्मानुसार कार्य करना ही सात्विक धर्म हुआ। 

2. राजसिक गुण धर्म में अहंकार मनोभाव मुख्य रूप से रहता है और रक्षा करना मौलिक धर्म माना जाता हैं। 

3. तामसिक गुण धर्म में मोह, क्रोध आदि प्रवृत्तियों को सम्मिलित किया जाता हैं। 

मनु के अनुसार वेद का अभ्यास, तप, ज्ञान, इंद्रियों का निग्रह, धर्मक्रिया तथा आत्मा का मनन आदि ये सत्वगुण के लक्षण हैं। तम का प्रधान लक्षण 'काम', रज का प्रधान लक्षण 'अर्थ' कहलाता है तथा सत्व का प्रधान लक्षण 'धर्म' हैं। इनमें सत्व या धर्म सबसे श्रेष्ठ हैं। इसके बाद क्रमशः रज (अर्थ) तथा तम (काम) का स्थान हैं, इसलिए मनुष्य को अधिकाधिक उन कर्मों को करना चाहिए, जो कि धर्म के अनुकूल हैं या जो सत्वगुण वाले हैं, क्योंकि मनु के अनुसार सात्विक कर्म वाले को देवत्व गति प्राप्ति होती हैं जबकि राजस और तामस कर्म करने वाले को क्रमशः मनुष्यत्व गति और निकृष्ट गति या तिर्यक वृक्ष, पशु, पक्षी आदि की योनि प्राप्त होती हैं। 

शुभ या उत्तम कर्म कौन से हैं तथा उनको करने से क्या फल मिलता हैं, इसका भी उल्लेख मनु ने किया हैं। उनके अनुसार वेद का अभ्यास, तप, ज्ञान, इंद्रियों को रोकना और हिंसा न करना और गुरू की सेवा करना ये परम कल्याणकारी कर्म हैं। इन सबमें आत्मज्ञान सबसे श्रेष्ठ हैं, क्योंकी उससे मोक्ष प्राप्त होता हैं। 

3. वर्ण-व्यवस्था तथा वर्ण-धर्म

वैदिक साहित्य में 'वर्ण' शब्द का प्रयोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चारों सामाजिक वर्गों तथा उनके कर्तव्य-कर्मों एवं गुणों के वर्णन के अर्थ में किया गया मालूम पड़ता हैं। मनुस्मृति से सृष्टि रचना के निमित्त विराट पुरुष की कल्पना की गई हैं। मनु का मत हैं कि-- 

"लोकनांतु विवृद्वयर्थ मुखबाह्रारूयादतः

ब्राह्राणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निवर्तयत्" 

अर्थात् उस विराट पुरुष ने लोकों की वृद्धि (कल्याण) के लिए अपने मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पाद से शुद्र की उत्पत्ति की। इन चारों वर्णों में अलग-अलग गुण पाए जाते हैं। सतोगुण प्रधान ब्राह्मण, रजोगुण-प्रधान क्षत्रिय, तमो मिश्रित रजोगुण प्रधान वैश्य तथा तमोगुण प्रधान शुद्र होता हैं। ब्राह्मण को चाहिए कि वह सदा वेदों का अभ्यास करते रहे तथा ज्ञान का अर्जन करते रहे यह उसका तप हैं। ब्राह्मण का वर्ण धर्म पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना तथा दान लेना लेकिन दान लेने का अवसर प्राप्त होने पर भरसक प्रयत्न यही करे कि दान न ले, क्योंकि दान ग्रहण करने से उसका ब्रह्रातेज कम हो जाता हैं। क्षत्रिय का प्रमुख कर्तव्य है प्रजा की रक्षा करना, युद्ध करना, दान देना, यज्ञ करना आदि हैं। ब्राह्मण तथा क्षत्रिय सम्मिलित रूप में इस लोक तथा परलोक में वृद्धि को पाते हैं। वैश्य धर्म से धन को बढ़ाने का पूरा यत्न करे तथा सब प्राणियों को यत्न से अन्न अवश्य पहुँचाए। शूद्र का वर्ण धर्म उपर्युक्त तीनों वर्णों की बिना ईर्ष्या के सेवा-सुश्रुषा करना हैं। अर्थात् वेद के जानने वाले विद्वान, गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मणादि की सेवा ही शुद्र का परम सुखदायी धर्म हैं।

4. आश्रम-व्यवस्था 

'आश्रम' शब्द संस्कृति की 'श्रम' धातु से बना हैं, जिसका अर्थ है प्रयास करना या परिश्रम करना। इस अर्थ में आश्रम एक ऐसा स्थान है जहाँ हम अपने जीवन के एक भाग के लिए लिए निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति हेतु प्रयास करते हैं। मनु के अनुसार ये आश्रम चार हैं-- ब्रह्राचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। ब्रह्मचर्याश्रम में जीवन के प्रथम 25 वर्ष तक गुरूकुल में रहकर विद्याध्ययन और धर्म का ज्ञान प्राप्त किया जाता हैं। गृहस्थाश्रम में विवाह करके परिवार एवं संबंधित कर्तव्यों को पूरा करके अर्थ व काम संबंधी उद्देश्यों की पूर्ति की जाती हैं। वानप्रस्थाश्रम में घर त्यागकर वन में जाकर तपस्या व ध्यान द्वारा सांसारिक इच्छाओं और बंधनों से मुक्त होने के प्रयत्न किये जाते हैं और संन्यासाश्रम में समस्त सांसारिक बंधनों व मोह को पूर्णतया त्यागकर मोक्ष की प्राप्ति के लिए यत्न किये जाते हैं। 

5. संस्कार 

संस्कार शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया जाता हैं। संस्कार का शाब्दिक अर्थ शुद्धि, सुधार या सफाई हैं। अतः हम कह सकते है कि जीवन को परिशुद्घ करने के लिए समुचित ढंग से किए गए कार्य-पद्धति को ही संस्कार कहते हैं, मनु के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी मूलतः शूद्र के रूप में ही जन्म लेते हैं। उसके बाद 'संस्कारात् द्विज उच्यते' अर्थात् धार्मिक संस्कारों द्वारा द्विज बनता हैं अर्थात् जब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य कुछ संस्कारों को पूरा करते हैं तभी वे द्विज कहलाते हैं। मनुस्मृति में तेरह संस्कारों का उल्लेख मिलता हैं। जो इस निम्नलिखित हैं-- 

1. गर्भाधान, 

2. पुंसवन, 

3. सीमंतोन्नयन, 

4. जातकर्म, 

5. नामधेय या नामाकरण, 

6. निष्क्रमण, 

7. अन्नप्राशन, 

8. चूड़ाकरण, 

9. कर्णछेदन, 

10. विद्यारंभ, 

11. उपनयन, 

12. विवाह, 

13. अंत्येष्टि। 

6. विवाह व परिवार 

हिन्दुओं में विवाह गृहस्थाश्रम का प्रवेश द्वार है वैसे भी कहा जाता है कि विवाह स्त्री तथा पुरुष को पारिवारिक जीवन में प्रवेश कराने की एक संस्था हैं। बिना इन दोनों के सहयोग से सृष्टि का कोई भी काम पूरा नहीं हो सकता। वास्तव में स्त्री तथा पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। मनु ने चार वर्णों के लिए अच्छे-बुरे आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया हैं। 

विधवा विवाह की अनुमति मनु साधारण परिस्थिति में नहीं देते। उनके मतानुसार पवित्र तथा पतिव्रता नारी का यह धर्म है कि अपने पति की मृत्यु के बाद भी वह अपने शील व पवित्रता को सुरक्षित रखे। साध्वी स्त्री पति के मरने पर यदि ब्रह्राचर्य मे रहे तो अपुत्रा होने पर भी वह स्वर्ग को जाती हैं। परिवार में स्त्री-पुरुष की तुलनात्मक स्थिति को भी मनु ने स्पष्ट किया हैं, उनके मतानुसार स्त्री कभी स्वतंत्रता से कोई काम घरों में भी न करें। बाल्यावस्था में पिता, यौवन में पति के तथा पति के मरने पर पुत्रों के अधीन रहे। सर्वदा प्रसन्नचित्त तथा घर के कामों में लगी रहे एवं खर्च करने के मामले में सर्वदा हाथ सिकोड़े रहे। पत्नी के मर जाने पर पति अगर विवाह करना चाहे तो कर सकता हैं पुत्र प्राप्ति हेतु तो यह कार्य और भी आवश्यक हो जाता हैं। पिता की मृत्यु के बाद उनकी संपूर्ण संपत्ति को ज्येष्ठ पुत्र ही ग्रहण करे और शेष छोटे भाई खाना-कपड़ा लेवें जैसे पिता के जीवनकाल में लेते थे। 

7. राज व्यवस्था 

मनु की मान्यता यह है कि बिना राजा के इस लोक में भय से चारों ओर जल विचल हो जाता, इस कारण सभी की रक्षा हेतु ईश्वर ने राजा को पैदा किया। इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरूण, चंद्र तथा कुबेर के सारभूत अंशों को निकालकर चूँकि राजा का सृजन किया गया इस कारण राजा इन सभी दिव्य गुणांशों से युक्त पुरुष होता हैं। उसकी आज्ञा की अवमानना करने का कष्ट एक बालक ही नहीं कर सकता, क्योंकि वह देवता होता हैं। राजा द्वारा बनाए गए कानूनों को तोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि कानून को तोड़ने पर राजा दंड देने का भी अधिकारी होता हैं। दंड संपूर्ण प्रजा का शासन करता हैं, दंड ही उनकी रक्षा करता हैं। 

राज व्यवस्था को उचित रूप से चलने हेतु राजा को एक मंत्रिपरिषद् का गठन करना चाहिए। उन मंत्रियों की अलग-अलग राय व सम्मिलित राय को जानकर ही कार्य करना चाहिए। 

प्रजा का पालन करता हुआ राजा सम्मान, उत्तम अथवा हीन शत्रु के साथ बुलाने पर क्षात्रधर्म को स्मरण करता हुआ युद्ध से न हटे। संग्राम से न भागना और प्रजा का पालन करना तथा ब्राह्मणों की सेवा ये राजा के परम कल्याण करने वाले कर्म हैं। 

समुचित न्याय-व्यवस्था हेतु मनुस्मृति में एक धर्मसभा का विधान हैं, जिसका धर्माध्यक्ष राजा ही होता हैं। मनुस्मृति में एक परंपरागत आदर्श स्थिति को स्पष्ट करने का सराहनीय प्रयास किया गया हैं। यह प्रयास अपने आपमें अति प्राचीन होते हुए भी आधुनिक संदर्भ में बिल्कुल ही अर्थहीन व महत्वहीन कदापि नहीं हैं। हमें इनके विचारों की गहनता व गंभीरता को समझने का प्रयास करना चाहिए।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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