11/30/2021

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के स्त्रोत

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प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के स्त्रोत 

prachin bhartiya rajnitik chintan ke strot;प्राचीन भारतीय शासन पद्धित का आरंभ वैदिक काल से माना जाता हैं। वैदिक काल और महाकाव्यों के काल का राजनीतिक इतिहास निश्चित और क्रमबद्ध रूप से प्राप्त नही होता। तीसरी शताब्दी ई. पू. से पहले राजशास्त्र पर कोई गंथ्र विशेष नही लिखा गया था। 

इसलिए हमें प्राचीन भारत की शासन पद्धित की जो भी जानकारी प्राप्त होती है वह साहित्य तथा वेदों, ब्राह्रणों, धर्मसूत्रों, धर्मशास्त्रों, उपनिषदों, पुराणों, महाकाव्यों, जैन ग्रंथों तथा बौध्द जातकों आदि से मिलती हैं। 

इन सभी के अलावा प्राचीन भारत की शासन पद्धित के बारे में हमें लिखे गए गंथ्र जैसे, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कामन्दकीय नीतिशास्त्र, शुक्र-नीति आदि से जानकारी प्राप्त होती हैं। 

हिन्दूकाल के राजनीतिक इतिहास पर लिखे गए अनेक ग्रन्थों, ग्रीक लेखकों के वर्णनों आदि से भी हिन्दु राज्यों और उनकी शासन-पद्धतियों के बारे में हमें बहुत कुछ जानकारी मिलती हैं।

संस्कृत साहित्य में लिखे गए अनेक ग्रंथों जैसे, पाणिनी के व्याकरण, कालिदास के रघुवंश, विशाखदत्त के मुद्राराक्षस आदि में भी प्राचीन भारतीय शासन-पद्धति के बारे में भी कुछ सूचनाएं प्राप्त होती हैं। 

इस प्रकार हमें प्राचीन राजनीतिक सिद्धांतों, चिन्तन तथा विचारों आदि की जानकारी विभिन्न स्त्रोतों के मध्यम से प्राप्त होती हैं। प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के स्त्रोत निम्नलिखित हैं--

1. प्राचीन भारतीय साहित्य 

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का एक सबसे प्रमुख स्त्रोत प्राचीन भारतीय साहित्य हैं। इनमे सर्वप्रथम वैदिक साहित्य आता हैं। वेदो में, और विशेष रूप से ऋग्वेद में हमें तत्कालीन समाज, सभ्यता और संस्कृति की जानकारी प्राप्त होती हैं। 

वैदिक साहित्य के बाद पौराणिक साहित्य में भी हमें प्राचीन राजनीति पर विस्तृत जानकारी मिलती हैं। इनमें विशेष रूप से 'रामायण' और 'महाभारत' हैं। रामायण तो एक आदर्श राज्य पर लिखा गया एक महाकाव्य हैं, वर्तमान में राम राज्य की कल्पना की जाती है। रामायण में हमें स्थान-स्थान पर प्राचीन भारतीय राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक आदर्शों और राजनीतिक संस्थाओं की जानकारी प्राप्त होती हैं। इसके बाद महाभारत तो मानो प्राचीन भारतीय राजनीति का बहुत बड़ा भंडार ही हैं। 'महाभारत' में जगह-जगह पर राजनीतिक सिद्धांतों की पूरी श्रंखला बिखरी हुई हैं। 'महाभारत' के 'शांति पर्व' में तो राजनीतिक आदर्शों पर विस्तृत चर्चा भी गई हैं।

प्राचीन भारत के धार्मिक साहित्य के अलावा, राजनीतिक साहित्य की भी संपूर्ण धारा हैं, जिसके जरिए हमें प्राचीन भारतीय राजनीति के विस्तृत दर्शन होते हैं। मनु की 'मनु-स्मृति' तथा कौटिल्य का 'अर्थशास्त्र' इनमें मुख्य हैं। मनु-स्मृति एक मानव जीवन पर लिखा गया संपूर्ण एक विशद ग्रंथ है, जिसमें राजनीति का, मानव जीवन के अंग के रूप में वर्णन किया गया हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र नाम गंथ्र राजनीति पर लिखा गया एक महान् गंथ्र हैं। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में राजनीति का सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों ही प्रकार का विवेचन किया हैं। इसमें राजतंत्र के विभिन्न पक्षों का विशद वर्णन तो है ही विदेश नीति के सिद्धांतों का विवेचन भी हैं। 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के बारे में डाॅ. ओम नागपाल ने लिखा हैं," इसकी तुलना विश्व के श्रेष्ठ राजनीतिक ग्रंथों से की जा सकती हैं।" 

2. भारत के संबंध में लिखा गया विदेशी साहित्य 

प्राचीकाल में अनेक विदेशी यात्री, विद्वान और इतिहासकार भारत आया करते थे। वह भारत में जगह-जगह पर घुमकर भारतीय व्यवस्था का अध्ययन किया करते थे। अपने देश लौटने के बाद वह भारत के बारे में संस्मरण लिखते थे। इन संस्मरणों में उन्होनें भारत की राजनीतिक व्यवस्था का चित्रण भी किया हैं। उदाहरणार्थ, सिकंदर की सेना के साथ भारत में मेगस्थनीज भी आया था। उसने काफी करीब से भारत की सामाजिक स्थिति और राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया था। उसने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी। जिसका नाम 'इंडिका' हैं। इस प्रकार, मेगास्थनीज की 'इंडिका' प्राचीन भारतीय राजनीति का एक प्रामाणिक स्त्रोत हैं। 

इस प्रकार से चीन से भी प्राचीनकाल मे अनेक यात्री भारत आये। इनमे मुख्य हैं-- फाहियान तथा ह्रेनसांग। फाहियान बौद्ध धर्म का अनुयायी था। उसने वह लगभग 399 ई. में अपने कुछ मित्रों 'हुई-चिंग', 'ताओंचेंग', 'हुई-मिंग' तथा 'हुईवेई' के साथ भारत यात्रा प्रारम्भ की। फ़ाह्यान की भारत यात्रा का उदेश्य बौद्ध हस्तलिपियों एवं बौद्ध स्मृतियों को खोजना था। इसीलिए फ़ाह्यान ने उन्हीं स्थानों के भ्रमण को महत्त्व दिया, जो बौद्ध धर्म से सम्बन्धित थे। 

ह्रेनसांग भारत में 15 वर्षों तक रहा। उसने अपनी पुस्तक सी-यू-की में अपनी यात्रा तथा तत्कालीन भारत का विवरण दिया है। उसके वर्णनों से हर्षकालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक अवस्था का परिचय मिलता है।

3. शिलालेख 

प्राचीन भारत में मुद्रण कला विकसित नहीं हो पाई थी। इस कारण से या ग्रंथ श्रुति परम्परा के अनुसार चलते रहते थे या उनकी ताम्रनत्रों पर लिखी पांडुलिपियां मिलती हैं। लेकिन अपने विचारों को स्थाई रूप देने के लिए उस समय के अनेक शासकों ने पहाड़ो की शिलाओं (पत्थरों) पर अपने विचार और कार्य खुदवा दिए थे। विशेष रूप से इनमें अशोक का नाम उल्लेखनीय हैं। अशोक ने अपने सन्देशों को अनेक स्थानों पर शिलालेखों पर खुदवा दिया था। ऐसा ही एक शिलालेख, उत्तरप्रदेश में जमुना के किनारे 'कालसी' नामक स्थान पर सुरक्षित हैं। इन शिलालेखों से तत्कालीन समाज, सभ्यता और राजनीति की काफी मात्रा में जानकारी प्राप्त होती हैं। 

4. ताम्रपत्र तथा सिक्क

प्राचीन भारतीय इतिहास के बारें में हमें ताम्रपत्र तथा सिक्कों से भी काफी जानकारी प्राप्त होती हैं। प्राचीन भारत के अनेक राजाओं ने ताम्रपत्र लिखवाए थे। कई राज्यों के सिक्के भी मिले हैं। इन ताम्रपत्रों और सिक्कों से बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होती हैं। उदाहरणार्थ, सिकंदर के समय के सिक्के मिले हैं, जिन पर लिखा हैं," योधेय गण की जय हो।" कुछ सिक्कों पर लिखा हैं," मालव गण की जय हो।"

इन सिक्कों से यह पता चलता हैं कि योधेय और मालव में उस काल में गणतंत्रत्मक शासन पद्धित थी।' हिन्दू राजतंत्र' के प्रसिद्ध लेखक डाॅ. जायसवाल ने सिक्कों को प्राचीन भारतीय राजनीतिक का एक प्रमुख स्त्रोत माना हैं।

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यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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