12/04/2021

कौटिल्य के सामाजिक विचार

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कौटिल्य के सामाजिक विचार 

kautilya ke samajik vichar;जिन प्राचीन ग्रंथों ने भारतीय सामाजिक विचारधारा के क्रम-विकास मे अपना अनुपम योगदान किया हैं, उनमें आचार्य कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र का अनूठा स्थान हैं। इस ग्रंथ में उपलब्ध सामग्री के आधार पर हम उस समय के समाज व सामाजिक जीवन के संबंध में विभिन्न विचारों को निम्न रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं-- 

 वर्णाश्रम धर्म 

कौटिल्य ने वर्णाश्रम धर्म का उल्लेख किया है और इस रूप में यह स्पष्ट किया हैं कि विभिन्न वर्ण के सदस्यों तथा विभिन्न आश्रमों के आश्रमियों के क्या-क्या कर्तव्य कर्म हैं। सामवेद, ऋग्वेद और यजुर्वेद ये तीनों मिलकर त्रयी कहलाते हैं। विभिन्न वर्णों के लिए निर्धारित धर्म या कर्तव्य-कर्म इस तरह हैं-- ब्रह्राण का धर्म पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ-याचन और दान देना व दान लेना हैं। क्षत्रिय का धर्म हैं पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, शस्त्र बल से जीविकोपार्जन करना तथा जीवों की रक्षा करना। वैश्य का अपना धर्म हैं-- पढ़ना, यज्ञ करना, दान-देना, कृषि कार्य, पशुपालन एवं व्यापार करना। उसी प्रकार शूद्र का अपना धर्म हैं ब्राह्राण, क्षत्रिय तथा वैश्य की सेवा-सुश्रुत करना, पशुपालन, खेती करना तथा गाने बजाने तथा कारीगरी का काम करना। 

 शिक्षा व संयम 

कौटिल्य के अनुसार शिक्षा दो तरह की होती हैं-- एक तो कृतक तथा दूसरी स्वाभाविक। विभिन्न विद्याओं से संबंधित अलग-अलग आचार्यों के मतानुसार ही शिष्य का शिक्षण तथा नियमन होना चाहिए। वह सोलह वर्ष तक ब्रह्राचर्य का यथावत पालन करे। इसके बाद गोदान विधिपूर्वक विवाह करे, दिन के पहले भाग को हाथी, घोड़े, रथ और अस्त्र-शस्त्र आदि विधाओं की शिक्षा में बिताने का निर्देश कौटिल्य देते हैं। दिन के दूसरे भाग को इतिहास सुनने में लगाए। 

विवाह धर्म 

कौटिल्य का यह निश्चित मत हैं कि विवाह संस्कार बाद ही सांसारिक व्यवहार प्रारंभ होते हैं। मनु की तरह ही कौटिल्य ने भी आठ तरह के विवाहों का उल्लेख किया हैं, सभी प्रकार के विवाहों में स्त्री-पुरुष में परस्पर प्रीति का होना आवश्यक हैं। 

स्त्रीधन 

स्त्रीधन कौटिल्य के अनुसार दो तरह का होता हैं-- एक वृत्ति तथा दूसरा आवध्य। स्त्री का वृत्ति धन वह हैं जो स्त्री के नाम से कहीं जमा किया गया हो तथा उसकी रकम कम से कम दो हजार तक होनी चाहिए। गहना या जेवर आदि आवध्य धन कहलाते हैं, जिनकी तादाद का कोई नियम नहीं हैं। 

पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार कौटिल्य देते हैं, उनका निर्देश हैं कि किसी स्त्री के संतान न होती हो अथवा वह बाँझ हो तो पति आठ वर्ष तक संतान होने की प्रतीक्षा करने के बाद पुनर्विवाह कर सकता हैं। स्त्रियों को पुनर्विवाह का अधिकार देते हैं, वे इस तरह हैं-- जिन शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण पुत्रहीन स्त्रियों के पति कुछ समय के लिए विदेश गए हों, वे एक वर्ष तक और पुत्रवती स्त्रियाँ इससे ज्यादा समय तक अपने पति के आने की प्रतीक्षा करें उसके बाद वे पुनर्विवाह कर सकती हैं। 

दाय भाग-उत्तराधिकार का नियम

इस अर्थ में संपत्ति का स्वामी उस संपत्ति के अधिकार त्यागता हैं तभी नये व्यक्ति के अधिकार की उत्पत्ति होती हैं, इसी सिद्धांत के आधार पर कौटिल्य ने भी दाय भाग के अंतर्गत उत्तराधिकार के सामान्य नियमों का निर्धारण करते हुए लिखा है कि पिता अथवा पिता-माता दोनों के जीवित रहते हुए लड़के सम्पति के अधिकारी नहीं होते। जिसके कोई पुत्र न हो उसकी संपत्ति सगे भाई या अन्य साथी ले लेवें और विवाह आदि के लिए जितना धन-आभूषण आदि जरूरी हो वह सब कन्या ले लेवे। 

समाज में नारी की स्थिति 

आचार्य कौटिल्य के मतानुसार राज्य संपूर्ण समाज का ही प्रतीक या समतुल्य है इसलिए राज्य को सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष का नियमन करना चाहिए और इसी सिद्धांत के आधार पर राजा का यह भी कर्तव्य है कि वह समाज में नारी की देख-रेख की उचित व्यवस्था करे। 

समाज में शूद्रों तथा दासों की स्थिति 

अपने राज्य में कौटिल्य ने निम्नतर वर्णों को भी स्वतंत्रता तथा सम्मान प्रदान किया हैं। उनके मतानुसार शूद्र जन्म से आर्य हो सकते हैं। उस समय आर्य शब्द से वंश-परंपरागत व वर्ग-नियमों की परतंत्रता से मुक्त स्वतंत्र नागरिकता का अर्थ सूचित होता था, इस कारण वह दासता के दायरे में नही आते थे। कौटिल्य ने लिखा हैं उदरदास को छोड़कर आर्य प्राण नाबालिग शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मण को अलग उनके ही परिवार का कोई व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उन पर क्रमशः 12 पण, 24 पण, 36 पण और 48 पण का दंड दिया जाए। 

कौटिल्य ने ब्राह्मणों को सामाजिक वरिष्ठता देते हुए भी शूद्रों को ब्राह्मण के समान कुछ व्यावहारिक अधिकार प्रदान किए जो पहले के भी सोचे नहीं थे, कौटिल्य ने शूद्रों को आर्य ही माना। कौटिल्य ने शूद्रों को आर्य की स्थिति देकर अपने अर्थशास्त्र में विधि प्रकरण तथा दंड विधान में समानता की स्थापना की हैं। कौटिल्य ने शूद्रों सहित सभी वर्णों के साथ धर्मनिरपेक्षता व समानता के सिद्धांत को अपनाना तथा आर्यत्व को वर्णगत नहीं, सांस्कृतिक रंग देना कौटिल्य का महान योगदान हैं। इस तरह कौटिल्य ने दास-दासियों के प्रति भी सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण को ही अपनाया हैं। 

राज-धर्म और राज्य व्यवस्था 

न्यायपूर्वक दंड प्रयोग करते हुए प्रजा के सुख-समृद्धि हेतु राज्य-व्यवस्था को चलाने वाला सर्वोच्च अधिकारी ही कौटिल्य के अनुसार राजा कहलाता हैं। प्रजा के सुख मे ही राजा को अपना सुख तथा प्रजा के हित को ही राजा को अपना हित समझना चाहिए। इसलिए राजा को चाहिए कि वह सदा उद्योगशील होकर व्यवहार संबंधी तथा राज्य संबंधी कार्यों को उचित रूप से पूरा करें। 

प्रजा के दैनिक जीवन के दुख-सुख का पूरा ब्यौरा प्राप्त करने, शासन व्यवस्था संबंधी योजनाओं का प्रजा पर क्या प्रभाव पड़ रहा है उसको जानने तथा राजा के विरूद्ध सभी षड़यंत्रो का पता लगाने हेतु गुप्तचरों की नियुक्ति पर भी कौटिल्य बल देते हैं। 

न्याय व्यवस्था 

विवादों को सुनने तथा उन पर निर्णय देने के लिए न्यायालयों की स्थापना पर कौटिल्य ने बल दिया हैं, कौटिल्य न्याय-व्यवस्था के अंतर्गत मध्यस्थ नियुक्त करने एवं उसके द्वारा विवादग्रस्त विषयों पर निर्णय प्राप्त करने के पक्ष में हैं। उनके द्वारा मध्यस्थ द्वारा किया गया निर्णय अंतिम निर्णय समझना चाहिए तथा उस निर्णय की वादी और प्रतिवादी दोनों को ही स्वीकार कर लेना चाहिए। 

कौटिल्य के अनुसार न्यायाधीशों को छल कपट त्याग कर समता के सिद्धांत को निष्ठापूर्वक अपनाना चाहिए, अर्थात् न्याय के सामने प्रत्येक व्यक्ति को समान मानना चाहिए। न्यायाधीश को लोकप्रिय एवं सबका विश्वासपात्र होना चाहिए। 

विवादग्रस्त विषय के निर्णय के लिए कौटिल्य ने भी मनु शुक्र की तरह प्रमाण को ही एकमात्र आधार माना हैं। उन्होंने प्रमाणों को तीन श्रेणियों में बाँटा हैं-- 

(अ) लिखित प्रमाण, 

(ब) साक्ष्य प्रमाण, 

(स) भुक्ति प्रमाण। 

राज्य के व्यवसायियों द्वारा प्रजा का शोषण एवं पीड़न न हो सके इस उद्देश्य से कौटिल्य व्यवसायियों को राज्य के नियंत्रण मे रखना उचित समझते हैं। 

दंड व्यवस्था 

कौटिल्य के अनुसार दंडनीति ही अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त करती हैं, प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करती है तथा रक्षित वस्तुओं की वृद्धि करती हैं। उसी पर संसार की सारी लोकयात्रा निर्भर हैं। अतः संसार को ठीक-ठीक रास्ते पर चलाने की इच्छा रखने वाला राजा ही उद्यत दंड रहे। कौटिल्य मानते हैं राजा को समुचित तथा संतुलित दंड देने वाला होना चाहिए। कौटिल्य का स्पष्ट मत हैं कि भली-भाँति सोच-समझकर प्रयुक्त दंड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में प्रवृत्त करता हैं। काम-क्रोध से वशीभूत होकर अज्ञानतापूर्वक अनुचित दिया गया दंड वानप्रस्थी और संन्यासी जैसे निःस्वृह व्यक्तियों को भी कुपित कर देता हैं तो गृहस्थ लोगों पर इसका कितना बुरा प्रभाव पड़ता हैं, यह बात सहज ही समझी जा सकती हैं।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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