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4/19/2021

सिंधु/हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएं

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सिंधु या हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएं 

हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएं इस प्रकार है-- 

1. नगरीय संस्कृति 

इस हड़प्पा संस्कृति का विकास एक नगरीय संस्कृति के रूप मे हुआ था। इसके सभी प्रमुख नगर नदियों के तट पर बसे हुये थे, जो सुरक्षा की दृष्टि से नगरीय-परकोटा-दीवाल से घिरे हुए थेह नगर एवं उसके भवनों का निर्माण योजनाबद्ध ढंग से हुआ था। ये नगर चौड़ी और सीधी सड़को द्वारा आयताकारभूखण्डों मे विभाजित होते थे। नगर की सफाई व स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया था। अतः सड़कों के किनारे कूड़ा-करकट हेतु पात्र रखे जाते थे। नगर मे जलापूर्ति हेतु स्थान-स्थान पर कुएँ बने हुए थे। नगर मे नालियों का जाल बिछा हुआ था। घरों की नालियां सड़कों की नालियों से मिल जाती थी। यहां की सभ्यता मे कच्ची व पक्की ईंटो के छोटे-बड़े सभी प्रकार के मकानों के अवशेष प्राप्त हुए है। सड़क के दोनों ओर मकान बनते थे। प्रायः प्रत्येक मकान के कक्षों के अतिरिक्त आंगन, स्नानागार, पाकशाला, शौचगृह और कुएँ की व्यवस्था होती थी। इन मकानों के दरवाजे और खिड़कियां मुख्य सड़क की ओर न खुलकर आंगन मे खुलते थे। ये मकान सादा होते थे। नगर मे कमरे वाले मकानों से लेकर विशाल भवनों के अवशेष भी मिले है। यहां की सभ्यता मे एक विशाल स्नानागार मिला है, जो 180 फुट लम्बा और 180 फुट चौड़ा है और इसके मध्य मे 39 फीट, 33 फीट चौड़ा व 8 फीट गहरा स्नान कुण्ड है। इस कुण्ड मे पानी भरने और निकालने के लिए पकी ईंटो की नलियां बनी हुई थी। हड़प्पा और मुअन-जोदड़ो जैसे नगरों मे विशाल अन्नागार के अवशेष भी मिले है।

2. सामाजिक जीवन 

यहाँ के निवासियों का जीवन सरल था। विविध भवनों के अवशेषों से प्रतीत होता है कि समाज दो वर्गो मे विभाजित था-- (1) अमीर वर्ग, (2) गरीब वर्ग। सामाजिक जीवन सुसंगठित था। उत्खानन से गेहूं और जो के दाने व खजूर की गुठलियां प्राप्त हुई है। वे अनाज पीसने के लिए चक्की का उपयोग करते थे। पशुओं की हड्डियों के अवशेष भी मिले है। यहां के लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के थे।

(अ) वस्त्रभूषण व श्रंगार प्रसाधन 

यहाँ के लोग सूत कातने और वस्त्र बुनने की कला से परिचित थे। पुरूष पट्टा जैसे वस्त्र का प्रयोग करते थे, जो बायें कंधे के ऊपर से दायें कंधे के नीचे पहना जाता था। स्त्रियाँ अलंकृत शिरोभूषा धारण करती थी। पुरूष व स्त्री दोनों आभूषण प्रेमी थे। वे हार, कंगन, अंगूठी, कर्णफूल, भुजबंध, हसूली, कड़ा, करधनी व पायजेब आदि आभूषण धारण करते थे। ये आभुषण सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल, हाथी-दाँत, हड्डी व पक्की मिट्टी के बनते थे। समाज मे लोग अपनी स्थिति के अनुरूप आभूषणों का उपयोग करते थे। स्त्री-पुरूष दोनो श्रंगार प्रिय थे। पुरूष दाड़ी, बाल, गल मुच्छे भी रखते थे। वे हड्डी की कंघियों और धातु के आइनों का प्रयोग करते थे। स्त्रियों का केश-विन्यास सुरुचिपूर्ण ढंग का होता था। स्त्रियां संभवतः ओठों को रंगती थी। वे काजल भी लगाती थीं, जिसकी सलाके खुदाई मे मिली है।

(ब) अस्त्र-शस्त्र व मनोरंजन 

यहाँ अस्त्र-शस्त्र अधिकतर तांबे व कांसे के बनते थे। इन अस्त्र-शस्त्रों मे बर्छा, छुरा व कुल्हाड़ी आदि प्रमुख थे। तीरकमान का प्रयोग भी लोग करते थे। पत्थर के औजारों का भी प्रयोग भी होता था। यहां के उत्खननों से पत्थर व मिट्टी के पासें भी मिले है, जिनसे मनोरंजन किया जाता था। लोगों मे संगीत व नृत्य के प्रति विशेष रूचि थी। प्राप्त मुद्राओं पर कुछ वाद्ययंत्रों का अंकन भी मिला है। मुअन जोदड़ो से काँसे की बनी एक नर्तकी की मूर्ति मिली है। उत्खानन से अनेक खिलौने भी मिले है, जो मनोरंजन के साधन थे। 

(स) दैनिक जीवन व विविध वस्तुएं 

यहाँ के उत्खननों से दैनिक जीवन की अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई थी। इनमे मिट्टी व धातु के घड़े, कलश, गिलास, तश्तरियां, कटोरे, चम्मच आदि उल्लेखनीय है, जिनका उपयोग वे दैनिक जीवन मे करते थे। इसके अतिरिक्त काष्ट और बेंत की बनी टोकरियों के अवशेष भी मिले है, जिन्हें वे अपने उपयोग मे लाते थे।

3. आर्थिक जीवन 

हड़प्पा संस्कृति का आर्थिक स्वरूप बड़ा ही व्यवस्थित था। यद्यपि उनकी आर्थिक व्यवस्था का मूलाधार कृषि और पशुपालन था पर उद्योग एवं व्यापार आदि भी बहुत ही सुव्यवस्थित व सुसंगठित थे।

(अ) पशुपालन और कृषि

सिन्धु घाटी के निवासियों का मूल उद्यम कृषि और पशुपालन था। सिन्धु घाटी मे पर्याप्त वर्षा होती थी, उसका अंचल आज की भांति रेगिस्तानी नही था। वहां की भूमि उर्वर थी। वहां के लोग गेहूं, जो चावल, मटर व तिल की  खेती करते थे। यहां कपास की भी खेती होती थी। यहाँ के पात्रों पर अंकित नारियल, केला, अनार व तरबूज की आकृतियों से ऐसा प्रतीत होता है कि वे फलों की भी खेती करते थे। यहां के लोग गाय, बैल, भैंस, बकरी, कुत्ते, सुअर इत्यादि पशुओं को पालते थे। बैल उनका प्रिय पशु था, जो कृषि कार्य मे लगाया जाता था। उनके पास खेती करने के लिए हल कैसे होते थे, इसकी स्पष्ट जानकारी नही है। 

(ब) उद्योग और व्यापार 

हड़प्पा संस्कृति के लोगो के आर्थिक जीवन का दूसरा प्रमुख आधार उद्योग और व्यापार था। अपनी सभ्यता मे उन्हेंने अनेक प्रकार के उद्योग-धंधों का विकास कर लिया था। उनका एक प्रमुख उद्योग वस्त्र उद्योग था। वे ऊनी व सूती दोनों प्रकार के वस्त्रों का निर्माण करते थे। कुम्भकार का उद्यम काफी विकसित था। इसकी पुष्टि मिट्टी के प्राप्त बर्तनों, खिलौने मुहरों व मनकों आदि से होती है। इसी प्रकार धातु का उद्यम भी उनके आर्थिक जीवन का अंग था। इसकी पुष्टि धातु के मिले बर्तनों, आभूषणों, मोहरों व मनको आदि से होती है। काष्ट उद्यम भी विकसित था पर उसके अवशेष समाप्त पाये गये। इन विविध उद्योग धंधों के साथ ही यहाँ के लोग व्यापार मे बड़े दक्ष थे। उनका वाणिज्य एवं व्यापार उन्नति पर था। उनका पश्चिमी एशिया के देशों-सुमेरिया व मेसोपोटामिया आदि से व्यापारिक संबंध था। उनका आंतरिक व्यापार भी समृद्धि पर था। सिन्धु घाटी उत्खननों से प्राप्त नाप-तौल व के बंटखरों से उनके व्यापार की पुष्टि होती है। उद्योग और व्यापार उनकी अर्थव्यवस्था के अंग थे।

4. धार्मिक जीवन 

सिन्धु घाटी के लोगो के धार्मिक विश्वास एवं विचारधार का स्पष्ट ज्ञान नही होता। पर यहां के उत्खननों से प्राप्त मूर्तियों व मुहर-चित्रों से प्रतीत होता है कि संभवतः मूर्ति पूजक थेह मातृदेवी की अनेकों मूर्तियां मिली है, जिससे स्पष्ट होता है कि वे मातृदेवी की पूजा-उपासना करते थे। यहां से प्राप्त एक मुहर पर तीन मुख वाले 'पशुपतिनाथ' का चित्र अंकित है। इससे प्रतीत होता है कि वे शिव के इस रूप की पूजा करते थे। इसी प्रकार प्रस्तर निर्मित लिंग और योनि की आकृतियाँ भी मिली है, जिससे स्पष्ट होता है कि वे संभवतः शिवलिंग और मातृ-योनि की भी पूजा करते थे। इस संस्कृति मे वृक्ष और पशु पूजा का भी प्रचलन था। वे काल्पनिक मिश्रित पशुओं की भी पूजा करते थे। इन विविध पूजा-उपासना से उनके धार्मिक विश्वास का ज्ञान होता है।

5. ललित जीवन 

हड़प्पा संस्कृति का ललित जीवन उनके कलात्मक उपकरणों मे अभिव्यक्त हुआ है। यहाँ के लोगो ने अपने ललित भावों को नृत्य-संगीत चित्र व मूर्ति-कला मे व्यक्त किया है। मुअनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की मूर्ति से उनके नृत्य संगीत कला का बोध होता है। इनकी मूर्ति कला का ज्ञान, उत्खननों मे प्राप्त विविधि मूर्तियों से होता है। इनके विविध बर्तनों व अन्य उपकरणों पर विविध रूप से चित्र मिले है। इससे इनका ललित भाव इन चित्रों मे अभिव्यक्त हुआ प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त उत्खनन मे प्राप्त मोहरें, उनकी कलात्मक रूचि की परिचायक है। उन्हें लिपि का ज्ञान था और वे लेखन कला से परिचित थे। अतः उनके ललित भाव लेखन मे भी अभिव्यक्त हुए होगें, पर उनकी लेखनी अभी पढ़ी नही जा सकी है। सिन्धु घाटी की विविध कलाओं-वस्तु कला, मूर्तिकला, संगीतकला, लेखनकला, कुम्भकार आदि मे ललित जीवन किसी न किसी रूप मे अभिव्यक्त हुआ है।

संदर्भ; मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, डाॅ. राधेशरण जी एवं डाॅ. सत्येन्द्र शरण जी।

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