10/09/2020

इतिहास का क्षेत्र व स्वरूप

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इतिहास का स्वरूप व क्षेत्र (itihas ka kshetra)

इतिहास के क्षेत्र की सीमा का आकलन विभिन्न विद्वानों ने अपने अपने ढंग से करने का प्रयत्न किया है। कालिंगवुड के अनुसार " इतिहास का क्षेत्र मानव चिन्तन का क्षेत्र है। मानवीय कार्यों तथा उपलब्धियों पर प्रकृति का अध्ययन इतिहास की सीमा मे नही आता।" प्रो. कार ने इतिहास के क्षेत्र को विज्ञान की भांति विस्तृत बताया जिसमे तथ्यों की व्याख्या अपेक्षित है। कार ने इसी दृष्टि से इतिहास को अतीत तथा वर्तमान के मध्य अनवरत परिसंवाद कहा। डाॅ. आर. सी. मजूमदार इतिहास के क्षेत्र को सत्यान्वेषण तक सीमित करते है। पर इतिहास के क्षेत्र के स्वरूप को समझने हेतु यह जरूरी हो जाता है कि इतिहास के क्षेत्र के प्रमुख निर्धारक तत्वों का अध्ययन किया जाय।

ओसवाल्ड स्पेंगलर ने संस्कृतियों के अध्ययन तक इतिहास के अध्ययन की सीमा रेखा खींची है। टायन्बी ने संस्कृति तथा सभ्यता के अध्ययन को इस तरह इतिहास के क्षेत्र मे परिभाषित किया है कि उसका स्वरूप अत्यन्त ही विस्तृत हो गया है। जाॅन लिबी के अनुसार " इतिहास के क्षेत्र का स्वरूप लगातार परिवर्तनशील है। यह सामाजिक आवश्यकतानुसार विकसित होता रहता है।" लिवी का यह कथन अत्यंत ही सार्थक प्रतीत होता है। यही कारण है कि जिस इतिहास चिन्तन का उद्गम ज्ञान की प्राप्ति अथवा अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए हुआ था, वही महाकाव्य युग मे हेरोडोटस की दृष्टि से सामाजिक आवश्यकता की कहानी था। 

रेनियर के अनुसार " प्रत्येक युग मे समाज इतिहासकारों से कुछ प्रशन करता है और इतिहासकार नवीन साक्ष्यों के आलोक मे अतीत से उनका उत्तर प्राप्त कर समाज के समक्ष प्रस्तुत करता है। काॅलिंगवुड भी इतिहास को प्रश्नोत्तर मानते है। सभी इतिहासकार प्रत्येक युग मे इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्वीकारते है। इसका आधार सामाजिक मूल्यों और आवश्यकताओं के अनुसार इतिहास का प्रस्तुतिकरण रहा। वैज्ञानिक युग की आवश्यकता ने ब्यूरी को यह मानने पर बाध्य किया कि " इतिहास विज्ञान है न कम और न अधिक।" मध्य युग मे जब धर्म की प्रधानता थी, तब सेंट आगस्टाइन ने सम्पूर्ण विश्व को ईश्वर का नगर संबोधित किया।

इतिहास क्षेत्र के अंतर्गत जब इतिहासकार किसी घटना का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है तो उसके सामने तीन प्रमुख प्रश्न होते है-- घटना क्या है? वह कैसे घटी? और क्यों घटी? इतिहासकार इसी का विश्लेषण करता है। इतिहासकार के प्रमुखतः दो कार्य होते है-- तथ्यों का संकलन और उनका विश्लेषण। इनमे से प्रथम का स्वरूप विषय निष्ठ और मानवतावादी है तो दूसरे का वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ। ट्रैवेलियन का मत है कि इतिहासकार इतिहास के प्रस्तुतीकरण मे तीन प्रमुख उपादानों का प्रयोग करता है। ये है-- वैज्ञानिक, परिकल्पनात्मक और साहित्यक। हालांकि मानवीय कार्यों और उपलब्धियों पर प्रकृति का अध्ययन इतिहासकार के क्षेत्र से बाहर है। इतिहास क्षेत्र के अंतर्गत मनुष्य के एक साधारण कार्य से लेकर उसकी विविध उपलब्धियों का वर्णन होता है। इस तरह इतिहास क्षेत्र का स्वरूप सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार सदैव विकसित होता रहा।

किसी भी समाज से सम्बंधित आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, न्यायिक, संवैधानिक, सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं तथा परिवेश आदि विभिन्न स्थितियों का आकलन इतिहास मे आवश्यक है। समाज से सम्बंधित प्रत्येक पहलू के प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर खोजना इतिहासकार, हेतु बहुत कठिन है। इतिहास के वर्गीकरण एवं विषयवस्तु का क्षेत्र विस्तार की दृष्टि से अध्ययन करने के बाद इतिहास के निम्नलिखित प्रकार (क्षेत्र) सामने आते है--

1. राजनीतिक इतिहास 

2. विधिक अथवा संवैधानिक इतिहास 

3. सामाजिक इतिहास 

4. आर्थिक इतिहास 

5. राजनयिक इतिहास 

6. धार्मिक इतिहास 

7. सांस्कृतिक इतिहास 

8. औपनिवेशिक इतिहास 

9. संसदीय इतिहास 

10. कामनवेल्थ का इतिहास 

11. सैनिक इतिहास 

12. बौध्दिक  इतिहास

13. विचारों का इतिहास 

14. दार्शनिक इतिहास 

15. मानव स्वतंत्रता का इतिहास 

16. मानव प्रगति का इतिहास 

17. विश्व इतिहास।

इस तरह इतिहास के विभिन्न प्रकारों को दृष्टिगत रखते हुए इतिहास के क्षेत्र का आकलन करें तो हमे स्पष्ट हो जाता है कि इतिहास का क्षेत्र दिन-प्रतिदिन विकसित होता जा रहा है।

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