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4/29/2021

मरूस्थलीकरण क्या है?

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मरूस्थलीकरण क्या है? 

मरूस्थलीकरण का सामान्य अर्थ है उपजाऊ तथा अमरूस्थली भूमि का मरूस्थली भूमि मे परिवर्तित हो जाना। जबकि परिस्थितिविद् तथा पर्यावरमवेत्ता इसे एक क्रमबद्ध प्रक्रिया मानते है जो जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, मृदा, जीव-जन्तु तथा मानवीय क्रियाओं का परिणाम है एवं इसे मानव द्वारा पारिस्थितिकी क्रम मे अवरोध माना जा सकता है।

मरूस्थलीय क्षेत्रो का विस्तार भी इसी क्रम का अंग होता है। वास्तव मे मरूस्थलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जो अल्प वर्षा वाले, शुष्क तथा अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों मे चलती रहती है, इसमे एक तरफ प्राकृतिक तत्वों का योग होता है तो दूसरी तरफ मानवीय कार्य-कलापो का। केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र संस्थान (CAZRI) के पूर्व निदेशक मान के अनुसार," मरूस्थलीकरण से अभिप्राय उन सभी प्रक्रमों के सामूहित प्रभाव से है जिनके कारण एक विशेष पारिस्थितिकी तंत्र मे मूलभूत परिवर्तन आ जाता है एवं जिससे अमरूस्थली क्षेत्र मरूस्थल मे परिवर्तित होने लगता है। यह जलवायु तथा जैविक तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रिया का परिणाम होता है।" 

यह प्रक्रिया मरूस्थल बनने से पहले ही शुरू हो जाती है तथा मरूस्थल इसी का परिणाम है। यह प्रक्रिया मरूस्थली दशाओ को सघन तथा जटिल बनाती जाती है, फलस्वरूप सीमावर्ती क्षेत्रों मे मरूस्थल विस्तार होता जाता है।

मरूस्थलीकरण सम्पूर्ण विश्व मे पर्यावरण की एक मुख्य समस्या है। भारत मे थार का मरूस्थल भी इसी प्रक्रिया का शिकार है, इसके कारण यहाँ पर्यावरण अवकर्षित हो रहा है। 

मरूस्थलीकरण के कारण 

विश्व मे मरूस्थलीकरण के मुख्य कारण इस प्रकार है--

1. मानव द्वारा वनस्पति का निर्ममता से उन्मूलन, 

2.अनियंत्रित पशु चारण, 

3. वायु अपरदन तथा स्थानान्तरण द्वारा विस्तार,

4. भूमिगत जल स्तर मे लगातार गिरावट, 

5. न्यून वर्षा के कारण सूखा पड़ना, 

6. मरूस्थली प्रदेश मे जनसंख्या वृद्धि, 

7. कृषि भूमि मे निरंतर एक ही फसल का बोना, 

8. मृदा की लवणता इत्यादि।

स्पष्ट है कि मरूस्थलीकरण मे पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी तंत्र मे परिवर्तन के कारण शुष्कता का विस्तार होता है। इस विस्तार मे मुख्य भूमिका चार कारको की रहती है। जो इस प्रकार हैं--

1. वनस्पति आवरण मे क्षति, फलस्वरूप वायु मंडल की नमी मे कमी, तापमान का अधिक होना एवं मिट्टी का कटान, 

2. वायु द्वारा शुष्क प्रदेशों मे लगातार मृदा अपरदन, 

3. यदा-कदा जल-अपरदन,

4. भूमि की लवणता से उपजाऊपन का क्षीण होना।

शुरू मे यह प्रक्रिया सीमित होती है जो मरूस्थलीकरण की प्रारम्भिक अवस्था होती है। इस अवस्था मे इस समस्या पर सामान्यतया ध्यान न देने से अवकर्षण क्रमशः ज्यादा होता जाता है। मरूस्थलीकरण प्राकृतिक कारणो से होने पर इसे प्राकृतिक मरूस्थलीकरण की संज्ञा देते है जबकि तकनीक द्वारा होने पर मानवीत या तकनीक-जनित मरूस्थलीकरण कहते है। सामान्यतया दोनो ही कारक एक क्षेत्र मे क्रियाशील रहते है। सारांश के रूप मे मरूस्थलीकरण से अभिप्राय है-- मरूस्थली दशाओं का क्रमशः सघन होते जाना। यह वह प्रक्रिया है जिससे जैविक उत्पादकता मे बाधा पड़ती है जिसके कारण पादप जीवोम मे कमी होती जाती है। उस प्रदेश की पशु धारण करने की क्षमता, उत्पादन क्षमता कम हो जाती है फलस्वरूप विकास का क्रम क्षीण होने लगता है। यह विचार संयुक्त राष्ट्र संघ की वैज्ञानिक शाखा द्वारा स्वीकृत है जो मरूस्थलीकरण की प्रकृति को ही नही वरन् उसके प्रभाव को भी स्पष्ट करती है।

वास्तव मे मरूस्थलीकरण का मूल कारण संसाधनों (प्राकृतिक तथा मानवीय) का निर्ममता से शोषण है अर्थात मानव स्वयं इसके लिये ज्यादा उत्तरदायी है, इसलिए इसको नियंत्रित करने के प्रयत्न भी उसे ही करने होगे। कतिपय उपायो से मरूस्थलीकरण को नियंत्रित किया जा सकता है। 

मरूस्थलीकरण को रोकने के उपाय/सुझाव 

मरूस्थलीकरण को रोकने के उपाय अथवा सुझाव इस प्रकार हैं-- 

1. मरूस्थली वनस्पति की कटाई पर रोक, 

2. पारिस्थितिकी के अनुरूप वृक्षों का लगाना, जोधपुर के केन्द्रीय शुष्क अनुसंधान केन्द्र ने कई पौधे तथा झाड़ियां विकसित की है अथवा पहचानी है जो सीमित नमी मे विकसित हो सकती।

3. चरागाहों का विकास, जिससे पशुओं को चारा उपलब्ध हो सके तथा अनियंत्रित पशुचारण पर रोक लगाई जा सके।

4. वायु के मार्ग मे वृक्षों की पेटी की पेटी का विकास किया जाय, 

5. भूमि संरक्षण उचित भूमि प्रबंध द्वारा किया जाय।

6. बालू के स्तूपों का स्थाईकरण किया जाय, इस तरह की विधियां विकसित की गई है जिससे रेत के टीलों का स्थानांतरण रोका जा सकता है।

7. उपलब्ध जल (भूमिगत तथा वर्षा का) उचित उपयोग किया जाय।

8. नमी संरक्षण तथा शुष्क कृषि का विकास किया जाय।

9. जहाँ जल उपलब्ध हो उसका उचित उपयोग हो जिससे लवणता तथा संचयन द्वारा पैदा समस्या न हो।

10. राजस्थान मे राष्ट्रीय जल संभर विकास कार्यक्रम मरूस्थलीकरण को रोकने के लिये चलाया जा रहा है। 1986 मे यह कार्यक्रम शुरू हुआ तथा सातवीं योजना के दौरान 104 वाटरशेड़ो मे कार्यान्वित किया गया। आठवीं योजना मे इस कार्य हेतु लगभग 135 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।

11. इस समस्या के प्रति जन-जागृति पैदा की जाय। 

संक्षेप मे, हम कह सकते है कि मरूस्थलीकरण एक प्राकृतिक विपदा है जिसे मानव ने अपने क्रिया-कलापों से और विकट बना दिया है, जो आने वाले समय मे विकटतम रूप धारण कर सकती है। अतः इस समस्या के प्रति सचेष्ट होना जरूरी है तथा शासकीय और सामाजिक प्रयत्नों से तथा उचित प्रबंधन द्वारा इस समस्या को सीमित किया जा सकता है एवं इसके द्वारा होने वाले पर्यावरण अवकर्षण से बचा जा सकता है।

शायद यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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