10/12/2020

रीतिकाल किसे कहते है? रीतिकाल, विशेषताएं

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रीतिकाल किसे कहते है?

ritikal meaning in hindi;राति का अर्थ है प्रणाली, पद्धति, मार्ग, पंथ, शैली, लक्षण आदि। संस्कृत साहित्य मे "रीति" का अर्थ होता है " विशिष्ट पद रचना। " सर्वप्रथम वामन ने इसे " काव्य की आत्मा " घोषित किया। यहाँ रीति को काव्य रचना की प्रणाली के रूप मे ग्रहण करने की अपेक्षा प्रणाली के अनुसार काव्य रचना करना, रीति का अर्थ मान्य हुआ। यहाँ पर रीति का तात्पर्य लक्षण देते हुए या लक्षण को ध्यान मे रखकर लिखे गए काव्य से है। इस प्रकार रीति काव्य वह काव्य है, जो लक्षण हैं के आधार पर या उसको ध्यान मे रखकर रचा जाता है। 
रीतिकाल से आश्य हिन्दी साहित्य के उस काल से है, जिसमे निर्दिष्ट काव्य रीति या प्रणाली के अंतर्गत रचना करना प्रधान साहित्यिक प्रवृत्ति बन गई थी। "रीति" "कवित्त रीति" एवं "सुकवि रीति" जैसे शब्दों का प्रयोग इस काल मे बहुत होने लगा था। हो सकता है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी ने इसी कारण इस काल को रीतिकाल कहना उचित समझा हो। काव्य रीति के ग्रन्थों मे काव्य-विवेचन करने का प्रयास किया जाता था। हिन्दी मे जो काव्य विवेचन इस काल मे हुआ, उसमे इसके बहाने मौलिक रचना भी की गई है। यह प्रवृत्ति इस काल मे प्रधान है,लेकिन इस काल की कविता प्रधानतः श्रंगार रस की है। इसीलिए इस काल को श्रंगार काल कहने की भी बात की जाती है। "श्रंगार" और "रीति" यानी इस काल की कविता मे वस्तु और इसका रूप एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए है।

रीतिकाल की विशेषताएं 

1. आचार्यत्व प्रदर्शन की प्रवृत्ति 
यह रातिकाल की मुख्य विशेषता है। इस काल के प्रायः सभी कवि आचार्य पहले थे और कवि बाद मे। उनकी कविता पांडित्य के भार मे दबी हुई है।
2. श्रृंगारप्रियता 
यह इस काल की दूसरी विशेषता है। सभी कवियों ने श्रंगार मे अतिशय रूचि दिखायी। यह श्रंगार वर्णन अश्लील कोटि तक पहुँच गया है।
काम झूलै उर मे, उरोजनि मे दाम झूले। श्याम झूलै प्यारी की अनियारी अँखियन मे।।
3. अलंकारप्रियता 
अलंकारप्रियता या चमत्कार प्रदर्शन इस काल की तीसरी विशेषता है। अनुप्रास की छटा, यमक की झलक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, रूपक, उपमा आदि नाना अलंकारों के चमत्कार से रीतिकाल की कविता चमत्कृत है-- " गग-गग गाजे गगन घन क्वार के।"

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