10/19/2020

पुलकेशिन द्वितीय की उपलब्धियां

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जयसिंह ने कदम्बों को पराजित कर वातायी के चालुक्य वंश की नींव रखी थी। बाद मे पुलिकेशिन प्रथम, कीर्तिवर्मा, मंगलेश, पुलिकेशिन द्वितीय, विक्रमादित्य प्रथम, विनयादित्य, विजयादित्य, विक्रमादित्य द्वितीय और कीर्तिवर्मा द्वितीय उत्तराधिकारी बने। वातायी के राजाओं ने अपने पड़ौसी राजाओं को पराजित कर राज्य की सामाओं का विस्तार किया तथा विजय के उपलक्ष्य मे विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया। पुलेकेशिन द्वितीय इनमे सबसे अधिक वीर और योग्य था।

पुलकेशिन द्वितीय की उपलब्धियां या विजय

1. शत्रुओं के संयुक्त आक्रमण की पराजय 

पुलिकेशिन द्वितीय के विरूद्ध राजा गीविन्द, मैसूर के गंग, कोंकण के मौर्यों, दक्षिण गुजरात के लाट, मालव और गुर्जर ने संयुक्त मोर्चा बनाया परन्तु सभी एक-एक कर पराजित हुये और इनमे से कुछ भागने के लिये विवश थे। गंग राजा ने अपनी पुत्री का विवाह पुलिकेशिन द्वितीय से करके संधि को तैयार हुआ।

2. हर्षवर्धन के साथ युद्ध 

कर्नाटक और महाराष्ट्र का शासक पुलिकेशिन, कन्नौज और थानेश्वर का सम्राट दोनो ही अपने-अपने साम्राज्य लगे थे। अतः दोनो मे संघर्ष हो गया। चीनी यात्री के अनुसार हर्षवर्धन ने दक्षिणापथ पर अनेक बार आक्रमण किया लेकिन उसे कोई सफलता नही मिली। एक बार फिर से हर्षवर्धन ने पुलकेशिन द्वितीय पर आक्रमण करने के लिए पंच प्रदेशों से सेनाएँ एकत्र की और सर्वश्रेष्ठ सेनापतियों को साथ लेकर स्वयं दक्षिणाथ पर आक्रमण किया, परन्तु वह असफल रहा। पुलिकेशिन को इस युद्ध मे विजय होने पर उसे " परमेश्वर " की उपाधि धारण की। इस पराजय से हर्षवर्धन का दक्षिण अभियान रूक गया। 

3. त्रिमहाराष्ट्र 

हर्षवर्धन को पराजित करने के बाद पुलिकेशिन द्वितीय ने त्रिमहाराष्ट्र को पराजित किया। प्रशस्तिकार ने त्रिमहाराष्ट्र के क्षेत्र का उल्लेख नही किया। विद्वानों का मानना है त्रिमहाराष्ट्र से तात्पर्य था- महाराष्ट्र, कोंकण तथा कर्नाटक से है। कुछ लोग इसका अर्थ विदर्भ, कुनाल तथा महाराष्ट्र से लगाते है।

4. पूर्वी दक्कन 

ऐहोल प्रशस्ति कार ने लिखा है ", कोशल और कलिंग के राजा जो दूसरे राजाओं के अभिमान को नष्ट करने वाले थे, भी इससे डरते थे। इसने दुर्गयुक्त पिष्टपुर नगर को अपनी विजय द्वारा दुर्गरहित बना दिया था और उसमे कलियुग के दुर्गुण प्रवेश तक नही कर सके थे। इस उद्धरण से ऐसा लगता है कि कोशल और कलिंग के राजाओं ने बिना युद्ध के ही पुलिकेशिन द्वितीय की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

5. पल्लवों से संघर्ष 

पुलकेशिन का समकालीन पल्लव महेद्रवर्मा प्रथम था। पल्लवों ने भी अपनी शक्ति का विस्तार कर लिया था, इसलिए इन दोनों मे संघर्ष अनिवार्य था। पुलकेशी ने पल्लव शासक पर आक्रमण किया और वह सफल रहा। चालुक्यों पल्लवों की राजधानी पर तो अधिकार नही पाये परन्तु वे उनके आन्तरिक भागो तक घुस चुके थे। 

6. चोल, पाण्ड्य और केरल से मित्रता 

ये तीनो शक्तशाली राज्य थे और पल्लवों को मदद दे सकते थे। अतः पुलिकेशिन ने पल्लवों पर आक्रमण करने के पूर्व इन तीनों से संधि कर ली। ये युद्ध के बाद भी पुलिकेशिन द्वितीय के मित्र बने रहे। 

7. वेंगी मे नवीन चालुक्य वंश की स्थापना 

उपरोक्त सफलताओ के बाद पुलिकेशिन द्वितीय ने वेंगी मे विष्णुवर्धन को अपना राज्यपाल बनाया तथा उसके उत्तराधिकारी वेंगी के चालुक्य कहलाने लगे।

8. विदेशो से सम्बन्ध 

पुलिकेशिन द्वितीय की शक्ति और राज्य का इतना विस्तार हुआ कि उससे ईरान और फ्रांस से सम्बन्ध स्थापित हुये।

ह्रेनसांग की दृष्टि मे पुलिकेशिन की उपलब्धियाँ

ह्रेनसांग पुलिकेशिन द्वितीय से मिला था और उसके राज्य मे भी रहा था। उसने अपने वर्णन मे लिखा है कि पुलिकेशिन सर्वशक्तिमान शासक था। उसकी साम्राज्य सीमा विन्ध्याचल से महानदी और मैसूर तक थी। उसका शासन उसके सामंत चलाते थे। भड़ौच, मालवा, गंग, कदम्ब, पूर्वी गंग उसके आधीन सामंत राज्य थे।

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