10/19/2020

मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण, कारण, उद्देश्य, प्रभाव

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मोहम्मद गौरी 

muhammad ghori ke bharat par akraman, karan, uddeshya, prabhav;गजनी और हिरात के मध्य गौर नामक एक छोटा-सा राज्य था। यहां गौरी वंश का उदय हुआ था। महमूद गजनवी ने गौर राज्य पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। जब महमूद की मृत्यु हो गयी तो उसके निर्बल उत्तराधिकारी गौर राज्य पर अपना नियंत्रण नही रख सके। परिणामस्वरूप गौर शासक स्वतंत्र हो गए। वे समय-समय पर गजनी पर ही आक्रमण करते रहे। 1173 ई. मे गयासुद्दीन महमूद (गौर राज्य का शासक) ने गजनी पर आक्रमण किया और उस पर स्थायी रूप ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। इसके बाद उसने मुहम्मद गौरी को वहां का शासक नियुक्त कर दिया। सर्वप्रथम मुहम्मद गौरी ने गजनी पर अपना राज्य सुदृढ़ किया और फिर भारत पर विजय का निश्चय किया।

मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण के कारण या उद्देश्य 

मुहम्मद गौरी के आक्रमणों का मूल उद्देश्य वही था जो गजनी का था। यानि धन प्राप्त करना, परन्तु गौरी ने धन प्राप्त करने के लिए स्थायी शासन स्थापित करने की योजना बनाई। इसके अतिरिक्त मोहम्मद गौरी के आक्रमण का कारण उत्तर भारत की राजनीतिक दशा का उसके अनुकूल होना था आक्रमण के लिए उसे जयचन्द का आमंत्रण भी मिल चुका था। पंजाब को वह अपना प्रदेश समझता था, क्योंकि वह गजनी शासन मे रह चुका था। भारत पर आक्रमण से उसे साम्राज्य निर्माण सैनिक यश, और धन तथा शक्ति प्राप्त करना था। उपरोक्त कारण से उसने भारत पर आक्रमण किया।

मोहम्मद गौरी के भारत पर आक्रमण (muhammad ghori ke bharat par akraman)

शिहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का प्रथम आक्रमण 1175 ई. मे हुआ था। इसके बाद वह 1205 ई. तक लगातार भारत पर आक्रमण करता रहा। गौरी ने सबसे पहले 1175-76 मे मुल्तान और कच्छ पर आक्रमण किया तथा आसानी से विजय प्राप्त कर ली। इसके बाद उसने 1178-79 मे गुजरत पर आक्रमण किया, परन्तु उसका सामना नहरवाला मे अनहिलवाड़ा के नरेश मूलराज सोलंकी से हुआ जिसने गौरी को पराजित किया। इसके बाद गौरी ने 1179-1182 ई. के बीच पेशावर और लाहौर पर सफल आक्रमण किया। पंजाब पर गजनी वंश का शासन था। वह पेशावर को नही बचा पाया। इससे पंजाब विजय का मार्ग प्रशस्त हो गया। पंजाब का गजनी शासक खुसरो मलिक शासन कर रहा था। यहाँ से गौरी संधि करके वापस चला गया। मोहम्मद गौरी ने 1185-86 मे पुनः पंजाब पर आक्रमण किया और अंतिम रूप से जीत हासिल की। 

तराइन का प्रथम युद्ध 

पंजाब की विजय से मोहम्मद गौरी के राज्य की सीमाएं अजमेर तथा दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान के राज्य से मिलने लगी। 1189 ई. मे मोहम्मद के भटिंडा पर आक्रमण से पृथ्वीराज चौहान चिंतित हुआ। क्योंकि यह राज्य चौहान की सीमा मे आता था। मोहम्मद गौरी भटिण्डा को आसानी से जीत कर वापस चला गया। जब पृथ्वीराज चौहान को यह सूचना मिली की भटिण्डा को पुनः हस्तगत करने के लिए सैनिक घेरा डाल दिया। मुहम्मद गौरी के आक्रमण का मुकाबला करने के लिए 100 राजपूतों राजाओं ने पृथ्वीराज की अधीनता मे एक संघ बनाया। 1191 ई. मे थानेश्वर से 14 मील दूर तराइन के मैदान मे दोनो सेनाओं मे मुठभेड़ हुई। इस युद्ध मे मोहम्मद गौरी की पराजय हुई। एक सैनिक ने उसके प्राणों की रक्षा की। 

मिनहाज-उस-सिराज ने इस घटना का वर्णन इन शब्दों मे किया है- " सुल्तान ने अपने घोड़े का मुँह घुमाया और भाग चला। घाव की पीड़ा से वह घोड़े पर न चल सका। इस्लामी सेनाओं की पराजय हुई और उनकी अपार क्षति हुई.... सुल्तान घोड़े से गिरा जा रहा था उसे देखकर एक शेरदिल योद्धा, एक खिलजी नवयुवक ने उसे पहचान लिया, उसको अपनी बाहों मे थाम कर घोडे को ललकार और रणभूमि से उसको बाहर ले गया।" 

इसके बाद पृथ्वीराज 13 माह तक भटिण्डा के किले का घेरा डाले रहा तब कहीं उसे मुक्त करा सका। इस युद्ध की विजय भारत के लिए गौरव की बात थी लेकिन पृथ्वीराज की उदारता तथा अदूरदर्शिता उसे महँगी पड़ी। इस बीच गौरी ने अपनी हार का बदला लेने की तैयारी की और पुनः आक्रमण किया।

द्वितीय तराईन युद्ध 

मोहम्मद गौरी अपनी हार और अपमान से बौखलाया हुआ था अब उसने पहले से अधिक तैयारी के साथ सेना आदि लेकर 1192 ई. मे बदला लेने के लिये और मुस्लिम क्षेत्रों को पाने के लिए आक्रमण की योजना बनाई। उसने इस युद्ध मे छल की नीति का पालन किया। 

ताजुल मासिर के लेखक हसन निजामी के अनुसार जब गौरी सुल्तान लाहौर पहुँचा तो उसने चौहान नरेश के पास एक दूत से संदेश भिजवाया कि युद्ध से बचने के लिए वह इस्लाम स्वीकार कर ले और सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ले। पृथ्वीराज ने प्रत्युत्तर मे कहलवाया कि राजपूत पलायन करती हुई सेना को अभयदान देने के अभ्यस्त है, यदि सेना और अपने प्राणो की रक्षा करना हो तो गौरी को वापस हो जाता चाहिये। 

पृथ्वीराज इस चालाकी को समझ नही पाया। इस संदेश की आड़ मे गौरी तराइन तक पहुँच गया। जब वह युद्ध के लिये तराईन पहुँचा तो गौरी मोर्चा जमा चुका था। गौरी ने अपना केन्द्र उसके सामने हाथी, उसके आगे रिजर्व सेना, उसके आगे घुड़सवार और सबसे आगे बायें, दायें, मध्य भाग मे बंटे सैनिक थे। इसके अतिरिक्त युद्धस्थल के राजपूतों के बायें दायें अश्वारोही न दिखने वाली दूरी पर थे।

राजपूत बिना रिजर्व सेना के बायें-दाये और मध्य मे बंटे पैदल के व्यूह मे लड़ने आगे बढ़े। यद्यपि पृथ्वीराज के साथ कुछ अन्य राजपूत राजा साथ थे, परन्तु अन्त मे पृथ्वीराज की पराजय हुई और उसे बन्दी बनाकर गजनी ले जाया गया और उसे अन्धा कर दिया गया। 

कन्नौज पर आक्रमण 

उस समय कन्नौज मे गहड़वाल वंश का राजा जयचंद राज्य करता था। 1994 ई. मे मोहम्मद गौरी ने जयचंद पर आक्रमण कर दिया। चंदावर नामक स्थान पर युद्ध हुआ। गौरी हारने वाला ही था कि अचानक जयचंद के एक तीर लगा और उसकी मृत्यु हो गई। जयचंद की सेना भाग खड़ी हुई। कन्नौज पर गौरी का अधिकार हो गया। 

बयाना, गवालियर और गुजरात पर अधिकार 

गौरी ने 1195-96 ई. मे बयाना तथा ग्वालियर पर अधिकार किया। 1197 ई. मे उसने गुजरात पर आक्रमण किया तथा चालुक्य राजा भीम द्वितीय की राजधानी अन्हिलवाड़ा पर अधिकार कर लिया। परन्तु 1201 ई. मे भीम ने पुनः गुजरात पर अधिकार कर लिया।

मोहम्मद गौरी की मृत्यु 

डाॅ. संजीव जैन ने अपनी पुस्तक मे मोहम्मद गौरी की मृत्यु के बारे मे लिखा है कि मुहम्मद गौरी जब अपने शिविर मे सांध्यकालीन नमाज अदा कर रहा था तभी चुपके से कुछ विद्रोहियों ने उसका वध कर दिया। 15 मार्च 1206 ई. को मोहम्मद गौरी मृत्यु हो गुई।

विश्वविद्यालय प्रकाशन की 20 प्रश्न मे बताया गया है की चन्दवरदायी के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी वाण से मोहम्मद गौरी की हत्या कर दी। उसके बाद पृथ्वीराज चौहान ने आत्महत्या कर ली।

मोहम्मद गौरी के आक्रमण का प्रभाव या परिणाम 

मोहम्मद गौरी के आक्रमणों का प्रभाव यह हुआ कि भारत मे तुर्की शासन की सत्ता काबिज हो गई। पृथ्वीराज चौहान की पराजय के कारण दिल्ली पर इस्लामी सत्ता जम गई। भारतीय राजपूतों की शक्ति, वीरता तथा बुद्धि की पोल खुल गई। पहले ही ख्वारिज्म के शाह से पराजित निर्बल सुल्तान गौरी से राजपूत पराजित हुए थे और अब उनके सामान्य सैनिक और गुलाम राजपूतों से लोहा ले रहे थे। इसका अर्थ यही है कि राजपूत शक्तियाँ अत्यंत कमजोर और भ्रम मे थी उन्हें अपनी शक्ति पर मिथ्या अभिमान था।

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