7/29/2022

अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप, वर्गीकरण/प्रकार

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अंतर्राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप (antarrashtriya sangathan ka swaroop)

वस्तुतः अन्तर्राष्ट्रीय संगठन स्वतंत्रता तथा प्रभुसत्ता संपन्न राज्यों का एक औपचारिक समूह हैं। इस संगठन की स्थापना अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा, सहयोग आदि कुछ निर्दिष्ट लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के जन्म के मूल में यही भावना निहित होती हैं कि मानव समाज संघर्षों से दूर हटकर बने। अंतर्राष्ट्रीय संगठन के स्वरूप पर विचारकों ने अग्रलिखित तरह से अपने विचार प्रकट किये हैं-- 

आर्गेन्सकी के अनुसार," अंतर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना तब होती है जब कुछ राष्ट्र संयुक्त हो जाते हैं तथा उनमें से हर यह अनुभव करता है कि एक औपचारिक संगठन के क्रियाशील होने से उसको लाभ ही होगा।"

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चीवर एवं हैवीलैंड ने लिखा हैं कि," अंतर्राष्ट्रीय संगठन राज्यों के बीच स्थापित वह सरकारी व्यवस्था है जिसकी स्थापना कुछ परस्पर लाभप्रद कार्यों को नियमित बैठकों तथा स्टाफ के जरिये पूरा करने के लिए प्रायः एक आधारभूत समझौते द्वारा होती हैं।" 

चार्ल्स लर्च के शब्दों में," कुछ सामान्य उद्देश्यों हेतु संगठित राष्ट्रों के औपचारिक समूह अंतर्राष्ट्रीय संगठन कहे जा सकते हैं। स्वरूप की भिन्नता के बावजूद उनका उदय समान प्रेरक तत्वों से होता है तथा उनके दर्शन एवं संगठन में महत्वपूर्ण समानता पाई जाती हैं। कतिपय वर्तमान यथार्थवादियों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय अभिकरण सिर्फ दब्बू या निष्क्रिय साधन तथा सभा भवन मात्र हैं," जो इस तरह का कोई कार्य नहीं करते जो उनके अभाव में न किया जाता हैं जिनकी अपनी इच्छाएं तथा अपना जीवन होता हैं।" 

चीवर तथा हैवीलैंड के अनुसार, यथार्थवादी समर्थन में यह दृष्टिगत रखना जरूरी हैं कि इन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों या अभिकरणों के पास प्रायः उस सत्ता या अधिकार या साधन का अभाव होता हैं जिससे वे अपेक्षाकृत ज्यादा शक्तिशाली राष्ट्रीय सरकारों से प्रतिस्पर्द्धा कर सकें, अतएव इन संगठनों पर ज्यादा शक्तिशाली राज्यों का प्रभाव होता हैं। यह संगठन उन पर निर्भर रहते हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना अनुचित होगा कि अन्तर्राष्ट्रीय संगठन कोई अंतर्राष्ट्रीय सरकार है जिसके अधीन सभी राज्य हैं। संप्रभुता के अभाव में उसके आदेश बाध्यकारी नहीं होते हैं, उनके पीछे सिर्फ नैतिक शक्ति होती हैं। स्वतंत्र राज्यों पर निर्भर करता हैं कि वे ऐसे आदेशों का पालन करें अथवा न करें। अभी तक अंतर्राष्ट्रीय संगठन सहयोग के आधार पर बने हैं। विश्व सरकार की शक्तियाँ मिल जाने पर उपके आदेश बाध्यकारी होंगे। चीवर तथा हैवीलैंड का यह भी कहना है कि," बगैर किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन के भी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग हो सकता हैं एवं भविष्‍य भी हो सकता हैं लेकिन उसकी प्रकृति भिन्न होगी। यह व्यवस्था 'कन्सर्ट ऑफ यूरोप' के समान होगी।" 

अंतर्राष्ट्रीय संगठन का निर्माण करके, राज्य सहयोग तथा ऐसे बंधनों में बंध जाते हैं कि," नियत काल मे मिलते हैं, सूचना एवं धन देते हैं।" सामान्य समस्याओं पर विचार-विमर्श करते हैं, संगठनों या उनके अंगों की सिफारिशों पर ध्यान देते हैं तथा बहुधा उन अंगों की सिफारिशों को मान लेते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संगठन के कर्मचारी होते हैं जो राष्ट्रीय पक्षपात रहित होते हैं तथा विश्व-बंधुत्व की भावना से प्रेरित होकर काम करते हैं।" अगर शक्तिशाली या बड़े राज्य संगठन में रहते हुए सहयोग के बजाय मनमानी करते हैं तो अन्तर्राष्ट्रीय संगठन भंग होने में देर नहीं लगती हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय संगठन एक बहुराज्य-व्यवस्था के रूप में काम करता हैं। वह पारस्परिक हितों को तो मानकर उसे पूरा करता है लेकिन जहाँ हितों में टकराव होता हैं, वहाँ वह उस विषय को छोड़ देता हैं। संगठन ऐसे ही कार्य करता है जिसमें राज्यों की प्रभुसत्ता में कमी न आये। वह संगठन को सुदृढ़ बनाने के लिए राज्यों से ऐच्छिक सहयोग माँगता हैं। वह छोटे राज्यों को शोषण अत्याचार एवं दबाव से बचाता हैं ताकि वे भी स्वतंत्रतापूर्वक काम करते रहें। वह राज्यों की नीतियों में समन्वय करना चाहता हैं।

दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय संगठन एक ऐसा आंदोलन है जो विश्व सरकार की स्थापना की तरफ जा रहा हैं। वह राष्ट्रीय राज्यों की प्रभुसत्ता का अंत करके एक शक्तिशाली संगठन बंधुत्व की इच्छा को कार्यरूप में बदलना चाहता हैं। लेकिन अभी तक ऐसी विश्व-सरकार केवल एक कल्पना मात्र हैं। 

विश्व के सभी राज्य एक समान नहीं हैं। कुछ राज्यों में मित्रता हैं, तथा कुछ में शत्रुता। इन दोनों तरह के राज्यों के संबंधों को मधुर बनाना बड़ा कठिन कार्य हैं। आज भी संयुक्त राष्ट्र संघ में अनेक षड्यंत्रकारी देश हैं जो निजी स्वार्थ के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य हैं। वे अपने अस्तित्व को खत्म नहीं करना चाहते। ऐसी स्थिति में विश्वय-सरकार की कल्पना आशावादी ही कही जायेगी।

अंतर्राष्ट्रीय संगठन का वर्गीकरण अथवा प्रकार (antarrashtriya sangathan ke prakar)

अन्तर्राष्ट्रीय संगठन कई प्रकार के होते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों को चार वर्गों में बाँटा जा सकता हैं-- 

1. क्षेत्रीय उत्तरदायित्व के आधार पर 

इस तरह के संगठनों को दो वर्गों में रखा जा सकता हैं-- 

(अ) व्यापक संगठन,

(ब) व्यक्तिगत संगठन। 

व्यापक संगठन के सामान्य उद्देश्य, कार्य एवं दायित्व बहुत व्यापक होते हैं, जैसे राष्ट्र संघ व सं. रा. संघ आदि। 

हालाॅकि कार्यगत संगठनों का उत्तरदायित्व भी व्यापक संगठनों के समान ही होता हैं लेकिन उनका कार्य-क्षेत्र व्यापक संगठनों की अपेक्षा कम तथा सीमित होता हैं जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व डाक संघ तथा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ आदि। वास्‍तव में इन संगठनों का निर्माण कुछ आर्थिक, सामाजिक अथवा सांस्कृतिक समस्याओं को सुलझाने के लिए किया गया हैं। इन्हें गैर-राजनीतिक संगठन की संज्ञा दी जाती हैं। ये मानव की सामान्य समस्याओं को ही सुलझाने का काम करते हैं। 

2. सदस्यता के आधार पर 

ये संगठन भी दो तरह के होते हैं-- 

(अ) सार्वभौमिक तथा 

(ब) प्रादेशिक।

सार्वभौमिक संगठन की सदस्यता विश्व के सभी राष्ट्रों के लिए खुली होती हैं लेकिन युद्ध लोलुप, शांति तथा व्यवस्था के घातक एवं झगड़ालू प्रवृत्ति के राष्ट्रों को इसकी सदस्यता प्राप्त करने से रोका जाता हैं। जैसे राष्ट्र संघ में रूस की सदस्यता को 16 वर्षों तक रोके रखा गया तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की सदस्यता से 23 वर्षों तक वंचित रखा गया। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ एवं स्वास्थ्य आदि संघ सार्वभौमिक प्रकृति रखने वाले संगठन हैं।

प्रादेशिक संगठनों का आधार क्षेत्रीय समस्याओं को सुलझाने के लिए होता हैं। इनकी सदस्यता विशिष्ट क्षेत्र के राष्ट्रों हेतु खुली होती हैं, जैसे-- नाटो, सीटो, वार्सा संगठन आदि। 

3. कार्यों की प्रकृति के आधार पर 

इन संगठनों को भी दो वर्गों में बाँटा जा सकता हैं-- 

(अ) नीति निर्माण संबंधी कार्य करने वाले संघ, एवं

(ब) प्रशासकीय कार्य करने वाले संघ। 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ नीति निर्माण करने वाला संघ हैं। वह नीति बनाता हैं तथा सदस्य राष्ट्रों के पास भेज देता हैं जो उसे लागू करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के समान ही विश्व स्वास्थ्य संगठन भी नीति निर्माण करने वाला संगठन हैं। 

प्रशासनिक कार्य करने वाले संगठनों में विश्व डाक संघ एवं अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय आदि आते हैं। 

4. सत्ता के आधार पर 

कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठन सत्ता के आधार पर बनाये जाते हैं जैसे, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय तथा सुरक्षा परिषद आदि। राजनीतिक सत्ता प्राप्त संगठनों को सिर्फ सिफारिशें करने का अधिकार प्राप्त होता हैं। इन सिफारिशों को मानना या न मानना राज्यों की इच्छा पर निर्भर करता हैं। विश्व के अधिकांश संगठन इसी वर्ग में आते हैं। 

इन संगठनों के अतिरिक्त कुछ संगठन और हैं, जैसे-- 

1. यूरोपीय कोयला और इस्पात संगठन, 

2. यूरोपीय अर्थ संगठन, 

3. यूरोपीय अनुसंधान आदि।

इन संगठनों का अपना अलग विशेष महत्व हैं।

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