8/09/2022

सामूहिक सुरक्षा का अर्थ, विशेषताएं, तत्व

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सामूहिक सुरक्षा 

सामूहिक सुरक्षा अनेकार्थक शब्द है पर संक्षेप में सामूहिक सुरक्षा का सिद्धांत इस आधार पर टिका हुआ है कि किसी एक राज्य पर आक्रमण को संसार के सभी-राज्यों के विरूद्ध आक्रमण माना जाएगा तथा सभी राष्ट्र संगठित होकर उस आक्रमण का प्रतिकार करेंगें। 

मार्गेन्थो के शब्दों में," सामूहिक सुरक्षि की सक्रिय प्रणाली में सुरक्षा की समस्या अब व्यक्तिगत राष्ट्र समुत्थान नहीं जिसका ख्याल शस्त्रों तथा राष्ट्रीय बल के दूसरे अंशों से किया जाये। सुरक्षा का संबंध सब राष्ट्रों से हैं। वे प्रत्‍येक की सुरक्षा का ख्याल सामूहिक रूप से करेंगे जैसे उनकी अपनी सुरक्षा खतरे में हो।" 

सामूहिक सुरक्षा का अर्थ (samuhik suraksha kya hai)

सामूहिक सुरक्षा का साधारण अर्थ अशांति के भय का सामना करने के लिए सामूहिक साधन अपनाने से हैं। आर्गेन्सकी ने इस शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा हैं," सामूहिक सुरक्षा एक ऐसी योजना नही है, जिसके द्वारा कुछ राष्ट्रों पर नियंत्रण रखा जाए, दूसरों पर नहीं, बल्कि जो भी राष्ट्र आक्रमण करता है, उसको हराया जाए।"

यदि प्रत्‍येक कार्य योजना के अनुसार हो तो शक्ति का प्रयोग करने की भी आवश्यकता नही रहती, केवल सामूहिक कार्य का भय भी उसे आक्रमण करने से रोक देगा, आर्थिक नाकेबंदी भी की जा सकती है। 

जार्ज स्वार्जबर्गर के अनुसार," सामूहिक सुरक्षा स्थापित अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के विरूद्ध किसी आक्रमण को रोकने का सामूहिक प्रयास हैं।" 

विल्सन सामूहिक सुरक्षा सिद्धांत के समर्थक माने जाते हैं।

सामूहिक सुरक्षा की विशेषताएं (samuhik suraksha ki visheshta)

सामूहिक सुरक्षा के विचार को व्यक्त करते हुए मर्गेन्थों ने एक सूत्र का प्रतिपादन किया हैं," एक सबके लिए तथा सब एक के लिए।" संक्षेप में, सामूहिक सुरक्षा का अर्थ हैं--

1. किसी राज्य पर किया गया आक्रमण सब राज्यों पर आक्रमण माना जाएगा। 

2. किसी राष्ट्र विशेष की सुरक्षा अकेले उसी राष्ट्र के लिए चिंता का विषय नहीं हैं बल्कि वह सारे अन्तर्राष्ट्रीय समाज के लिए चिंता का विषय हैं। 

3. यदि कोई एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के लिए खतरा उत्पन्न करता है तो खतराग्रस्त राज्य की ओर से बाकी सब राष्ट्र कार्यवाही करेंगे। 

4. आक्रमणकारी के अतिरिक्त और सब राज्यों में सहयोग सामुहिक सुरक्षा का सार है। 

5. संभव है कि सहयोग के इस भय से आक्रमणकारी आक्रमण का विचार ही त्याग दें। 

आग्रेन्सकी ने सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत की निम्नलिखित मान्यताएं बताई हैं--

1. किसी भी सशस्त्र संघर्ष में समस्‍त राष्ट्र इस बात पर सहमत होगें कि कौन-सा राष्ट्र आक्रमक हैं। वे यह निर्णय लेने में कोई समय नहीं लगाएंगे क्योंकि आक्रमण का प्रतिकार करने में विलंब करने का अर्थ हैं व्यापक हानि। 

2. समस्‍त राष्ट्र आक्रमण रोकने में समान रूचि रखते हैं चाहे आक्रमण का स्त्रोत कुछ भी क्यों न हो? अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों के संचालन में आक्रमण का प्रतिकार करना असल में सबसे अधिक मूल्यवान बात हैं और उसके मार्ग में मैत्री और आर्थिक लाभ के विचार खड़े नही हो सकते। 

3. सभी राष्ट्र आक्रमक राष्ट्र के विरूद्ध कार्यवाही करने में समान रूप से रूचि रखते हैं और उनमें ऐसा करने की क्षमता भी समान रूप से पाई जाती हैं। 

4. आक्रमणकारी को छोड़कर शेष सभी राष्ट्रों की सामूहिक शक्ति आक्रमक राष्ट्र की शक्ति से ज्यादा होगी। 

5. इस तथ्य को समझकर कि उसके विरूद्ध प्रयुक्त होने वाली शक्ति उसकी शक्ति से कहीं अधिक हैं, आक्रमक राष्ट्र या तो युद्ध का विचार ही त्याग देगा तथा यदि उसने ऐसा नहीं किया तो युद्ध में उसकी पराजय निश्चित हैं।

सामूहिक सुरक्षा के तत्व (samuhik suraksha ke tatva)

1. सामूहिक प्रयास 

सामूहिक सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयास को स्पष्ट करने से पूर्व Aggression शब्द का अर्थ जान लेना आवश्‍यक हैं। यह स्पष्ट है कि जो आक्रमण से पहले करता है वह आक्रमणकारी होता है। यदि A, B पर आक्रमण इसलिए करता है क्योंकि वह इससे भयभीत है तो दोष बंट जाता हैं। उदाहरण के लिए फ्रांस 1876 में जर्मनी के विरूद्ध उत्तरी कोरिया और दक्षिण कोरिया के युद्ध में रूस एवं अमेरिका ने क्रमशः दोनो को सहायता दी। अब क्या हम रूस को या अमेरिका को आक्रमणकारी मानें अथवा उत्तरी कोरिया और दक्षिण कोरिया को। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया को सहायता इसलिए नहीं दी कि उसमें सामूहिक सुरक्षा की भावना थी, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति की भावना थी। यह कहना कि सभी राष्ट्र आक्रमणकारी पर सहमत होंगे, मिथ्या हैं। चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो पाकिस्तान ने अपने राष्ट्रीय हितों के कारण चीन का विरोध नहीं किया। 

2. आक्रमण को रोकने के लिए सार्वभौम इच्छा

यह भी विश्वास नहीं किया जा सकता कि सभी राष्ट्र आक्रमणकारी को रोकने में इच्छा रखते हों, आक्रमणकारी के भी अपने मित्र होते हैं।

3. आक्रमण का विरोध करने की योग्यता 

सामूहिक सुरक्षा का अर्थ यह हैं कि आक्रमणकारी को रोकने की देशों में योग्यता होनी चाहिए। आक्रमणकारी को रोकने का अर्थ हैं, अपनी सीमा पर युद्ध करना एवं कभी-कभी उनकी सेनाएं दूसरी जगह युद्ध में व्यक्त रहती हैं। कोरिया युद्ध के समय फ्रांस, इंडोचीन उपनिवेश को रूस से बचाने के लिए प्रयत्न कर रहा था। 

4. सामूहिकता की शक्ति

यह सिद्धांत सही है कि कोई भी एक राष्ट्र सामूहिक शक्ति के आगे विजयी नहीं हो सकता। इंग्लैंड, अमेरिका और रूस की सम्मिलित शक्ति ने जर्मनी को हराया। आज केवल रूस और अमेरिका को छोड़कर कोई ऐसा राष्ट्र नहीं है, जो कि बहुत देर तक सम्मिलित शक्तियों के आगे ठहर सके। लेकिन यदि इनमें से कोई एक राष्ट्र आक्रमणकारी है तो कोई ऐसा राष्ट्र नहीं होगा जो कि इनके विरूद्ध लड़ेगा। 

5. सामूहिक सुरक्षा शक्ति पर आधारित हैं 

इसके अनुसार सामूहिक सुरक्षा के भय से आक्रमणकारी आक्रमण करने का विचार ही त्याग देगा। उदाहरण के लिए 1815-1914 तक ब्रिटेन की सर्वोच्‍चता होने से अधिक युद्ध नहीं हुए। लेकिन इसमें भी दोष यह है कि जब तक राष्ट्र राष्ट्रीय-हित का, मित्र का ध्यान न रखकर आक्रमणकारी का विश्वास के साथ सामना नहीं करेंगे, तब हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि योजना मौलिक रूप से क्रियान्वित नहीं हो सकती हैं, यद्यपि वह उत्साहवर्धक हैं।

सामूहिक सुरक्षा पद्धित की कठिनाइयाँ अथवा समस्याएं 

सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था यद्यपि सुंदर है, लेकिन इसकी निम्‍नलिखित कठिनाइयां अथवा समस्याएं हैं-- 

1. अविश्वास की भावना 

राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह विश्‍वास के साथ नहीं कहा जा सकता है कि सामूहिक सुरक्षा के वचनों का सदा पालन किया जाएगा। इस प्रकार किसी राज्य की सुरक्षा दूसरे राज्य की आंतरिक राजनीति पर निर्भर करती है। विश्वास ही एक महत्वपूर्ण तत्व रह जाता है। संकट तथा तनाव की स्थिति में इस विश्वास का बना रहना कठिन है और शान्ति के उद्देश्‍य से आक्रमण की स्थिति मे भी उतना ही कठिन होता हैं। 

2. महान् शक्तियों के हित 

सशस्त्रीय संघर्ष जो केवल स्थानीय ही रहते है, सामान्‍य युद्ध मे परिवर्तित हो सकते है, विशेषकर जब महान् शक्तियों के हित टकराते हों। 1962 में क्यूबा के मामले पर महान शक्तियों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। 

3. सौदेबाजी की भावना

सामूहिक सुरक्षा में सौदेबाजी की भावना घातक होती है। उदाहरण के लिए नेपाल अपनी सुरक्षा तथा सामरिक स्थिति के कारण चीन तथा भारत के साथ सौदेबाजी करता रहता हैं। यह सौदेबाजी की भावना कभी-कभी संकट उत्पन्न कर देती हैं।

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