8/05/2022

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के उद्देश्य, सिद्धांत

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अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना 

अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ का निर्माण एक पृथक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के रूप में 1919 में किया गया हैं। यह संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट संस्था है। 1969 में इसे विश्व शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों के अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) का गठन किया गया। यह संघ आधुनिक प्रगतिशील विचारों के आधार पर राज्यों में ऐसे श्रम व्यवस्थापन की स्थापना करने का प्रयास करता हैं, जिससे श्रमिकों की स्थिति में सुधार हो। इस संगठन में सरकारों, उद्योगपतियों तथा श्रमिको का 2:1:1 के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहता हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के कार्य (antarrashtriya shram sangathan ke karya)

आज विश्व में हर एक राजनीतिज्ञ इस बात का समर्थक है कि स्थाई शान्ति बनाये रखने के लिए मालिकों एवं श्रमिकों के भेद-भाव को दूर किया जाये तथा श्रमिक जो उत्पादन की आधार-शिला हैं, उसके हितों की रक्षा की जाये। ऐसा सब कुछ करने से ही विश्व शान्ति रह सकती हैं, ऐसा करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन निम्नलिखित कार्य करता हैं-- 

1. यह संस्था अपने संसार की आर्थिक व श्रम समस्याओं का गहन अध्ययन करती है एवं इनसे संबंधित समस्याओं के निराकरण के लिए अपने सुझाव देती हैं। 

2. अपने शिष्ट मण्‍डल की सहायता से यह संस्था उन देशों को अपनी सहायता प्रदान करती हैं, जो इसकी सहायता लेना चाहते हैं। यह अपने शिष्टमण्डल उन देशों को भेजती हैं, जो प्रार्थन करते हैं। ये शिष्टमण्डल उस देश में जाकर वहीं की दशाओं का अध्ययन करते हैं और उचित सलाह देते हैं। 

3. यह संस्था सामाजिक अधिनियम अथवा सामाजिक संगठन संबंधी बहुमूल्य सलाह देकर उन राष्ट्रों की अमूल्य सेवा करती हैं, जो इस ओर बढ़ना चाहते हैं। 

4. यह संस्था श्रम-कल्याण व औद्योगिक उन्नति के हेतु अपने सदस्य राष्ट्रों को समय-समय पर कन्वेन्शन्स एवं अपने बहुमूल्य सुझाव दिया करती हैं, जिनसे इन्हें अधिक लाभ होता हैं।

5. इस संस्था की सहायता से विभिन्‍न देशों में पाई जाने वाली आर्थिक, सामाजिक व श्रम संबंधी समस्याओं का ज्ञान हो जाता हैं एवं साथ ही साथ यह भी विदित होता है कि कौन क्षेत्र अमुक समस्या को किस प्रकार हल करता है और उसे करने में कहाँ तक सफलता मिली हैं तथा यदि सफलता नहीं मिली हैं, तो क्यों? 

6. बेरोजगारी, सामाजिक सुरक्षा, समाज कल्याण, श्रम संगठन तथा अन्य श्रम संबंधी अनेक प्रकार की समस्याओं के ऊपर बहुमूल्य प्रकाशन करके यह संस्था श्रम शक्ति की विशेश रूप से सेवा करती हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के उद्देश्य (antarrashtriya shram sangathan ke uddshya)

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के निम्नलिखित उद्देश्‍य हैं-- 

1. प्रत्येक काम करने के योग्य श्रमिक के लिए रोजगार की व्यवस्था करना।

2. प्रत्येक श्रमिक को इसके योग्य काम में लगाना। इसका तात्‍पर्य यह है कि जो श्रमिक जिस कार्य के लिए उपयुक्त हैं, उसे वही कार्य मिलना। इसके साथ-साथ जो श्रमिक जिस कार्य को पसंद करता है उसे वही कार्य मिलना चाहिए। 

3. श्रमिकों की आय में वृद्धि करके उसके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना। 

4. श्रमिकों की गतिशीलता की सुविधाओं की व्यवस्था उचित रूप से करना। 

5. श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा का समुचित प्रबंध करना। इस सिलसिले में स्वास्थ्य, बढ़ौती अथवा बेरोजगारी आदि हेतु आवश्यकतानुसार सामाजिक बीमा का प्रबंध। 

6. सामूहिक सौदा के अधिकार का सम्मान तथा प्रोत्साहन देना। 

7. श्रमिकों की शिक्षा तथा उनके प्रशिक्षण का प्रबंध करना। 

8. श्रमिकों के रहने के लिए उचित निवास स्थानों की समुचित व्यवस्था करना। 

9. उत्पादन क्षमता की वृद्धि का प्रबंध करना, इसके लिए श्रमिकों व सेवायोजकों के बीच आपसी सहयोग वांछनीय हैं। 

10. श्रमिकों के लिए मनोरंजन आदि का समुचित प्रबंध करना। 

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के सिद्धांत (antarrashtriya shram sangathan ke siddhant)

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संघ का आधार ऐसे नौ आधारभूत सिद्धांतों पर है जो कि 'श्रमिक चार्टर' में दिए गए हैं। राष्ट्र संघ के प्रत्येक सदस्य को इन सिद्धांतों को स्वीकार करना पड़ता हैं। ये सिद्धांत निम्नलिखित हैं-- 

1. मार्ग दर्शन सिद्धांत यह होगा कि श्रम को केवल पदार्थ अथवा वाणिज्य की वस्तु नहीं समझा जाना चाहिए। 

2. श्रमिक और मालिक के सभी प्रकार के वैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संघ बनाने के अधिकारों को मान्यता प्रदान की जानी चाहिए। 

3. देश और समय के अनुसार उचित प्रकार के जीवन-स्तर को बनाए रखने के लिए कर्मचारियों को पर्याप्त मजदूरी के भुगतान की व्यवस्था होनी चाहिए। 

4. प्रत्येक दिन में आठ घण्टे के कार्य अथवा सप्ताह में 48 घण्टे कार्य के सिद्धांत को उन सभी स्थानों पर लागू किया जाना चाहिए जहाँ वे अभी तक लागू नहीं किये गये। 

5. सप्ताह में कम से कम 24 घण्टे का अवकाश मिलना चाहिए और जहाँ भी सम्भव हो यह अवकाश रविवार को होना चाहिए।

6. बालकों से काम लेना समाप्त कर देना चाहिए और किशोरों के रोजगार पर भी रोकथाम होनी चाहिए, जिससे कि उनकी शिक्षा के चालू रखने के साथ-साथ उन्हें उचित रीति से शारीरिक विकास का भी अवसर मिल सके। 

7. समान मूल्य के समान कार्यों के लिए पुरूष एवं स्त्री श्रमिकों को समाध वेतन दिया जाना चाहिए। 

उपरोक्त सिद्धांतों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का मुख्य उद्देश्य विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को सुखी व समृद्धशाली बनाना हैं। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए श्रमिकों को वे समस्त सुविधाएं प्रदान करनी होगी जो उनके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने तथा उन्हें समाज में समानता का स्तर प्रदान कराने के लिए आवश्यक हैं।

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