8/07/2022

विश्व बैंक के उद्देश्‍य, कार्य

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विश्व बैंक 

अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (जिसे संक्षेप में विश्व बैंक कहा जाता हैं) की स्थापना 1944 में IMF की स्थापना के साथ ही हुई है। मुद्रा कोष स्थायित्व पर जोर देता हैं, जबकि विश्व बैंक विकास पर। वास्‍तव में युद्ध जर्जरित अर्थव्यवस्थाओं के पुनर्निर्माण और अविकसित व अल्पविकसित देशों के आर्थिक विकास के लिए दीर्घकालीन पूँजी की व्यवस्था करने हेतु विश्व बैंक की स्थापना की गई। 

विश्व बैंक के उद्देश्‍य (vishv bank ke uddshya)

विश्व बैंक की स्थापना का उद्देश्य था कि युद्ध पीड़ित देशों के पुनर्निर्माण तथा विकास में सहायता की जा सके और अर्द्धविकसित तथा विकासशील देशों में दीर्घकालीन ॠणों के रूप में सहायता दी जा सके, ताकि वे विकास के पथ पर अग्रसर हो सकें। 

मि. स्नाइडर के शब्दों में," बैंक और कोष दोनों ही अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं थी जो अनुपूरक कार्यों से युक्त थीं तथा जिनका निर्माण अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक संबंधों के क्षेत्र में पूर्ण सहयोग से कार्यों को प्रोत्साहन देने के लिए बनाया गया था।" 

विश्व बैंक की स्थापना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-- 

1. पुनर्निर्माण एवं विकास 

द्वितीय महायुद्ध में क्षतिग्रस्त देशों के पुनर्निर्माण तथा अर्द्ध-विकसित देशों के आर्थिक विकास में सहायता प्रदान करना। 

2. पूँजी विनियोग को प्रोत्साहन 

व्यक्तिगत विनियोगकर्ताओं को दूसरे देशों में अपनी पूँजी का विनियोग करने में प्रोत्साहन देना। 

3. दीर्घकालीन अन्तर्राष्ट्रीय प्रोत्साहन 

विश्व बैंक का तीसरा उद्देश्य विश्व में स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के स्थायी रूप से संतुलित विकास में सहायता प्रदान करना है और इस प्रकार सदस्य देशों में उपज, जीवन-स्तर तथा श्रमिकों की कार्य दशाओं को सुधारना हैं। 

4. शांतिकालीन अर्थव्यवस्था की स्थापना 

चौथा उद्देश्य अपने कार्य इस प्रकार करना था जिससे युद्धकालीन अर्थव्यवस्था का प्रतिस्थापन, शांतिकालीन अर्थव्यवस्था में हो सके। 

विश्व बैंक के कार्य (vishv bank ke kray)

विश्व बैंक के निम्नलिखित कार्य हैं--

1. ॠण की गारंटी प्रदान करना 

विश्व बैंक सदस्य राष्ट्र के व्यक्तिगत विनियोजकों को उसके ऋण की वापसी की गारंटी देकर जरूरतमंद राष्ट्रों को ऋण प्रदान करता है। इस प्रकार गारंटी देते समय निम्नलिखित चार शर्तें अनिवार्य होती हैं-- 

1. जब विश्व बैंक किसी दूसरे देश द्वारा किए गए ऋण की गारंटी करता हैं, तो वह देखता है कि ऋण प्रदान करने की शर्ते उचित हैं अथवा नहीं। 

2. जिस योजना के हेतु ऋण लिया जा रहा है वह विकासजन्य अथवा उत्पादक है या नहीं। 

3. ऋणकर्ता के पास भुगतान करने के पर्याप्त साधन हैं अथवा नहीं। 

4. जिस राष्ट्र के विनियोजक को यह ऋण दिया जा रहा हैं वहाँ की सरकार ने ऋण भुगतान की गारंटी की है या नहीं। 

2. उधार लेकर ऋण प्रदान करना 

विश्व बैंक सदस्य राष्ट्रों को ऋण देने हेतु स्वयं पूँजी उधार ले सकता है। (यह प्रायः तभी किया जाता है जबकि अन्य उपायों से काफी मात्रा में ऋण की व्यवस्था करना संभव नहीं होता हैं) जो देश विश्व बैंक से ऋण मांगता है उस देश की सरकार को ब्याज तथा मूलधन के भुगतान की गारंटी करनी पड़ती हैं। बैंक जिस ब्याज की दर पर ऋण प्राप्त करता है उससे ऊंची दर पर सदस्य राष्ट्रों को प्रदान करके स्वयं लाभ कमाता है। 

3. अपने साधनों में से ऋण देना 

एक निश्चित सीमा तक विश्व बैंक अपनी पूंजी में से भी ऋण प्रदान कर सकता हैं। बैंक को सदस्य राष्ट्रों से जो चंदा स्वर्ण या डालर के रूप में प्राप्त होता है (कुल चंदे का 2 प्रतिशत भाग) उस मात्रा को वह स्वतंत्रतापूर्वक किसी भी सदस्य राष्ट्र को ऋणस्वरूप प्रदान कर सकता हैं। परन्तु बैंक सदस्य राष्ट्रों से जो चंदा उनकी मुद्राओं के रूप मे प्राप्‍त होता हैं। (कुल चंदे का 18 प्रतिशत) उस पूंजी को वह संबंधित राष्ट्रों की पूर्वाज्ञा  पाकर ही ऋणस्वरूप प्रदान कर सकता हैं।

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