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10/30/2021

शिक्षा की विशेषताएं

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शिक्षा की विशेषताएं 

शिक्षा की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-- 
1. शिक्षा एक सोद्देश्य व सचेतन प्रक्रिया हैं 
शिक्षा एक निरूद्देश्य व अचेतन प्रक्रिया न  होकर एक सोद्देश्य व सचेतन प्रक्रिया होती है क्योंकि शिक्षा का कुछ न कुछ उद्देश्य अवश्य होता ही है और उसकी प्राप्ति के लिए सोच-विचार कर व जानबूझकर प्रयास किए जाते हैं। 
दूसरे शब्दों में, शिक्षा निश्चित उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि द्वारा सोच समझकर प्रदान और प्राप्त की जाती है जिसमें व्यक्ति  (Individual) तथा समाज (Society) दोनों के हित को ध्यान में रखा जाता है। इस प्रकार दी जाने वाली शिक्षा सप्रयोजन और सचेतन होती है। 
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2. शिक्षा अन्तः शक्तियों का सर्वांगीण विकास है 
शिक्षा बालक में अन्तर्निहित शक्तियों का विकास मात्र नहीं है बल्कि यह उनका सर्वांगीण व पूर्ण विकास है। आधुनिक युग में जब से शिक्षा में मनोविज्ञान को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। तब से बालक की  अन्तर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता है। अब शिक्षक बालक के ऊपर बाह्य ज्ञान को लादने का प्रयास न कर उसमें अन्तर्निहित शक्तियों का सर्वांगीण और प्रगतिशील विकास कर उसका जीवन सफल बनाने का प्रयास करता है। 
एडीसन के अनुसार," शिक्षा वह क्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य में निहित शक्तियों एवं गुणों का दिग्दर्शन होता है जिसे शिक्षा के बिना अन्दर से बाहर निकलना नितान्त असंभव हैं।"
3. शिक्षा विकास की प्रक्रिया है
प्रत्येक बालक व व्यक्ति कुछ जन्मजात शक्तियों व सम्भावनाओं को लेकर जन्म लेता है। सामाजिक वातावरण में बालक की उन शक्तियों का विकास होता है। समाज में रहते हुए उसे अनेक नए-नए अनुभव प्राप्त होते हैं उन अनुभवों से वह अपने व्यवहार में परिवर्तन करके अपना विकास करता है। जिस बालक को जितने अधिक अनुभव प्राप्त होते जाते हैं उसके विकास में भी उतनी ही अधिक वृद्धि होती जाती है। परिवर्तन की इस क्रिया को विकास की प्रक्रिया  कहा जाता हैं।
 4. शिक्षा का अर्थ केवल विद्यालयों में प्रदान किए जाने वाले ज्ञान से नहीं है। 
अधिकांश लोग शिक्षा का संकुचित अर्थ विद्यालय से लगाते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि शिक्षा विद्यालय तक ही सीमित नहीं होती बल्कि बालक पर जो-जो तत्व प्रभाव डालते हैं वे सब शिक्षा के क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। मनुष्य के लिए संसार के समस्त प्राणी शिक्षण का कार्य करते हैं। भारत में महर्षि कणाद को ही लीजिए, वे चींटी तथा अन्य छोटे जीव-जन्तुओं को उनके विशेष गुणों के कारण अपना गुरू मानते थे। शिक्षा का व्यापक अर्थ इसी मन्तव्य को प्रकट करता है। 
5. शिक्षा एक प्रगतिशील परिवर्तन है
वस्तुतः शिक्षा द्वारा व्यक्ति अपनी क्षमताओं आदि का प्रयोग करते हुए कुछ न कुछ सीखता रहता है। सीखने के परिणामस्वरूप उसके व्यवहार एवं अनुभव में प्रगतिशील परिवर्तन (Progressive Change) होते रहते हैं। एक सामाजिक प्राणी (Social Animal) होने के कारण व्यक्ति को अपने मूल प्रवृत्यात्मक व्यवहार में  परिवर्तन करना भी आवश्यक है ताकि वह समाज में एक सरल, एक शिक्षित व्यक्ति के नाम से पुकारा जा सके। 
कनिंघम के अनुसार," समाज एवं व्यक्ति दोनों के लिए शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो परिवर्तनों को लाती हैं।" 
6. शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया है 
हमें यह समझ लेना चाहिए कि केवल शिक्षक ही सक्रिय (Active) होकर बालक के मस्तिष्क में ज्ञान भरने का प्रयास नहीं करता है बल्कि वास्तविकता यह है कि इस प्रक्रिया में शिक्षक (Educator) और विद्यार्थी (Educant) दोनों को परस्पर सक्रिय सहयोग करना पड़ता है। इस बात की पुष्टि करते हुए एडम्स के अनुसार," शिक्षा एक द्विमुखी प्रक्रिया (Bi-polar process) है जिसमें कि एक व्यक्ति दूसरे के विकास में परिवर्तन के लिए कार्य करता है।" 
7. शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है 
ड्यूवी आदि शिक्षाशास्त्रियों का कहना है कि शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है। शिक्षा के तीन अंग है शिक्षक, बालक और पाठ्यक्रम शिक्षक और बालक के साथ-साथ पाठ्यक्रम भी शिक्षा का एक आवश्यक अंग है। पाठ्यक्रम का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान से न होकर उन सब विचारों, भावों, मान्यताओं और अनुभवों से है जिनसे बालक का सर्वांगीण विकास और समाज का हित होता है। पाठ्यक्रम ही वह महत्वपूर्ण बिन्दु है जो शिक्षक और बालक दोनों बिन्दुओं को मिलाता है इसलिए शिक्षा को त्रिमुखी प्रक्रिया कहा गया है। 
8. शिक्षा आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है
शिक्षा प्रक्रिया अनवरत रूप से जीवनपर्यन्त चलती रहती है। व्यक्ति सदैव कुछ न कुछ अनुभव प्राप्त करता रहता है और इन्हीं अनुभवों से वह कुछ न कुछ सीखता रहता है। स्पष्ट है कि शिक्षा कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जो एक निश्चित अवधि अथवा विद्यालयी जीवन में ही समाप्त हो जाए। यह तो बिना समाप्त हुए चलती रहती है इसलिए शिक्षा को एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया (Continuous process) कहा जाता हैं। 
9. शिक्षा समायोजन की प्रक्रिया है
व्यक्ति का संतुलित विकास तभी सम्भव है जब वह अपने वातावरण के साथ समायोजन स्थापित कर ले। अपने स्वयं के तथा अपने वातावरण के साथ जब तक व्यक्ति का समायोजन नहीं होगा तब तक व्यक्ति की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहेगी तथा उसमें चिन्ता व तनाव रहेगा। फलतः वह मानसिक उद्वेगों से पीड़ित रहेगा और किसी भी प्रकार के अनुभव प्राप्त नहीं कर पाएगा। शिक्षा के द्वारा बालक में पर्यावरण के साथ समायोजन करने की शक्ति विकसित की जाती है जिससे वह मानसिक संघर्षो से बचता हुआ अपना सन्तुलित विकास कर सके। 
10.  शिक्षा अनुभवों का सतत् पुनर्गठन है 
मनुष्य तथा बालक अपने दैनिक जीवन में विविध प्रकार के अनुभव प्राप्त करते हैं। कुछ व्यक्ति अपने अनुभवों से लाभ उठाकर अपने व्यवहारों का परिमार्जन कर लेते हैं तथा नई-नई क्षमताओं से कौशलों का विकास कर लेते हैं। यही शिक्षा कहलाती है जबकि कुछ लोग अपने अनुभवों से लाभ नहीं उठा पाते हैं, व्यक्ति जब अपने अनुभवों का पुनर्संगठन करता है जिससे प्रत्येक अनुभव उसे अधिगम में लाभ दे सके और उसकी शिक्षा प्रणाली में ऐसा स्थान ग्रहण कर सकें जहाँ से वह उस अनुभव का सर्वोत्तम लाभ ले सकें। इसलिए कहा जाता हैं कि शिक्षा अनुभवों का पुनर्संगठन हैं।
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