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8/12/2021

शिक्षा का क्षेत्र, महत्व, आवश्यकता

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शिक्षा का विषय-विस्तार अथवा क्षेत्र 

shiksha ka kshetra;शिक्षा का संबंध जीवन से है, इसलिए शिक्षा के विषय विस्तार के अंतर्गत जीवन की क्रियाएँ और समस्याएँ आती है शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को उसके पूर्वजों के द्वारा संग्रहित धरोहर, उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत और उनके संचित अनुभवों का ऐसा ज्ञान दिया जाता है जिससे उसको उसके जीवन की समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है लेकिन ये अनुभव, विरासत तथा धरोहर इतने व्यापक है कि व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन मे भी उनको पूरी तरह से प्राप्त नही कर सकता। अतः अतः मानव की योग्यताओं, क्षमताओं और रूचियों को ध्यान मे रखकर उपयोगी विषय-वस्तु का अलग-अलग विषयों के रूप मे चुनाव कर लिया जाता है जिससे व्यक्ति सहजता, सरलता और स्वाभाविकता के साथ उन्हें सीख सकें। इस तरह जीवन के विविध क्षेत्रों में प्राप्त अनुभवों को पृथक-पृथक विषयों के रूप में पेश करके शिक्षा के विषय-विस्तार अथवा क्षेत्र को निम्नलिखित भागों में बाँटा जाता है-- 

1. शिक्षा दर्शन 

शिक्षा शास्त्र के अन्तर्गत जीवन के प्रति जो विभिन्न दृष्टिकोण हैं, उनका और उनके आधार पर शिक्षा के स्वरूप, शिक्षा के उद्देश्य और शिक्षा की पाठ्यचर्या आदि का अध्ययन किया जाता है।

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2. शैक्षिक समाजशास्त्र 

समाज और शिक्षा का संबंध शैक्षिक समाजशास्त्र का विषय है। शैक्षिक समाजशास्त्र शिक्षा को सामाजिक पृष्ठभूमि और समाजशास्त्रीय आधार प्रदान करता है। इसमें समाज की आवश्यकताओं, समाजिक अन्तःक्रिया, समाजीकरण की प्रक्रिया, शिक्षा के सामाजिक कार्यों और शिक्षा तथा सामाजिक परिवर्तन के पारस्परिक संबंधों आदि पर विचार किया जाता है।

3. शिक्षा मनोविज्ञानि

इसके अंतर्गत बच्चों की प्रकृति, उनकी योग्यता, रूचियों और अभिरूचियों तथा स्मृति, विस्मृति, चिन्तन और कल्पना आदि शक्तियों का अध्ययन किया जाता है और शिक्षा की प्रक्रिया मे उनके उपयोग की सीमा निश्चित की जाती है। शिक्षा मनोविज्ञान मे सीखने के स्वरूप, सीखने की दशाओं, सीखने को प्रभावित करने वाले कारकों और सीखने के सिद्धांतों तथा नियमों का भी अध्ययन किया जाता है।

4. शिक्षा का इतिहास 

इसके अंतर्गत हम शिक्षा के इतिहास का अध्ययन इसी दृष्टि से करते है कि आदिकाल से लेकर अब तक शिक्षा का जो स्वरूप रहा है, उसकी जो व्यवस्था रही है और उसके जो परिणाम रहे हैं उससे छात्रों तथा समाज को क्या लाभ हुआ है? तथा कहाँ पर सुधार की आवश्यकता है इन सबका अध्ययन नही करेंगे तब तक हम उचित शिक्षा की व्यवस्था नही कर सकते। 

5. तुलनात्मक शिक्षा 

शिक्षाशास्त्र के क्षेत्र मे भी विभिन्न देशों की शिक्षा प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है और उसके गुण-दोषों का विवेचन किया जाता है। इस जानकारी को प्राप्त करके हम अपने देश की शिक्षा-व्यवस्था का मूल्यांकन कर सकते है। दूसरे देशों की शिक्षा व्यवस्था के गुणों व अच्छाइयों को हम अपनी शिक्षा-व्यवस्था मे अपना सकते है और एक उत्तम शिक्षा-व्यवस्था का निर्माण करने मे सफल हो सकते है।

6. शैक्षिक समस्याएं 

इसके अंतर्गत देश की वर्तमान शैक्षिक समस्याओं पर विचार किया जाता है और उनके समाधान के तरीके ढूँढे जाते है। प्रमुख समस्याएँ जैसे-- अपव्यय और अवरोधन की समस्या, अनुशासनहीनता की समस्या, जनसंख्या शिक्षा की समस्या, शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की समस्या आदि। इन समस्याओं के कारणों का विश्लेषण करके उनका समाधान खोजना अत्यंत आवश्यक है, तभी देश मे शिक्षा व्यवस्था सुचारू रूप से चल सकती है।

7. शैक्षिक प्रशासन एवं संगठन 

इसके अंतर्गत शिक्षा का संचालन किसके हाथ में है, राज्य का इसमें किस प्रकार सहयोग है। प्रधानाध्यापकों एवं अध्यापकों के गुण एवं कर्तव्यों, बच्चों का प्रवेश, उनका वर्गीकरण आदि के अध्ययन से हम शिक्षा की प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में समर्थ होते है।

8. शिक्षण कला एवं तकनीकी 

शिक्षण प्रक्रिया मे सीखना और सिखाना दोनों क्रियाएँ आती है भिन्न-भिन्न स्तरों के बच्चों को भिन्न-भिन्न विषयों को पढ़ाने की कौन-कौन सी विधियों का निर्माण हुआ है, उनमें कौन-सी विधियाँ उपयोगी हैं और इन विधियों को अपनाते समय क्या सावधानियाँ बतरती चाहिए? इन सबकी चर्चा शिक्षण कला एवं तकनीकी के अंतर्गत की जाती है।

शिक्षा का महत्व 

shiksha ka mahatva;शिक्षा का महत्व कई दृष्टियों से है। इसका कार्य इतना व्यापक है कि इसके अन्तर्गत वे सभी कार्य आ जाते है जिनको पूरा करने से व्यक्ति अपने जीवन को सुखी एवं सफल बनाते हुए, सामाजिक कार्यों को उचित समय पर पूरा करने के योग्य बन जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि सामान्य रूप से शिक्षा व्यक्ति की मूल प्रवृत्तियों का नियंत्रण, मार्गान्तीकरण एवं शोधन करते हुए, उसकी जन्मजात शक्तियों के विकास मे इस तरह मदद प्रदान करती है कि उसका सर्वांगीण विकास हो जाय। यही नही, शिक्षा व्यक्ति में चरित्रिक एवं नैतिक गुणों तथा सामाजिक भावनाओं को विकसित करके, उसे प्रौढ़ जीवन हेतु इस तरह तैयार करती है कि वह अपनी संस्कृति एवं सभ्यता का संरक्षण करते हुए उत्तम नागरिक के रूप में सामाजिक सुधार करके, राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति देने में तनिक भी नहीं हिचकिचाता। 

संक्षिप्त रूप में शिक्षा मानवीय जीवन मे व्यक्ति को जहाँ एक तरफ वातावरण से अनुकूलन करने एवं उसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन करते हुए भौतिक सम्पन्नता को प्राप्त करके चरित्रवान, बुद्धिमान वीर और साहसी उत्तम नागरिक के रूप में आत्मनिर्भर बनाकर, उसका सर्वांगीण विकास करती है, वहाँ दूसरी तरफ शिक्षा राष्ट्रीय जीवन मे व्यक्ति के भीतर राष्ट्रीय एकता, भावनात्मक एकता सामाजिक कुशलता एवं राष्ट्रीय अनुशासन आदि भावनाओं को विकसित करके उसे इस योग्य बना देती है कि वह सामाजिक कर्तव्यों को पूरा करते हुए राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने हेतु ओत-प्रोत हो जाता है। संक्षेप मे, शिक्षा सामान्य एवं राष्ट्रीय जीवन मे इतने कार्य करती है जिससे व्यक्ति और समाज लगातार उन्नति के शिखर पर चढ़ते रहते है।

शिक्षा की आवश्यकता 

shiksha ki aavshakata;प्रत्येक व्यक्ति को अपने जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त तक शिक्षा की आवश्यता बनी रहती है। प्रत्येक समय शिक्षा का प्रभाव किसी न किसी रूप मे अवश्य उपलब्ध रहता है। व्यक्ति का जीवन शिक्षा के अभाव मे पतवार के बिना नाव जैसा हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक क्षण, प्रत्येक स्थान पर शिक्षा की आवश्यतका अनुभव होती है, शिक्षा की आवश्यकता कोनिम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा समझा जा सकता है-- 

1. आधुनिक समाज की प्रकृति, आवश्यकताओं तथा कर्तव्यों को जानने के लिये।

2. अपनी विभिन्न आवश्यकताओं की समुचित सन्तुष्टि हेतु।

3. वक्ति के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास हेतु।

4. अन्तर्निहित शक्तियों के विकास हेतु।

5. प्रत्येक प्राणी की अन्तर्निहित शक्तियों को समझने के लिये।

6. मानवीय गुणों के संचार हेतु।

7. प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता को जानने हेतु।

8. राष्ट्रीय एकता एवं अन्तर्राष्ट्रीय भावना के विकास हेतु।

9. वक्ति में सहयोग, प्रेम, सहानुभूति, करूणा, बलिदान, न्यायप्रियता तथा समाज सेवा आदि की भावना के विकास के लिये शिक्षा अत्यधिक आवश्यक है।

उपरोक्त वर्णित बिन्दुओं से स्पष्ट होता है, कि मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे शिक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। केवल शिक्षा की ओर ध्यान केंद्रित करने मे ही शिक्षा संबंधी कार्य पूर्ण नही हो जाता, बल्कि हमें शिक्षा के स्वरूप को और अधिक परिष्कृत करके उसका क्रियान्वयन करना चाहिए।

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