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9/07/2021

शिक्षा के अभिकरण का अर्थ, प्रकार/वर्गीकरण

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शिक्षा अभिकरण का अर्थ (shiksha ke abhikaran ka arth)

शिक्षा को प्रभावित करने वाले तत्व जो बालक पर किसी-न-किसी रूप में शैक्षिक प्रभाव डालते हैं, शिक्षा के अभिकरण कहलाते हैं। 

अभिकरण या साधन अंग्रजी शब्द 'Agency' शब्द का हिन्दी रूपांतर हैं। 'Agency' का अर्थ है-- 'Agent' का कार्य। 'Agent' से हमारा तात्पर्य उस व्यक्ति या वस्तु से होता है, जो कोई कार्य करता है या प्रभाव डालता हैं। अतः शिक्षा के अभिकरण वे तत्व, करण, स्थान या संस्थाएँ हैं, जो बालक पर शैक्षिक प्रभाव डालते हैं। 

टी. रेमण्ट महोदय ने बतलाया है कि 'बालक का शिक्षण केवल अध्यापन को ही नही बताता हैं, बल्कि जिस साधन के द्वारा मानव कुछ भी सीखता है, वही उसका शिक्षण हैं। संक्षेप में संपूर्ण वातावरण को ही मानव का शिक्षक कहा जा सकता हैं। शिक्षा के अभिकरणों के अर्थ को स्पष्ट करते हुए बी. डी. भाटिया ने लिखा है," समाज ने शिक्षा के कार्यों को करने के लिए अनेक विशिष्ट संस्थाओं का विकास किया है। इन्हीं संस्थाओं को 'शिक्षा के अभिकरण' कहा जाता है।" 

शिक्षा के अभिकरणों के प्रकार अथवा वर्गीकरण (shiksha ke abhikaran ka vargikaran)

शैक्षिक अभिकरण एक ही तरह के नही होते। इन्हें दो दृष्टिकोणों से दो-दो भागों मे वर्गीकृत किया जाता है। एक दृष्टिकोण से शैक्षिक अभिकरणों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जाता हैं-- 

1. सक्रिय अभिकरण 

सक्रिय अभिकरण प्रायः यह प्रयत्न करते हैं कि वे सामाजिक विकास पर नियंत्रण कर लें और इसे निश्चित दिशा प्रदान कर दें। सक्रिय अभिकरण में विद्यार्थी तथा शिक्षक के मध्य प्रत्यक्ष रूप से अन्तःक्रिया होती है। इसमें शिक्षार्थी तथा शिक्षक दोनों एक-दूसरे पर प्रभाव डालते हैं और स्वयं भी एक-दूसरे से प्रभावित होते रहते हैं। विद्यालय, परिवार, समाज, राज्य, धर्म आदि सक्रिय अभिकरण कहे जाते हैं। 

2. निष्क्रिय अभिकरण 

निष्क्रिय अभिकरण छात्रों पर तो प्रभाव डालते है तथा उनके सीखने को प्रभावित करते हैं पर बदले में उन छात्रों से स्वयं नही प्रभावित होते। इस तरह यह प्रभाव एक ही ओर से पड़ता है। समाचार-पत्र, फिल्म, टेलीविजन, रेडियो, प्रेस आदि निष्क्रिय अभिकरणों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पर बाद में चलकर जनमत से ये भी प्रभावित हो जाते हैं। अतः शैक्षिक अभिकरणों को सक्रिय तथा निष्क्रिय के रूप में नितान्त पृथक समझना उचित नहीं।

एक अन्य दृष्टिकोण से भी अभिकरणों का वर्गीकरण होता है। इस दृष्टिकोण से शैक्षिक अभिकरण औपचारिक तथा अनौपचारिक के रूप मे वर्गीकृत होते है। यह दूसरा वर्गीकरण अधिक लोकप्रिय है एवं अब हम इस दूसरे प्रकार के वर्गीकरण की ओर उन्मुख होगें। इस वर्गीकरण के अनुसार शिक्षा के अभिकरण निम्नलिखित दो रूपों में वर्गीकृत हो सकते है-- 

1. औपचारिक अभिकरण 

औपचारिक अभिकरण उन संस्थाओं तथा संगठनों को कहा जाता है जो नियमानुसार संगठित होती हैं। इन संस्थाओं मे शिक्षा की प्रक्रिया सविचार प्रक्रिया होती हैं। समाज के उत्तरदायी पुरूष नयी पीढ़ी को शिक्षित करने हेतु कुछ योजनाएँ बनाते हैं। औपचारिक अभिकरण में शिक्षा की प्रक्रिया नियोजित ढंग से चलती है। एक निश्चित पाठ्यक्रम होता हैं। निश्चित विद्यार्थी तथा निश्चित योग्यता के शिक्षक होते हैं। कार्य-विधि भी निश्चित होती है। पूरी प्रक्रिया किसी निश्चित उद्देश्य के अनुसार व्यक्ति तथा समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में संचालित की जाती है। शिक्षण की विधि भी सुनियोजित होती है। स्थान, समय, सब कुछ निश्चित होता है। कुछ आवश्यक नियम होते हैं जिनका शिक्षक एवं शिक्षार्थी दोनों पालन करते हैं। 

औपचारिक अभिकरणों की आवश्यकता 

आदिम युग में विद्यालय नहीं थे। तब विद्यालयों की कोई आवश्यकता भी नही थी। बालक अपने माता-पिता के साथ रहकर जीवनयापन करना सीखता था। जीवन की सभी बातें वह प्रत्यक्ष देखता था तथा वातावरण के प्रत्यक्ष संपर्क मे रहता था। जीवन भी बड़ा सरल था। थोड़ी-सी दैहिक आवश्यकताएँ थी। उन्हें आसानी से पूरा किया जा सकता था। कन्द-मूल फल से ही व्यक्ति की क्षुधा तृप्त हो जाती थी। तालाबों में पानी पी लेता था। पेड़ो की छालों को वस्त्र के रूप में पहन लेता था। अब बताइए उसे सीखना ही क्या था, जिसके लिये वह स्कूल जाने के झंझट में पड़ता। ज्यों-ज्यों सभ्यता व संस्कृति का विकास होता गया, त्यों-त्यों व्यक्ति यह सोचने लगा कि उसके अनुभव विस्तृत होते जा रहे हैं। वह सोचने लगा कि मानवता ने कुछ भूलें की हैं। भूलों व प्रयत्नों के परिणामस्वरूप वह नये-नये अनुभव ग्रहण कर रहा था। वह चाहता था कि नयी पीढ़ी मानव की त्रुटियों को पुनःन दुहराए। वह यह भी चाहता था कि जहाँ तक उसने विकास कर लिया हैं, सभ्यता का विकास उसके आगे हो। व्यक्ति अगर प्रारंभ से ही चलता रहेगा तो वह छोटे से जीवन में अधिक मार्ग तय नही कर सकता तथा सभ्यता रथ आगे न बढ़ सकेगा। इसलिए उसने सोचा कि मानव के पूर्व अनुभवों से नयी पीढ़ी को शीघ्र के लिए निश्चित विधि, निश्चित पाठ्यक्रम, निश्चित शिक्षक, समय, स्थान आदि की सहायता ली। इसी तरह विद्यालय का जन्म हुआ। अब हम कल्पना भी नही कर सकते कि विद्यालयों के अभाव में सभ्यता तथा संस्कृति का क्या होगा? इसमें संदेह नही कि स्कूल, काॅलेज एवं विश्वविद्यालय सभ्यता व संस्कृति के संरक्षक हैं। 

बालक विद्यालय में जाकर विद्या अध्ययन करता हैं। वह शिक्षा प्राप्त करता है। यद्यपि उसे बाहर शिक्षा भी मिलती रहती पर वहाँ पर वह एक निश्चित पाठ्यक्रम के अनुसार चलता है। इससे शक्ति का अपव्यय नही होता तथा समय की बचत होती है। यद्यपि कुछ विद्यालय अपने कार्यों को ठीक से पूरा नहीं करते पर इससे विद्यालयों का महत्व कम नही होता।

2. अनौपचारिक अभिकरण 

औपचारिक शिक्षा के विपरीत अनौपचारिक शिक्षा किसी निश्चित स्थान तथा समय पर नही दी जाती है। न निश्चित शिक्षक होते हैं और न निश्चित शिक्षार्थी। सभी स्थानों पर और सभी समयों पर हम इस प्रकार की शिक्षा-संस्थाओं से शिक्षा प्राप्त करते रहते है। इन अभिकरणों मे शिक्षा प्रदान करने की निश्चित विधि या नियम आदि नही होते हैं। किसी समय किसी भी विधि से हम इन अभिकरणों से सीखते रहते हैं। 

अनौपचारिक साधनों का प्रभाव बहुत गहरा और व्यापक होता है। ये चरित्र और मस्तिष्क के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करते हैं। ये अनजाने ही आदतों, व्यवहारों, रूचियों और दृष्टिकोणों का निर्माण करते हैं। ये बाहरी दबाव का प्रयोग करके बालक की स्वतंत्रता पर अंकुश नही लगाते हैं। 

औपचारिकेतर शिक्षा के लाभ 

औपचारिकेतर शिक्षा से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं-- 

1. प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण की प्राप्ति।

2. प्रौढ़ निरक्षरता को दूर करने में सहायक। 

3. औपचारिक शिक्षा की कमियों को दूर करने में सहायक। 

4. छात्रों को सीखने तथा उत्पन्न करने के योग्य बनाना।

5. उन छात्रों तक पहुँचना जिनके पास औपचारिक शिक्षा की सुविधाएँ नही हैं। 

6. व्यक्तियों को अपने ज्ञान को अधुनातन में बनाने में सहायक।

यह भी पढ़े; औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा में अंतर

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