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10/01/2021

राष्‍ट्र संघ की असफलता के कारण

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राष्‍ट्र संघ की असफलता के कारण 

rashtra sangh ki asafalta ke karan;राष्‍ट्रसंघ की स्‍थापना का मुख्‍य उद्देश्‍य प्रथम विश्‍व युद्ध जैसी घटना रोकना और विश्‍व में शांति स्‍थापित करना था। वह काफी हद तक इस कार्य को करने में सफल भी रहा, किन्‍तु उसके यह प्रयास पूर्णतः असफल सिद्ध हुऐ। राष्‍ट्रसंघ अपने आरंभिक समय में उन्‍नति के चरम शिखर पर रहा इस समय में उसकी प्रतिष्‍ठा सारे संसार में छायी हुई थी। लेकिन 1931 में उसकी अवनति धीरें-धीरें शुरू हुई। 1930 के आर्थिक संकट में राष्‍ट्रसंघ के पतन को आवश्‍यम्‍भावी बना दिया। इस भीषण संकट ने सब देशों को अपनी आर्थिक दशा सुधारने के लिए तरह-तरह के आर्थिक प्रतिबंध, संरक्षण सीमा-कर आदि लगाने को बाध्‍य किया। हर एक देश अपनी स्थिति को एक दूसरे से अलग रखकर मजबूत बनाने की कोशिश की। फलस्‍वरूप अंतर्राष्‍ट्रीयता की भावना कमजोर पड़ने लगी और आर्थिक सहयोग के स्‍थान पर आर्थिक प्रतिद्वंद्विता का जन्‍म हुआ। इसके परिणामस्‍वरूप संकुचित राष्‍ट्रीयता का फिर से बोलबाला हो गया। इसी समय जापान ने राष्‍ट्रसंघ को एक जबरदस्‍त धक्‍का पहुंचाया। 

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राष्‍ट्रसंघ की असफलता के निम्‍न‍लिखित कारण थे--

1. संवैधानिक कमजोरी तथा दोष

वर्साय की संधि के तहत राष्‍ट्रसंघ की स्‍थापना की गई। इसलियें वर्साय की संधि का उल्‍लंघन करना दण्‍डनीय अपराध था। किन्‍तु राष्‍ट्रसंघ के आदेशों का उल्‍लंघन दण्‍ड़नीय नहीं था। इससे यह सिद्ध होता है कि यह एक कमजोर नींव पर खड़ा किया गया था। 

राष्‍ट्रसंघ में संवैधानिक दृष्टि से भी बहुत से दोष थें। क्‍योकि इसके निर्णय सर्वसम्‍मति से होते थे। अतः परिषद् किसी भी एक सदस्‍य का स्‍व‍ार्थ पूर्ण नहीं होता था वह अपना विरोध प्रकट कर निर्णय नहीं होने की स्थिति उत्‍पन्‍न करता था।

राष्‍ट्रसंघ के संविधान में यह व्‍यवस्‍था की परिषद् सिर्फ सलाह दे सकती थीं। पर उस सलाह को स्‍वीकृत कराने की शक्ति उसमें नहीं थीं। सदस्‍य राष्‍ट्रों के आन्‍तरिक मामलों में राष्‍ट्रसंघ हस्‍तक्षेप नहीं कर सकता था। सदस्‍य राष्‍ट्र मामलों को आन्‍तरिक कहकर राष्‍ट्रसंघ से हाथ झटकार सकते थें। 

राष्‍ट्रसंघ की अपनी कोई सेना नही थीं वह सेना के लियें अपने सदस्‍य राष्‍ट्रों पर निर्भर रहता था। अतः आक्रमक कार्यवाही हेतु राष्‍ट्रसंघ पराधीन था। वर्साय संधि में यह प्रावधान नहीं किया गया कि युद्ध को पूर्ण निषेध किया जाता है तो इसके फलस्‍वरूप सदस्‍य राष्‍ट्र आक्रामक नीति अपना कर इसको आन्‍तरिक समस्‍या घोषित कर टाल देते थें। यह राष्‍ट्रसंघ की परिधि से बाहर हो जाता और राष्‍ट्रसंघ मूक बनकर देखता रह जाता। 

2. राष्‍ट्र संघ के सिद्धान्‍तों में अविश्‍वास

किसी भी संगठन की सफलता की प्रमुख शर्त है उसके सिद्धांतों में पूर्ण विश्‍वास। लेकिन राष्‍ट्र संघ के साथ ऐसा नहीं था, वह अपने राष्‍ट्रों का विश्‍वास प्राप्‍त नहीं कर सका। इस कारण उसकी असफलता तय थीं। जिस समय राष्‍ट्र संघ की स्‍थापना हुई उस समय सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत का प्रतिपादन बड़े जोर से किया गया। राष्‍ट्र संघ की सदस्‍यता लेने वालें राष्‍ट्रों ने इस बात का वचन लिया कि वे मिल-जुलकर सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत के आधार पर सदस्‍य राज्‍यों की स्‍वतंत्रता तथा प्रादेशिक अखंडता को बनाए रखेंगे, किन्‍तु व्‍यवहारिक तौर पर इन राष्‍ट्रों ने ऐसा नहीं किया। वे राष्‍ट्र संघ के सिद्धांतों को स्‍वंय ही तोड़तें रहे। राष्‍ट्र संघ द्वारा आक्रमणकारी राज्‍य के विरूद्ध आर्थिक प्रति‍बंध की बात इन राष्‍ट्रों को स्‍वीकार नहीं होती थीं, क्‍योंकि  इससे इनके आर्थिक-व्‍यापारि हित प्रभावित होते थे। इस तरह अनेकों सिद्धांतों को सदस्‍य राष्‍ट्रों ने स्‍वार्थवश ताक पर रख दिया। इस कारण राष्‍ट्र संघ का पतन होना ही था। 

3. अमेरिका का असहयोग 

राष्‍ट्रसंघ योजना का विचार सर्वप्रथम अमेरिका के राष्‍ट्रपति के मन में आया था। लेकिन राष्‍ट्रसंघ बनने पर अमेरिका को संसद से स्‍वीकृति नहीं मिलने पर अमेरिका ही इसका सदस्‍य नहीं बना। यह स्थिति बड़ी दुर्भाग्‍यपूर्ण थीं। राष्‍ट्रसंघ में अमेरिका के सदस्‍य नहीं बनने से आक्रामक राष्‍ट्र के प्रति कार्यवाही करने हेतु इसकी सहायता नहीं मिली। और अमेरिका के इसका सदस्‍य नहीं बनने से इंग्‍लैण्‍ड़ भी आधे मन से ही राष्‍ट्रसंघ में रूचि लेने लगा। अमेरिका के अभाव में प्रभावशाली योजनांए प्रारंभ करना संभव नहीं था। 

4. एक अपमानजनक संधि से सम्‍बद्धता 

जिस संधि से राष्‍ट्रसंघ की स्‍थापना हुई वह बहुत कठोर और अपमान जनक थीं। जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने वर्साय की संधि को जर्मनी के लिए कलंक घोषित कर संधि पत्र को जर्मन जनता के सम्‍मुख फाड़कर फेंक दिया था। अतः एक बदनाम संधि के माध्‍यम से जन्‍म लेने वाली संस्‍था को नोरमन बेन्‍टविच नामक विद्वान ने कहा, ‘‘एक कुख्‍यात माता की कुख्‍यात पुत्री‘‘ हैं।

5. आर्थिक मन्‍दी

आर्थिक मंदी ने राष्‍ट्रसंघ की असफलता को सिद्ध कर दिया। आर्थिक मंदी का सामना करने वाले विश्‍व के देशो में संकुचित राष्‍ट्रीय भावनाओं का विकास हुआ। इससे अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग की सारी बातें हवा में उड़ गई। यह परिस्थिति राष्‍ट्र संघ के लिए बड़ा ही खतरनाक सिद्ध हुआ। 

6. तानाशाहों का उदय 

1930 के बाद इटली, जर्मनी, स्‍पेन और जापान में सैनिक तानाशाही का उदय हुआ। जो कि शांतिपूर्ण साधनों के स्‍थान पर शक्ति को अधिक महत्‍व देते थें। इन देशों के तानाशाहओं ने राष्‍ट्रसंघ की सदस्‍यता को त्‍याग कर उग्र कार्यवाही करना प्रारंभ कर दिया। इससे राष्‍ट्रसंघ की छवि धूमिल होती गई और उसका पतन आगे बढ़ने लगा। 

7. फ्रांस की नीति 

राष्‍ट्रसंघ की तात्‍कालिक असफलता मुख्‍य कारण फ्रांस की नीति थीं। देखा जायें तो राष्‍ट्रसंघ का समर्थन करने में फ्रांस का भी हित था, परन्‍तु जब इस तरह की परिस्थितियां निर्मित हुई तो उसका दृष्टिकोण उदासीन और निषेधात्‍मक हो गया। वास्‍तविकता यह थी कि उसे संघ की ओर से सुरक्षा की अधिक आशा नहीं रहीं। अतः उसने इटली से संधि कर ली जिससे उसे उत्तरी अफ्रीका में औपनिवेशिक झगड़ों तथा इटली से अपने सीमा संबंधी विवाद से मुक्ति मिल गई थीं। वह इटली के साथ-साथ इंग्‍लैंड़ को भी नाराज करना नहीं चाहता था क्‍योंकि जर्मनी की ओर से उसे जो भय था इस मुकाबला करनें इंग्‍लैंड की आवश्‍यकता थीं। ऐसी जटिल स्थिति में वह इटली के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही को रोककर उसे प्रसन्‍न करने में लगा रहा त‍था उसके साथ ही प्रतिबंधों का समर्थन करने में इंग्‍लैण्‍ड का साथ देकर उसकी सद्भावना को बनाए रखने का प्रयत्‍न भी करता रहा। इस प्रकार इंग्‍लैंण्‍ड और फ्रांस में पूर्ण सहयोग नहीं हुआ और सक्रिय विरोध के अभाव में इटली ने संघ को ऐसी चोट पहुंचायी जिससे वह बाहर नहीं निकाल सका।  

राष्‍ट्र संघ का मूल्‍यांकन 

राष्‍ट्र संघ की सबसे बड़ी देन अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग के विचार को बढ़ावा देना था और राष्‍ट्रसंघ अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सहयोग का प्रथम बड़ा प्रयोग था। राष्‍ट्रसंघ भले ही महत्‍वपूर्ण राजनीतिक प्रश्‍नों को सुलझाने में अधिक सफल न हो सका किन्‍तु उसे गैर राजनीतिक कार्यो में बड़ी सफलता मिली। इसने अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग और सौहार्द्र की ऐसी परपंरा का सूत्रपात किया जो अंतर्राष्‍ट्रीय जीवन का अभिन्‍न अंग बन गयी। संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ की स्‍थापना में इस प्रयोग से बड़ी सहायता मिली। वाल्‍टर ने अपने शब्‍दों  में कहा है कि, ‘‘संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ के उद्देश्‍यों, सिद्धान्‍तों, अंगों त‍था कार्यप्रणाली अर्थात् प्रत्‍येक पहलू पर राष्‍ट्र संघ की स्‍पष्‍ट छाप है।"

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