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7/04/2021

ग्रामीण समाजशास्त्र का अर्थ, परिभाषा, प्रकृति

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ग्रामीण समाजशास्त्र का अर्थ (gramin samajshastra kya hai)

gramin samajshastra arth paribhasha prakriti;ग्रामीण समाजशास्त्र ग्रामीण वातावरण मे सामाजिक जीवन का अध्ययन है जिसमें यथाक्रमानुसार ग्रामीणों की दशाओं की खोज के लिए, उनकी धारणाओं और उन्नति के आदर्शों के निर्माण के लिए ग्रामीण समूहों का अध्ययन किया जाता है। 

ग्रामीण समाजशास्त्र दो शब्दों के मेल से बना है-- ग्रामीण+समाजशास्त्र। अतः ग्रामीण समाजशास्त्र मे ग्रामीण समाज का अध्ययन किया किया जाता है। इसका कार्य आवश्यक तथ्यों तथा आधारभूत आदर्शों का संकलन करना है जो ग्रामीण सामाजिक संबंधों के अध्ययन मे वैज्ञानिक विधियों द्वारा ज्ञात किए जाते है।  

ग्रामीण समाजशास्त्र की परिभाषा (gramin samajshastra ki paribhasha)

ग्रामीण समाजशास्त्र, समाजशास्त्र की एक शाखा के रूप मे विकसित हुई है जिसको अनेक विद्वानों ने परिभाषित करने का प्रयास किया है। 

डेविड सैण्डरसन के अनुसार," ग्रामीण समाजशास्त्र ग्रामीण वातावरण मे पाए जाने वाले जीवन का समाजशास्त्र है। बिना इसकी उत्पत्ति एवं विकास के समझे हुए, अधिकांशतः इस विषय पर ग्रामीण जीवन का विवरण प्रायः सामान्य रूप से दे दिया जाता है। 

टी. लिन. स्मिथ के अनुसार," ग्रामीण सामाजिक संबंधों की व्यवस्थित जानकारी को ग्रामीण जीवन का समाजशास्त्र कहना ही अधिक उचित होगा।" 

स्टुअर्ट चैपिन के अनुसार," ग्रामीण जीवन का समाजशास्त्र किसी ग्रामीण समाज की जनसंख्या, सामाजिक संगठन, और वहाँ कार्य करने वाली सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन है।" 

भारत के प्रमुख समाजशास्त्रियों में डाॅ. ए. आर. देसाई की परिभाषा ग्रामीण समाजशास्त्र के व्यापक उद्देश्य की ओर संकेत करते है। उन्हीं के शब्दों मे," ग्रामीण समाजशास्त्र का मूल उद्देश्य ग्रामीण सामाजिक संगठन, उनकी संरचना, प्रक्रियाओं और विकास की वस्तुनिष्ठ प्रवृत्तियों का एक वैज्ञानिक, व्यवस्थित और विस्ततृ अध्ययन करना तथा इस अध्ययन के आधार पर ही उसके विकास के नियमों को ज्ञात करना होना चाहिए।" 

उपरोक्त परिभाषाओं का विश्लेषण करने से स्पष्ट ज्ञात होता है कि ग्रामीण समाजशास्त्र गांव के सम्पूर्ण ढाँचे का विस्तृत व वैज्ञानिक अध्ययन करता है। इसके होते हुए भी ग्रामीण समाजशास्त्र की अपनी सीमायें है और उन सीमीओं मे रहकर ही इसका अध्ययन किया जा सकता है। अधिकांश विद्वान इस पक्ष के है कि वे ग्रामीण समाजशास्त्र को ग्रामीण जीवन का समाजशास्त्र कहना अधिक उपयुक्त समझते है। इसके अन्तर्गत विशषतया ग्रामीण मानव-संबंधों के विविध-स्वरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन करना जरूरी है।

ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रकृति (gramin samajshastra ki prakriti)

ग्रामीण समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र सीमित करने से पहले यह प्रश्न उठता है कि इसकी विषय सामग्री वैज्ञानिक है या नही? इस आधार पर हम ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रकृति की जांच कर सकती है। किसी विषय विशेष से संबंधित ज्ञान की प्राप्ति के लिए जब हम तथ्यों को वैज्ञानिक विधि से इकट्ठा करते हैं तो ऐसा अध्ययन वैज्ञानिक अध्ययन कहलाता है। इसलिए विज्ञान का आधार वैज्ञानिक विधि है विशेष सामग्री नहीं।

इसलिए ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रकृति को समझने से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि हम वैज्ञानिक विधि के अर्थ को ठीक से समझे। श्री लुंडवर्ग के अनुसार," वैज्ञानिक विधि में तथ्यों  को क्रमबद्ध प्रेक्षण, वर्गीकरण एवं व्याख्या का समावेश किया जाता है।"

वैज्ञानिक विधि के विभिन्न सोपानों पर श्री बरनार्ड लिखते है," कि विज्ञान को इसके अंतर्गत आने वाली मुख्य प्रक्रियाओं द्वारा परिभाषित किया जा सकता है। यह परीक्षण, सत्यापन, परिभाषा, वर्गीकरण संगठन और दिशा निर्देश पर आश्रित है। जिसमें भविष्य की ओर संकेत करना एवं व्यवहार में लाना भी सम्मिलित है।

इस संदर्भ मे श्री लुंडवर्ग का मत है," कि समाजशास्त्र में वैज्ञानिक समाज की समस्याओं का अध्ययन करते हैं और यदि संभव हो तो समुचित और यथा क्रम प्रेक्षण, सत्यापन, वर्गीकरण और सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के आधार पर उनके समाधान का प्रयास करते हैं। यह विधि अपने प्रखर और सफल रूप में बहुआ वैज्ञानिक विधि के नाम से जानी जाती है 

वैज्ञानिक विधि के विभिन्न सोपान निम्न है--

1. सामयिक या क्रियात्मक परिकल्पना का निर्माण

2. प्रश्नावली के उपकरणों या साधनों का चयन 

3. तथ्यावलोकन तथा तथ्य संकलन 

4. लिपिबद्ध करना 

5. तथ्यों का वर्गीकरण एवं संगठन 

6. निष्कर्षों का सामान्यीकरण एवं नियम बनाना।

वैज्ञानिक विधि अपनाने के लिए समाज विज्ञान के शोधकर्ताओं में एक विशिष्ट वैज्ञानिक रुझान होना चाहिए। साधारण व्यक्ति के पास यह नहीं हो सकता। वैज्ञानिक विधि के मुख्य लक्ष्य है-- अध्ययन की प्रवृत्ति, विशिष्ट उत्साह, कठिन परिश्रम, आर्थिक विचार, निष्पक्षी विवेचन इत्यादि ग्रामीण क्षेत्रों में अब तक किए गए उपक्रमों की यदि वैज्ञानिक समीक्षा करें तो हम पाएंगे कि यह अध्ययन मुख्यता आर्थिक स्थिति से संबंधित थे। ग्रामीण समाजशास्त्र में ग्रामीण समाज का अध्ययन अनेक उद्देश्यों से किया जाता है। अतः हम देखते हैं कि ग्रामीण समाजशास्त्र के विभिन्न सामाजिक तौर-तरीकों के अध्ययन के साथ-साथ ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान भी खोजता है।

अमेरिका में 1937 में हुए समाजशास्त्रीय सम्मेलन में यह निर्णय निर्णय लिया गया था की वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित ग्रामीण समाजशास्त्र में सभी ग्रामीण समस्याओं का अध्ययन किया जाना चाहिए। अतः ग्रामणशास्त्रीय पूर्णतया  वैज्ञानिक है और यह एक सामाजिक विज्ञान है।

ग्रामीण समाजशास्त्र एक विज्ञान के रूप में 

वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रामीण समाजशास्त्र के अध्ययन मे निम्न सोपान होने चाहिए-- 

(अ) ज्ञान के स्वरूप की सत्यता, 

(ब) इसका संगठन, 

(स) इसकी विधि, 

जैसा कि निम्नलिखित वर्णन से स्पष्ट है कि ग्रामीण समाजशास्त्र इन तीन दशाओं का सत्यापन करता है--

1. विश्वसनीय ज्ञान 

वैज्ञानिक विधि की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी विषय की सामग्री ऐसी वैज्ञानिक विधियों द्वारा संकलित की जानी चाहिए जिनकी सत्यता एवं विश्वसनीयता की जांच की जा चुकी है हो तथा जिने निर्विवाद किया गया हो समाजशास्त्र यद्यपि एक विज्ञान है। फिर भी इसके अध्ययन का प्रारंभ जिस स्वरूप और गति से हुआ है वह निश्चय ही उत्साहवर्धक है। अनेक क्षेत्रों में नवीन ज्ञान प्रदान किया है। जैसे-- जनसंख्या, कुटुंब समूह का व्यवहार, संस्थाओं का विकास, सामाजिक परिवर्तन की विधि आदि। ग्रामीण समाजशास्त्र के अध्ययन में आने वाली अनेक अड़चनों के बावजूद इसकी सामग्री विश्वसनीय है तथा कुछ नगण्य कमियों के आधार पर इसे अवैज्ञानिक कहना एकदम अनुचित है।

2. ज्ञान संगठन 

विज्ञान का संगठन संबंधों पर आधारित है जो ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र को परस्पर संबंद्ध करते हैं। समाजशास्त्र में बहुत से अंतःसंबंध है। उसके पास और अधिक खोजों के लिए बहुत से साधन और उपकरण है। यद्यपि यह पर्याप्त है परंतु अभी भी उससे संपूर्ण क्षेत्र के समुचित अध्ययन विश्लेषण एवं संश्लेषण की क्षमता इनमें नहीं है। यह विश्वास किया जाता है कि समाज संबंधी प्राचीन ज्ञान का संकलन अंततः इस प्रकार के संश्लेषण से सहायक होगा।

3. समाजशास्त्र एक विधि के रूप मे 

जिस प्रकार भौतिक शास्त्र के अध्ययन के लिए सही सही प्रेक्षण एवं निष्कर्ष की आवश्यकता है। उसी प्रकार प्रेक्षण एवं निष्कर्ष समाजशास्त्र के अध्ययन में भी आवश्यक है तथापि भौतिक शास्त्र के प्रेक्षण प्रयोगों पर आधारित होते हैं तथा समाजशास्त्र प्रेक्षण अन्वेषण आंकड़ों पर। उदाहरणार्थ यदि हम जानना चाहते हैं कि बाल मृत्यु कम आय वाले परिवारों में अधिक होती है या अधिक आय वाले परिवारों में। तो इसके लिए हम ऐसा नहीं करते हैं कि 50 धनी परिवारों की माताओं को और 50 गरीब परिवारों की माताओं को एक कमरे में ले आए और बाल मृत्यु को देखने लगे। बल्कि इसके स्थान पर हम तथ्य संकलन करते हैं परंतु सर्वप्रथम हमें उनके खाने की व्यवस्था उस धार्मिक समूह के रीति रिवाज और अंत में उनकी वंश परंपरा का समन्वित अध्ययन करना होगा। बाल मृत्यु के संदर्भ में विभिन्न आय वर्गों का अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ है कि केवल आय में वृद्धि द्वारा बाल मृत्यु की दर कम की जा सकती है तथा बच्चों का जीवन सुरक्षित रहता है।

अतः समाजशास्त्र में अध्ययन की वैज्ञानिक विधि बड़ी सावधानी के साथ अपनाई जाती है। पृथक्करण करने, योजना बनाने, समुदायिक विकास में वैज्ञानिक तौर तरीकों पर आधारित सभी कार्य आवश्यक है। ग्रामीण समाज के अध्ययन में हमें सामाजिक सांख्यकी, सामाजिक निरीक्षण पूर्व इतिहास तथा समुदायिक अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है। वैज्ञानिक विधि के अभाव में ग्रामीण समस्याओं का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया जा सकता। ऐसे अध्ययनों पर आधारित निष्कर्षों के आधार पर जहां वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग नहीं किया गया है हम भविष्य के विषय में पूर्वानुमान ही लगा सकते हैं। किसी वैज्ञानिक तथ्य को प्राप्त नहीं कर पाएंगे ग्रामीण समाजशास्त्र में कारण और प्रभाव के बीच के संबंधों के अध्ययन का भी प्रयास किया जाता है जो वैज्ञानिक अध्ययन की प्रथम आवश्यकता है। साथ ही वर्गीकरण द्वारा छितरी हुई सामग्री को व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक रूप दिया जाता है तथा इसके गहन अध्ययन द्वारा सामान्यीकरण का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार ग्रामीण समाजशास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि समाजशास्त्र एक विज्ञान है।

सीमाएं 

वस्तुतः कुछ अवयव ऐसे भी है जो वैज्ञानिक प्रकृति को सीमित करते है जो निम्न प्रकार है--

1. ग्रामीण और नागरिक क्षेत्रों के बीच रेखा खींचना संभव नही है, 

2. यह विज्ञान अभी भी अविकसित है, 

3. इसके पास भौतिक विज्ञान की तरह प्रयोगशालाएं नही हो सकती है, और 

4. हम इसकी विषय सामग्री को किसी पैमाने से नही नाप सकते है। परन्तु ये छोटी-छोटी सीमाएं है। इनका सुधार कठिन अवश्य है पर असंभव नही।

यह भी पढ़ें; ग्रामीण समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र, अध्ययन का महत्व 

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