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7/07/2021

लोक संस्कृति का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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लोक संस्कृति का अर्थ (lok sanskriti kya hai)

lok sanskriti arth paribhasha visheshtayen;लोक संस्कृति निर्माण दो शब्दों से मिलकर हुआ है। लोक+संस्कृति। लोक का अर्थ ऐसे लोगों से है जो प्रायः असभ्य तथा अशिक्षित है। संस्कृति का अर्थ सीखा गया वह व्यवहार जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता है। 

लोक संस्कृति का वास्तविक अर्थ उस संस्कृति से है जो ग्रामीण और विशेषकर कृषक समाज मे उदय होती है और उसी समाज मे विकसित होती है। ग्रामीण लोक संस्कृति को परिभाषित करते हुए जार्ज एम फोस्टर ने बताया है कि लोक संस्कृति को जीवन के एक सामान्य जीवन यापन की विधि के रूप मे देखा जा सकता है जो एक क्षेत्र विशेष के रूप मे बहुत से गाँवों, कस्बों तथा नगरों के कुछ लोगों या सभी लोगों की विशेषता के रूप मे होती है और एक लोक समाज उन व्यक्तियों के एक संगठित समूह के रूप मे है जिसकी एक अपनी पृथक लोक संस्कृति होती है। 

वास्तव मे विश्व संस्कृतियों के अध्ययन की दृष्टि से दो प्रकार की संस्कृतियां स्पष्ट रूप मे दिखाई देती है। एक लोक संस्कृति है जिसका सीधा संपर्क लोक से है और दूसरी, संस्कृति समाज के विद्वित वर्ग द्वारा सूचित संस्कृति से है जो प्रायः नगरों अथवा विद्या के केन्द्रों मे निर्मित होती है। अर्थात् लोक संस्कृति नगरीय व विद्वित समाज की संस्कृति से भिन्न विशेषताओं वाली संस्कृति मानी जाती है। 

लोक संस्कृति की परिभाषा (lok sanskriti ki paribhasha)

रेडफील्ड के अनुसार," यह एक ऐसा समाज है जिसका आकार छोटा होता है तथा जिसमें अकेलापन, अशिक्षा, समानता, समूह दृढ़ता की भावना एवं जीवन का रूढ़िगत ढंग पाया जाता है।" 

डाॅ. सम्पूर्णानन्द के अनुसार," लोक संस्कृति वह जीती-जागती वस्तु जिसके द्वारा लोक की संस्कृति बोलती है।" 

जी. एम. फोस्टर के मतानुसार," लोक संस्कृति को जीवन की एक ऐसी सामान्य विधि के रूप मे समझा जाता है जो एक क्षेत्र विशेष के गाँवों, कस्बों तथा नगरों के कुछ पास भी व्यक्तियों की विशेषता के रूप मे स्पष्ट होती है तथा लोक समाज उन व्यक्तियों का एक संगठित समूह है जो लोक संस्कृति से बँधा होता है।"

लोक संस्कृति की विशेषताएं (lok sanskriti ki visheshta)

लोक संस्कृति की निम्न विशेषताएं है--

1. सरलता 

लोक संस्कृति की सहजता, सरलता और ग्राह्राता महत्वपूर्ण विशेषताएं है। इसमे न तो बनावटीपन और न ही दिखाव होता है। ग्रामीण और जनजातीय समाज की तरह इनकी सम्पूर्ण संस्कृति अत्यधिक सरल है। इसकी भाषा और अभिव्यक्ति मे न जटिलता और न कठिनाई है। जैसा उनका सरल जीवन है वैसी उनकी सरल संस्कृति भी।

2. मुखिक संस्कृति परंपरा 

लोक संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती है। लोक संस्कृति का कोई लिखित स्वरूप नही होता है बल्कि यह मौखिक रूप से ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। इसकी कोई ऐसी संस्था भी नही है जो व्यवस्थित रूप से प्रशिक्षण दे सके। इसमे धर्म, साहित्य, संगीत, लोक गाथाओं तथा विश्वासों के प्रशिक्षण को ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे संबंधित विभिन्न प्रकार के व्यवहारों, विश्वासों, विधि-विधानों तथा शिष्टाचार के लिए पुस्तकों के किन्ही लिखित नियमों का पालन नही किया जाता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिवार, पडौस अथवा अनौपचारिक समूहों से इनकी मौखिक सीख प्राप्त होती है।

3. सामूहिकता की भावना 

लोक संस्कृति किसी व्यक्ति विशेष की निधि नही है। यह सम्पूर्ण समाज के सहयोग से अनजाने किसी कारण से उत्पन्न हुई और सम्पूर्ण समाज की सम्पत्ति बन गयी है। लोक संस्कृति मे सामूहिक प्रेरणा, सामूहिक हिस्सा लेने की भावना और सामूहिकता पायी जाती है। इसलिए यह आज भी जीवित है। 

4. पिछ़ड़े हुए समाज की संपत्ति 

लोक संस्कृति पिछड़े हुए समाज से जुड़ी हुई है। इसका जन्म ही जनजातियों, कबीलों और कृषि-समाज मे हुआ है। इसीलिए सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ यह भी विकसित हुई है किन्तु अपने ही समुदाय की सीमाओं मे प्रभावी रूप से कार्य करती रही है। इसीलिए लोक संस्कृति मे जितनी विविधता है उतनी नगरीय संस्कृति मे नही है।

5. कृषि पर आधारित 

इसमें दो मत नही है कि भारत की लोक संस्कृति मूलतः कृषि समाज से जुड़ी हुई है। ग्रामीण समाज मे अधिकांश कार्य, उत्सव, मेले और हाट, पूजा-पाठ, ग्रामीण देवी-देवता की पूजा, लोक नृत्य और लोक गीत आदि कृषि से संबंधित है।

6. व्यवसायीकरण का अभाव 

लोक संस्कृति अव्यवसायिक होती है। इसकी अभिव्यक्ति व प्रदर्शन का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं होता। इससें संबंद्ध विचारक, कलाकार, संगीतज्ञ, शिल्पकार इत्यादि अपनी कला का प्रदर्शन लाभ प्राप्ति के लिए नहीं करते बल्कि उनका उद्देश्य मनोरंजन एवं ग्रामीण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है।

7. कलात्मक क्रियाओं मे सभी का सहभाग 

लोक संस्कृति में आने वाली कलात्मक क्रियाओं में सभी लोगों का सहवाग होता है। इसका तात्पर्य यह है कि लोक संस्कृति के अंतर्गत दर्शक और कलाकार को अलग-अलग वर्गों में विभाजित नहीं किया जा सकता। क्योंकि इनमें एक समय में जो व्यक्ति दर्शक होता है वही दूसरे समय में कलाकार बन जाता है। लोक नृत्य में भाग लेने वाले व्यक्ति स्वयं गीतों की रचना करते हैं, उन्हें गाते हैं तथा साथ ही नृत्य भी करते हैं।

8. स्थानीय स्वरूप 

यद्यपि भारत के ग्रामीण जीवन में अनेक ऐसे देवी-देवताओं पर विश्वास किया जाता है तथा अनेक ऐसे त्यौहार मनाए जाते हैं जिनका विस्तार संपूर्ण भारत में है। परंतु फिर भी यहां के गांवों में अनेक ऐसे देवी-देवता त्योहार, अनुष्ठान आदि देखे जाते हैं जिनका विस्तार संपूर्ण भारत में ना होकर केवल स्थानीय ही होता है। लोक संस्कृति में इस स्थानीय स्वरूप को ही अधिक महत्व दिया जाता है। धर्म और विश्वासों का यह स्थानीय स्वरूप लोक संस्कृति की विशेषता को स्पष्ट करता है।

9. परिवार और समुदाय लोक संस्कृति संरक्षक 

परिवार और समुदाय ही लोक संस्कृति के वास्तविक संरक्षक है। ग्रामीण अंचलों के परिवार और समुदाय आज भी अपने सभी उत्सवों, रीति-रिवाजों, पर्वों आदि को लोक संस्कृति के विश्वासों के आधार पर करते हैं। यह लोक संस्कृति के आधार है।

10. बौद्धिक, धार्मिक एवं नैतिक जीवन की दृष्टि से पूर्णता का अभाव 

बौद्धिक, धार्मिक तथा नैतिक जीवन की दृष्टि से लोक संस्कृति कभी पूरी नहीं होती। लोक संस्कृति तथा अभिजात संस्कृति एक दूसरे से प्रभावित होती रहती है। लोक संस्कृति अभिजात संस्कृति से अपने सदस्यों के भौतिक तथा अभौतिक होती विकास के लिए बड़ी सीमा तक प्रभावित होती रही है। इस प्रकार से अभिजात संस्कृति भी लोक संस्कृति को अपने में उसमें कुछ परिवर्तन करके, समाविष्ट करती जा रही है।

औद्योगिकरण तथा नगरीकरण का लोक संस्कृति पर प्रभाव 

औद्योगिकरण तथा नगरीकरण का लोक संस्कृति पर प्रभाव निम्न प्रकार है--

1. ग्रामीण जनता कलाकारों तथा अन्य लोगों मे विभाजित की गई है।

2. प्राचीन काल मे कलाकार धार्मिक उत्सवों पर गाना-बजाना तथा नृत्य इत्यादि कार्य बिना किसी लालच के करते थे, किन्तु आज औद्योगिकरण के कारण कलाकार अपनी कला अपनी पदर्शन पैसे लेकर करते है। इस तरह लोक संस्कृति मे व्यावसायिक मनोरंजन को स्थान मिल गया है।

3. प्राचीन काल मे लोक संस्कृति की सरलता उसकी एक मुख्य विशेषता थी परन्तु आज लोक संस्कृति मे जटिलता आ गई है।

4. अब से पहले लोक संस्कृति मे आर्थिक लाभ का कोई भी स्थान नही था किन्तु अब कलाकारों का उद्देश्य आर्थिक लाभ मात्र रह गया है। 

5. औद्योगिकरण व नगरीकरण के विकास से पूर्व ग्रामीण जनता को मनोरंजन पर खर्च नही करना पड़ता था। वे स्वांग, कठपुतली, नाच, आल्हा श्रवण आदि से मनोरंजन करते थे किन्तु आज उन्हें मनोरंजन के साधनों के लिए नगरों की शरण धन देकर लेनी पड़ती है।

6. ग्रामीण कला तथा मनोरंजन अपनी पारिवारिकता का महत्व खो रहे है। उन पर औद्योगिकरण की छाप पड़ रही है।

7. औद्योगिकरण तथा नगरीकरण के कारण विशेषीकरण का जन्म हो गया है। कलाकार विभिन्न कलाओं मे प्रशिक्षण प्राप्त करके अपनी कला को बेचते है।

8. ग्रामीण समुदायों मे लोकगीतों और लोकगाथाओं के स्थान पर फिल्मी गानों की धुन सुनाई पड़ती है। इस तरह लोक संस्कृति का नगरीकरण हो रहा है।

लोक संस्कृति की अवधारणा की समाजशास्त्रीय आलोचना 

लोक संस्कृति की अवधारणा के प्रवर्तक और समर्थक राबर्ट रेडफील्ड माने जाते है। आधुनिक युग के समाजशास्त्रियों द्वारा इस अवधारणा की आलोचना की गई है जिसके प्रमुख आधार निम्न हैं--

1. सोल टैक्स का अध्ययन 

राबर्ट रेडफील्ड ने लोक संस्कृति की व्याख्या करते हुए कहा है कि जब कोई एक लोक संस्कृति किसी अन्य संस्कृति के संपर्क मे आती है तो उसमें धर्म निरपेक्षता और व्यक्तिवादी प्रवृत्तियां उत्पन्न हो जाती है, किन्तु सोल-टैक्स ने अपने अध्ययन मे इस बात का खंडन किया है और उनकी मान्यता है कि दोनों संस्कृतियां एक ही समाज मे अपना-अपना स्वतंत्र रूप से भी बनायें रखती हैं।

2. ऑक्सर लेविस का अध्ययन 

लेविस ने एक गांव भारत मे और एक गांग मैक्सिको मे अपने अध्ययन के लिए चयन किया। भारत मे दिल्ली के पास रानी खेड़ा और मैक्सिको मे टेपोज्टलान गाँव का अध्ययन किया। इन अध्ययनों के आधार पर लेविस की मान्यता है कि लोक संस्कृति मे परिवर्तन केवल नगरीकरण की प्रक्रिया द्वारा ही नही होता है, प्रत्येक संस्कृति के परिवर्तन के उसके आंतरिक और बाहरी कारण भी होते है, जिन्हें रेडफील्ड ने स्वीकार नही किया है। 

3. लोक संस्कृति का प्रारूप अस्पष्ट 

लोक संस्कृति की आलोचना का एक आधार यह है कि रेडफील्ड ने इस संस्कृति की जिन विशेषताओं की अभिव्यक्ति की है वैसी विशेषताएं अथवा सांस्कृतिक तत्व एक समान रूप से सभी लोक संस्कृतियों मे नही पाये जाते है। भिन्न-भिन्न आदिवासी जातियों मे भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति पाई जाती है। इन संस्कृतियों की मूल्य व्यवस्था भी अलग-अलग होती है। अतः लोक संस्कृति का जो स्वरूप और विशेषताएं रैडफील्ड ने बताई है वे सभी प्रकार की लोक संस्कृतियों पर लागू नही होती है।

4. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अपूर्ण 

कुछ समाजशास्त्रियों की आलोचना का आधार यह है कि इस अवधारणा मे मनोवैज्ञानिक कारकों को स्पष्ट रूप से नही समझाया गया है और लोक संस्कृति के अनुयायियों के चरित्र की विशेषताओं पर समुचित प्रकाश नही डाला गया है।

5. क्रोबर के विचार 

प्रसिद्ध मानवशास्त्री क्रोबर के अनुसार भी इस अवधारणा की आलोचना इस आधार पर की जाती है कि इसमें केवल ग्रामीण संस्कृति परिवर्तित होकर नगरीय संस्कृति के रूप मे परिवर्तित नही होती है अपितु नगरीय संस्कृति भी ग्रामीण लोक संस्कृति से निरंतर प्रभावित होती रहती है।

6. सैद्धांतिक आधार का अभाव 

कुछ विद्वान समाजशास्त्रियों के विचारानुसार लोक संस्कृति की अवधारणा की रचना के साथ-साथ रैडफील्ड इसकी कोई गहन सैद्धांतिक रूपरेखा नही बना पाये है। यही कारण है कि इस अवधारणा के आधार पर मनोवैज्ञानिक, प्रकार्यवादी तथा ऐतिहासिक सिद्धांतों के आधार पर अध्ययन नही किये जा सकते।

7. जार्ज फोस्टर के विचार

प्रसिद्ध  समाजशास्त्री जार्ज फोस्टर ने भी रैडफील्ड की लोक संस्कृति की अवधारणा की आलोचना की है। इनकी आलोचना का आधार यह है कि रेडफील्ड ने लोक संस्कृति के अकेलेपन की विशेषता पर जोर दिया है। किन्तु वास्तविकता ऐसी नही है। सांस्कृतिक तत्व सर्वदा एक स्थान से दूसरे स्थान को हस्तांतरित होते रहते है। जब लोग एक समूह के रूप मे तीर्थ यात्रा आदि करते है तो वे अपने सांस्कृतिक तत्वों का प्रसार करने और नवीन स्थान के तत्वों को ग्रहण करने मे बड़ा योगदान देते है। अतः लोक संस्कृति को एक अकेली संस्कृति कहना अनुचित है।

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