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2/25/2021

लाभांश का अर्थ, परिभाषा, प्रकार, महत्व

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लाभांश का अर्थ (labhansh kya hai)

labhansh arth paribhasha prakar mahatva;विभाजन योग्‍य लाभ का वह भाग जो कम्‍पनी कें अशंधारियों को प्राप्‍त होता है 'लाभांश' कहलाता है। विभाजन योग्‍य लाभ से आशय उस लाभ से है जो कम्‍पनी द्वारा प्राप्‍त लाभों में से सभी खर्चो को घटाने एंव संचय वे कोषों मे हस्‍तान्‍तरण के बाद बचते है यदि कम्‍पनी को नगद राशि की आवश्‍यकता है तो कम्‍पनी लाभ के सम्‍पूर्ण भाग को लाभांश के रूप में वितरित न कर उस व्‍यवसाय मे ही रख सकती है। ऐसी स्थिति में लाभांश की घोषणा नही की जाती बल्कि सम्‍पूर्ण लाभ को विभिन्‍न कोषों के रूप मे ही रख लिया जाता है। इस सम्‍बन्‍ध में निर्णय संचालक मण्‍डल करता है कि लाभ का कितना अंश लाभांश के रूप में घोषित किया जाये तथा कितना अंश कम्‍पनी में ही पुनर्विनियोग किया जायें।

लाभांश की परिभाषा (labhansh ki paribhasha)

सर्वोच्‍च न्‍यायालय मे अनुसार,'' लाभांश कम्‍पनी के लाभो का वह भाग है जो अंशधारियों में बांटने के लिए नियत कर दिया गया है।''

वैस्‍टन एंव ब्रिगम के अनुसार,'' लाभांश नीति अर्जनों का अंशधारियों  को भुगतन एंव प्रतिधरित अर्जनों में विभाजन निश्चित करती है।''

एस.एम.शाह के अनुसार,'' लाभांश एक कम्‍पनी के लाभ हेाते है जो उसके सदस्‍यों में उनके अंशो के अनुपात में बांटे जाते है।''

लाभांश के अर्थ एंव विभिन्‍न परिभाषाओं के अध्‍ययन से स्‍पष्‍ट है कि लाभांश का आशय कम्‍पनी को प्राप्‍त उस अंश से है जो कम्‍पनी के अंशधारियों में वितरित किया जता है। लाभांश की घोषणा के सम्‍बन्‍ध में सर्वप्रथम कम्‍पनी का संचालन-मण्‍डल एक प्रस्‍ताव पास करके यह सुझाव देता है कि कम्‍पनी के लाभ में से इतना भाग लांभांश के रूप वितरित किया जाना चाहिए। इसके पश्‍चात् सामान्‍य सभा में अंशधारी प्रस्‍ताव पास करके इस सुझाव को  मंजूरी प्रदान करता है ,तभी लाभांश घोषित समझा जाता है और कम्‍पनी के लिए इसका वितरण अंशधारियों में करना अनिवार्य हो जाता है । लांभाश की घोषणा के सम्‍बन्‍ध में निर्णय करते समय कम्‍पनी के सचांलक मण्‍डल को निम्‍नलिखित दो बातों को अवश्‍य ध्‍यान में रखना चाहिए--

1. कम्‍पनी की आवश्‍यकतांए 

प्रत्‍येक कम्‍पनी की अपनी वित्तीय आवश्‍यकताएं होती है। इन वित्तीय आवश्‍यकताओ को ध्‍यान में रखकर ही लाभांश की घोषणा करनी चाहिए। यदि कम्‍पनी की निकट भविष्‍य में विकास व विस्‍तार की योजना है तो इस आवश्‍यकता की पूति हेतु कम्‍पनी को पर्याप्‍त मात्रा में वित्त की आवश्‍यकता होगी। ऐसी स्थिति में लाभांश कम घोषित किया जा सकता है और यदि आवश्‍यक हो तो लाभांश घोषित ही न किया जाये। इस प्रकार कम्‍पनी की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ बनाये रखना प्रबन्‍धकों का पहला कर्तव्‍य है भले ही ऐसा करने के लिए अंशधारियों को कुछ त्‍याग ही क्‍यों न करना पड़े।

2. अशंधारियो को उचित प्रतिफल 

अंशधारियो अंशो में विनियोग कुछ प्रतिफल प्राप्‍त करने की आशा रखते है। इस बात का सही अनुमान संचालकों को होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो अंशधारियों मे अंसतोष पनपेगा जिससे कम्‍पनी कें अंशो के बाजार मूल्‍य एंव कम्‍पनी की साख पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ सकता है। 

लाभांश के विभिन्‍न रूप अथवा लाभांश के प्रकार 

labhansh ke prakar;लाभांश को कई रूपों मे बांटा जा सकता है। सामान्‍य तौर पर यह नकदी में वितरित  किया जाता है किन्‍तु कभी -कभी वह बोनस अंशो के रूप में भी बांटा जा सकता है। लाभांश नकद अथवा बोनस अंशो के अलावा अन्‍य रूपों में भी वितरित किया जा सकता है। लाभांश के निम्न  प्रकार है--

 1. नकद लाभांश

लाभांश देने का यह रूप सबसे अधिक प्रचलित एंव लोकप्रिय है।  अंशधारियों को भी यह तरीका सुविधाजनक लगता है। जिन कम्‍पनियों की तरलता की स्थिति सुदृढ़ होती है वे कम्‍पनियां नकद मे ही लाभांश बांटना पसन्‍द करती है।

2. सम्‍पत्ति लाभांश 

कभी-कभी नकद के अतिरिक्‍त सम्‍पत्ति के रूप में लाभांश वितरित किया जाता है। इसे वस्‍तुओं के रूप में लाभांश के नाम से भी जाना जाता है। एक कम्‍पनी दूसरी कम्‍पनी के अंश व ऋण पत्र अपने पास क्रय करके रखती है ओर इन प्रतिभूतियों को लाभांश के रूप में वितरित करती है। लाभांश वितरण का यह तरीका बहुत ही कम संस्‍थाओ के द्वारा से असुविधाजनक माना जाता है। कुछ मदिरा उत्‍पादक कम्‍पनियां शराब की बोतलें निर्धारित मूल्‍य पर लाभांश के रूप में बांटती है। लांभाश का यह रूप बहुत ही कम प्रचलित है। 

3. स्‍टाक लाभांश या बोनस अंश 

स्‍टाक लाभांश को बोनस अंश के नाम से भी जाना जाता है। जब कम्‍पनी स्‍टाक लाभांश का भुगतान करती है तो कम्‍पनी अपने संचित कोषों या लाभों का पूंजीकरण करके ऐसा करती है। जिन कम्‍पनियों की तरलता की स्थिति ठीक नहीं होती है वे प्राय: अपने लाभों का पूंजीकरण करके स्‍टाफ लाभांश का भुगतान करती है। 

4. ऋणपत्र के रूप मे लाभांश 

जब संस्‍था की तरल स्थिति ठीक नही होती है तो वह ऋणपत्र के रूप में लाभांश का वितरण  करती है। लाभांश का यह तरीका दीर्घकालीन हो सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कम्‍पनी लाभांश का वितरण वर्तमान में न करके भविष्‍य में करना चाहती है।

5. प्रपत्र लाभांश 

यदि संस्‍था के पास पर्याप्‍त नकदी नहीं है और कम्‍पनी लाभांश का वितरण करना चाहती है तो कम्‍पनी लाभांश की निश्चिता राशि के लिए  प्रतिज्ञा-पत्र जारी कर सकती है। जो कुछ माह बाद देय होते है। यदि आवश्‍यक हुआ तो शोध लाभांश अधिपत्र भी जारी किये जा सकते है।

6. संयुक्‍त लाभांश 

जब लाभांश का कुछ भाग नगद मे तथा शेष अन्‍य सम्‍पत्ति के रूप में वितरित किया जाता है तो वह संयुक्‍त लाभांश कहलाता है।

लाभांश नीति के लाभ/महत्व (labhansh ka mahatva)

स्थिर लाभांश नीति का प्रमुख लक्षण यह है कि उसमे स्थिरता एंव नियमितता होनी चाहिए यदि लाभांश नीति में स्‍थायित्‍व का अभाव होता है तो इससे कम्‍पनी की स्‍थायी साख पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा अंशधारियों की स्थिति भी अनिश्चित हो जाती है। जब अंशो के बाजार मूल्‍यो में उच्‍चावचन होता रहता है तो इससे कम्‍पनी व अंशधारियों दोनों पर ही बुरा प्रभाव पड़ता है। ऐसी दशा मे सटोरिये लाभ उठाते है और यह स्थिति कम्‍पनी के अस्तित्‍व को ही चुनौती दे सकती है। लाभांश नीति के लाभ निम्‍न बिन्‍दूओं द्वारा समझ सकते है--

1. अंशधारियों में विश्‍वास 

एक मजबूत लाभांश नीति में स्थिरता व नियमितता का गुण अंशधारियों के मन में अंशो के प्रति विश्‍वास जगा देता है किसी वर्ष लाभांश कम होने की स्थिति में कम्‍पनी लाभांश में कटौती करके कोषों में से नियोजन करके लाभांश वितरित करती है। फलस्‍वरूप पूंजी बाजार में इन अंश की साख अच्‍छी  बनी रहती है। 

2. साख में वृद्धि 

मजबूत लाभांश नीति अपनाने के कारण कम्‍पनी की साख बढ़ जाती है जिसके कारण कम्‍पनी को विभिन्‍न वित्तीय साधनों से पूंजी प्राप्‍त करने में कोई कठिनाई नहीं होती है।

3. अंशधारियों में संतुष्टि का भाव 

एक मजबूत लाभांश नीति ऐसे अंशधारियों को संतुष्‍ट रख सकती है जो अपनी आय के प्रति अत्‍यधिक जागरूक एंव सतर्क रहते है तथा  नियमित रूप से प्रतिवर्ष प्राप्‍त होने वाले लाभांश को अधिक महत्‍व देते है। 

4. अशों के बाजार मूल्‍य में स्‍थायित्‍व 

जिन अंशों पर नियमित दर से लाभांश प्राप्‍त होता है उन अशों प्राप्‍त होता है। उन अंशो के बाजार मूल्‍य में अपेक्षाकृत कम उच्‍चावचन होते है फलस्‍वरूप ऐसे अंशो पर सट्टेबाजी की संभाबनांए कम होती है।

5. दीर्घकालीन योजनाओं में सहायक 

कम्‍पनी के प्रबन्‍धक कम्‍पनी के विस्‍तार व विकास के लिए दीर्घकालीन योजना बना सकते है क्‍योकि मजबूत लाभांश नीति के अंतर्गत कम्‍पनी की वित्तीय आवश्‍यकताओं ओर उनकी पूर्ति के साधनों का सही मूल्‍यांकन किया जा सकता है। 

6. राष्‍ट्रीय आय में स्थिरता 

यदि देश की अधिकांश नीति का पालन करती है तो इससे देश की राष्‍ट्रीय आय में स्थिरता आएगी जो निश्चित रूप से देश की अर्थ-अर्थव्‍यवस्‍था के लिए स्‍थायित्‍व का सूचक होगी।

शायद यह जानकारी आपके काफी उपयोगी सिद्ध होंगी 

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