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2/23/2021

अल्प पंजीकरण क्या है? परिभाषा, दोष

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अल्‍प पूंजीकरण क्या है? (Alp panjikaran ka arth)

अल्‍प पूंजीकरण अतिपूंजीकरण की विपरीत स्थिति है। अति पूंजीकरण में अंशो का वास्‍तविक मूल्‍य उसके पुस्‍तकीय मूल्‍यों से कम होता है जबकि अल्‍प पूंजीकरण में कम्‍पनी कें अंशो का वास्‍तविक या बाजार मूल्‍य उसके पुस्‍तकीय मूल्‍य से ज्‍यादा होता है। अल्‍प पूंजीकरण की स्थितियों में कम्‍पनियों की सम्‍पत्तियों का उपयोग अधिक हेाती है। अल्‍प पूंजीकरण की स्थिति में कम्‍पनी की सम्‍पत्तियों का उपयोग अधिक कुशलता से किया जाता है जिससे लाभ अर्जन क्षमता में लगातार वृद्धि होती है। ऐसा वे तभी कर पाती है जबकि उनके पास उनकी आवश्‍यकता के अनुपात में कम पूंजी रहती है। कम पूंजी के साथ-साथ ऐसी कम्‍पनियां अधिक लाभ कमाती है तथा अधिक लाभांश बांटती है। दूसरे शब्‍दों में हम कह सकतें है कि अल्‍प पूंजीकरण कम्‍पनी की अशं पूंजी के गहन उपयोग की स्थिति है। कुछ लोग अल्‍प पूंजीकरण को व्‍यापार में पूंजी की अपर्याप्‍ताता मानते है जो कि उचित नही है। 

अल्प पूंजीकरण की परिभाषा (Alp panjikaran ki paribhasha)

हागलैण्‍ड के अनुसार,'' अल्‍पपूंजीकरण का अर्थ व्‍यापार में लगी हुई सम्‍पत्ति तथा उसकी कुल अंशपूंजी की तुलना में सम्‍पत्ति का आधिक्‍य है।''

ग्रेस्‍टनबर्ग के अनुसार,'' जब कोई उद्योग कुल पूंजी के अनुपात में लाभ की दर उसी प्रकार के अन्‍य उद्योगो के लाभ की तुलना में अप्रत्‍याशित रूप से अधिक हो अथवा जब व्‍यवसाय को चलाने के लिए पूंजी बहुत कम हो तो उसे अल्‍प पूंजीकरण कहते है।''

अल्प पूंजीकरण की विशेषताएं 

अल्प पूंजीकरण की विशेषताएं इस प्रकार है--

1. कम्‍पनी की औसत आय विनियोजित पूंजी की तुलना में अधिक।

2. लाभांश की ऊंची दर।

3. अंशो का बाजार मूल्‍य पुस्‍तकीय मूल्‍य से अधिक।

4. सम्‍पत्तियो का वास्‍तविक मूल्‍य पुस्‍तकीय मूल्‍य से अधिक ।

5.अपर्याप्‍त पूंजी।

अल्‍प पूंजीकरण के दोष

अल्प पूंजीकरण के दोष इस प्रकार है--

1. अंशधारियों का शोषण 

निश्चित रूप से अल्‍पपूंजीकरण की स्थिति में उद्योग में लाभ अधिक होते है; यद्यपि इन लाभों का उपयोग त्रणों का ब्‍याज चुकाने तथा विभिन्‍न संचयों का निर्माण मे चला जाता है। गुप्‍त कोषों का निर्माण कर आय को कम बताया जाता है और अंशधारियों को घोषित लाभांश न देकर उनका शोषण किया जाता है। वास्‍तव मे लाभ की दर निश्चित बनाये रखने के लिये कम दर से लाभांश दिया जाता है। 

2. अंशो के मूल्‍यों में भारी उतार-चढा़व

अल्‍पपूंजीकरण की स्थिति में अधिक लाभ होने पर कम्‍पनी के संचालक कभी कम तथा कभी ज्‍यादा लाभांश बांटते है जिससे अंशों के मूल्‍यों में भारी उतार-चढाव आता रहता है

3. औद्योगिक संघर्ष  

अल्‍पपूंजीकरण की स्थिति में कम्‍पनी के कर्मचारी बढ़े हुए लाभो को देखकर अधिक वेतन, बोनस तथा भर्ती की मांग करते है और जब उनकी मांगे नही मानी जाती है तो हड़ताल, तालाबन्‍दी की स्थितियां निर्मित होने लगती है। इस प्रकार अल्‍पपूंजीकरण की स्थिति औद्योगिक संघर्ष को जन्‍म देती है।

4. प्रतिस्‍पर्धी में वृद्धि 

जब अल्‍पपूंजीकरण के कारण उद्योग के लाभ बढ़ जाते है तो बढे हुए लाभों  को देखकर अनेक प्रतिस्‍पर्द्धा मैदार में आ जाते है जिससे कम्‍पनी को प्रतिस्‍पर्द्धा का सामना करना पड़ता है ओर भविष्‍य में प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ जाने की सम्‍भावना रहती है।

5. उपभोक्‍ताओं में अंसतोष 

सस्‍ंथा के बढ़े हुए लाभ देखकर उपभोक्‍ता यह सेाचने लगते हैं कि अधिक मूल्‍य लेकर उनका शोषण किया जा रहा है और इससे उपभोक्‍ताओ मे असंतोष की भावना फैलती है। 

6. अल्‍पकालीन ऋणो पर निर्भरता 

जब संस्‍था में पूंजी की कमी हो जाती है तो इस कमी की पूर्ति अल्‍पकालीन ऋणों तथा निवेशो से की जाती है। इससे उपक़्रम सदैव ऋणो रहता है और आय का एक बड़ा भाग ब्‍याज के रूप में जाता रहता है। 

7. सरकारी नियंत्रण 

जब अल्‍पपूंजीकरण के कारण लाभ बढ़ जाते है तब सरकार इसे उपभोक्‍ताओं का शोषण मानती है ओर उपक्रम पर नियंत्रण के आदेश देती है। 

8. करो के बोझ में वृद्धि 

अल्‍पपूंजीकरण वाली कम्‍पनियों में लाभ की मात्रा अधिक होने से सरकार करो का भी बोझ लाद देती है।

शायद यह जानकारी आपके काफी उपयोगी सिद्ध होंगी 

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