10/03/2020

कार्नवालिस के प्रशासनिक सुधार

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लाॅर्ड काॅर्नवालिस 

1784 ई. मे वारेन हेस्टिंग्ज के इंग्लैंड जाने के बाद एक वर्ष से कुछ अधिक अर्थात् 1785-86 तक बंगाल का गवर्नर जनरल सर जाॅन मैकफर्सन था। सितम्बर 1786 मे लाॅर्ड काॅर्नवालिस गवर्नर जनरल बनकर आया। लाॅर्ड काॅर्नवालिस एक प्रभावशाली व्यक्ति था। ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ कंट्रोल का अध्यक्ष हेनरी डंडस उसका मित्र था। इंग्लैंड का तत्कालीन प्रधानमंत्री छोटा पिट भी उसका मित्र था। उसे बंगाल की शासन व्यवस्था को उचित ढंग से संगठित करने के लिए भारत भेजा गया था। उसे इस बात का भी आश्वासन दिया गया था कि भारत की नीति को पूर्ण समर्थन दिया जाएगा। अतः उसने प्रशासन व्यवस्था मे ब्रिटिश सरकार की अपेक्षाओं को पूरा करने का निश्चय किया।

कार्नवालिस के प्रशासनिक व न्याय सम्बन्धी सुधार 

सार्वजनिक सेवाओं मे सुधार

क्लाईव के भ्रष्टाचारी शासन तथा रेग्यूलेटिंग एक्ट के दोषो से कंपनी के कर्मचारी कंपनी के हितों की उपेक्षा कर भ्रष्टाचार मे लगे थे। इसलिए उसने सबसे पहले कर्मचारियों मे भ्रष्टाचार हटाने या कम करने का प्रयास किया।

भ्रष्टाचार का कारण कर्मचारियों का वेतन कम होना था। इसलिए उसने कंपनी को मजबूर किया कि वे उनके वेतन मे बढ़ोत्तरी करे। उसने अनावश्यक पदों को खत्म कर बचत की और इन पर कार्य करने वालों को दूसरे विभागों मे भेजकर आय वृद्धि की। रिश्वत और निजी व्यापार को रोकने हेतु भी कठोर कानून बनाए। लेकिन सरकारी नौकरियों मे सिर्फ अंग्रेजों को ही नियुक्त करता था। भारतीय कर्मचारियों पर झुठे आरोप लगाकर अपदस्थ किया पर भ्रष्टाचारी अंग्रेज अफसरों के साथ उदारता अपनाई। इसने भारतीय जनता का कोई हित नही किया।

काॅर्नवालिस का भू-राजस्व सुधार 

काॅर्नवालिस का स्थायी भूमि प्रबंध अत्यंत ही महत्वपूर्ण सुधार माना गया। वारेन काॅर्नवालिस के समय मे ही कंपनी के उच्च अधिकारियों की ऐसी धारणा थी कि भू राजस्व समस्या को स्थायी रूप से समाप्त करने का एक ही रास्ता है और वह है जमींदारों के साथ स्थायी रूप मे मालगुजारी निश्चित कर ली जाए।

इंग्लैंड मे सर फिलिप फ्रांसिस बंदोबस्त का प्रबल समर्थक था। भारत मे कार्नवालिस को सर जाॅन शोर से संबंध मे काफी सहायता मिली। सर जाॅन शोर बंगाल मे कंपनी का उच्च पदाधिकारी था। शोर के अलावा उसे एक दूसरे अधिकारी जेम्स ग्रांट से भी सहायता मिली थी। लाॅर्ड काॅर्नवालिस भी फ्रांसिस के मत का समर्थक था। बंगाल मे एक निश्चित मालगुजारी के आधार पर स्थायी बंदोबस्त करना ही सबसे अधिक लाभप्रद एवं सुविधाजनक माना गया। कार्नवालिस ने इस संबंध मे काफी खोज की और सभी संभव आंकड़े एकत्र किए। सर्वप्रथम उसने 10 फरवरी 1790 को दसवर्षीय प्रबंध लागू किया और तीन साल बाद 22 मार्च, 1793 को स्थायी प्रबंध लागू करने की घोषणा की। 

स्थायी भूमि बन्दोबस्त 

स्थायी प्रबंध के अनुसार एक निश्चित मालगुजारी पर स्थायी रूप से भूमि सदा के लिए जमींदारों को दे दी गई। इस व्यवस्था की विशेषता यह थी कि जमींदार तथा अन्य भू राजस्व संग्रहकर्ता इस प्रबंध के अनुसार भूमिपति हो गए। वे अपनी जमींदारी मे स्थित सारी जमीन के स्वामी बन गए। उनका केवल एक काम था, वह यह कि किसानों से मालगुजारी वसूल कर निश्चित रकम एक निश्चित तिथि को कंपनी के खजाने मे जमा करना। जमींदारी मे स्थित जमीन के वे स्वामी ही नही बन गए बल्कि उनका अधिकार वंशानुगत भी हो गया। वे अपनी जमीन बेच भी सकते थे। इससे किसानों की अवस्था दयनीय हो गई। वे अपनी जमीन के स्वामी नही रहे। अब वे अपने जानवरों को चरागाह मे चरने के लिए बिना जमींदार की अनुमति के नही भेज सकते थे और न गाँव के तालाब मे मछली पकड़ सकते थे। अब बंगाल के किसान अपने जमींदार की दया और कृपा पर आश्रित हो गए।

कार्नवालिस के न्याय संबंधी सुधार 

कार्नवालिस का प्रमुख उद्देश्य न्याय व्यवस्था मे होने वाले व्यय मे कमी करना था। अतः उसने 1787, 1790 तथा 1793 मे बंगाल, बिहार, उड़ीसा मे बम्बई और मद्रास के आदर्शों पर सुधार किए और हेस्टिंग्ज की व्यवस्था को सुधारों के साथ बढ़ाया।

(अ) दीवानी न्यायालय 

वारेन हेस्टिंग्स ने दीवानी न्यायालयों मे कई बार परिवर्तन किए। शुरू मे जिलों की संख्या 36 से 23 की और इसमे अंग्रेज कलेक्टर बनाए और उन्हें न्याय के भी अधिकार दिए। अब उसे मजिस्ट्रेट अथवा न्यायाधीश के कर्तव्यों को निभाना था। लगान वसूली के समय वह मजिस्ट्रेट होता था। लेकिन मालगुजारी अदालत मे वह मजिस्ट्रेट नही होता था। इसके प्रतिकूल अपील मालवोर्ड मे फिर गवर्नर जनरल के पास होती थी जो सदर दीवानी अदालत का भी प्रधान था। यह 1 हजार रूपये तक के प्रकरण सुनता था तथा 5 हजार रूपये तक के प्रकरण मे सम्राट से अपील होती थी। कलेक्टर 200 रूपये तक के प्रकरण राजिस्ट्रार को भेज सकता था। इससे कलेक्टर निरंकुश हो गया। इसलिए परिवर्तन कर 1793 मे पुनः न्यायालय का संगठन हुआ। 

इसमे सबसे छोटी अदालत 50 रूपये के मामले सुनती थी तथा राजिस्ट्रार 200 रूपये तक के मामले सुनता था। इनकी अपील जिला अदालतों मे होती थी। इनमे एक अंग्रेज ढाका, मुर्शिदाबाद तथा पटना मे थे। हर मे तीन अंग्रेज जज और भारतीय कर्मचारी होते थे। प्रांतीय न्यायालय सदर दीवानी अदालत के अधीन थे और जो गवर्नर जनरल व उसकी परिषद् के नियंत्रण मे थे। प्रांतों के विरुद्ध अपील यही होती थी।

(ब) कार्नवालिस कोड का निमार्ण 

कार्नवालिस ने विभिन्न कानूनों और नियमों का संकलन करवा कर एक कोड का निमार्ण करवाया। इसके अन्तर्गत अंग-भंग तथा अमानवीय अत्याचार करने के दण्ड समाप्त कर दिये। यही कार्नवालिस कोड कहलाता था।

(स) वकीलों पर नियंत्रण 

न्यायालय मे योग्य वकीलों की व्यवस्था के लिए उनकी नियुक्ति का दायित्व दीवानी अदालत को दे दिया गया। सदर दीवानी अदालत ने योग्य वकीलों के उद्भव के लिए न्यूनतम योग्यता निश्चित कर दी और उन पर नियंत्रण भी रखने लगा। 

(ब) फौजदारी न्यायालयों का गठन 

फौजदादी न्यायालय का गठन भी दीवानी न्यायालयों के समान ही था। अतः यह क्रम सदर फौजदारी, चार प्रान्तीय, जिला अदालतों के बाद सबसे छोटी अदालत दरोगा अदालत होती थी। अपील का क्रम नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः था। प्रांतीय न्यायालयों के जज सिविल न्यायालयों के जज होते थे तथा प्रान्तों का दौरा करके न्याय प्रदान करते थे। इनके द्वारा दिये गये मृत्यु दण्ड की अपील की स्वीकृति सदर निजामत अदालत से लेना पड़ती थी। सदर निजामत अदालत गवर्नर जनरल और उसकी परिषद् के आधीन थी।

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