10/01/2020

यूरोप शक्तियों का भारत मे आगमन

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यूरोपीय शक्तियों का भारत में आगमन/प्रवेश (europe saktiyo ka bhart me aagman)

प्रचीनकाल से ही भारत का विदेशों से व्यापार होता था। लगभग 15 वीं सदी उत्तरार्द्ध तक सब कुछ ठी-ठाक रहा पर मध्य एशिया की उथल-पुथल एवं कुस्तुनतुनिया पर 1453 और  1516-17 मे मिश्र पर तुर्की लोगों का अधिकार हो गया और आटोमन साम्राज्य स्थापित हुआ। अतः पूर्व और पश्चिम के देशों के मध्य संपर्क स्थापित करने वाले मार्ग भी तुर्कों के अधीन आ गये और उन्होंने यूरोप के व्यापारियों को अपने आटोमन साम्राज्य से होकर पूर्वीय देशों से व्यापार करने की सुविधा देने से इंकार कर दिया। अतः यूरोपीय देशों ने नये मार्ग खोजना प्रारंभ कर दिया।

चूँकि भारत उस समय एक विशाल और बहुत धन-धान्य से पूर्ण था उस समय भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, अतः सभी यूरोपीय जातियों की इच्छा भारत मे व्यापार करने की थी। वास्को-डि-गामा द्वारा मार्ग खोजे जाने के बाद धीरे-धीरे अन्य यूरोपीय जातियां भी भारत के प्रति आकर्षित होकर भारत आने लगी। इनमे सबसे पहले पुर्तगाली आये थे।

भारत मे पुर्तगालियों का आगमन/प्रवेश 

सबसे पहले वास्कोडिगामा ने 20 मई, 1498 मे भारत के पश्चिमी समुद्र तट से कालीकट मे प्रवेश किया। वास्कोडिगामा की भारत यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण थी। डाॅ. ईश्वरीप्रसाद के शब्दों मे "वास्को-डि-गाम की भारत के लिये समुद्री मार्ग की खोज ने भारत-यूरोप सम्बन्धों के इतिहास मे एक नया अध्याय खोल दिया। जिससे यूरोपीय जातियों को भारत के पर्दे पर पहली व्यापारिक रूप मे फिर उपनिवेश के रूप मे और अन्त मे ब्रिटिश साम्राज्य के संस्थापक के रूप मे प्रस्तुत किया।

कालीकट के राजा जमोरिन ने वास्कोडिगामा का हार्दिक स्वागत किया। इसके बाद वह स्वदेश लौट गया और 1502 मे वास्कोडिगामा दुबारा भारत आया। उसने हिन्दू शासक जमोरिन से व्यापार करने की सुविधाएं प्राप्त कर ली तथा इस तरह से पुर्तगालियों का भारत मे व्यापार शुरू हो गया। पुर्तगालियों ने जमोरिन को उसके शत्रु राज्यों मुख्यतः कोचीन राज्य के विरूद्ध मदद देना शुरू कर दिया तथा इस तरह से पुर्तगालियों ने भारत की राजनीति मे हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया। पुर्तगालियों ने कन्नानोर मे एक कारखाना स्थापित कर कोचीन तथा कन्नानोर मे व्यापारिक केन्द्र बनाये।

अरब व्यापारियों के बहकाने पर जमोरिन ने पुर्तगालियों पर आक्रमण कर दिया। कोचीन के पुर्तगाली कमांडर ने जमोरिन को पराजित किया और कालीकट मे भी एक कारखाना स्थापित किया। 1505 ई. तक पुर्तगाली व्यापारियों की पश्चिमी तट तक पहुँच पहुँच ही गयी। डी. अल्मेडा भारत मे पुर्तगाली अधिकृत क्षेत्र का प्रथम गवर्नर बना। वह 1505 ई. से 1509 ई. तक भारत मे रहा तथा उसने भारत मे पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न शुरू किया, हालांकि उसका प्रमुख उद्देश्य पुर्तगाल के दक्षिण-पूर्वी एशिया के व्यापार की सुरक्षा करना था। ब्लू वाटर नीति का पक्षपाती होने के नाते उसने सामुद्रिक शक्ति का विकास अधिक किया, जिससे भारत मे पुर्तगाली राज्य सुरक्षित रह सके।

अल्मेडा के बाद अल्बुकर्क भारत आया जो 1509 ई. से 1515 ई. तक भारत मे रहा तथा जिसकी अधीनता मे भारत मे पुर्तगाली शक्ति का निर्माण हुआ। उसने कई सफलताएं भी पाई मुख्यतः भारत मे उसने पुर्तगाली शक्ति को काफी दृढ़ किया। अल्बुकर्क की मृत्यु के बाद भी पुर्तगाली अपनी शक्ति मे वृद्धि करते रहे, पुर्तगालियों को काफी सफलता मिली तथा धीरे-धीरे पश्चिमी तट पर गोआ, दमन, ड्यू, साल्सट, वेसीन, चौल, बम्बई, बंगाल मे हुगली एवं मद्रास तट पर "सान थोम" पुर्तगालियों के अधिकार मे चले गये।

पुर्तगालियों की सफलताएं 

पुर्तगालियों की प्रारम्भिक सफलता के विभिन्न कारण थे जिनमे से प्रमुख निम्म है--

1. भारतीय नरेशों की पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता।

2. शाहजहाँ के अलावा किसी के भी द्वारा इनका विरोध नही।

3. प्रारंभिक गवर्नरों की योग्यता तथा साहस।

4. पुर्तगाली जलसेना तथा तोपखाने का यथेष्ट योगदान।

पुर्तगालियों के पतन (असफलता) के कारण 

प्रारंभिक सफलता के बाद पुर्तगाली भारत मे असफल हुए। अंत मे गोआ, दमन तथा दियू के अलावा उनके अधिकार मे कुछ भी नही रहा। पुर्तगालियों के पतन या सफलता के कारण इस प्रकार है--

1. सन् 1580 ई. मे पुर्तगाल स्पेन के साथ शामिल हो गया तथा अपनी स्वतंत्रता खो बैठा।

2. बाद मे मुगलों तथा मराठों ने भी पुर्तगालियों का विरोध किया।

3. 1629 ई. मे शाहजहाँ ने हुगली छीन लिया।

4. 1639 ई. मे मराठों ने पुर्तगालियों से साल्सट तथा बेसीन छीन लिया और 1661 ई. मे बम्बई अंग्रेजों को दहेज मे दे दिया गया। 

5. पुर्तगालियों की धार्मिक कट्टरता, धर्म प्रचार तथा स्थानीय स्त्रियों से विवाह करने की नीति ने भी उनके कई शत्रु बना दिये।

6. पुर्तगाली बादे व्यापार के प्रति उदासीन हो गये तथा राजनीति मे ज्यादा हस्तक्षेप करने लगे जिससे आर्थिक शक्ति समाप्त होने लगी।

उपर्युक्त कारणों के साथ अंत मे यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि पुर्तगाल यूरोप का एक छोटा देश था। जन-शक्ति तथा आर्थिक शक्ति की दृष्टि से वह इतनी दूर एक बड़ा साम्राज्य स्थापित करने मे सर्वथा अयोग्य था।

डचों का भारत मे आगमन/प्रवेश 

भारत मे हालैंड के निवासी डच जाति के लोगों का पुर्तगालियों के सामान ही आगमन पुर्तगालियों के बाद हुआ था। 

डचों को भी पूर्व के साथ व्यापार करने की इच्छा जागृत हुई और इस उद्देश्य की पर्ति के लिये आठ डच कंपनियां बनाई गई।

भारत मे डच व्यापार को स्थापित करने का श्रेय एमस्टर्डम की व्यापारिक कंपनी को है। 1602 ई. मे भारत मे व्यापार के लिये उक्त आठ कंपनियों को मिलाकर डच इंडिया कम्पनी बनाई गई और उसे अधिपत्र (चार्डर) देकर व्यापार करने भेजा गया। डचों ने पुलीकट, सूरत, चिनसुर, कासिमबाजार, पटना, बालासोर, नागाट्टम और कोचीन मे अपने व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना की। डचों ने भारत मे अंग्रेजों और फ्रांसीसियों से कोई स्पर्धा नही की, क्योंकि वे दक्षिण पूर्वी एशिया के व्यापार मे रूचि रखते थे। इसीलिए भारत मे उनकी स्थिति अमहत्वपूर्ण रही। 

डचों के पतन या असफलता के कारण

1. भारत की बजाय दक्षिण एशिया के मसालों के द्वीप की तरफ डचों का ध्यान केन्द्रित होना।

2. डच कंपनी का राष्ट्रीय संस्था न होना तथा उसके कर्मचारियों मे नेतृत्व की भावना एवं उत्साह का अभाव।

3. साधनों का अभाव।

4. डचों की निर्बल स्थिति।

5. डच व्यापारियों का निजी व्यापार मे ध्यान।

भारत मे फ्रांसीसियों का आगमन (प्रवेश)

"फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी" ने भारत से अपना व्यापार करने के लिये 1664 ई. मे एक नई फ्रांसीसी कंपनी स्थापित की और उसके इलाके की रक्षा का उत्तरदायित्व फ्रांस की सरकार ने अपने हाथ मे रखा। 1667 ई. मे फ्रांसिस केरन को भारत मे फ्रांसीसी व्यापार का डायरेक्टर जनरल बनाकर भेजा जिसने 1667 ई. मे सूरत मे पहला फ्रांसीसी कारखाना स्थापित किया। 1669 ई. मे दूसरा फ्रांसीसी कारखाना, मछलीपट्टम मे खोला गया तथा गोकुण्डा के नवाब से आयात-निर्यात करों मे छूट की सुविधा भी प्राप्त कर ली। उन्होंने बीजापुर नरेश शेरखान लोदी की अनुमति से पांडिचेरी और चन्द्रनगर मे भी अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये। 1725 ई. मे मलावार तट पर माही और 1739 ई. मे कोरीमण्डल तट पर कारीकल भी प्राप्त कर लिया। मर्टिन ने पांडिचेरी को प्रमुख बस्ती का रूप दिया था। मर्टिन की मृत्यु के पश्चात फ्रांसीसियों का प्रभाव कम होने से उन्होंने सूरत, बटम, मछलीपट्टम के कारखाने छोड़ दिये। मृतप्रायः फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कम्पनी को 1720 ई. मे हिन्द द्वीप समूह की शास्वत कंपनी के रूप मे संगठित कर पुनः भाग्य आजमाने को भेजा गया। 1726 ई. मे इसकी स्थिति मे सुधार हुआ। 1735 ई. मे डच्यूमस ने गवर्नर बनते ही दिल्ली मे मुगल बादशाह से मुद्रा बनाने की अनुमति लेकर भारतीय राजनीति मे हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया और 1739 ई. मे तंजौर का सिंहासन दिलाने मे सहायता करने के बदले मे पुरस्कार स्वरूप करीकल प्राप्त कर लिया। पुर्तगाल और डचों की शक्ति भारत मे समाप्त हो गयी थी। अब केवल फ्रांसीसी बचे थे जिन्होंने भारत मे अपनी सत्ता स्थापित करना का स्वप्न देखना शुरू कर दिया और 1748 ई. के बाद डूप्ले ने शांतिपूर्ण व्यापार की नीति का परित्याग कर दिया, इसके कारण उन्हें अंग्रेजों से संघर्ष करना पड़ा।

अंग्रेजों का भारत मे आगमन (प्रवेश) और भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार 

पुर्तगालियों और डचों की सफलता से प्रेरित होकर अंग्रेजों का आकर्षण भारत की ओर बढ़ा। सन् 1558 मे महारानी एलिजाबेथ के राज्यारोहरण के बाद इस दिशा मे प्रयत्न प्रारंभ हुए। जब ब्रिटेन मे इस विचारधारा ने जन्म लिया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार से देश समृद्धशाली होता है तो वे भी पूर्व मे व्यापार करने के इच्छुक हो गये और भारत से व्यापार करने के लिए दिसंबर सन् 1600 ई. मे लंदन के सौ व्यापारियों ने एक कंपनी की स्थापना की, जो कालांतर मे "ईस्ट इंडिया कंपनी" कहलाई। महारानी एलिजाबेथ ने इसे पुर्वी देशों के साथ व्यापार, युद्ध और संधि संबंधी एकाधिकार प्रदान किया। व्यापार के आधार पर अंग्रेजों ने भारत मे प्रवेश किया। कालांतर मे ब्रिटिश साम्राज्यवाद की स्थापना हेतु यह घटना महत्वपूर्ण मानी जाती है। 

हाॅकिन्स द्वारा मुगल सम्राट जहाँगीर से व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त करने हेतु प्रयत्न (सन् 1609-11)

ईस्ट इंडिया कंपनी ने पश्चिमी तट के बंदरगाह सूरत को अपना केन्द्र बनाया था। हाॅकिन्स को मुगल सम्राट के पास राजदूत बनाकर भेजा गया। थोड़े ही समय मे वह जहाँगीर का कृपापात्र बन गया। मुगल दरबार मे उसका विशेष स्थान बन गया, पर पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण हाॅकिन्स अपने प्रयत्नों मे असफल रहा।

सर टामस रो की सफलता 

पुर्तगालियों के कुचक्र के विरुद्ध अंग्रेजों ने अब सन् 1615 ई. मे टामस रो को राजदूत बनाकर भेजा। वह विद्वान, वाक्पटु, अध्यवसायी तथा प्रभावशाली व्यक्ति था। उसने अपने प्रयत्नों द्वारा शांतिपूर्ण व्यापार करने संबंधी अनुमति सम्राट से प्राप्त कर ली। इसके फलस्वरूप सूरत, भड़ौच, अहमदाबाद तथा आगरा से अंग्रेजों के व्यापारिक केन्द्र स्थापित हो गये।

अब भारत मे दो शक्तियाँ आमने-सामने थी- फ्रांसीसी एवं अंग्रेज। तीन कर्नाटक युद्धों (1740-1760) मे अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को पूर्णतया परास्त कर पांडिचेरी एवं चन्दनगर तक सिमट जाने पर विवश कर दिया। अब भारत मे अंग्रेजों का साम्राज्यवादी दौर शुरू हुआ। उन्होंने दक्षिण की तीनों प्रमुख शक्तियों-निजाम, मैसूर, मराठे को परास्त कर दिया। 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ तक पंजाब और सिंध को छोड़ लगभग पूरा भारत उनके राजनीतिक एवं सैनिक प्रभुत्व मे आ चुका था, तथा भारत मे अंग्रेजी शासन की संरचना प्रारंभ हो चुकी थी।

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