9/07/2020

धर्म के स्वरूप महत्व व कार्य

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धर्म के स्वरूप/प्रकार (dharm ka swaroop)

सामान्य धर्म 

जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, इसका तात्पर्य धर्म के उस स्वरूप से है, जो सभी के द्वारा अनुसरण करने योग्य होता है। इस धर्म के पालन मे आयु, लिंग, सम्पत्ति, पर आदि का किसी प्रकार का भेद नही होता। सामान्य धर्म इस सत्य पर आधारित है कि सभी धर्म समान है तथा सभी धर्मों का उद्देश्य मानव समाज का कल्याण करना है। मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और सामान्य धर्म का उद्देश्य मानव की इसी श्रेष्ठता को बनाए रखना है। सामान्य धर्म सभी प्राणी मात्र के लिए है। इसे सर्वव्यापी मानव धर्म कहा जा सकता है।
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मनुस्मृति मे मनु ने मनुस्मृति मे सामान्य धर्म की विवेचना करते हुए लिखा लिखा है--
धृतिः क्षमा दमोडस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्दा सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
सामान्य धर्म अथवा मानव धर्म के रूप मे मनु ने उन मानवीय गुणों का उल्लेख किया है, जो सभी के लिए अनुकरणीय है। इन गुणों की संख्या दस है--
1. धृति
धृति का तात्पर्य जीभ अथवा जननेन्द्रियों को संयमित रखना है। जो व्यक्ति इस गुण को विकसित कर लेता है, वह धीर कहलाता है।
2. क्षमा
सबल होते हुए भी उदार कार्य करना क्षमा कहलाता है, किन्तु कायरता क्षमा नही है।
3. संयम
शारीरिक और मानसिक वासनाओं को रोककर अपने को शुद्ध और नियमित बनाना संयम है।
4. अस्तेय
सामान्यतया अस्तेय का तात्पर्य चोरी न करना है, जो इसे अपना लेता है उसे सारी सम्वृध्दि अपने आप मिल जाती है।
5. शुचिता
शुचिता का तात्पर्य पवित्रता है। शुचिता मन, जीवात्मा और बुद्धि की पवित्रता का नाम है।
6. इन्द्रिय-निग्रह
मानव का एक निश्चित लक्ष्य होता है। उस लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव है, जब वह इन्द्रियों पर नियंत्रण रखे। इन्द्रिय निग्रह का तात्पर्य इन्द्रियों को नियंत्रित रखना है।
7. धी
धी का अर्थ बुद्धि है। मानव बुद्धि का समुचित विकास करना धर्म का महत्वपूर्ण लक्षण है।
8. विद्या
वेदों मे विद्या को अत्यंत ही महत्व प्रदान किया गया है। वास्तव मे विद्या प्राप्त कर लेने से मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह और मन की क्षुद्र प्रवृत्तियों से छुटकारा प्राप्त कर लेता है।
9. सत्य 
सत्य धर्म का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। " सत्यं वद् धर्मम् चर" अर्थात् सत्य का अनुसरण ही धर्म का अनुसरण है। सत्य की पहचान और सत्य के अनुसरण के समान दूसरा कोई धर्म नही है।
10. अक्रोध
जैसा गीता मे कहा गया है कि कामनाओं की पूर्ति मे विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है जिससे व्यक्ति असामान्य व्यवहार करने लगता है। क्रोध संयम रहित हो जाता है। संयम रहित होने से वह धर्म और अर्धम मे भेद करने मे समर्थ नही होता। क्रोध न करना भी मानव धर्म है। अक्रोध के द्वारा ही मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है।

विशिष्ट धर्म 

भारतीय सांस्कृतिक योजना मे जीवन के दो पक्ष होते है- सामान्य और विशिष्ट। सामान्य कार्य व्यवहारों के सफलतापूर्वक सम्पादन और व्यक्तित्व के सर्वतोन्मुखी विकास की दृष्टि से व्यक्ति मे कतिपय सामान्य गुणों का होना जरूरी होता है जिसे धर्म के सामान्य लक्षण के रूप मे निरूपित किया गया है किन्तु जीवन मे अपने हितों के साधन मे व्यक्ति को विशिष्ट स्थितियों के अनुरूप कतिपय विशिष्ट भूमिकाएँ करनी होती है जिसे विशिष्ट धर्म या स्वधर्म कहा जाता है।
स्वधर्म निर्दिष्ट स्थितियों के सन्दर्भ मे व्यक्ति की भूमिका को परिभाषित करता है जिससे एक तो व्यक्ति को कार्य करने मे आसानी होती है, दूसरे पारस्परिक आदान-प्रदान मे संशय व अनिश्चितता की स्थिति नही बनती और समाज मे निजी हितों की पूर्ति मे अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और संघर्ष से बचा जाता है। विशिष्ट धर्म के प्रमुख स्वरूप निम्म है--
1. वर्ण धर्म 
वर्ण-व्यवस्था मे विभिन्न वर्ण के व्यक्तियों के लिए जिन कर्तव्यों की विवेचना की गई है, उनका विवरण इस प्रकार है--
(अ) ब्राह्मण
चारों वर्णों मे ब्राह्मण श्रेष्ठ है। उसकी श्रेष्ठता का आधार उसकी सात्विक प्रवृत्ति और निश्छल स्वभाव है। ब्राह्मण को निम्न धर्मों का पालन करना चाहिये--
1. अध्ययन
2. अध्यापन
3. यज्ञ करना
4. यज्ञ कराना
5. दान देना
6. दान लेना।
(ब) क्षत्रिय
इनके निम्म धर्म कर्त्तव्य थे--
1. प्रजा की रक्षा
2. कानून निर्माण
3. पढ़ना
4. दान देना
5. यज्ञ करना
6. स्वाभिमान
7. चातुर्य
8. धैर्य तथा तेज।
(स) वैश्य
वैश्यों के निम्म धर्म थे--
1. पशु पालन और कृषि
2. अध्ययन
3. दान देना
4. व्यापार।
(द) शूद्र
शुद्रों का धर्म इन द्धिज वर्गों की सेवा करना था।
2. आश्रम धर्म 
आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत मनुष्य की आयु 100 वर्ष की मानी गयी है। इन 100 वर्षों को चार बराबर भागों मे विभाजित किया गया है। ये चार भाग इस प्रकार है--
1. ब्रह्राचर्य
2. गृहस्थ
3. वानप्रस्थ
4. सन्यास।
इन्ही चार भागों को चार आश्रमों की संज्ञा दी गयी है।
3. कुल धर्म
वर्ण धर्म और आश्रम धर्म के बाद तीसरा विशिष्ट धर्म कुल धर्म है। कुल का तात्पर्य परिवार से है। भारतीय संस्कृति मे परिवार को अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। कुल धर्म का तात्पर्य है परिवार के सभी सदस्यों द्वारा दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना तथा परिवार की परम्परा को बनाए रखना। कुलधर्म के अन्तर्गत निम्न धर्म आते है--
1. पति धर्म
2. पत्नी धर्म
3. पुत्र धर्म
4. मातृ धर्म
4. राज धर्म
राजधर्म के अन्तर्गत राता द्वारा दोषी व्यक्तियों को दण्डित करना सम्मिलित है। राजा को समाज और धर्म का रक्षक माना जाता है। सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था को गति प्रदान करने मे राजधर्म का महत्वपूर्ण स्थान है।
5. युग धर्म
यह धर्म परिवर्तन को स्वीकार करता है। हिन्दू धर्म मे परिवर्तित परिस्थितियों के महत्व को स्वीकार किया गया है तथा इनके अनुसार व्यक्ति के धर्म या कर्तव्यों की विवेचना की गई है। उदाहरण के लिए--
1. सतयुग   =   तप धर्म
2. त्रेता युग  =   ज्ञान धर्म
3. द्धापर युग  = यज्ञ धर्म
4. कलियुग =     दान-धर्म।
6. मित्र धर्म 
एक मित्र द्वारा दूसरे मित्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का सम्पादन करना ही मित्र धर्म है। भारतीय धर्म मे मित्रता को अत्यंत ही महत्व प्रदान किया गया है। मित्रता के कारण समाज मे सामाजिक सम्बन्धों का विकास होता है तथा सामाजिक संगठन बनता है।
7. गुरू धर्म
विशिष्ट धर्म का एक अन्य महत्वपूर्ण स्वरूप गुरू धर्म है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा मे गुरू को श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया गया है। गुरू के सान्निध्य और गुरू की कृपा से ही व्यक्ति लौकिक कर्मों मे सफलता और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति करता है। इसलिए गुरू की तुलना ब्रह्रा, विष्णु और महेश से की गई है।
गुरूब्रह्रा गुरुर्विष्णु, गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मैश्री गुरूवे नमः।।
भारतीय मान्यता तो यह रही है कि यदि गुरू और ईश्वर दोनों खड़े हो तो गुरू के पाँव पहले छूना चाहिए क्योंकि गुरू ही ईश्वर का ज्ञान कराता है।
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरू आपनी, जिन गोविन्द दियो बताय।।

धर्म का महत्व एवं कार्य (dharm ka mahatva karya)

मनुष्य के सामाजिक जीवन मे धर्म की उपयोगिता अथवा उसके महत्व से कोई इन्कार नही कर सकता। प्रत्येक समाज की संस्कृति मे भिन्नता होने से धर्म के स्वरूप मे भिन्नता हो सकती है, पर धर्म के द्वारा कुछ ऐसे सार्वभौमिक कार्य किये जाते है जो कि प्रत्येक समाज मे होते देखे जा सकते हैं। धर्म के द्वारा कई ऐसे कार्यों को व्यावहारिक धरातरल पर किया जाता है, जो कि सामाजिक व्यवस्था एवं सामाजिक संगठन हेतु बहुत महत्वपूर्ण होते है। धर्म एक सामाजिक संस्था के रूप मे कई महत्वपूर्ण कार्य करता है। संक्षेप मे, धर्म के महत्व को उसके कार्यों के रूप मे निम्म तरह से स्पष्ट किया जा सकता है--
1. धर्म समाज को संगठित करता है
धर्म समाज के सभी सदस्यों को एकता के सूत्र मे बाँधकर इन्हें संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य करता है। एक धर्म के सदस्य स्वभावतः समान मूल्यों को स्वीकार करने लगते है। समान मूल्य तथा विचारधार के कारण ये एक-दूसरे के सुख-दुख मे सहयोगी बनते है। इस तरह इनमे एक प्रकार का संगठन-सा बन जाता है, जो कि समाज को संगठित करता है।
2. धर्म सामाजिक व्यवस्था करता है
धर्म का एक महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह सामाजिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करता है। कई समाजशास्त्रियों का मत है कि धर्म समाज तथा व्यक्ति को जीवत रखता है। धर्म अपने सदस्यों को सामाजिक सेवा की अनुमति देता है एवं व्यक्तियों मे यह भाव पैदा करता है कि उसे सामाजिक हितों हेतु अपना सर्वस्व समर्पित कर देना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने का प्रयत्न करता है तो धर्म उसे अलौकिक अथवा ईश्वरीय शक्ति के दण्ड का भय दिखाता है। इस सन्दर्भ मे रेडक्लिफ ब्राउन ने विचार दिये है कि धर्म किस तरह सामाजिक व्यवस्था मे सहयोगी बनता है।
3. धर्म सामाजिक नियंत्रण मे मददगार
धर्म समाज के सदस्यों मे पाप-पुण्य की भावना को उत्पन्न करता है एवं सदस्यों के व्यवहारों, आचरण तथा कार्यों को नियंत्रित करता है। प्रत्येक धर्म का आधार पारलौकिक शक्ति होती है, जो कि व्यक्ति के प्रत्येक व्यवहार, आचरण तथा कार्यों को देखती रहती है एवं अनुचित अथवा धर्म विरोधी कार्यों के लिए दण्ड भी दे सकती है। इसी भय से व्यक्ति धर्म से सम्बंधित नियमों का पालन करना ही श्रेयस्कर समझते है। प्रत्येक धर्म से सम्बंधित कुछ गाथाएँ अथवा कहानियाँ होती है, जिनके माध्यम से पारलौकिक शक्ति की महिमा को स्पष्ट किया जाता है एवं यह बतलाया जाता हैं कि अच्छे तथा धर्मानुसार कार्य करने से पारलौकिक शक्ति प्रसन्न होती है एवं व्यक्ति को सुख व मानसिक शांति प्राप्त होती है तथा समाज विरोधी व धर्म विरोधी कार्य करने से दु:ख, कष्ट व परेशानियाँ होंगी एवं मानसिक तनाव होगा। इसलिए व्यक्ति धर्मानुसार चलना ही उचित समझता है, जिससे सामाजिक नियंत्रण बना रहता है।
4. धर्म व्यक्तित्व का विकास करता है
धर्म मानव के व्यक्तित्व का विकास करने का एक महत्वपूर्ण कार्य करता है। यह व्यक्ति मे पारलौकिक शक्ति का भाव जागृत करता है एवं किसी भी कार्य मे सफलता-असफलता से परे कार्य करने को प्रेरित करता है। धर्म मनुष्य मे जीवन के महत्व को स्पष्ट करता है, पवित्र भावनाओं को पैदा करता है एवं मानसिक तनाव व चिन्ताओं से दूर रखकर गलत, समाज विरोधी व धर्म विरोधी कार्यों के प्रति घृणा को पैदा करता है। इस तरह धर्म व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास करता है एवं उसे सुख समृद्धि हेतु धार्मिक नियमों के अनुरूप आचरण के लिए प्रेरित करता है।
5. धर्म सुरक्षात्मक भावना का विकास करता है
प्रत्येक धर्म के द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है कि अलौकिक शक्ति ही सर्वेसर्वा है, उस शक्ति की इच्छा के बगैर न तो कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को किसी भी तरह की हानि, नुकसान या अशुभ कर सकता है तथा न ही अलौकिक शक्ति से कोई व्यक्ति अपने स्वार्थों को पूरा कर सकता है। यह तो धर्मनुसार कार्य की भावना-जागृत होती है, वह दु:खों तथा कष्टों के समय भी निराश नही होता तथा इन्हें हल करने के लिए न ही असामाजिक या अधर्म के कार्यों का ही सहार लेता है। इस संदर्भ मे धर्म व्यक्तियों मे सुरक्षा की भावना को पैदा करने का कार्य करता है।
6. धर्म समाज कल्याण का कार्य करता है
प्रत्येक धर्म अपने सदस्यों को समाज कल्याण के कार्य को करने की प्रेरणा देता है। धर्म व्यक्तियों मे सहयोग, प्रेम, आपसी तालमेल तथा परोपकार जैसे गुणों को विकसित करता है। इन गुणों से प्रेरित होकर व्यक्ति समाज कल्याण के कार्यों को करता है एवं उसमे दूसरे व्यक्तियों के प्रति सहयोग, त्याग तथा स्नेह के भाव पैदा होते है। वह वैयक्तिक स्वार्थों तथा हितों को ही महत्व नही देता बल्कि समाज कल्याण के कार्यों को करके सन्तुष्ट होता है।
अतः स्पष्ट है कि धर्म समाज व व्यक्ति के लिए कई कार्यों को करता है।

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