9/17/2020

कर्म अर्थ, प्रकार, तत्व, सिद्धांत

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कर्म का अर्थ (karm kise kahte hai)

karm meaning in hindi;शाब्दिक रूप से कर्म शब्द की उत्पत्ति कृ धातु से हुई है जिसका अर्थ है; क्रिया करना। व्यक्ति द्वारा अर्थात् उसके शरीर, मन, वाणी द्वारा की गई कोई भी क्रिया-चलना, खाना-पीना, सोना, उठना, बैठना, लिखना, खेत जोतना, बोझा ढोना, सोचना, विचारना व इच्छा करना, बोलना, पढ़ना इत्यादि कर्म है, किन्तु धर्म-गंर्थों मे कर्म शब्द का प्रयोग व्यक्ति के मन, वाणी और शरीर द्वारा लौकिक व पारलौकिक दायित्वों के निर्वाह हेतु किये गये कार्यों से है। कर्म अकर्म ( अर्थात् निषिद्ध कर्म ) से भिन्न है। कर्म का शास्त्रीय अर्थ अहंकार रहित कर्म से है ( गीता 4-17 )।

कर्म और पुनर्जन्म की धारणा को हिन्दू धर्म मे एक व्यवस्थित सिद्धांत के रूप मे स्थापित किया गया है। कर्म और पुनर्जन्म हिन्दू संस्कृति के आधारभूत तत्व है जिन पर सम्पूर्ण हिन्दू सामाजिक वैचारिकी-वर्ण, आश्रम, धर्म, ऋण एवं संस्कार आधारित है। व्यक्ति का किस योनि या किस वर्ण मे जन्म होगा अथवा उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी, यह उसके द्वारा पूर्वजन्म ( अथवा जन्मों ) के संचित धर्म तथा वर्ण आश्रम, ऋण एवं संस्कार युक्त कर्म के निर्वाह पर निर्भर करता है। 

कर्म के प्रकार (karm ke pirakar)

कर्मों को एक वर्गीकरण के अनुसार तीन प्रकार का बताया गया है। ये तीन प्रकार है--

1. कायिक

कायिक कर्म उन कर्मों को कहा जाता है जो काया या शरीर द्वारा किये जाते है। 

2. वाचिक 

जो कर्म वचन या वाणी द्वारा किये जाते है उन्हें वाचिक कर्म कहा जाता है।

3. मानसिक

मन से सम्पन्न होने वाले कर्म मानसिक कर्म कहलाते है। 

इससे भिन्न गीता मे क्रमशः 3 प्रकार के कर्म का उल्लेख किया गया है। 

1. सात्विक कर्म 

जो कर्म शास्त्र विधि से नियत किया हुआ और कर्तापन से अभिमान से रहित, फल को न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग द्वेष से किया हुआ है वह कर्म सात्विक कर्म कहा जाता है (गीता 18:24)। 

2. राजस कर्म 

जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है तथा फल को चाहने वाले अहंकार युक्त पुरूष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कर्म कहलाता है। (गीता 18:25) 

3. तामसिक कर्म 

जो कर्म परिणाम हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह कर्म तामस कर्म कहा जाता है। (गीता 18:25)। संक्षेप मे धर्मानुकुल आचरण सद्कर्म है, जिसका फल अच्छा होता है। गीता (गीता 2:34,35) मे कहा गया है कि धर्म रूपी कर्म करने से अपकीर्ति और पाप होता है। 

कर्मों के फल के आधार पर भी कर्मों का वर्गीकरण किया है। इस आधार पर भी तीन प्रकार के कर्मों का उल्लेख मिलता है--

1. संचित कर्म 

इस श्रणी मे वे सब कर्म आते है जिन्हें व्यक्ति ने पूर्व जन्म मे किया है।

2. प्रारब्ध कर्म 

पूर्व जन्म के संचिक कर्मों मे जिन कर्मों का फल व्यक्ति वर्तमान जीवन मे भोगता है, उसे प्रारब्ध कर्म कहा जाता है।

2. क्रियमाण या संचीयमान कर्म 

व्यक्ति द्वारा इस जन्म मे जो कर्म किया जाता है वह क्रियमाण कर्म कहलाता है। संचित कर्म का भाग जो प्रारब्ध कर्म भोगने के उपरांत शेष बचता है तथा क्रियमाण कर्म इन दोनों  पर व्यक्ति का भावी जीवन निर्भर करता है। 

कर्म के सिद्धांत के मुख्य तथ्य 

कर्म के सिद्धांत का प्रतिपादन वेदों, उपनिषदों, महाभारत, गीता, स्मृतियों एवं अन्य ग्रन्थों मे विस्तारपूर्वक किया गया है। विस्तृत विवेचन से बचते हुए यहां पर कर्म के सिद्धांत के मुख्य तथ्यों को संक्षेप मे प्रस्तुत किया जा रहा है--

1. कर्म के सिद्धांत मे कर्म तथा पुनर्जन्म का घनिष्ठ सम्बन्ध है। कर्मों के ही परिणामस्वरूप पुनर्जन्म होता है।

2. कर्म का प्रत्यय पर्याप्त व्यापक है। शरीर के अतिरिक्त मन तथा वचन द्वारा की गई क्रियायें भी कर्म के ही अन्तर्गत सम्मिलित मानी जाती है।

3. कर्म के सिद्धांत की यह मान्यता है कि व्यक्ति द्वारा किये गये किसी भी कर्म का प्रभाव समाप्त नही होता। कर्मों के फलों को अनिवार्य रूप से भोगना पड़ता है। 

4. कर्म के चक्र को अनन्त माना गया है। कर्मों की समाप्ति एक जन्म मे नही हो जाती। एक के बाद अनेक जन्म होते है तथा अनिवार्य नही कि प्रत्येक जन्म मे मनुष्य योनि ही मिले। इसके अतिरिक्त कर्म की व्यापकता को स्पष्ट करते हुए माना गया है कि व्यक्ति के वंशजों पर भी कर्म का प्रभाव पड़ सकता है।

5. कर्मों के ही कारण पुनर्जन्म होता है। वास्तविकता यह है कि व्यक्ति एक जन्म मे अपने समस्त कर्मों के फल को नही भोग पाता अतः अपने कर्मों के फलों को भोगने के लिये बार-बार जन्म लेना पड़ता है। इस प्रकार पुनर्जन्म का चक्र अनन्त काल तक चलता रहता है।

6. यह अनिवार्य नही कि इस जन्म मे इसी जन्म के कर्मों के फल प्राप्त हो बल्कि पहले के जन्मों के संचित कर्मों  के फल भी भोगने पड़ते है। इसी सिद्धांत के आधार पर वर्तमान मे अच्छे कर्म करने वालों द्वारा दुखः एवं कष्ट पाने की स्थिति देखी जाती है।

कर्म के तत्व (karm ke tatva)

कर्म के कुछ तत्व या विशेषताएं होती है। ये सभी तत्व कर्म की व्याख्या को स्पष्ट करते है। इन तत्वों के अभाव मे कर्म की कल्पना सम्भव नही है। कर्म मे निहित प्रमुख तत्व इस प्रकार है---

1. कर्म का अटल सिद्धांत "फल" से सम्बंधित है। मनुष्य जो भी करता है, वही उसका कर्म है। इस कर्म का कुछ न कुछ फल या परिणाम होना चाहिए। कर्म-फल को टाला नही जा सकता है। मनुष्य कर्म करता है। इस कर्म का कुछ फल होता है, वह इस फल का भुगतान करता है और इन भुगतानों के अनुसार पुनः उसके कर्मों का निर्माण होता है। कर्म और फल का यह चक्र निरन्तर चलता रहता है।

2.  कर्म केवल भौतिक क्रिया नही है। इसके अन्तर्गत सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक तथा भावात्मक सभी प्रकार की क्रियाओं का समावेश होता है।

3. कर्म-फल मे कार्य-कारण का नियम काम करता है। कारण कार्य को उत्पन्न करता है और फिर कारण बन जाता है। प्रवाह अनन्त है, कभी इसका अन्त नही होता है।

4. कर्म का फल नष्ट नही होता है और बिना कर्म किये फल की आशा करना व्यर्थ है।

5. कर्म मे कार्य-कारण की आश्चर्यभाविता तथा चक्रपना पाया जाता है।

6. कर्म सिद्धांत के अनुसार आत्मा अमर है और पुनर्जन्म होता है। इस जन्म मे हम जो कुछ करते है, वह पिछले जन्म के कर्मों का फल है। अतः जन्म-जन्मान्तर और कर्म-फल के द्वारा हम यह स्वीकार करते है कि आत्मा अमर है।

7. जीवन की परिस्थितियाँ के कर्मों का ही फल है। सभी परिस्थितियाँ समान नही होती, अतः सभी के कर्म समान नही होते है।

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