10/07/2020

संस्कार अर्थ, परिभाषा, महत्व, प्रकार

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संस्कार का अर्थ (sanskar kise kahte hai)

sanskar meaning in hindi;धर्म के दो पक्ष होते है, जिनमे एक है विश्वास और दूसरा है क्रिया। विश्वास धर्म का अमूर्त पक्ष है, जबकि क्रिया धर्म का मूर्त पक्ष है। धर्म के क्रियात्मक पक्ष मे संस्कार, अनुष्ठान, विधि-विधान एवं कर्मकांड आदि सम्मिलित है।

मोटेतौर पर संस्कार (अनुष्ठान) समाज मे विशिष्ट अवसरों पर संपन्न की जाने वाली क्रियाओं की समूह द्वारा स्वीकृत विधियां है। ये सामान्यतया समूह की उपस्थिति मे संपन्न की जाती है। समूह के सदस्यों की उपस्थिति एवं भागीदारी मे संपन्न किये जाने के कारण इन क्रियाओं के साथ पवित्रता व अलौकिकता का भाव जुड़ जाता है जो इन्हें सांसारिक कार्यों से पृथक करता है। 

दुर्खीम के अनुसार (या सामूहिक विधि विधान) तीन प्रकार के होते है। एक है, नकारात्मक संस्कार। इसकी प्रकृति निषेधात्मक होती है। इसमे गोत्र के सदस्यों के लिये कुछ आचारण वर्जित होते है। दूसरे प्रकार के संस्कार को दुर्खीम ने सकारात्मक संस्कार कहा है। यह संस्कार कर्म ऐसे आचरण से संबंधित होता है जिसे करने की समूह की स्वीकृति होती है। इसके अंतर्गत विवाह एवं संतानोत्पत्ति से संबंधित संस्कारों को सम्मिलित किया जा सकता है। तीसरे प्रकार का संस्कार प्रायश्चित कर्म से संबंधित होता है। जब गोत्र का सदस्य कोई गलत कार्य करता है तो उसके प्रायश्चित स्वरूप उसे जो संस्कार कर्म करने होते है उन्हें प्रायश्चित संस्कार की श्रेणी मे सम्मिलित किया जा सकता है। 

संस्कार की परिभाषा (sanskar ki paribhasha)

राजबली पाण्डेय के अनुसार " वास्तव मे संस्कार-व्यंजक तथा प्रतीकात्मक अनुष्ठान है। उनमे बहुत से अभिनयात्मक उद्गार और धर्म, वैज्ञानिक मुद्रायें एवं इंगित पाई जाती है।" 

जैमिनी के अनुसार " संस्कार वह प्रक्रिया है जिसके करने से पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य को करने के योग्य हो जाता है।" 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक तथा सामाजिक विधि-विधानों से है जिसका उद्देश्य व्यक्ति को नैतिक, मानसिक तथा सांस्कृतिक दृष्टिकोण से परिष्कृत बनाना है।

संस्कार का महत्व या कार्य (sanskar ka mahatva)

दुर्खीम के अनुसार सामाजिक जीवन मे धार्मिक विधि-विधान संस्कार व अनुष्ठान का अत्यधिक महत्व है। संस्कार समाज मे व्यवस्था बनाये रखने मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है। संस्कार (या कर्मकांड) गोत्र के सदस्यों मे एकता लाते है और उन्हे एक सूत्र मे बाँधे रहते है। दरअसल, समान अवसरों पर समान कर्मों को अपनाने की वजह से गोत्र के सदस्यों मे एकरूपता उत्पन्न होती है, जिससे उनमे एकता का विकास होता है जो सामाजिक संगठन को मजबूत करने मे मदद करता है। साथ ही, विशिष्ट अवसरों पर समूह द्वारा निर्धारित अनुष्ठानों को संपन्न करने से गोत्र के सदस्यों मे समूह बोध का भाव जागृत होता है, क्योंकि इन अवसरों पर वे गोत्र द्वारा निर्धारित विधि-विधान के अनुरूप ही कार्य करते है, जिससे उनमे समूह के प्रति सम्बध्दता की भावना या समूह से जुड़े रहने की भावना बनी रहती है। इनके अतिरिक्त संस्कार की एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका समूह के सदस्यों मे धार्मिक विश्वास को कायम रखना है, क्योंकि किसी समूह के सदस्यों द्वारा संपन्न किये जाने वाले संस्कार या धार्मिक अनुष्ठान उसके धार्मिक विश्वास से घनिष्ठ रूप से जुड़े व उसके अनुरूप होते है, ऐसे मे उन्हें संपन्न करते रहने से ये विश्वास उनमे निरंतर बने रहते है। दूसरे शब्दों मे संस्कार कर्म लोगों मे धार्मिक विश्वासों को परिपुष्ट करते है और उन्हे बनाये रखते है।

हिन्दू संस्कार 

हिन्दुओं मे संस्कारों को बहुत अधिक महत्व दिया जाता। यहां गर्भ से लेकर मृत्यु के बाद तक के लिये अनेक सूक्ष्म संस्कारों की व्यवस्था की गई है। व्यक्ति के जीवन मे कुल कितने संस्कार होते है इस सम्बन्ध मे शास्त्रों मे मतभेद है एवं भिन्नता है। गौतम धर्म सूत्र मे व्यक्ति के लिये 40 संस्कारों का विधान है। इससे भिन्न पारस्कर गृहसूत्र, वाराह गृहसूत्र, मनुस्मृति तथा बौधायन गृहसूत्र मे कुल 13 संस्कारों का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त कुछ धर्म ग्रंथों मे 11 तथा कुछ मे 18 संस्कारों का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार संस्कार अनेक प्रकार के होते है, जिनमे मुख्य संस्कार सोलह (16) है। 

भारतीय संस्कृति मे संस्कारों का अत्यधिक महत्व है। भारतीय मान्यता के अनुसार जन्म से सभी वर्णों के व्यक्ति समान होते है। 

"जन्मना जायेते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते" 

अर्थात जन्म से सभी शुद्र होते है, संस्कारों को पूरा करने के कारण द्विज (अर्थात् ब्रांह्राण, क्षत्रिय और वैश्य) वर्णों के लोग शूद्रों से श्रेष्ठ हो जाते है वास्तव मे संस्कार ही व्यक्ति को मनुष्य बनाते है। संस्कार विहीन पुरूष पशु के समान समझा जाता है।संस्कार से आश्य उन अनुष्ठानों से है जो एक हिन्दू को अपने जीवन को पवित्र और परमार्जित करने की दृष्टि से करने पड़ते है। संस्कार मनुष्य के जीवन मे नई स्थितियों के परिचायक है। मनुष्य के जीवन मे आगे आने वाले विभिन्न स्तरों के उत्तरदायित्व का बोध कराते हुए उसके जीवन को प्रगतिशील व व्यवस्थित करते है। अधिकांश प्रमुख संस्कार जीवन के निर्माणकारी स्तर अर्थात् ब्रह्राचर्य आश्रम के अंतर्गत आते है। इससे स्पष्ट होता है कि इस आश्रम का व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक विकास तथा तत्सम्बन्धी शक्तियों के संचय की दृष्टि से अत्यधिक महत्व है।  

संस्कार व्यक्ति के माँ के गर्भ मे आने के पूर्व से लेकर उसकी मृत्यु के पश्चात तक चलते है। जैसा पूर्व मे कहा गया है कि प्रमुख संस्कार 16 (सोलह) है--

1. गर्भाधान संस्कार 

2. पुंसवन संस्कार 

3. सीमान्तोन्नयन संस्कार 

4. जातकर्म संस्कार 

5. नामकरण संस्कार 

6. निष्क्रमण संस्कार 

7. अन्नप्राशन संस्कार

8. चूड़ाकर्म संस्कार 

9. कर्ण वेधन संस्कार

10. उपनयन संस्कार 

11. वेदारम्भ संस्कार 

12. समावर्तन संस्कार

13. विवाह संस्कार 

14. वानप्रस्थ  

15. संन्यास 

16. अन्त्येष्टि संस्कार।

संस्कारों का समाजशास्त्रीय महत्व 

हिन्दू (सत्य सनातन धर्म) जीवन मे संस्कारों का महत्व इस प्रकार है--

1. संस्कार मानव शुद्धि तथा व्यक्तित्व के विकास मे सहायक है। ये मनुष्य की भौतिक आध्यात्मिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति कर जटिल समस्याओं से परिचित कराते है।

2. संस्कार शिक्षा के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप मे मानव का समाजीकरण करते है। इससे व्यक्ति सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग हो जाता है।

3. संस्कार मानव ज्ञान तथा समस्याओं के समाधान मे सहायक है। ये जैविकीय, मानसिक व सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति मे सहायक है।

4. डाॅ. राजबली पांडेय के अनुसार संस्कार का महत्व आध्यात्मिक शिक्षा के लिए भी है। इसमे संपूर्ण जीवन संस्कारमय हो जाता है।

5. संस्कार नैतिक गुणों जैसे दया, क्षमा तथा समर्पणता के विकास मे सहायक है। 

6. संस्कारों के द्वारा व्यक्ति अपने समाज की सांस्कृतिक परंपराओं तथा आदर्श प्रतिमानों से परिचित हो जाता है।

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