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9/17/2020

पुरुषार्थ का अर्थ, प्रकार या तत्व

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पुरुषार्थ का अर्थ (purusharth kya hai)

purusharth meaning in hindi;पुरुषार्थ का शाब्दिक अर्थ है " पुरूषरथर्यते पुरुषार्थ: " अर्थात् पुरूष के लिये जो अर्थपूर्ण है, जो अभीष्ट है, उसे प्राप्त करने के लिये प्रयास करना पुरुषार्थ है। इस प्रकार पुरुषार्थ से आशय है पुरूष का अर्थ अर्थात् अभीष्ट और इस अभीष्ट की प्राप्ति हेतु उद्यम करना।

भारतीय संस्कृति मे जीवन को एक वास्तविकता के रूप मे स्वीकार किया गया है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो जन्म जन्मांतर चलती है। व्यक्ति  ( अर्थात् जीवात्मा ) कर्मानुसार विभिन्न योनियों मे जन्म लेता है। स्वर्ग और नर्क का भोग करता है। भोग की अवधि समाप्त होते ही जीवात्मा पुनः जीवन-मृत्यु की प्रक्रिया मे शामिल हो जाता है। इसलिए जीवन की सार्थकता इस बात मे नही है कि व्यक्ति अच्छी योनि मे जन्म ले तथा लौकिक सुख अथवा स्वर्गिक सुख का अधिकतम उपभोग करे। जीवन तो वास्तव मे सार्थक तब है जबकि व्यक्ति जीवन मृत्यु के इस चक्र से पूर्णतः मुक्त हो जाए। यह अवस्था ही मोक्ष कहलाती है। जिसे भारतीय संस्कृति मे मानव जीवन का परम लक्ष्य या साध्य निरूपित किया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति मे धर्म, अर्थ और काम साधन है। (गीता, 18:38)। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों तत्वों के सम्यक संयोग से जिस तत्व की सृष्टि होती है उसे पुरुषार्थ कहते है जो हिन्दू जीवन दर्शन का सारभूत तत्व है। जो भी व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थ को नही समझता और जीवन मे उन्हे उतारने के लिये उद्यम नही करता उसका जीवन निरर्थक है।

पुरुषार्थ के तत्व या प्रकार (purusharth ke pirakar)

पुरुषार्थ के क्रमानुसार 4 तत्व है--

1. धर्म 

धर्म वह साधन है जो मनुष्य द्वारा अर्थ  और काम के उपभोग को मर्यादित करता हुआ उसे मोक्ष की ओर ले जाता है। इसलिए धर्म की वैशेषिक सूत्र मे व्याख्या की गई है, जिसके द्वारा अभ्युदय और नि: श्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। वायु पुराण मे भी धर्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है, " स्मृतियों ने कुशल करने वाले कर्म को धर्म तथा अकुशल करने वाले को अधर्म बताया है। धर्म की धारणा और धृति अर्थ होने के कारण जो धारण करता है, जिससे व्यवस्था बनी रहती है उसे धर्म कहा जाता है। जिसमे धारणा नही होती और जिससे महत्व ( सुयश अथवा सम्मान ) प्राप्त नही होता उसे अधर्म कहते है। 

2. अर्थ 

अर्थ को हिन्दू धर्म मे मानव जीवन का दूसरा पुरुषार्थ माना गया है। अर्थ मनुष्य के आर्थिक और राजनीतिक जीवन के संबंध मे तथा प्रभुता और संपत्ति की लालसा के संबंध मे विचार करता है। अर्थ के अन्तर्गत केवल धन का ही समावेश नही है परन्तु ऐसे सभी साधन जो मनुष्य की कामना पूर्ति मे सहायक होते है तथा जिनके प्राप्त करने से समाज पर ऐहिक सत्ता प्रस्थापित होती है अर्थ के अंतर्गत आते है। जिस प्रेरणा से मनुष्य अर्थ अर्जित करता है उसे हम मानव स्वभाव की मूलभूत प्रवृत्ति कहते है।

3. काम 

काम भी एक पुरुषार्थ है। काम का अभिप्राय केवल भोग वासना ही नही है बल्कि इनका संबंध समस्त कामनाओं और इच्छाओं से है जिनसे प्रेरित होकर व्यक्ति कार्य करता है। काम की परिभाषा है -- कम्यते जनैरिति कामः सुखः। मनुष्यों द्वारा जिसकी कामना की जाए, वह काम है तथा यह काम सुख ही है। विचारकों का ऐसा मत है कि यदि कामना ही न हो तो व्यक्ति कार्य के लिए उन्मुख ही न हो। जिसके भीतर कामना नही है उसे धन कमाने की इच्छा होती है न धर्म करने की। कामना के बिना तो व्यक्ति कोई भी काम नही चाहता।

4. मोक्ष 

मोक्ष जीवन का चरम लक्ष्य है। मोक्ष आध्यात्मिक सिद्धि है। मोक्ष आत्मा-मुक्ति है, हमारी आत्मा का नित्य ब्रह्रा मे लीन होना मोक्ष है। मोक्ष प्राप्ति के विभिन्न मार्गों मे तीन प्रधान है-- ज्ञान, भक्ति और कर्म। मोक्ष वह चरम पुरुषार्थ है जो मनुष्य को आवागमन के चक्र से छुटकारा दिलाता है। वैदिक ऋषि संसार के दु:खों से पुर्णतया परिचित थे। परम ज्ञान के साथ ही वे परम सुख की खोज मे लगे थे। यह परम सुख मोक्ष ही है। दु:ख का कारण है अज्ञान और इससे मोक्ष प्राप्त करना ही संसार के आवागमन चक्र से छुटकारा पाना है।

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