3/15/2022

आश्रम व्यवस्था (ashram vyavastha)

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आश्रम व्यवस्था 

आश्रम व्यवस्था का अर्थ/ आश्रम व्यवस्था किसे कहते है?

ashram vyavastha kya thi? ashram vyavastha prakar mahatva;आश्रम शब्द श्रम धातु से निकला है जिसका अर्थ होता है प्रयत्न या परिश्रम। इस प्रकार एक आश्रम तुलनात्मक रूप से श्रम का एक उल्लेखनीय भाग या कर्मस्थली है जिसमे व्यक्ति अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार किन्ही वैयक्तिक व सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति ( या धार्मिक कर्तव्यों के निर्वाह) के लिए प्रयत्न करता है।

आश्रम का अर्थ वैसे चाहे कुछ भी हो, जन समाज मे इसका अर्थ विश्राम स्थान के रूप मे ग्रहण किया गया। उपनिषद्काल मे आर्य लोग जीवन को अनन्त यात्रा मानते है थे, जिसमे स्थान-स्थान पर विश्राम करके आगे बढ़ते थे अथवा आगे बढ़ने की तैयारी करते थे। यह यात्रा मोक्ष की ओर होती थी। लोगों के जीवन का चरम लक्ष्य था मोक्ष की प्राप्ति, जिसके बाद आवागमन के बन्धन से मुक्ति मिल जाती थी। प्रत्येक आश्रम एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमे कुछ अवधि के लिए रूककर व्यक्ति आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान करता था। 

वैदिक व्यवस्था मे मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानी गई है। इन 100 वर्षों को चार बराबर भागों मे विभाजित किया गया है। ये चार भाग इस प्रकार है--

1. ब्रह्राचर्य आश्रम 

2. गृहस्थ आश्रम

3. वानप्रस्थ आश्रम 

4. सन्यास आश्रम।

इन्ही चार भागों को चार आश्रमों की संज्ञा दी गयी है। प्रत्येक आश्रम की अवधि 25 वर्ष मानी गई है। मनुष्य के जीवन के प्रथम 25 वर्ष ब्रह्राचर्य आश्रम, द्वितीय 25 वर्ष अर्थात् 50 वर्ष तक गृहस्थ आश्रम, तीसरे 25 वर्ष अर्थात् 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम तथा अन्तिम 25 वर्ष सन्यास आश्रम के कहलाते है। 

अब हम आश्रम व्यवस्था के इन चारों भागों या प्रकार को विस्तार से समझेंगे। इनका वर्णन व उल्लेख करेंगे।

1. ब्रह्राचर्य आश्रम 

यह आश्रम साधारणतः 25 वर्ष की आयु तक माना गया है। ब्रह्राचर्य आश्रम, विद्या और शक्ति की साधना का आश्रम है। इसमे एक व्यक्ति ब्रह्राचर्य व्रत का पालन करते हुए विभिन्न विद्याओं मे निपुणता प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। मनुष्य का शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास इसी आश्रम मे होता है। ब्रह्राचर्य आश्रम का आयोजन और महत्व विशेष रूप से द्विजों के लिए है जिन्हें विभिन्न वेदशास्त्रों और विद्याओं की साधना की अनुमति है। इस आश्रम मे यज्ञोपवीत या उपनयन संस्कार के पूर्ण होने पर द्विज प्रवेश करता है, जिसकी आयु सामान्यतः 8 से 16 वर्ष की होती है। प्रचीन ग्रन्थों के अनुसार एक ब्राह्मण साधारणतः 8 से 10 वर्ष, क्षत्रिय 10 से 14 वर्ष की और वैश्य 12 से 16 वर्ष की आयु के बीच उपनयन संस्कार के माध्यम से ब्रह्राचर्य आश्रम मे प्रवेश कर सकता है।  

ब्रह्राचर्य जीवन तप और इंद्रिय संयम का जीवन है। मनु के अनुसार ब्रह्राचारी को गुरू के पास रहता हुआ इंद्रियों को वस मे कर तपवृद्वी के लिए नियमों का पालन करे। वह नित्य पूजन करे तथा प्रातः एवं सायंकाल हवन करे। 

ब्रह्राचर्य भोजन के लिए गृहस्थों से भिक्षा प्राप्त करे किन्तु निम्न व पातकी लोगों से तथा साधारणतः अपने कुलबान्धव, जाति व गुरूकुल से भिक्षा प्राप्त न करे। 

वह प्रतिदिन भिक्षा माँगे परन्तु किसी एक का ही अन्न ग्रहण न करे और न ही भोजन का संचय करे। ब्राह्राचारी को गुरू की आज्ञा का पालन करना चाहिए।

2. गृहस्थ आश्रम  

सामाजिक जीवन का आरंभ तथा अन्त इसी आश्रम से होता है। सामाजिक दृष्टिकोण से गृहस्थ आश्रम सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। 

साधारणतः ब्रह्राचर्य आश्रम के समाप्त होने यानि की 25 वर्ष की आयु तक व्यक्ति शरीरिक और मानसिक दृष्टि से इतना समर्थ हो जाता है कि वह जीवन मे अर्थ और काम की उचित साधाना और विभिन्न पारिवारिक व सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर सके। सामान्यतः इस आयु तक व्यक्ति अपनी शिक्षा पूर्ण कर विवाह करके, गृहस्थ मे प्रवेश करता है। जीवन की यही 25 से 50 वर्ष का भाग गृहस्थाश्रम कहलाता है। 

इस आश्रम मे प्रवेश करने के पश्चात व्यक्ति सन्तान उत्पन्न करता है। वह अपनी पत्नी तथा बच्चों का पालन-पोषण करता है। इस आश्रम मे रहकर व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा करता है। उन्हें सभी तरह से सन्तुष्ट रखता है। इस आश्रम मे व्यक्ति पितृ यज्ञ करता है। पितृ यज्ञ एक महत्वपूर्ण यज्ञ कहलाता है। गृहस्थ आश्रम मे व्यक्ति अनेक व्यक्तियों को भोजन कराता है। अनेक प्राणी गृहस्थ के सहारे जीवित रहते है। इसी कारण यह आश्रम सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इस आश्रम मे व्यक्ति के 2 महत्वपूर्ण कर्तव्य बताए गए है। प्रथम प्रकार के कर्तव्यों का सम्बन्ध धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षा से है। द्वितीय प्रकार के कर्तव्यों का सम्बन्ध विभिन्न ऋणों से उऋण होना है। विभिन्न प्रकार के यज्ञ करके ही एक व्यक्ति इन ऋणों से उऋण हो सकता है। 

मनु के अनुसार जिस प्रकार सब लोग वायु के सहारे जीवित रहते है, उसी प्रकार सब आश्रम गृहस्थाश्रम के सहारे निर्वाह करते है। गृहस्थाश्रम के इस महत्व को देखते हुए मनु ने इसे सभी आश्रमों मे श्रेष्ठ निरूपित किया है। 

यस्मात्त्रयोउप्याश्रमिणो ज्ञानेनात्रेन चान्वहम्।

गृहस्थेनैव धार्यन्ते तत्याज्जेष्ठाश्रमों गृही।। (मनुस्मृति, 2:78)।

3. वानप्रस्थ आश्रम

50 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद वानप्रस्थ आश्रम मे प्रवेश करता है। यह गृहस्थाश्रम के बाद की स्थिति है। मनु के अनुसार गृहस्थाश्रम व्यतीत करने के पश्चात जब व्यक्ति के बाल पक जायें, चेहरे पर झुरियाँ दिखाई पड़ने लगें, उसके प्रौत्र उत्पन्न हो जायें तब वह विषयों से रहित होकर वन का आश्रय ले। यदि उसकी पत्नी उसके साथ जाना चाहे तो ले जाए अन्यथा उसे पुत्रों के उत्तरदायित्व पर छोड़ दें। उसे अपने साथ कोई भी गृह सम्पत्ति नही ले जानी चाहिए। अपने साथ अग्निहोत्र तथा तथा उसकी सामग्री लेकर अपने ग्राम का त्याग करे। जटा, दाढ़ी, मूँछ और नख धारण करे तथा प्रातः फल एवं मूल का सेवन करे। साधारणतः वानप्रस्थी को बस्तियों मे केवल भिक्षा के लिए ही जाना चाहिए। वर्षा के अतिरिक्त वानप्रस्थी को किसी ग्राम मे एक से अधिक रात्रि के लिए विश्राम नही करना चाहिए।

4. सन्यास आश्रम 

सन्यास शब्द का अर्थ है- 'सम्यक रूप से त्याग'-- 

सम्यक न्यासः प्रतिग्रहाणां सन्यासः।' (बौधायन घ. सू. 10.1)। 

लेकिन भौतिक पदार्थों का त्याग मात्र सन्यास नहीं है बल्कि यह राग-द्वेष, मोह-माया जैसे आन्तरिक भावों का त्याग भी है। 

भगवद्गीता (5.3) में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सन्यासी वह है जो न किसी से द्वेष करता है और न ही स्नेह 

'ज्ञेयः स नित्यं संन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।'

महाभारत में ही लिखा है कि सन्यासी की दृष्टि में पाषाण और कांचन, शत्रु मित्र उदासीन आदि सब समान होते है। 

गृह्यसूत्रों एवं धर्मसूत्रों में सन्यास आश्रम का उल्लेख न होने की वजह से रीज डेविड जैसे कुछ विद्वानों की मान्यता है कि इसका प्रचलन बुद्ध काल के बाद ही हुआ होगा लेकिन डाॅ. रोमिला थापर ने सन्यास अथवा योग के इतिहास को प्राक्-इतिहासकालीन माना है तथा हड़प्पा संस्कृति से प्राप्त पशुपति की मुहर को इसका प्रारम्भिक चरण दिखाया है। डाॅ. रोमिला थापर ने सन्यास अपनाने वाले दो वर्गों का उल्लेख किया है-- एक वह जो व्यक्तिगत रूप से अपने को पूर्णतः अलग करके सन्यासी हो जाता था और दूसरा वह जो संसार त्यागियों के समूह में मिलकर रहता था। पहला वर्ग योगी का था और दूसरा वर्ग त्यागी का ऐसे त्यागी सन्यासी की श्रेणी से सम्बन्धित थे किन्तु पहले वर्ग के योगी समाज में विरले ही पाये जाते सन्यासी के कर्तव्यों का उल्लेख करते हुए मनुस्मृति में कहा गया है कि इसमें व्यक्ति यज्ञोपवीत शिक्षा आदि चिह्नों तथा पंचमहायज्ञ के लिए स्वीकृत गृहाग्नि का त्यागकर गेरुआ (काषाय) वस्त्र धारण करता था। वह निरपेक्ष तथा एकाकी जीवन बिताये इन्द्रियों को विषयों से दूर करने के लिए अल्पभोजन तथा एकान्तवास करे दिन में केवल एक बार भिक्षा ग्रहण करें गाँव में एक दिन तथा नगर में पाँच दिन से अधिक न रुके, अहिंसा को अपनाते हुए सभी प्राणियों के परोपकार के लिए कार्य करे। इस तरह समूचा विश्व उसका अपना परिवार तथा आत्मा की खोज और मोक्ष की प्राप्ति करना उसका लक्ष्य बन जाता था।

आश्रम व्यवस्था की प्रासंगिकता या महत्व 

मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी पृष्ठ क्रमांक 43 के अनुसार  यह एक निर्विवाद सत्य है कि व्यक्ति सभी आयु मे समान प्रकार के कार्यों का सम्पादन नही कर सकता। आश्रम व्यवस्था आयु के अनुसार कार्यों का एक वैज्ञानिक विभाजन प्रस्तुत करती है और इस प्रकार विभिन्न आयु के व्यक्ति से जो सर्वोत्तम सेवा प्राप्त की जा सकती है, उसे प्राप्त करने का प्रयास करती है। ब्रह्राचर्य जीवन ज्ञान और शक्ति के संचय का जीवन है। गृहस्थ जीवन मे आकार व्यक्ति इस संचित शक्ति का विभिन्न क्षेत्रों मे रचनात्मक सदुपयोग करता है। वानप्रस्थ के रूप मे वह इंद्रिय और मन को वश मे करते हुए अपने अनुभवों से समाज को संचालित करता है और संन्यास आश्रम मे आकार ज्ञान, तप और सेवा से जगत को आलोकित करता है। इस प्रकार आश्रम व्यवस्था जीवन के परस्पर संबंधित भागों का समनवित सर्वागीण चित्र प्रस्तुत करती है। विभिन्न आश्रम, धर्मों के रूप मे समाज के सभी व्यक्तियों मे सहयोग और सद्भाव स्थापित करते है। ब्राह्राचारी के रूप मे शेष सब मिलकर व्यक्ति का विकास करते है, जो आगे चलकर गृहस्थ के रूप मे सबका पालन करता है। क्रियाशक्ति के क्षीण होते ही एक गृहस्थ गृहस्थ के रूप मे सबका पालन करता है। क्रियाशक्ति के क्षीण होते ही गृहस्थ अपने को संयमित कर अपने अनुभव, ज्ञान व सेवा से एक वानप्रस्थी व संन्यासी के रूप मे सबकी सेवा करता है। आश्रम व्यवस्था एक  महत्वपूर्ण लाभ यह है कि यह विभिन्न आयु वर्गों के बीच परस्पर सहयोग और सद्भाव का विकास करती है। अलग आश्रमों मे अलग कर्तव्य से बँधे होने से कुर्सी या अधिकार से चिपके रहने की प्रवृत्ति का उन्मूलन होता है। जब व्यक्ति की क्रियाशक्ति क्षीण हो जाती है तो उसे अधिकार और पद से पृथक होना ही चाहिए जिससे आने वाले व्यक्तियों को कार्य करने का स्वतंत्र अवसर उपलब्ध हो सके। जब व्यक्ति की कार्य क्षमता का ह्रास हो जाता है तब उसके पद से चिपके रहने का अर्थ अधिकार और शक्ति के दुरूपयोग या दूसरों के शोषण से अधिक और क्या हो सकता है? ऐसी स्थिति मे वह क्रिया शक्ति से नही अपितु अनुभव शक्ति से समाज को लाभान्वित कर सकता है। परिणामस्वरूप, व्यावहारिक जीवन से संबंधित समस्त पदों का परित्याग कर देना व्यक्ति का एक सामाजिक व नैतिक दायित्व हो जाता है। निश्चित रूप से ऐसी अवस्था मे अध्यापन, मार्गदर्शन और रचनात्मक सेवा कार्य ही व्यक्ति के जीवन के अंग हो सकते है। इसका यह अर्थ नही है कि बाद की आयु मे व्यक्ति का कोई सामाजिक प्रयोजन नही होता। समाज की प्रक्रिया तथा समाज के निर्माण मे वह प्रत्यक्ष नही अपितु अप्रत्यक्ष रूप से योग देता है।

आश्रम व्यवस्था व्यक्ति के सम्मुख एक अनुशासित जीवन प्रस्तुत करती है।

यह जानकारी आपके के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी

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