9/07/2020

धर्म अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं या लक्षण

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dharm meaning in hindi;मनुष्य के मस्तिष्क मे इस प्रकार के स्वाभाविक प्रश्न पैदा होते थे कि प्राकृतिक घटनाओं का संचालन कौन करता है? पानी क्यों गिरता हैं? बिजली क्यों कौंधती है? आदि इसी प्रकार के अनेक प्रश्न उसके मस्तिष्क मे पैदा होते थे। इसके साथ ही वह ऐसे प्रयास भी करता था जिनसे प्राकृतिक शक्तियों से अपनी रक्षा कर सके। इस सबका परिणाम यह हुआ कि वह परिस्थितियों के मध्य अपने को असहाय मानने लगा। ज्ञान के अभाव मे वह इस प्रकार की धारणाएं विकसित करने लगा कि इन घटनाओं का संचालन एक ऐसी शक्ति के माध्यम से होता है, जो मनुष्य से परे है। शक्ति का रूप स्वीकार करने के बाद मनुष्य ने उस शक्ति मे पूजा, आराधना, जैसे कार्यों को विकसित किया और इस प्रकार धर्म नामक संस्था का जन्म हुआ। आगे जानेंगे धर्म क्या है? धर्म किसे कहते है? धर्म का अर्थ, धर्म की परिभाषा और धर्म की विशेषताएं। नीचे धर्म के स्वरूप और कार्य भी दिए गए है।

धर्म का अर्थ (dharm kya hai)

dharm ka arth;धर्म से मोटे तौर पर आश्य अलौकिक शक्ति पर विश्वास है। अलौकिक हम उसे कहते है जो लौकिक जगत से परे है। इंद्रियगम्य नही है। जो अगम और अगोचर है।" बिनु पग चलै, सुनै बिनु काना। कर बिनु कर्म करै विधि नाना"।  जिसे हम स्पर्श नही कर सकते, जिसे हम देख नही सकते, किन्तु उसका अस्तित्व है। वह सर्वशक्तिमान है और मानव जीवन व जगत को नियंत्रित करता है। यदि अलौकिक शक्ति साकार अर्थात् इंद्रिय गम्य है तो भी वह मानव की समझ और नियंत्रण से परे है।
प्राय: धर्म का अर्थ होता है धारण करना। हिन्दू समाज मे धर्म की मान्यता इस प्रकार है " धारणात धर्ममाहुः" अर्थात् धारण करने के कारण ही किसी वस्तु को धर्म कहा जाता है। बोसांके ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि " जहाँ धर्मपरायणता, अनुशक्ति एवं भक्ति मिलती है, वही धर्म का प्राथमिक रूप प्राप्त हो जाता है।

धर्म की परिभाषा (dharm ki paribhasha)

मजूमदार और मदन के अनुसार "धर्म किसी भय की वस्तु अथवा शक्ति का मानवीय परिणाम है, जो पारलौकिक है इन्द्रियों से परे है। यह व्यवहार की अभिव्यक्ति तथा अनुकूलन का रूप है, जो लोगों को अलौकिक शक्ति की धारणा से प्रभावित करता है।"
डाॅ. राधाकृष्णन " धर्म की अवधारणा के अन्तर्गत हिन्दू उन स्वरूपों और प्रतिक्रियाओं को लाते है जो मानव-जीवन का निर्माण करती है और उसको धारण करती है।"
गिलिन और गिलिन " धर्म के समाजशास्त्रीय क्षेत्र के अन्तर्गत एक समूह मे अलौकिक से सम्बंधित उद्देश्यपूर्ण विश्वास तथा इन विश्वासों से सम्बंधित बाहरी व्यवहार, भौतिक वस्तुएँ और प्रतीक आते है।"
फ्रेजर " धर्म से मेरा तात्पर्य मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि अथवा आराधना करना है जिनके बारे मे व्यक्तियों का विश्वास हो कि वे प्रकृति और मानव-जीवन को नियंत्रित करती है तथा उनको निर्देश देती है।"
टेलर " धर्म का अर्थ किसी आध्यात्मिक शक्ति मे विश्वास करना है।
दुर्खीम " धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बंधित विश्वासों और आचरणों की समग्रता है जो इन पर विश्वास करने वाले को एक नैतिक समुदाय के रूप मे संयुक्त करती है।
होबेल " धर्म अलौकिक शक्ति के ऊपर विश्वास मे आधारित है, जो आत्मवाद और मानव को सम्मिलित करता है।"
मैलिनोवस्की " धर्म क्रिया का एक ढंग है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी, और धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।
होनिगशीम " प्रत्येक मनोवृत्ति जो इस विश्वास पर आधारित या इस विश्वास से सम्बंधित है कि अलौकिक शक्तियों का अस्तित्व है और उनसे सम्बन्ध स्थापित करना सम्भव व महत्वपूर्ण है,  धर्म कहलाती है।"
ऑगबर्न और निमकाॅक " धर्म मानवोपरि शक्तियों के प्रति अभिवृत्तियाँ है।"
जाॅनसन " एक धर्म प्राणियों, शक्तियों, स्थान अथवा अन्य वस्तुओं की अलौकिक व्यवस्था से सम्बंधित विश्वासों एवं व्यवहारों की अधिक या कम साम्यपूर्ण व्यवस्था है।"
पाॅल टिलिक " धर्म वह है, जो अन्ततः हमसे सम्बंधित है।"

धर्म की विशेषताएं या लक्षण (dharm ki visheshta)

1. शक्ति मे विश्वास
धर्म की पहली विशेषता यह है कि यह शक्ति मे विश्वास पर आधारित है। धर्म शक्ति पर आधारित है वह मनुष्य निर्मित न होकर प्राकृतिक होता है।
2. दिव्य चरित्र
धर्म से जिस शक्ति मे विश्वास किया जाता है, उसकी प्रकृति अलौकिक होती है। चूंकि यह चरित्र दिव्य होता है, अतः मानव समाज से परे होती है।
3. पवित्रता का पत्र
सामाजिक जीवन के तत्वों को दो भागों मे विभाजित किया जा सकता है- पवित्र और अपवित्र। धर्म मे सिर्फ उन्ही तत्वों को महत्व प्रदान किया जाता है, जो पवित्रता की अवधारणा से सम्बंधित होते है।
4. सैद्धांतिक व्यवस्था
सैद्धांतिक व्यवस्था भी धर्म का अनिवार्य तत्व है इसका कारण यह है कि प्रत्येक धर्म की एक सैद्धांतिक व्यवस्था होती है। इस सैद्धान्तिक व्यवस्था की सहायता से धर्म को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जाता है।
5. निश्चित प्रतिमान
प्रत्येक धर्म के कुछ निश्चित प्रतिमान होते है। ये प्रतिमान ईश्वरीय रक्षा का प्रतिनिधित्व करते है। यही कारण है कि व्यक्ति इन प्रतिमानों का आदर करता है तथा इन प्रतिमानों के आधार पर अपने व्यवहार का निर्धारण करता है।
6. मूल्यात्मक व्यवस्था
धर्म समाज मे मूल्यों की एक व्यवस्था का निर्धारण करता है। यही कारण है कि धर्म को मूल्य और भावनाओं के आधार पर समझने का प्रयास किया जाता है। तर्क और विवेक को धर्म मे कोई स्थान नही है।
7. धार्मिक चेतना
प्रत्येक धर्म अपने मे धार्मिक चेतना को विकसित करता है। धार्मिक चेतना के कारण ही व्यक्ति धर्म का आदार करता है। आज संसार मे जो अनेक धर्म पाए जाते है, उनका जन्म और विकास धार्मिक चेतना के कारण ही हुआ है।
8. कर्मकांड
धर्म से संबंध की अभिव्यक्ति पूजा पाठ, प्रार्थना या कर्मकांड के रूप मे होती है। प्रत्येक धर्म की मान्यताएं, विश्वास एवं पौराणिक गाथाओं के अनुसार कर्मकांड होता है। यहि वजह है कि विभिन्न धर्मों के कर्मकांडों मे भिन्नता दिखाई पड़ती है।
9. धार्मिक मान्यताएं 
प्रत्येक समाज के धर्म की अपनी अलग-अलग मूल्य एवं मान्यताएं है, यही मान्यताएं धर्म को एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है। यहि कारम है कि लोग समस्याओं एवं कठिनाइयों मे भी धर्म पर विश्वास करके साहस व धैर्य से कार्य करते है।
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