3/10/2022

धर्म का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं या लक्षण

By:   Last Updated: in: ,

dharm ka arthparibhasha visheshta;मनुष्य के मस्तिष्क मे इस प्रकार के स्वाभाविक प्रश्न पैदा होते थे कि प्राकृतिक घटनाओं का संचालन कौन करता है? पानी क्यों गिरता हैं? बिजली क्यों कौंधती है? आदि इसी प्रकार के अनेक प्रश्न उसके मस्तिष्क मे पैदा होते थे। इसके साथ ही वह ऐसे प्रयास भी करता था जिनसे प्राकृतिक शक्तियों से अपनी रक्षा कर सके। इस सबका परिणाम यह हुआ कि वह परिस्थितियों के मध्य अपने को असहाय मानने लगा। ज्ञान के अभाव मे वह इस प्रकार की धारणाएं विकसित करने लगा कि इन घटनाओं का संचालन एक ऐसी शक्ति के माध्यम से होता है, जो मनुष्य से परे है। शक्ति का रूप स्वीकार करने के बाद मनुष्य ने उस शक्ति मे पूजा, आराधना, जैसे कार्यों को विकसित किया और इस प्रकार धर्म नामक संस्था का जन्म हुआ। आगे जानेंगे धर्म क्या है? धर्म किसे कहते है? धर्म का अर्थ, धर्म की परिभाषा और धर्म की विशेषताएं। नीचे धर्म के स्वरूप और कार्य भी दिए गए है।

धर्म का अर्थ (dharm kya hai)

धर्म शब्द संस्कृत भाषा के 'धृ' से बना है जिसका अर्थ है किसी वस्तु को धारण करना अथवा उस वस्तु के अस्तित्व को बनाये रखना। 
धर्म का सामान्य अर्थ कर्तव्य है। इसीलिए व्यक्ति के जीवन से संबंधित अनेक आचरणों की एक संहिता है जो उसके कर्तव्यों और व्यवहारों को नियंत्रित और निर्देशित करती है। उसका मार्ग-दर्शन करती है जिससे कि वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
हिन्दू समाज मे धर्म की मान्यता इस प्रकार है "धारणात धर्ममाहुः" अर्थात् धारण करने के कारण ही किसी वस्तु को धर्म कहा जाता है। 
बोसांके ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि " जहाँ धर्मपरायणता, अनुशक्ति एवं भक्ति मिलती है, वही धर्म का प्राथमिक रूप प्राप्त हो जाता है।
धर्म से मोटे तौर पर धर्म से आश्य अलौकिक शक्ति पर विश्वास है। अलौकिक हम उसे कहते है जो लौकिक जगत से परे है। इंद्रियगम्य नही है। जो अगम और अगोचर है।
"बिनु पग चलै, सुनै बिनु काना। 
कर बिनु कर्म करै विधि नाना।।" 
जिसे हम स्पर्श नही कर सकते, जिसे हम देख नही सकते, किन्तु उसका अस्तित्व है। वह सर्वशक्तिमान है और मानव जीवन व जगत को नियंत्रित करता है। यदि अलौकिक शक्ति साकार अर्थात् इंद्रिय गम्य है तो भी वह मानव की समझ और नियंत्रण से परे है।

धर्म की परिभाषा (dharm ki paribhasha)

विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई धर्म की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं--
मजूमदार और मदन के अनुसार, "धर्म किसी भय की वस्तु अथवा शक्ति का मानवीय परिणाम है, जो पारलौकिक है इन्द्रियों से परे है। यह व्यवहार की अभिव्यक्ति तथा अनुकूलन का रूप है, जो लोगों को अलौकिक शक्ति की धारणा से प्रभावित करता है।"
डाॅ. राधाकृष्णन, " धर्म की अवधारणा के अन्तर्गत हिन्दू उन स्वरूपों और प्रतिक्रियाओं को लाते है जो मानव-जीवन का निर्माण करती है और उसको धारण करती है।"
गिलिन और गिलिन, " धर्म के समाजशास्त्रीय क्षेत्र के अन्तर्गत एक समूह मे अलौकिक से सम्बंधित उद्देश्यपूर्ण विश्वास तथा इन विश्वासों से सम्बंधित बाहरी व्यवहार, भौतिक वस्तुएँ और प्रतीक आते है।"
फ्रेजर, " धर्म से मेरा तात्पर्य मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि अथवा आराधना करना है जिनके बारे मे व्यक्तियों का विश्वास हो कि वे प्रकृति और मानव-जीवन को नियंत्रित करती है तथा उनको निर्देश देती है।"
टेलर, " धर्म का अर्थ किसी आध्यात्मिक शक्ति मे विश्वास करना है।"
दुर्खीम, " धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बंधित विश्वासों और आचरणों की समग्रता है जो इन पर विश्वास करने वाले को एक नैतिक समुदाय के रूप मे संयुक्त करती है।"
होबेल, " धर्म अलौकिक शक्ति के ऊपर विश्वास मे आधारित है, जो आत्मवाद और मानव को सम्मिलित करता है।"
मैलिनोवस्की, " धर्म क्रिया का एक ढंग है और साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी, और धर्म एक समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।"
होनिगशीम, " प्रत्येक मनोवृत्ति जो इस विश्वास पर आधारित या इस विश्वास से सम्बंधित है कि अलौकिक शक्तियों का अस्तित्व है और उनसे सम्बन्ध स्थापित करना सम्भव व महत्वपूर्ण है,  धर्म कहलाती है।"
ऑगबर्न और निमकाॅक, " धर्म मानवोपरि शक्तियों के प्रति अभिवृत्तियाँ है।"
जाॅनसन, " एक धर्म प्राणियों, शक्तियों, स्थान अथवा अन्य वस्तुओं की अलौकिक व्यवस्था से सम्बंधित विश्वासों एवं व्यवहारों की अधिक या कम साम्यपूर्ण व्यवस्था है।"
पाॅल टिलिक " धर्म वह है, जो अन्ततः हमसे सम्बंधित है।"
उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि धर्म किसी-न - किसी प्रकार की अतिमानवीय (Super-human) या अलौकिक (Super-natural) या समाजोपरि (Supra-social) शक्ति पर विश्वास है जिसका आधार भय, श्रद्धा भक्ति और पवित्रता की धारणा है और जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना, पूजा या आराधना आदि के रूप में की जाती है।

धर्म की विशेषताएं या लक्षण (dharm ki visheshta)

धर्म की विशेषताएं अथवा लक्षण निम्नलिखित है-- 
1. शक्ति मे विश्वास
धर्म की पहली विशेषता यह है कि यह शक्ति मे विश्वास पर आधारित है। धर्म शक्ति पर आधारित है वह मनुष्य निर्मित न होकर प्राकृतिक होता है।
2. दिव्य चरित्र
धर्म से जिस शक्ति मे विश्वास किया जाता है, उसकी प्रकृति अलौकिक होती है। चूंकि यह चरित्र दिव्य होता है, अतः मानव समाज से परे होती है।
3. पवित्रता का पत्र
सामाजिक जीवन के तत्वों को दो भागों मे विभाजित किया जा सकता है- पवित्र और अपवित्र। धर्म मे सिर्फ उन्ही तत्वों को महत्व प्रदान किया जाता है, जो पवित्रता की अवधारणा से सम्बंधित होते है।
4. सैद्धांतिक व्यवस्था
सैद्धांतिक व्यवस्था भी धर्म का अनिवार्य तत्व है इसका कारण यह है कि प्रत्येक धर्म की एक सैद्धांतिक व्यवस्था होती है। इस सैद्धान्तिक व्यवस्था की सहायता से धर्म को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया जाता है।
5. निश्चित प्रतिमान
प्रत्येक धर्म के कुछ निश्चित प्रतिमान होते है। ये प्रतिमान ईश्वरीय रक्षा का प्रतिनिधित्व करते है। यही कारण है कि व्यक्ति इन प्रतिमानों का आदर करता है तथा इन प्रतिमानों के आधार पर अपने व्यवहार का निर्धारण करता है।
6. मूल्यात्मक व्यवस्था
धर्म समाज मे मूल्यों की एक व्यवस्था का निर्धारण करता है। यही कारण है कि धर्म को मूल्य और भावनाओं के आधार पर समझने का प्रयास किया जाता है। तर्क और विवेक को धर्म मे कोई स्थान नही है।
7. धार्मिक चेतना
प्रत्येक धर्म अपने मे धार्मिक चेतना को विकसित करता है। धार्मिक चेतना के कारण ही व्यक्ति धर्म का आदार करता है। आज संसार मे जो अनेक धर्म पाए जाते है, उनका जन्म और विकास धार्मिक चेतना के कारण ही हुआ है।
8. कर्मकांड
धर्म से संबंध की अभिव्यक्ति पूजा पाठ, प्रार्थना या कर्मकांड के रूप मे होती है। प्रत्येक धर्म की मान्यताएं, विश्वास एवं पौराणिक गाथाओं के अनुसार कर्मकांड होता है। यहि वजह है कि विभिन्न धर्मों के कर्मकांडों मे भिन्नता दिखाई पड़ती है।
9. धार्मिक मान्यताएं 
प्रत्येक समाज के धर्म की अपनी अलग-अलग मूल्य एवं मान्यताएं है, यही मान्यताएं धर्म को एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है। यहि कारम है कि लोग समस्याओं एवं कठिनाइयों मे भी धर्म पर विश्वास करके साहस व धैर्य से कार्य करते है।
10. निषेध 
प्रत्येक धर्म में लोगों के व्यवहारों के नकारात्मक पक्ष को प्रभावित करने की दृष्टि से कुछ निषेध पाए जाते हैं। निषेध का तात्पर्य यही है कि उन्हें कुछ कार्यों की मनाही की जाती है, उन्हें बताया जाता है कि क्या-क्या नहीं करना चाहिए, जैसे झूठ नहीं बोलना चाहिए, दुराचार, व्याभिचार, बेईमानी आदि नहीं करनी चाहिए। कुछ निषेध सभी धर्मों में समान रूप से पाए जाते है। जबकि कुछ विशेष समाजों से ही संबंधित होते हैं। विवाह संबंधी निषेध प्रत्येक समाज में अलग-अलग पाए जाते हैं। 
11. धार्मिक संस्तरण 
सामन्यतः प्रत्येक धर्म से संबंधित संस्तरण की एक व्यवस्था पाई जाती है। जिन लोगों को धार्मिक क्रियाएँ अथवा कर्मकांड कराने का समाज द्वारा विशेष अधिकार प्राप्त होता है, उन्हें अन्य लोगों की तुलना में संस्कारात्मक दृष्टि से उच्च एवं पवित्र समझा जाता है। ऐसे लोगों में पंडे, पुजारी, महंत, संत, पादरी, मौलवी ओझा आदि आते हैं। संस्तरण की प्रणाली में दूसरा स्थान उन लोगों को प्राप्त होता है जो धर्म के अंतर्गत बताए गए मार्ग पर चलते हैं। जो लोग धार्मिक आदेशों का पालन नहीं करते, धर्म विरुद्ध कार्य करते है। अथवा अपवित्रता लाने वाली वस्तुओं के संपर्क में आते हैं, उन्हें समाज में निम्नतम स्थान होता है।

धर्म और जादू 

धर्म मानता है कि कुछ आत्माएँ और देवता प्रकृति का संचालन करते हैं। इनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इनको संतुष्ट करना चाहिए, इन्हें अपने अनुकूल बनाना चाहिए तथा इनकी पूजा करनी चाहिए। ये आत्माएँ आशीर्वाद भी दे सकती हैं ओर अभिशाप भी। इस कारण इन आत्माओं और देवताओं में स्वतंत्रता और इच्छा शक्ति का गुण माना जाता है। परन्तु दूसरी ओर जादू एक निर्वैयक्तिक शक्ति है जिसे विधिपूर्वक चला कर ही प्रयोग में लाया जा सकता है। निर्वैयक्तिक शक्ति के मामले में इच्छा शक्ति की कोई भूमिका नहीं होती। जादू सफल होना चाहिए। वह केवल तभी असफल होता है जब सही तरीके से न किया जाए था उस पर कोई और शक्तिशाली जादू की तोड़ न की जाए। फ्रेजर (1920) का विश्वास था कि सभी जादू कारण और प्रभाव के बीच सहानुभूति के नियम पर आधारित होते हैं। फ्रेज़र ने जादू की क्रिया के दो सिद्धांतों के विषय में चर्चा की। पहला समानता का सिद्धांत और दूसरा स्पर्श का सिद्धांत। पहले सिद्धांत पर आधारित जादू को वह होमियोपैथिक या सदृश अनुकारक जादू कहते हैं और दूसरे सिद्धांत पर आधारित जादू को संसर्गी जादू कहते हैं। होमियोपैथिक जादू में शत्रु का नाश करने के लिए उसकी प्रतिकृति को नष्ट करते हैं। और संसगीं जादू में शत्रु, के शरीर से निकाले गए भाग जैसे नाखून या बालों पर जादू किया जाता है। परन्तु जादू सदा विनाशकारी नहीं होता। वास्तव में वह केवल एक प्रतीकात्मक क्रिया होती है जिसमें एक घटनाक्रम को पूरा किया जाता है। जादू का अर्थ प्रतीकात्मक रूप में इच्छाओं की अभिव्यक्ति करना होता है।

धर्म और समाज 

धर्म को मानव के सामाजिक तथा व्यक्तिगत जीवन के उस पक्ष के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें मानव की उदात्त आकांक्षाएँ होती हैं। यह समाज की नियामक संरचना का आधार स्तम्भ है। यह समाज की सभी नैतिक मान्यताओं, मूल्यों और आचार की मर्यादा रखता है। इस प्रकार यह समाज में सार्वजनिक व्यवस्था का आधार है और सभी नर-नारियों के लिए अन्तःचेतना का उद्गम है। यह मानव में श्रेष्ठ गुणों का संचार कर उसे सभ्य बनाता है। लेकिन साथ ही मानव को आगे बढ़ने में यह उसके सामने बाधाएँ भी उपस्थित करता है। मनुष्य जाति पर इसका सबसे बुरा प्रभाव यह देखने में आया है कि यह मनुष्य को कट्टरपंथी, असहिष्णु, अज्ञानी, अंधविश्वासी और रूढ़िवादी बना देता है। (ओ. डेअ. टी. एफ. 1966 ) 
समाज के सदस्यों को एक सूत्रबद्ध करने के लिए धर्म सबसे दृढ़ सूत्र है। परंतु इसके कारण ही धार्मिक युद्ध तथा सांप्रदायिक तनाव भी पैदा हुए हैं। फिर भी हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि समाज में सांप्रदायिक तनाव के कारणों में अधार्मिक मामले और ऐसे स्वार्थों के टकराव भी होते हैं जिनका धर्म से कोई संबंध नहीं होता। उदाहरण के लिए भारतीय समाज में होने वाले सांप्रदायिक तनावों को देखा जा सकता है। 
अधिकांश लोग धर्म को विश्वव्यापी मानते हुए इसे समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था मानते हैं। परंतु मार्क्सवादी विचारकों की दृष्टि में धर्म समाज का आवश्यक अंग नहीं है। 
कार्ल मार्क्स के शब्दों में," धर्म दलित वर्ग की आह है, निर्दयी विश्व की भावना है और निष्प्राण स्थितियों की आत्मा है। यह जनता के लिए अफीम का काम करता हैं।" 
उनका विश्वास था कि धर्म का विश्वास शोषित लोगों के दिमाग में गरीबी और शोषण का उत्पीड़न सहने के लिए अफीम के रूप में काम करता है। 
अतः मानव समाज को तब तक इसकी आवश्यकता रहती है जब तक कि वह समाज के उच्च वर्ग द्वारा दलित और शोषित होता रहता है। समाजवादी समाज में इसकी कोई आवश्यकता नहीं होगी और यही सामाजिक विकास का अंतिम चरण होगा।

धर्म और आस्था 

सभी धर्मों के मूल में आस्था की संकल्पना होती है। इस दृष्टि से धर्म, आस्था का बाह्य रूप है जो मानव समाज को उनके मूल लौकिक और लोकोत्तर जीवन से बाँधे रखता है। आस्था के कारण ही मानव अन्य जीवधारियों से भिन्न है। निश्चित रूप से यह व्यक्ति निष्ठ और निजी मामला है। हम एक दूसरे के विश्वासों का आदर करते हैं। इससे हमें व्यापक मानवीय आधार प्राप्त होता है। 
इस प्रकार हम सबको एक सूत्र में बाँधे रखने के कारण आस्था, तर्क से अधिक महत्वपूर्ण है। 
प्राचीन भारतीय चिंतनधारा के अनुसार, " आस्था ही आदमी को बनाती है जैसी आस्था वैसा व्यक्ति" (भगवद् गीता)। 
बुद्ध धर्म के ग्रंथों में आस्था को मानव की पाँच कार्य शक्तियों में से एक माना गया है। (अन्य कार्य शक्तियाँ हैं ऊर्जा, मननशीलता, एकाग्रता और पूर्ण ज्ञान)। 
आर. पाणिकर के अनुसार," आस्था मूलधार है और सभी मानव संबंध उसमें निहित हैं। यह एक प्रकार की प्रेमावस्था भी है। अपनी आस्था के माध्यम से आस्थावान अपने विचारों का आदान-प्रदान करता है और नास्तिक के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है। इस प्रकार मानव अपने दैनिक जीवन में एक सूत्रबद्ध हो जाता है।
यह भी पढ़ें; धर्म के स्वरूप, कार्य,उपयोगिता या महत्व 
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;आश्रम व्यवस्था (ashram vyavastha)
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; वर्ण व्यवस्था क्या है?
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; कर्म अर्थ, प्रकार, तत्व, सिद्धांत
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए;पुरुषार्थ का अर्थ, प्रकार या तत्व
आपको यह जरूर पढ़ना चाहिए; संस्कार अर्थ, परिभाषा, महत्व, प्रकार

4 टिप्‍पणियां:
Write comment

आपके के सुझाव, सवाल, और शिकायत पर अमल करने के लिए हम आपके लिए हमेशा तत्पर है। कृपया नीचे comment कर हमें बिना किसी संकोच के अपने विचार बताए हम शीघ्र ही जबाव देंगे।