8/24/2020

उपभोक्ता प्रबंधन का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं, महत्व

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upbhokta prabandhan meaning in hindi;आज विपणन उपभोक्ता-अभिमुखी है एवं उपभोक्ता को राजा माना जाता है। उपभोक्ता की आवश्यकता अथवा प्रेरणा को ध्यान मे रखकर ही वस्तु बनायी जाती है तथा उसकी ब्राण्ड व पैकेजिंग का तरीका निश्चित किया जाता है।
उपभोक्ता की आय, शिक्षा, रोजगार, आयु एवं आर्थिक स्थिति का भी विपणन पर प्रभाव पड़ता है। अगर इसमे परिवर्तन हो जाता है तो उनके व्यवहार मे परिवर्तन हो जाता है एवं विपणन नीतियाँ ही नही बदलनी पड़ती है, वरन् पूरे विपणन ढांचे को ही परिवर्तित करना पड़ जाता है।
उपभोक्ता का बदलता हुआ फैशन भी विपणन के तरीकों पर प्रभाव डालता है। नयी-नयी वस्तुएं निर्माण मे योग देती है तथा नयी-नयी वस्तुएं बनकर सामने आ जाती है।
इस लेख मे हम उपभोक्ता प्रबंधन क्या है, उपभोक्ता प्रबंधन का अर्थ, परिभाषा, उपभोक्ता प्रबंधन हेतु आवश्यक शर्ते और उपभोक्ता प्रबंधन की विशेषताएं एवं  महत्व जानेगें।

उपभोक्ता प्रबंधन का अर्थ (upbhokta prabandhan ka arth)

उपभोक्ता या क्रेता का अर्थ उपभोक्ता की उन क्रय आदतों, आचरणों, प्रवृत्ति या व्यवहार से है, जिनसे प्रेरित होकर वह वस्तुओं या सेवाओं को क्रय करने का निर्णय लेता है।
उपभोक्ता-व्यवहार दो शब्दों से मिलकर बना है- उपभोक्ता एवं व्यवहार। यहां पर उपभोक्ता से तात्पर्य क्रेताओं से है और व्यवहार का तात्पर्य विशिष्ट आचरण या तरीके से है। इस प्रकार उपभोक्ता व्यवहार का तात्पर्य क्रेताओं द्वारा किए जाने वाले उन आचरणों से लगाया जाता है, जिनसे प्रेरित होकर वे माल को खरीदने का निर्णय लेते है। इस प्रकार से उपभोक्ता व्यवहार यह निर्णय लेने की प्रक्रिया है कि उपभोक्ता क्या, कब, कैसे व कहाँ से क्रय करेगा।

उपभोक्ता प्रबंधन की परिभाषा (upbhokta prabandhan ki paribhasha)

गोथे के अनुसार " क्रय करते समय किसी व्यक्ति के सम्पूर्ण व्यवहार को उपभोक्ता व्यवहार कहा जाता है।"
वाल्टर एवं पाल के अनुसार " उपभोक्ता व्यवहार एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमे व्यक्ति यह निर्णय लेता है कि वस्तुओं और सेवाओं का क्रय करना है, तो क्या, कब, कहाँ और किससे क्रय करना है।"
स्टिल, कण्डिफ तथा गोवोनी " क्रेता या उपभोक्ता व्यवहार एक क्रमबद्ध प्रक्रिया है, जिसके अन्तर्गत कोई व्यक्ति बाजार, स्थान या उत्पाद एवं सम्बन्धी निर्णय लेने के लिए अपने पारस्परिक वातावरण से प्रभावित होता है।"
निष्कर्ष के रूप मे कह सकते है कि उपभोक्ता व्यवहार से आश्य उपभोक्ता की उन क्रय आदतों आचरण होकर वह वस्तुओं अथवा सेवाओं को क्रय करने का निर्णय लेता है।

उपभोक्ता प्रबंधन हेतु आवश्यक शर्ते 

1. ग्राहक की मनोवृत्ति जानना जरूरी है।
2. उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं की पहचान होनी चाहिए।
3. ग्राहकों की आवश्यकताओं तथा अपेक्षाओं को नमूना सर्वेक्षण के द्वारा जाना जा सकता है।
4. विक्रयकर्ता या उधमी को ग्राहक से मधुर सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए।
6. उपभोक्ता द्वारा किसी विशेष स्टोर या दुकान से वस्तुएं इसलिए भी खरीदते है कि उनको वहाँ उचित आदर-सम्मान दिया जाता है।

उपभोक्ता प्रबंधन की प्रकृति एवं विशेषताएं (upbhokta prabandhan visheshta)

1. एक व्यापक प्रक्रिया
उपभोक्ता व्यवहार एक व्यापक शब्द एवं प्रक्रिया होती है, जिसमें व्यक्तिगत एवं घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ संस्थागत उपभोक्ताओं का व्यवहार भी सम्मिलित है।
2. एक गतिशील प्रक्रिया
उपभोक्ता का व्यवहार अपने आप मे गतिशीलता रखता है, उसका प्रत्येक समय व स्थान पर अलग-अलग व्यवहार होता इतना ही नही जैसे-जैसे समय, परिस्थितियाँ स्थिति, सामाजिक व मानसिक एवं शारीरिक स्थिति की गतिशीलता परिवर्तित होती है, वैसे ही उपभोक्ता व्यवहार की गतिशीलता भी बदलती जाती है।
3. विपणन का मुख्य आधार
उपभोक्ता व्यवहार को विपणन का मुख्य आधार इसलिए कहना उचित होगा कि " उपभोक्ता व्यवहार विपणन प्रबंधन की आधारशिला (नींव) है, जिस पर विपणन टिका हुआ है।
4. अनिश्चित तत्व/परिवर्तनशील
उपभोक्ता व्यवहार सदैव एक समान नही रहता। यह उम्र, आय, पेशा, परिवार, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, वातावरण मे एवं उसके अच्छे-बूरे मुड़ से उसके व्यवहार मे भी परिवर्तन होता रहता है। विज्ञापन के विभिन्न माध्यमों से प्राप्त अनेकानेक सूचनाएं प्रभावित करके क्रय व्यवहार परिर्तित हो जाता है, जो हर बार निश्चित तत्व की तरह काम करता है।
5. मानवीय व्यवहार का महत्वपूर्ण अंग
सम्पूर्ण मानव व्यवहार के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण अंग उपभोक्ता व्यवहार भी होता है, प्रत्येक मनुष्य एक उपभोक्ता होता है, जिसे वह व्यावहारिक रूप से अपने जीवन के अधिकतम समय मे जी लेता है। अतः यह अधिकतम समय ही उपभोक्ता प्रबंध के लिए विशेष महत्वपूर्ण है।

6. क्रय-निर्णयन प्रक्रिया 
श्रीमान कुर्ज तथा बून का कहना है कि " एक व्यक्ति का क्रय-व्यवहार उसकी सम्पूर्ण क्रय-निर्णयन प्रक्रिया है, न केवल क्रय प्रक्रिया का चरण " उपभोक्ता प्रबंध मे उपभोक्ता द्वारा किसी उत्पाद के क्रय का निर्णय लेना ही अध्ययन का मुख्य उद्देश्य है।"
7. अनेक तत्वों के प्रभावों का परिणाम
उपभोक्ता व्यवहार एक ऐसा परिणाम होता है, जिसमें विभिन्न अलग-अलग तत्वों का प्रभाव शामिल होता है, जो उसके व्यवहार को नियंत्रित करती है। जैसे- व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, सांस्कृतिक घटक तथा विभिन्न विपणन सूचनाओं के प्रभावों का सामूहिक परिणाम होता है, उपभोक्ता व्यवहार।

उपभोक्ता प्रबंधन का महत्व तथा उपयोगिता (upbhokta prabandhan ka mahatva)

1. उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन करने से उपभोक्ताओं के व्यवहार के सभी पहलुओं की व्यापक जानकारी प्राप्त हो जाती है। इससे विपणनकर्ता सही प्रकार का विपणन मिश्रण तैयार कर सकता है।
2. उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन करना एक सतत प्रक्रिया है, जो निरंतर चलती रहती है। इससे विपणनकर्ताओं को ग्राहकों के व्यवहार मे होने वाले परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त होती रहती है।
3. विपणन नियोजन करते समय उपभोक्ता के व्यवहार को प्रभावित करने वाले समस्त तत्वों पर विचार करना आवश्यक होता है। इस प्रकार से उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन विपणन नियोजन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण होता है।
4. उत्पाद विकास तथा नियोजन मे उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन आवश्यक होता है। उत्पादित वस्तु के रंग, डिजाइन, किस्म, पैकिंग आदि के निर्धारिण मे उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन उपयोगी रहता है।

5. उत्पादित वस्तु के मूल्य निर्धारण मे वस्तु की लागत के साथ-साथ उपभोक्ता व्यवहार को भी दृष्टिगत रखा जाता है। इसमे क्रेताओं के वर्ग तथा उनकी प्रवृत्तियों को ध्यान मे रखा जाता है।
6. उपभोक्ता व्यवहार का अध्ययन करके यह ज्ञात किया जा सकता है कि उपभोक्ता कौन-सी वस्तु कहाँ से खरीदना पसंद करते है। इस आधार पर विपणनकर्ता वितरण नीति तथा वितरण श्रंखला का निर्धारण कर सकते है।
7. विपणन प्रबंधक उपभोक्ताओं कि क्रय निर्णयन प्रक्रिया के अनुसार ही विक्रय संवर्ध्दन के लिए विज्ञापन, अभियान, व्यक्तिगत विक्रय, प्रचार, जनसम्पर्क आदि सम्बंधित नीतियों का निर्धारण करते है।
8. वर्तमान समय मे ग्राहकों की रूचि एवं फैशन मे तेजी से परिवर्तन हो रहे है। उपभोक्ता व्यवहार के अध्ययन मे विपणनकर्ताओं को ग्राहकों को रूचि व फैशन मे होने वाले परिवर्तन की जानकारी प्राप्त होती है।
संदर्भ; मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, लेखक डाॅ. सुरेश चन्द्र जैन
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