पृथ्वी क्या हैं? पृथ्वी की उत्पत्ति, विकास एवं संरचना


पृथ्वी क्या हैं?  पृथ्वी किसे कहते हैं? (prithvi kya hai)

पृथ्वी वह ग्रह है जिस पर हम रहते है। यहां के पर्वत, नदियाँ जलाशय, वन, मरूस्थल, जीव-जन्तु आदि आकर्षण का केंद्र है।
अंतरिक्ष से देखने पर, हरियाली एवं जल
के कारण पृथ्वी का धरातल हरे व नीले रंग का दिखाई देता है। केवल इस ग्रह पर ही जल है और वह भी विपुल मात्रा मे। यहाँ ताप भी न तो बहुत अधिक है और न ही बहुत कम। पृथ्वी पर वायुमण्डल है। इस वायुमंडल मे प्रमुख रूप से नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन हाईऑक्साइड, जल वाष्प और सूक्ष्म मात्रा मे ओजोन आदि उपस्थित है।
आज के लेख मे हम जानेंगे पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई? पृथ्वी का जन्म, पृथ्वी का विकास कैसे हुआ, पृथ्वी की संरचना कैसी हैं, पृथ्वी की तीनों परतों के बारें में तो बने रहिए इस लेख के साथ।
पृथ्वी

ताप, ऑक्सीजन एवं जल की उपयुक्त परिस्थितियों के कारण केवल पृथ्वी ही जीवधारी ग्रह है। यहाँ का वायुमंडल जीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चूँकि हम पृथ्वी पर रहते है अतः हमें इसकी उत्पत्ति, विकास और संरचना जानने की सहज मे ही उत्सुकता होती है। आइए हम पृथ्वी की उत्पत्ति, विकास एवं संरचना के विषय मे जानें---

पृथ्वी की उत्पत्ति कैसे हुई? (prithvi ki utpatti kaise hui)

पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य से अलग हुए पदर्थ (पिण्ड) के धीरे-धीरे ठण्डे होने से हुई है। प्रारंभ मे पृथ्वी ठंडी चट्टानों का एक समूह थी। पृथ्वी की इन चट्टानों मे रेडियोधर्मी पदार्थ जैसे यूरेनियम, थोरियम और पोटोशियम-40 आदि थे। इन रेडियोधर्मी पदार्थो के स्वाभाविक विघटन से विपुल ऊष्मा उत्पन्न हुई। इस विपुल ऊष्मा एवं गुरूत्वीय संकुचन ने पृथ्वी का ताप इतना अधिक कर दिया कि पृथ्वी द्रवित हो गई। मूल पृथ्वी ग्रह के अस्तित्व मे आने के 80 करोड़ वर्ष बाद द्रवीकरण की यह घटना हुई।

पृथ्वी का विकास कैसे हुआ? (prithvi ka vikas kaise huaa)

जब पृथ्वी का द्रवीकरण हुआ तो गुरूत्व के प्रभाव से इसके पदार्थ मे पुनर्व्यवस्था प्रारंभ हो गई द्रवित लोहा सबसे भारी होने के कारण पृथ्वी के केन्द्रीय भाग मे एकत्रित हुआ। जिससे पृथ्वी के क्रोड (core) का निर्माण हुआ। सबसे हल्के भाग जो पहले पृथ्वी के केन्द्र मे थे सबसे ऊपर आ गये इस चट्टानी भाग से भूपर्पटी का निर्माण हुआ। माध्यम घनत्व का पदार्थ भूपर्पटी और क्रोड के बीच मे एकत्रित हुआ जिससे (mantle) का निर्माण हुआ।
द्रवित पृथ्वी का भिन्न-भिन्न घनत्वों की परर्तों मे विभाजन अवकलन कहलाता है। इस अवकलन के कारण ही पृथ्वी की तीन परतों क्रोड (core), प्रावार (mantel), और भूपर्पटी (crust), का निर्माण हुआ। अवकलन की अवधि मे पृथ्वी की चट्टानों के बीच मे उपस्थित जल-वाष्प और विभिन्न गैसों के अणु मुक्त हुए। जल-वाष्प ने संघनित होकर समुद्रों का निर्माण किया और गैसों से वायुमंडल का निर्माण हुआ।

पृथ्वी की संरचना (prithvi ki aantarik sanrachna)

पृथ्वी कई परतों से मिलकर बनी है। प्रत्येक परत का भिन्न-भिन्न संघटन है। इस आधार पर पृथ्वी को निम्न तीन परतों मे विभक्त माना गया हैं---
1. भूपर्पटी
अन्तरिक्ष से देखने पर पृथ्वी लगभग गोलाकार गेंद की भांति दिखाई है। इस गोलाकार पृथ्वी की भूपर्पटी की संतरे के छिलके से तुलना की जा सकती है। भूपर्पटी हल्की चट्टानों से बनी है। इन चट्टानों मे मुख्य रूप से सिलिका है। सिलिका से बनी ये चट्टाने एल्यूमीनियम सिलिकेट से समृद्ध है। भूपर्पटी का घनत्व लगभग 3 ग्राम/सेमी/3 है। भूपर्पटी की मोटाई सर्वत्र एक समान नही है। समुद्र रहित भू-भाग पर इसकी मोटाई 40 किमी तक हो सकती है। समुद्र के नीचे की भूपर्पटी की मोटाई बहुत कम होती है। यह मोटाई 10 किमी. के लगभग होती है। भूपर्पटी का लगभग तीन चौथाई भाग समुद्र से घिरा है। पृथ्वी की इस पर्पटी के ऊपर लगभग 1600 किमी ऊँचाई तक वायुमंडल और आयनमण्डल है। पृथ्वी पर जीवन एवं वनस्पति के विकास का वरदान भूपर्पटी पर प्राप्त जल एवं मृदा से ही मिला है।
2. प्रावार
भूपर्पटी के निचले तल से 2900 किमी गहराई तक भू-भाग (परत) को प्रावार कहते है। यह भाग नेत्र से सीधे दृष्टिगोचर नही होता है। इसलिए इस भाग के संघटन का अध्ययन अन्य अप्रत्यक्ष विधियों से किया जाता है। यह परत लोहा, सिलिका और मैग्निशियम से समृद्ध है। प्रावार मे दाब का मान गहराई के साथ बढ़ता है। इस भाग मे उच्च दाब होने पर भी चट्टाने ठोस रूप मे ही रहती है। मेन्टल परत की निचली (पृथ्वी के केन्द्र के पास वाली) सतह पर उच्च ताप एवं दाब होता है। ताप एवं दाब की इन परिस्थितियों मे कुछ चट्टानें द्रवित होकर कोलतार की भांति बहने लगती हैं। प्रावार की ऊपरी सतह से निचली सतह की ओर पृथ्वी का घनत्व धीरे-धीरे परन्तु लगातार बढ़ता ही जाता है। प्रावार के ऊपरी तल का घनत्व 4 ग्राम/सेमी/3 और निचले तल का घनत्व 6 ग्राम/सेमी/3 होता हैं। प्रावार का निचला तल जहाँ समाप्त होता है उसके नीचे पृथ्वी का घनत्व तेजी से बढ़ता है।
3. क्रोड
पृथ्वी का केन्द्रीय भाग क्रोड कहलता है। क्रोड की त्रिज्या लगभग 3400 किमी है। यह अत्यंत गर्म भाग है। क्रोड मे मुख्यतः लोहा है। इस भाग मे कुछ निकिल भी उपस्थित है। क्रोड का ऊपरी भाग द्रवित लोहे का बना है। इसके केन्द्रीय भाग का ताप, लोहे के गलनांक से अधिक है फिर भी यह भाग ठोस लोहे का बना है। यहाँ लोहे के ठोस होने का कारण उच्च दाब है। क्रोड की ऊपरी भाग का दाब कम होता है अतः यह भाव द्रवित रहता है। इस प्रकार क्रोड की ऊपरी सतह से 1600 किमी की गहराई तक लोहा द्रवित रूप मे है। क्रोड के द्रवित लौहा भाग का घनत्व ऊपर से नीचे की ओर 10 ग्राम/सेमी/3 से 16 ग्राम/सेमी/3 तक परिवर्तित होता है। क्रोड के ठोस केन्द्रीय भाग का घनत्व 18 ग्राम/सेमी/3 हैं।

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