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9/10/2019

जजमानी व्यवस्था का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएं

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जजमानी व्यवस्था 

jajmani vyavastha arth paribhasha visheshtayen;जजमानी प्रथा के अन्तर्गत प्रत्येक जाति का एक निश्चित परम्परागत व्यवसाय होता है। इस व्यवस्था के अंर्तगत सभी जातियाँ  परस्पर एक-दूसरे की सेवा करती है ब्राहमण विवाह, उत्सव, त्यौहारो के समय दूसरी जातियों के यहां पूजा-पाठ करते है। नाई बाल काटने का काम करता है, धोबी कपड़े धोने का काम करता है, चमार जूते बनाने, जुलाहा कपड़े बनाने का काम करता है इसी प्रकार सभी जातियों एक-दूसरे के लिए सेवाएं प्रदान करती है। इसके बदले में भुगतान के रूप मे कुछ वस्तुऐ या रूपये दिये जाते है। इसी व्यवस्था को हम जजमानी प्रथा या जजमानी व्यवस्था के नाम से जानते है।
जजमानी प्रथा (व्यवस्था) का संक्षिप्त विवरण के बाद अब हम जजमानी (प्रथा) व्यवस्था का अर्थ, जजमानी व्यवस्था की परिभाषा और जजमानी व्यवस्था की विशेषताएं जानेंगे।

जजमानी व्यवस्था का अर्थ (jajmani vyavastha kya hai)

जजमानी व्यवस्था परम्परागत व्यवस्था पर निर्भर है। इस व्यवस्था में प्रत्येक जाति का एक निश्चित व्यवसाय तय हो जाता है जो परम्परागत होता है तथा यह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होता रहता है।
जजमानी व्यवस्था परम्परागत भारतीय ग्रामीण समाज की एक प्रमुख विशेषता रही है। इसमे वंशानुगत आधार पर जातियों के द्वारा अपने व्यावसायिक कर्तव्यों का परस्पर निर्वहन किया जाता है।

जजमानी व्यवस्था की परिभाषा (jajmani vyavastha ki paribhasha)

आस्कर लेविस के अनुसार," इस प्रथा के अन्तर्गत एक गाँव में रहने वाले प्रत्येक जाति-समूह से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अन्य जातियों के परिवारों को कुछ प्रमाणित सेवायें प्रदान करें।"
योगेन्द्र सिंह के अनुसार," जजमानी  व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जो गाँव के अन्तर्जातीय संबंधों मे पारस्परिकता पर आधारित संबंध द्वारा नियंत्रित होती है।"
रेड्डी के अनुसार," जजमानी व्यवस्था मे परम्परागत रूप से एक जाति का सदस्य दूसरी जाति को अपनी सेवाएं प्रदान करता है। ये सेवा संबंध पारंपरिक रूप से शामिल होते है एवं जजमान-परजन संबंध कहलाते है।"
ड्यूमा के अनुसार," जजमानी व्यवस्था वंशानुगत व्यक्तिगत संबंधों के माध्यम से श्रम विभाजन को व्यक्त करती है। यह आर्थिक प्रणाली के साथ सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है।"
जजमानी व्यवस्था का अर्थ और परिभाषा को जानें के बाद अब हम जजमानी व्यवस्था की विशेषताएं जानेंगे--

जजमानी व्यवस्था की विशेषताएं (jajmani vyavastha ki visheshta)

जजमानी व्यवस्था की निम्न विशेषताएं हैं--
1. सामुदायिक संगठन में सहायक 
जजमानी व्यवस्था के अन्तर्गत विभिन्न ऊँची-नीची जातियाँ को पारस्परिक रूप से एक-दूसरे की सेवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। इस पारस्परिक आश्रितता तथा निर्भरता के कारण ग्रामीण समाज का संगठन सुदृढ़ बना रहता है। इस प्रकार ग्रामीण समुदाय के लोगों में सामूहिक इच्छा और संगठन की भावना विकसित होती है।
2. मानसिक सुरक्षा 
जजमानी प्रथा के कारण परिजन के जीवन निर्वाह का साधन पूर्व निश्चित होता है। व्यक्ति को यह सोचना नही पड़ता है कि उसको क्या व्यवसाय करना है।
3. शान्ति व सन्तोष की भावना 
यह व्यवस्था ग्रामीण समुदाय के सदस्यों को सन्तोष व शांति प्रदान करती है। परजनों के व्यवसाय पैतृक तथा परम्परागत होने के कारण उन्हें नये धंधे को ढूंढना नहीं पड़ता है।
4. स्थायी सम्बन्ध
इस व्यवस्था का प्रथम लक्षण यह है कि इसमें जजमान और परजन के मध्य स्थायी सम्बन्ध पाये जाते हैं।
5. पैतृक सम्बन्ध
जजमान और परजन के मध्य पाये जाने वाले सम्बन्धों का स्वरूप पैतृक होता है। जजमानी अधिकार सम्पत्ति के अधिकारों के समान ही होते ।
6. घनिष्ठ सम्बन्ध
जजमानी व्यवस्था मे परजन और जजमान के सम्बन्धों मे घनिष्ठा होती है। वे एक-दूसरे के कार्यों को लगन से करते है।
7.  व्यावसायिक आधार
जजमानी व्यवस्था मे जातियों के द्वारा अपनी निर्धारित व्यवसाय के आधार पर सेवाएं प्रदान की जाती है। इन सेवाओं को प्राप्त करने वाला जजमाना सेवा प्रदाताओं को आवश्यक वस्तुएं, अनाज, वस्त्र इत्यादि प्रदान करता है। चूंकि जाति का निर्धारण अपना पेशा होता है। अतः दूसरी जाति का व्यक्ति उन कार्यों को नही कर सकता
8. जाति पर आधारित 
जजमानी व्यवस्था मुख्यतः जातियों के व्यवसायों उनकी सेवाओं पर आधारित है। ग्रामीण समाज मे आज भी विभिन्न जातियों के कार्य निश्चित है जैसे लोहार लोहे का काम करता है, नाई बाल कटाने का काम करता है, बढ़ई लकड़ी का, कुमार बर्तन बनने का कार्य करता है। इन विभिन्न जातियों के पारस्परिक सहयोग से एक दूसरे की आवश्यकताएं पूरी होती है।
9. पुरस्कारों मे समानता नही होती 
सेवकों के कार्यों का कोई निश्चित पारिश्रमिक नही होता है। यह बहुत कुछ जजमानों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है कि उसे किस परिवार से किस अवसर पर कितना पारिश्रमिक अथवा हक प्राप्त होता है। एक धनी जजमान के यहाँ धोबी, नाई, नाइन तथा अन्य सेवकों को अच्छा उपहार और वस्तुएं प्राप्त होती है अपेक्षाकृत किसी निर्धन जजमान के। 
10. पारस्परिक कर्त्तव्य बोध और अधिकार 
जजमानी व्यवस्था मे कर्तव्य और अधिकार दोनों ही साथ-साथ चलते है। यदि जजमान को सेवक से काम लेने का अधिकार है तो उसका यह पुनीत कर्तव्य भी है कि उसके काम के एवज मे उसे उसका हक भी दिया जाय जिससे उसके जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। इसीलिए उसके सेवा के एवज मे मुद्रा या वस्त्र अथवा अन्न आदि दिए जाते है।
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