8/14/2020

ग्रामीण गुटबंदी का अर्थ, परिभाषा एवं विशेषताएं

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ग्रामीण गुटबंदी का अर्थ (gramin gutbandi ka arth)

विशेष हितों की पूर्ति के आधार पर प्रत्येक समाज मे कुछ अलग-अलग समूह तैयार हो जाते है। यह समूह परस्पर विरोधी होते है जैसा कि "गूट" शब्द से ही स्पष्ट होता है "अलग समूह"। फर्थ के अनुसार "गुट समाज के वे भाग अथवा वे समूह है जो एक दूसरे के विरोधी होते है एवं सम्पूर्ण समाज के बजाय वे अपने उद्देश्यों को बढ़ावा देते है। गुट तुलनात्मक रूप से छोटा समूह होता है जिसमे गुट का नेता अपने समूह के लोगों की राजनीति,सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति मे सहायक होता है। गुट को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है--
गुट की परिभाषा " गुट शब्द का प्रयोग ऐसे राजनीतिक समूह को सन्दर्भित करने के लिए किया जाता है जो सकारात्मक सामाजिक प्रकार्य करता है।
ग्रामीण समाज मे बहारी तौर पर एक जुटता दिखाई देती है क्योंकि विभिन्न अवसरों पर सभी ग्रामीण मिल-जुल कर सहभागिता करते है। लेकिन आंतरिक रूप से निहित स्वार्थों के पूर्ति के लिए ग्रामीण समाज मे गुट तैयार हो जाते है। प्रायः ऐसे गुट धन बल, संख्यात्मक शक्ति, जातिगत सबंध, नातेदारी संबंध आदि के आधार पर परस्पर विरोधी समूह के रूप मे तैयार हो जाते है।

ग्रामीण गुट की विशेषताएं 

1. ग्रामीण गुट राजनीतिक समूहों के रूप मे कार्य करते है।
2. ग्रामीण गुट एक सार्वजनिक तत्व है जो भारतीय राजनैतिक जीवन मे अनिवार्यतः पाया जाता है।
3. सामान्यतः ग्रामीण गुट शक्ति समूह के रूप मे ही कार्य करते है।
4. निकोलस के अनुसार गुट संघर्षकारी एवं राजनैतिक समूह है, सामूहिक समूह नही। इसके सदस्यों की भर्ती विभिन्न सिद्धांतों के आधार पर एक एक नेता द्वारा की जाती है।
5. गाँवों मे सामान्यतः विभिन्न गुटों मे परस्पर तनाव एवं संघर्ष पाया जाता है परन्तु कुछ अवसरों पर सहयोग भी देखा जा सकता है।
6. गुटों का नामकरण नेतृत्व एवं वंश समूहों के आधार पर होता है।
7. गाँवों मे जाति एवं नातेदारी के आधार पर भी गुट पाये जाते है।
8. गाँवों मे विभिन्न गुटों के बीच तनाव का मुख्य कारण मुकदमेबाजी या मारपीट सोता है।

गुट बनने के कारण

ऑस्कर लेविस ने उत्तर भारत के गाँव रामपूर के अध्ययन के दौरान गुट की अवधारणा को प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने अध्ययन मे स्थानीय छोटे-छोटे 12 समूहों का अध्ययन किया। जिन्हे स्थानीय भाषा मे "धड़े" कहा जाता है। अपने अध्ययन मे गुट निर्माण के जिन कारणों का उल्लेख लेविस ने किया है। वे इस प्रकार है--
1. भूमि के उत्तराधिकार के प्रश्न पर विवाद,
2. कृषि संबंधी विवाद-जैसे सिंचाई के अधिकार के लिए संघर्ष आदि,
3. यौन अपराध संबंधी विवाद,
4. विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष से संबंधित विवाद।
यद्यपि लेविस द्वारा वर्णित उपर्युक्त कारण ही गुट निर्माण के मुख्य कारण है। परन्तु इसके अतिरिक्त एक प्रमुख कारण यह भी है कि वे भूमि एवं जीवन-यापन के पर्याप्त साधन के अभाव मे एक संगठन या समूह की आवश्यकता महसूस करते है जिससे वह जीवन की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति मे आने वाली बाधाओं को दूर कर सके। परस्पर सहायता हेतु बनाया गया यह समूह ही कालान्तर मे गुट का रूप ले लेता है।
ग्रामीण भारत मे गुटों या गुटबन्दी की भूमिका
भारतीय ग्रामीण समुदायों मे गुटों की सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों प्रकार की भूमिका रही है। ऑस्कर लेविस ने अपने अध्ययन मे पाया कि यद्यपि गुट अपने हितों के आधार पर पस्पर विरोधी समूह है लेकिन गुट ग्रामीण समाज मे समन्वित इकाई के रूप मे कार्य करते है। जन्म, मृत्यु, विवाह आदि अवसरों पर कर्मकाण्डीय कार्यों मे मिलकर भाग लेते है। आपसी वैमनस्य को प्राथमिकता न देकर विशेष अवसरों पर आवश्यक सहायता प्रदान करते है।
गुट अपने आंतरिक संगठन के लिए लाभप्रद होते है, एक गुट के सदस्य आपस मे घनिष्ठ रूप से अंतः संबंधी होते है। आवश्यकता पड़ने पर अपने समूह के सदस्यों की मदद भी करते है।
गाँव मे गुटबन्दी के जहाँ कुछ प्रकार्यात्मक आधार है वही गुटबन्दी ग्रामीण समाज मे संघर्ष का कारण भी रही है। गाँव मे गुटबन्दी ने अवांछित संघर्ष की स्थितियों को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के लिए गांव मे किसी किसान के खेत से रास्ता निकलने के लिए आपसी टकराव व्यक्तिगत स्तर पर छोटा विवाद हो सकता है, लेकिन संबंधित व्यक्ति यदि किसी गुट का सदस्य है तो यह छोटा-सा विवाद भी बड़ा रूप ले सकता है।
कुछ विद्वानों का कहना है कि गुटबन्दी ने परम्परागत ग्रामीण समुदायों का स्वरूप ही बदल दिया है। परम्परागत रूप से ग्रामों मे विभिन्न जातियों मे सेवाओं के विनिमय की व्यवस्था (जजमानी व्यवस्था) पाया जाती थी जो गुटों के निर्माण मे सहायक नही थी। परन्तु प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति ने ग्रामीण समुदायों को गुटबन्दी का अखाड़ा बना दिया है। आज ग्रामों मे गुटबन्दी इतनी अधिक हो गई है कि इससे सारी विकास योजनाये अवरूद्ध होने लगी है। एक तरफ, सत्ताधारी गुट इन योजनाओं का लाभ अपने सदस्यों को देना चाहता है तो दूसरी ओर पराजित गुट सामूहिक रूप से इन योजनाओं का विरोध करना शुरू कर देते है। इससे ग्रामीण भारत का विकास उतना नही हो पाया है जितना कि हो सकता था।
गुटबन्दी के कारण ग्राम्य समुदायों मे पायी जाने वाली सामुदायिक भावना पूरी तरह से समाप्त होती जा रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जनसाधारण को यह समझना होगा कि विभिन्न सरकारी योजनाओं, जो ग्रामीण विकास से सम्बंधित है, कि सफलता उनके अपने विकास के रास्ते खोलने मे सहायक है। अतः विभिन्न गुटों को नकारात्मक दृष्टिकोण छोड़कर ग्रामीण विकास हेतु सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि ग्रामीण विकास का लाभ सभी ग्रामवासियों को मिल सके।

ग्रामीण गुटबंदी के आधार या प्रकार 

1. जाति के आधार पर
2. वैवाहिक सम्बन्धों के आधार पर
3. परम्परागत शत्रुता के आधार पर
4. परिवार के आधार पर
5. वंश के आधार पर
6. गाँवों के आधार पर
7. उत्तराधिकार के आधार पर
8. भूस्वामित्व के आधार पर
9. सिंचाई सम्बंधित झगड़े
10. गोद लेने के आधार पर
11. यौन सम्बन्धी झगडे
जब कोई व्यक्ति किसी लड़की को भगा कर ले जाता है या अन्य कोई यौन सम्बन्धी अपराध कर देता है, तो गाँव मे इसके सम्बन्ध में दो मत वाले लोग उत्पन्न हो जाते है, एक उसका पक्ष लेता है तो दूसरे विपक्ष हो जाता है जो उसका विरोध करता है।
12. नैतिकता के आधार पर
13. चुनाव के आधार पर
14. हत्याएँ
जब गांव मे किसी व्यक्ति की हत्या कर दी जाती है तो इस सम्बन्ध मे भी गुट बन जाते है। एक हत्यारे के पक्ष मे तो दूसरा हत्यारे के विपक्ष मे।
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