3/26/2022

अनुसूचित जनजाति किसे कहते हैं? विशेषताएं

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अनुसूचित जनजाति किसे कहते हैं? (aunsuchiti janjati kya hai)

26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के बाद ही जनजातियों एवं जनजाति को 'अनुसूचित जनजाति' की विशिष्ट संज्ञा देने की जरूरत महसूस हुई। भारत सरकार के अधिनियम, 1935 में 'पिछड़ी जनजातियों' का संदर्भ है एवं भारत सरकार के आदेश 1936 की तेरहवीं अनुसूचि के अंतर्गत असम, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रांत तथा बेराट, मद्रास और बम्बई की कुछ जनजातियों को पिछड़ी जनजातियों की श्रेणी में रखा गया था। 

सर्वप्रथम 'आदिम जनजातियों' को अनुसूचित करने का प्रयत्न 1931 की जनगण के समय हुआ था। 

जब स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण का कार्य चल रहा था उस समय भारतीय आदिवासियों (जंगल में निवास करने वाली जातियों को विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न नामों से संबोधित किया हैं, जैसे रिजले आदि कई विद्वानों ने इन्हें 'आदिवासी' कहा हैं, हट्टन ने इन्हें 'आदिम जातियाँ' कहा है, सर बेन्स ने इन्हें 'पर्वतीय जनजातियाँ' कहा हैं, सेल्जनिक तथा मार्टिन ने इन्हें 'सर्वजीव वाही' कहा हैं, धूरिये ने इन्हें आदिवासी अथवा पिछड़े हिन्दू कहा हैं। इनके उत्थान के लिए विशेष प्रावधान रखे गये। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 330 में इन आदिवासियों अथवा जनजातियों के नाम गिनाकर एक सूची तैयार की गई। इसलिए इन सबको एक संवैधानिक नाम अनुसूचित जनजातियाँ कहा जाता हैं। 

अतः स्पष्ट है कि 'अनुसूचित जनजाति' एक संवैधानिक शब्दावली हैं, जिसका प्रथम प्रयोग भारतीय संविधान में हुआ हैं। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार देश के 26 राज्यों तथा केन्द्र शासित राज्यों में लगभग 106 विविध भाषाएं बोलने वाले 460 समुदायों को 'अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में रखा गया हैं। उल्लेखनीय है कि देश के दो राज्यों पंजाब तथा हरियाणा एवं तीन केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली, चंडीगढ और पांडिचेरी में जनजातियाँ न होने के कारण इन्हें जनजाति अनुसूचित में निर्दिष्ट नहीं किया गया हैं।

अनुसूचित जनजातियों की विशेषताएं (anusuchiti janjati ki visheshta)

अनुसूचित जनजातियों की विशेषताओं को जनजातियों को सामान्य विशेषताओं से पृथक् करना एक कठिन कार्य है फिर भी, अनुसूचित जनजातियों में पाई जाने वाली प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है-- 

1. अनुसूचित जनजातियाँ आर्थिक दृष्टि से अधिक पिछड़ी हुई हैं। उनकी अर्थव्यवस्था अत्यन्त सरल तथा अविकसित होती है। 

2. अनुसूचित जनजातियों की आधे से अधिक (55 प्रतिशत) जनसंख्या पूर्वी तथा मध्य जनजातीय क्षेत्रों (पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा तथा आन्ध्र प्रदेश का कुछ भाग) तथा एक - चौथाई से थोड़ा अधिक (28 प्रतिशत) भाग पश्चिमी जनजातीय क्षेत्र (गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, गोवा, दादरा व नगर हवेली, दमन तथा दीव) में निवास करता है। 

3. अनुसूचित जनजातियाँ शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं। 2001 ई. की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की अखिल भारतीय साक्षरता दर 47.1 प्रतिशत है, जबकि साक्षरता का राष्ट्रीय औसत 64.8 प्रतिशत है। जनजातीय महिलाओं तथा सामान्य महिलाओं में साक्षरता के प्रतिशत में और अधिक अन्तर है। जनजातीय महिलाओं की साक्षरता का औसत केवल 34.8 प्रतिशत है, जबकि देश की सामान्य महिलाओं का साक्षरता का औसत 53.7 प्रतिशत है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए इनके शैक्षिक उत्थान हेतु अनेक योजनाएँ प्रारम्भ की गई हैं। 

4. अनुसूचित जनजातियों हेतु पंचायतों तथा स्थानीय निकायों से लेकर राज्य विधानसभाओं तथा लोकसभा तक आरक्षित स्थानों की व्यवस्था की गई है ताकि नीति निर्माण में इनकी समुचित सहभागिता सुनिश्चित हो सके। 

5. अनुसूचित जनजातियों को केन्द्र तथा राज्य सरकारों की सेवाओं में आरक्षण सुविधाएँ प्रदान की गई हैं। इन्हें नौकरियों में आयु सीमा में छूट, उपयुक्तता के मापदण्डों में छूट तथा अनुभव सम्बन्धी योग्यताओं में छूट प्रदान की गई है ताकि नौकरियों में इनका समुचित प्रतिनिधित्व हो सके। 6. अनुसूचित जनजातियाँ स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पिछड़ी हुई हैं । इसका प्रमुख कारण इन्हें आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध न हो पाना है। 

7. अनुसूचित जनजातियों के कल्याण एवं विकास हेतु राज्यों में कल्याण विभागों की स्थापना की गई है, जोकि जनजातीय कल्याण कार्यों की देख-रेख करते हैं। इनके विकास हेतु इनके बीच कार्य कर रहे गैर सरकारी स्वैच्छिक संगठनों को भी अनुदान प्रदान किए जाते हैं। अनुसूचित जनजाति की महिलाओं और बच्चों के हित सुरक्षित करने के लिए केन्द्रीय कल्याण राज्यमन्त्री की अध्यक्षता में सलाहकार बोर्ड की स्थापना की गई है। 

8. पंचवर्षीय योजनाओं में अनुसूचित जनजातियों के विकास हेतु विशेष प्रावधान किए जाते हैं। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में आदिवासियों के विका तथा कल्याण से सम्बन्धित अनेक कार्यक्रमों तथा योजनाओं को स्थान दिया गया है। आदिवासी उपयोजना कार्यक्रम का लक्ष्य है-- गरीबी को दूर करना। बीस सूत्री कार्यक्रमों में सर्वोच्च स्थान गरीबी के विरुद्ध संघर्ष को दिया गया था। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में पूरे देश में अधिकाधिक आदिवासियों को गरीबी की रेखा से ऊपर उठाने का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। 

9. आर्थिक शोषण अनुसूचित जनजातियों की एक प्रमुख समस्या है। इस समस्या के समाधान हेतु भारतीय जनजातीय विपणन विकास संघ की स्थापना की गई है ताकि इनका आर्थिक शोषण कम हो सके। वन से प्राप्त सामग्रियों के विपणन के सम्बन्ध में सहकारी समितियों की स्थापना की गई है। मध्य प्रदेश में अब नई तेंदू पत्तों की नीति से ठेकेदारों के आदमी आदिवासियों का शोषण नहीं कर पाएँगे, क्योंकि तेंदू पत्ता एकत्र कराने का कार्य सहकारिता के अन्तर्गत आ गया है। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की दृष्टि से सरकार के द्वारा समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी कार्यक्रम आदि को आदिवासी क्षेत्रों में लागू किया गया है। 

10. संविधान की पाँचवीं अनुसूची में अनुसूचित क्षेत्र वाले तथा राष्ट्रपति के निर्देश पर अनुसूचित आदिम जातियों वाले राज्यों में आदिम जाति के लिए सलाहकार परिषदों की स्थापना की व्यवस्था है। आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, गुजरात, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा राजस्थान में ऐसी परिषदों की स्थापना की जा चुकी है। ये परिषदें आदिवासियों के कल्याण सम्बन्धी विषयों पर राज्यपालों को परामर्श देती हैं।

11. अनुसूचित जनजातियों की समस्याओं के अध्ययन एवं उनके समाधान के कारगर उपायों की खोज करने के उद्देश्य से आदिवासी शोध संस्थान एवं प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की गई है। भारत में छठी पंचवर्षीय योजना के पूर्व भुवनेश्वर (1953 ई.), कोलकाता (1955 ई.), पटना (1959 ई.), पुणे, अहमदाबाद, शिलांग (1962 ई.), हैदराबाद (1963 ई.), उदयपुर (1968 ई.), कालीकट, लखनऊ (1971 ई.) तथा गुवाहाटी (1977 ई.) में ऐसे अनेक शोध केन्द्रों की स्थापना की गई है। इन विभिन्न शोध केन्द्रों ने आदिवासियों की समस्याओं के सन्दर्भ में 168 विविध सर्वेक्षणात्मक एवं शोधपूर्ण अध्ययन किए हैं। 

12. केन्द्र तथा राज्य सरकारों के द्वारा अनुसूचित जनजातियों के लिए बनाए गए संवैधानिक तथा कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है तथा इसके प्रभावशाली क्रियान्वयन पर भी अधिक जोर दिया जा रहा है।

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