8/14/2020

जजमानी व्यवस्था के गुण एवं दोष

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जजमानी व्यवस्था के गुण अथवा महत्व (jajmani vyavastha ke gun aur dosh)

1. आर्थिक सुरक्षा
जजमानी व्यवस्था के माध्यम से व्यक्ति अपने पैतृक व्यवसाय के माध्यम से आजीविका उपार्जित करते है और इस आधार पर उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी स्थानीय आधार पर हो जाती है।
2. मानसिक सुरक्षा
सेवा प्रदाता जातियां अपने सेवा योजकों से यह अपेक्षा रखते है कि वे आवश्यकता पड़ने पर मदद करेंगें। विभिन्न अध्ययनों से यह प्रमाणित हो चुका है कि जजमानी सेवा लेने के बदले मे सेवाप्रदाता को संकटकालीन परिस्थितियों मे आकस्मिक सहायता भी प्रदान करता है। परम्परागत व्यवसाय के कारण रोजगार प्राप्त करने की मानसिक संघर्ष से भी मुक्ति मिलती है। इस तरह स्पष्ट होता है कि जजमानी व्यवस्था मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है।
3. सामाजिक बीमा
जजमानी व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक परजन का अनिवार्य सामाजिक बीमा हो जाता है। अतः दुर्घटना, मृत्यु अथवा बीमारी या लड़की के विवाह आदि के अवसर पर जजमान से अनिवार्य रूप से सहायता मिलती है। इसलिए जजमान व्यवस्था के अन्तर्गत सभी परजन निश्चिन्त रहते है तथा अपने जजमान के भरोसे पर रहते है।
4. सामुदायिक संगठ मे सहायक
जजमानी व्यवस्था के अन्तर्गत विभिन्न ऊँची-नीची जातियों को पारस्परिक रूप से एक-दूसरे की सेवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। इस पारस्परिक आश्रितता तथा निर्भरता के कारण ग्रामीण समाज का संगठन सुदृढ़ बना रहता है। अतः ग्रामीण समुदाय के लोगों मे सामूहिक इच्छा और संगठन की भावना विकसित होती है।
5. घनिष्ठ संबंध
जजमानी प्रथा के कारण जजमान तथा परजन वर्ग मे सम्बन्धों की घनिष्ठता पाई जाती है। वे एक-दूसरे के कार्यों को लगन से करते है।जजमान के यहाँ विवाह आदि के अवसर पर जजमान को पूर्ण सहयोग देते है। जजमान भी अपने परजन की सहायता करता है। परजन के सभी कार्य उनके जजमानों की सहायता से सम्पन्न होते है। इस प्रकार इन दोनों पक्षों की निकटता तथा सम्बंधों की घनिष्ठता से परस्पर अपनत्व या निजीपन विकसित होता है। इसमे आपस मे मालिक-मजूदर जैसे सम्बन्ध नही है।
6. विशेषीकरण
इस व्यवस्था मे परजन अपना काम परम्परागत रूप से करता है। अतः वह एक ही कार्य करते करते अपने कार्य मे कुशलता प्राप्त कर लेता है।

जजमानी व्यवस्था के दोष अथवा हानियाँ 

1. जातिवाद का विकास
इस व्यवस्था के कारण जातिवाद का अत्यधिक विकास हुआ है। किसी एक प्रकार के कार्य को करने के लिए किसी विशेष जाति के लोगों को बुलाया जाता है और इन्हें जाति से सम्बोधित किया जाता है, उनमे जातिगत भावना का विकास होता है।
2. गतिशीलता का अभाव
जजमानी व्यवस्था चूँकि जातिगत व्यवस्था पर आधारित है। अतः स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति समुदाय मे स्थानीय आधार पर होती रही है। इस तरह जजमानी व्यवस्था स्थिर व्यवस्था का पर्याय बन जाती है। जिसमे, पद, स्थान, पेशे की गतिशीलता का अभाव होता है।
3. बेगार प्रथा को प्रोत्साहन
बेगार का अर्थ है बिना पैसे दिये काम करवाना। जजमानी व्यवस्था ने सदैव बैगार को प्रोत्साहन दिया है।
4. रूढ़िवादिता को प्रोत्साहन
जजमानी व्यवस्था परंपरागत कार्यों पर आधारित है अतः इसमे नवीन परिवर्तन की गुंजाइश नही होती। व्यक्ति अपने कार्य कौशल को बढ़ाने का कोई उपक्रम नही करता।
5. राष्ट्रीय एकता मे बाधक
जजमानी व्यवस्था के कारण ग्रामीण सामाजिक संगठन स्वतंत्रता एवं प्रभुसत्ता का अनुभव करता है। इस कारण राष्ट्रीय एकता एवं एकीकरण मे अवरोध उत्पन्न होता है, क्योंकि ये ग्रामीण समुदाय के प्रति निष्ठा भाव रखते थे और दूसरों को अपने से पृथक समझते थे।
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